शुक्रवार, 22 अक्तूबर 2010

..तब ढेरों पदक ढलते हैं

पी.टी.ऊषा
जीवन सूत्र . पी.टी.उषा ने खेल के मैदान में देश का नाम कई बार रोशन किया और अब अनगढ़ प्रतिभाओं को खोजकर निखार रही हैं। उषा की कहानी, उन्ही की Êाुबानी..

री पैदाइश केरल के छोटे से गांव मेलाडी पयोल्ली की है। परिवार साधारण था, लेकिन मेरी अभिलाषा पूरी करने के लिए उन्होंने जी-जान लगा दी। ६क् के दशक की वे यादें आज भी ताज़ा हैं, जब मेरे माता-पिता ने एहसास भी नहीं होने दिया कि मैं कोई ग़लत इच्छाएं पाल रही हूं। १३ साल की उम्र से लगातार मिले हौसले ने मुझे पयोल्ली एक्सप्रेस और उड़नपरी के नाम से मशहूर कर दिया। परिवार को यक़ीन था कि मैं कामयाब एथलीट बन सकती हूं। उसी यक़ीन ने मुझे सबसे पहले बल और भरोसा दिया। बच्चों में फूटने वाली रोशनी को माता-पिता पहचान सकते हैं।
हर मोर्चे पर संघर्ष
अफ़सोस होता है, यह देखकर कि लोगों का सारा ध्यान क्रिकेट में लगा है। देश के खेल अधिकारियों को देखकर खेद होता है, जो इतना भी यक़ीन दिलाने में नाकाम रहते हैं कि विदेश दौरे में हमारे साथ ठीक बर्ताव होगा। जब मेरा करियर चोटी पर था और तमगों पर मीडिया मुझे शाबाशी दे रहा था, उस व़क्त भी मुझे उतना आदर नहीं मिला, जितना इस देश में क्रिकेट के एक रिटायर खिलाड़ी को मिलता है। यह सब महसूस करके मुझे बेहद पीड़ा हुई है। लेकिन अपने सपने को साकार करने और देश का नाम ऊंचा उठाने के लिए मैने ज़िंदगी के हर मोर्चे पर लड़ाई लड़ी है।
उस पल की कसक
लॉस एंजेलिस में संपन्न १९८४ के ओलिंपिक खेल में ४क्क् मीटर की रेस में एक सेकेंड के सौवें हिस्से के फ़र्क़ ने मुझे कांस्य पदक जीतने से वंचित कर दिया। मैं आज भी उस पल को याद करती हूं कि कैसे चूक गई थी। फिर मुझे कोच की वह सीख याद आती है- ऐसा कुछ भी नहीं हुआ है कि पीछे देखा जाए।
सपनों को लगे पंख
आख़िरकार2002में उन लड़कियों के सपनों को पंख लगे, जो मुझसे प्रेरित थीं। केरल सरकार की १५ लाख रुपए और ३क् एकड़ ज़मीन की मदद से मैं उषा स्कूल ऑफ एथलेटिक्स को आकार देने में कामयाब हो गई। आठ लड़कियां, जिन्हें मैं तैयार कर रही हूं, अब वही मेरा परिवार हैं। उनकी लगन और गंभीरता हैरान कर देती है।
विश्वास तो करें
अगर सभी खेलों को एक नज़र से देखा जाए, तो कल्पना कीजिए कि ये लड़कियां क्या कर सकती हैं? एक व़क्त शंका और दुविधा का था कि क्या भारत अंतरराष्ट्रीय एथलेटिक्स के दायरे में कोई जगह बना सकता है? लेकिन आज मैं दावे के साथ कह सकती हूं, कि हम जीत सकते हैं। कॉमनवेल्थ में लड़कियों ने इतिहास रचकर यह साबित भी कर दिया। हम मेडल की झड़ी लगा सकते हैं, लेकिन जब आप विश्वास करें। मेरे माता-पिता के विश्वास का नतीजा सामने है। उसी विश्वास के साथ मैंने भी उन बच्चियों को तराशने की छोटी-सी कोशिश की है।

1 टिप्पणी:

  1. सच में बहुत मेहनत से मिलते हैं पदक.... यह प्रेरणा देने वाली जानकारी बांटने के लिए
    थैंक्स अंकल

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