मंगलवार, 18 जनवरी 2011

रास्ते की रुकावट

विद्यार्थियों की एक टोली पढ़ने के लिए रोज़ाना अपने गांव से 6-7 मील दूर दूसरे गांव जाती थी।

एक दिन जाते-जाते अचानक विद्यार्थियों को लगा कि उन में एक विद्यार्थी कम है। ढूंढने पर पता चला कि वह पीछे रह गया है। से एक विद्यार्थी ने पुकारा, ‘तुम वहां क्या कर रहे हो?’उस विद्यार्थी ने वहीं से उदर दिया, ‘ठहरो, मैं अभी आता हूं।’
यह कह कर उस ने धरती में गड़े एक खूटे को पकड़ा। ज़ोर से हिलाया, उखाड़ा और एक ओर फेंक दिया फिर टोली में आ मिला।’उसके एक साथी ने पूछा, ‘तुम ने वह खूंटा क्यों उखाड़ा? इसे तो किसी ने खेत की हद जताने के लिए गाड़ा था।’
इस पर विद्यार्थी बोला, ‘लेकिन वह बीच रास्ते में गड़ा हुआ था। चलने में रुकावट डालता था। जो खूंटा रास्ते की रुकावट बने, उस खूंटे को उखाड़ फेंकना चाहिए।’वह विद्यार्थी और कोई नहीं, बल्कि लौह पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल थे।

भागवत-१७०: माता यशोदा ने क्यों बांधा बालकृष्ण को ?

पिछले अंक में हमने पढ़ा कि माता यशोदा दूध उफनता देख बालकृष्ण को अतृप्त छोड़कर दूध उतारने चली जाती हैं। गुस्से में बालकृष्ण दही की मटकी फोड़ देते हैं। यशोदाजी जब वापस आती हैं तो देखती हैं कि दही का मटका फूटा पड़ा है। वे समझ गईं कि यह सब मेरे लाला की करतूत है। इधर-उधर ढूंढने पर पता चला कि श्रीकृष्ण एक उलटे हुए ऊखल पर खड़े हैं और छीके पर का माखन ले-लेकर बंदरों को खूब लुटा रहे हैं।

उन्हें यह भी डर है कि कहीं मेरी चोरी खुल न जाए इसलिए चौकन्ने होकर चारों ओर ताकते जाते हैं। यह देखकर यशोदारानी पीछे से धीरे-धीरे उनके पास जा पहुंची। जब श्रीकृष्ण ने देखा कि मां हाथ में छड़ी लिए मेरी ही ओर आ रही है, तब झट से ओखली पर से कूद पड़े और डरकर भागने लगे। उन्हें पकडऩे के लिए यशोदाजी भी दौड़ीं। श्रीकृष्ण का हाथ पकड़कर वे उन्हें डराने लगीं। तब माता यशोद ने श्रीकृष्ण को ओखल से बांधने का निश्चय किया। बांधने के लिए वे जिस भी रस्सी को उठाती, वही छोटी पडऩे लगती।
काफी प्रयास करने के बाद भी जब यशोदा कृष्ण को नहीं बांध पाई तो परेशान हो गई। इस घटना का अभिप्राय है कि भगवान को तो केवल भावों से बांधा जा सकता है, क्रोध और अहंकार से भगवान बंधने वाले नहीं। माता ने सारे प्रयास कर डाले लेकिन कृष्ण बंध नहीं पाए। दो अंगुल रस्सी कम पड़ गई, एक अंगुल भक्ति की और दूसरी भावना की। भगवान् श्रीकृष्ण ने देखा कि माता बहुत थक गई हैं तब कृपा करके वे स्वयं ही बंधन में बंध गए। इस प्रकार भगवान ने स्वयं बंधन स्वीकार कर लिया।

विदुरजी ने युधिष्ठिर को क्या गुप्त बात कही?

जब राजा धृतराष्ट्र के कहने पर पाण्डव वारणावत जाने लगे तो विदुरजी ने युधिष्ठिर को सांकेतिक भाषा में कहा कि नीतिज्ञ पुरुष को शत्रु का मनोभाव समझकर उससे अपनी अपनी रक्षा करनी चाहिए। एक ऐसा अस्त्र है जो लोहे का तो नहीं है परंतु शरीर को नष्ट कर सकता है (अर्थात शत्रुओं ने तुम्हारे लिए एक ऐसा भवन तैयार किया है जो आग से तुरंत भड़क उठने वाले पदार्थों से बना है।)


आग घास-फूस और जीव सारे जंगल को जला डालती है परंतु बिल में रहने वाले जीव उससे अपनी रक्षा कर लेते हैं। यही जीवित रहन का उपाय है (अर्थात उससे बचने के लिए तुम एक सुरंग तैयार करा लेना।)
अंधे को रास्ता और दिशा का ज्ञान नहीं होता। बिना धैर्य के समझदारी नहीं आती। (अर्थात दिशा आदि का ज्ञान पहले से ही तैयार कर लेना ताकि रात मे भटकना न पड़े।)
शत्रुओं के दिए हुए बिना लोहे के हथियार को जो स्वीकार करता है वह स्याही के बिल में घुसकर आग से बच जाता है। (अर्थात उस सुरंग से यदि तुम बाहर निकल जाओगे तो उस भवन की आग में जलने से बच जाओगे।)
जिसकी पांचों इंद्रियां वश में है, शत्रु उसकी कुछ भी हानि नहीं कर सकता (अर्थात यदि तुम पांचों भाई एकमत रहोगो तो शत्रु तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ सकेगा।
विदुरजी की सारी बात युधिष्ठिर ने अच्छी तरह से समझ ली। तब विदुरजी हस्तिनापुर लौट गए। यह घटना फाल्गुन शुक्ल अष्टमी, रोहिणी नक्षत्र की है।

यहां दुर्योधन को पूजने की है परंपरा...


द्वापर युग श्रीकृष्ण का युग माना जाता है। इस युग में कई महान और तेजस्वी लोगों ने जन्म लिया। जिनकी आज भी पूजा की जाती है। इन पूजनीय लोगों में श्रीकृष्ण सहित माता यशोदा, राधा, नंद बाबा, पांडव, भीष्म आदि शामिल है। सामान्यत: दैवीय शक्तियों और अच्छाई के प्रतीक लोगों को पूजा जाता है लेकिन कुछ ऐसे क्षेत्र हैं जहां बुराई के प्रतीक दुर्योधन को पूजा जाता है।
महाभारत युद्ध के खलनायक श्रीकृष्ण द्रोही दुर्योधन को सामान्यत: बुराई का प्रतीक माना जाता है। क्योंकि दुर्योधन ने जीवन भर अहं और ईष्र्या के वश में होकर हमेशा अधर्म का साथ दिया। परंतु कुछ लोगों की आस्था का केंद्र है दुर्योधन। वे दुर्योधन को भगवान के समान मानते हैं और उसकी पूजा करते हैं। उन लोगों के लिए सभी देवताओं के पहले दुर्योधन की प्रमुख देवता है।केरल के एक जिले कोल्लम दुर्योधन के भक्त हैं जो सभी देवताओं से पहले दुर्योधन की पूजा करते हैं। उसके बाद वहां श्रीगणेश आदि देवताओं को पूजा जाता है।एक अन्य स्थान है जहां दुर्योधन आराध्य देव है। यह स्थान उत्तराखंड में स्थित है। वहां एक क्षेत्र है हर की दून, जहां के गांव वाले दुर्योधन की पूजा करते हैं। उन लोगों का मानना है कि दुर्योधन ही उनकी सारी मुसीबतों और इच्छाओं की पूर्ति करते हैं।उत्तरांचल के कुछ गांव ऐसे हैं जहां पांडवों का नाम लेना तक अनुचित समझा जाता है और दुर्योधन को भगवान माना जाता है।

ये हैं श्री गणेश की 32 मंगलमूर्तियां


श्री गणेश बुद्धि और विद्या के देवता है। जीवन को विघ्र और बाधा रहित बनाने के लिए श्री गणेश उपासना बहुत शुभ मानी जाती है। इसलिए हिन्दू धर्म के हर मंगल कार्य में सबसे पहले भगवान गणेश की उपासना की परंपरा है। माना जाता है कि श्री गणेश स्मरण से मिली बुद्धि और विवेक से ही व्यक्ति अपार सुख, धन और लंबी आयु प्राप्त करता है।
धर्मशास्त्रों में भगवान श्री गणेश के मंगलमय चरित्र, गुण, स्वरुपों और अवतारों का वर्णन है। भगवान को आदिदेव मानकर परब्रह्म का ही एक रूप माना जाता है। यही कारण है कि अलग-अलग युगों में श्री गणेश के अलग-अलग अवतारों ने जगत के शोक और संकट का नाश किया। इसी कड़ी में शास्त्रों में बताए गए है भगवान श्री गणेश के 32 मंगलकारी स्वरूप -
श्री बाल गणपति - छ: भुजाओं और लाल रंग का शरीर
श्री तरुण गणपति - आठ भुजाओं वाला रक्तवर्ण शरीर
श्री भक्त गणपति - चार भुजाओं वाला सफेद रंग का शरीर
श्री वीर गणपति - दस भुजाओं वाला रक्तवर्ण शरीर
श्री शक्ति गणपति - चार भुजाओं वाला सिंदूरी रंग का शरीर
श्री द्विज गणपति - चार भुजाधारी शुभ्रवर्ण शरीर
श्री सिद्धि गणपति - छ: भुजाधारी पिंगल वर्ण शरीर
श्री विघ्न गणपति - दस भुजाधारी सुनहरी शरीर
श्री उच्चिष्ठ गणपति - चार भुजाधारी नीले रंग का शरीर
श्री हेरम्भ गणपति - आठ भुजाधारी गौर वर्ण शरीर
श्री उद्ध गणपति - छ: भुजाधारी कनक यानि सोने के रंग का शरीर
श्री क्षिप्र गणपति - छ: भुजाधारी रक्तवर्ण शरीर
श्री लक्ष्मी गणपति - आठ भुजाधारी गौर वर्ण शरीर
श्री विजय गणपति - चार भुजाधारी रक्त वर्ण शरीर
श्री महागणपति - आठ भुजाधारी रक्त वर्ण शरीर
श्री नृत्त गणपति - छ: भुजाधारी रक्त वर्ण शरीर
श्री एकाक्षर गणपति - चार भुजाधारी रक्तवर्ण शरीर
श्री हरिद्रा गणपति - छ: भुजाधारी पीले रंग का शरीर
श्री त्र्यैक्ष गणपति - सुनहरे शरीर, तीन नेत्रों वाले चार भुजाधारी
श्री वर गणपति - छ: भुजाधारी रक्तवर्ण शरीर
श्री ढुण्डि गणपति - चार भुजाधारी रक्तवर्णी शरीर
श्री क्षिप्र प्रसाद गणपति - छ: भुजाधारी रक्ववर्णी, त्रिनेत्र धारी
श्री ऋण मोचन गणपति - चार भुजाधारी लालवस्त्र धारी
श्री एकदन्त गणपति - छ: भुजाधारी श्याम वर्ण शरीरधारी
श्री सृष्टि गणपति - चार भुजाधारी, मूषक पर सवार रक्तवर्णी शरीरधारी
श्री द्विमुख गणपति - पीले वर्ण के चार भुजाधारी और दो मुख वाले
श्री उद्दण्ड गणपति - बारह भुजाधारी रक्तवर्णी शरीर वाले, हाथ में कुमुदनी और अमृत का पात्र होता है।
श्री दुर्गा गणपति - आठ भुजाधारी रक्तवर्णी और लाल वस्त्र पहने हुए।
श्री त्रिमुख गणपति - तीन मुख वाले, छ: भुजाधारी, रक्तवर्ण शरीरधारी
श्री योग गणपति - योगमुद्रा में विराजित, नीले वस्त्र पहने, चार भुजाधारी
श्री सिंह गणपति - श्वेत वर्णी आठ भुजाधारी, सिंह के मुख और हाथी की सूंड वाले
श्री संकष्ट हरण गणपति - चार भुजाधारी, रक्तवर्णी शरीर, हीरा जडि़त मुकूट पहने।

सोमवार, 17 जनवरी 2011

प्रार्थना के बीच में

एक सेठ एक साधु से मिलने आया। साधु को प्रणाम करके उसने कहा, 'बाबा, मैं प्रार्थना करना चाहता हूं, लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद नहीं कर पाता। जब भी मैं ध्यान लगाने की कोशिश करता हूं तभी मेरे आगे दुनियावी चीजें आ खड़ी होती हैं। धन कमाने और पारिवारिक तनाव के बारे में सोचने लग जाता हूं। आप ही बताइए मुझे प्रार्थना में मन लगाने के लिए क्या करना चाहिए?' यह सुनकर साधु महाराज सेठ को एक ऐसे कमरे में ले गए जिसकी खिड़कियों में शीशे लगे हुए थे। साधु ने सेठ को कांच के पार बाहर का नजारा दिखाया। शीशों से पेड़, उस पर चहकते पक्षी व दूसरी कई चीजें नजर आ रही थीं। यह देखकर सेठ प्रसन्न हो गया। उसके बाद साधु उसे एक दूसरे कमरे में लेकर गए। वहां कमरों की खिड़कियों पर चांदी की चमकीली परत लगी हुई थी। साधु बोले, 'सेठ जी, जरा देखो तो इस चांदी की चमकीली परत के पार आप क्या देख पाते हैं?'
सेठ चांदी की चमकीली परत के पास गया तो उसे अपने चेहरे के सिवाय और कुछ नहीं दिखा। बाहर के मनोरम दृश्य उस परत में खो गए थे। यह देखकर सेठ बोला, 'बाबा, यहां तो बाहर की दुनिया ही गायब है। चांदी की चमकीली परत में तो मुझे सिवाय अपने चेहरे के कुछ भी दिखाई नहीं पड़ता जबकि कांच में से मुझे बाहर के मनोरम दृश्य दिखाई पड़ रहे थे।' सेठ की बात सुनकर साधु बोले, 'बिल्कुल सही कहा तुमने। इसी तरह तुम भी प्रार्थना करते समय अपने ऊपर चांदी की परत चढ़ाए रखते हो इसलिए उसमें तुम्हें अपनी शक्ल और अहं के अलावा कुछ और नजर नहीं आता। यदि तुम स्वयं को कांच की तरह पारदर्शी और स्वच्छ बनाओगे तो तुम्हारा प्रार्थना में ध्यान सहज ही लग जाएगा।' सेठ को अपनी गलती का अहसास हो गया और उसने उसी क्षण निश्चय किया कि अब वह बेमतलब की चीजों को प्रार्थना के बीच में नहीं आने देगा।

माघ में ऐसे करें भगवान का पूजन


माघ मास स्नान, तप व उपवास के लिए श्रेष्ठ माना गया है। इस मास में यदि विधिपूर्वक भगवान माधव की पूजा की जाए तो सभी मनोकामनाओं की पूर्ति होती है। माघ मास में विधिपूर्वक भगवान माधव की पूजा से पूर्व प्रात:काल तिल, जल, पुष्प, कुश लेकर इस प्रकार संकल्प करना चाहिए-
ऊँ तत्सत् अद्य माघे मासि अमुकपक्षे अमुक-तिथिमारभ्य मकरस्त रविं यावत् अमुकगोत्र अमुकशर्मा (वर्मा/गोप्तोहं) वैकुण्ठनिवासपूर्वक श्रीविष्णुप्रीत्यर्थं प्रात: स्नानं करिष्ये।
इसके बाद निम्न प्रार्थना करें-
दु:खदारिद्रयनाशाय श्रीविष्णोस्तोषणाय: च।
प्रात:स्नानं करोम्यद्य माघे पापविनाशनम्।।
मकरस्थे रवौ माघे गोविन्दाच्युत माधव।
स्नानेनानेन मे देव यथोक्तफलदो भव।।
दिवाकर जगन्नाथ प्रभाकर नमोस्तु ते।
परिपूर्णं कुरुष्वेदं माघस्नानं महाव्रतम्।।
माघमासमिमं पुण्यं स्नानम्यहं देव माधव।
तीर्थस्यास्य जले नित्यं प्रसीद भगवन् हरे।।
माघमास की ऐसी महिमा है कि इसमें जहां कहीं भी जल हो, वह गंगाजल के समान होता है, फिर भी प्रयाग, काशी, नैमिषारण्य, कुरुक्षेत्र, हरिद्वार तथा अन्य पवित्र तीर्थों और नदियों में स्नान का बड़ा महत्व है।धर्मग्रंथों के अनुसार यदि इस प्रकार पूरे मास भगवान माधव का पूजन किया जाए तो वे अपने भक्तों की हर मनोकामना पूरी करते हैं।