सोमवार, 7 फ़रवरी 2011

मां सरस्वती का पूजन वसंत पंचमी पर ही क्यों?

कहते हैं जब ब्रह्मा ने विष्णु की आज्ञा से सृष्टी की रचना की विशेषकर मनुष्यों की रचना के बाद जब ब्रम्हा ने अपनी रचना को देखा तो उन्हें लगता था कि कुछ कमी रह गई है जिसके कारण चारों और मौन छाया रहता है। विष्णु से अनुमति लेकर उन्होने एक चर्तुभुजी स्त्री की रचना की जिसके एक हाथ में वीणा तथा दूसरा हाथ वर मुद्रा में था। अन्य दोनों हाथों में पुस्तक एवं माला थी।

ब्रह्मा ने देवी से वीणा बजाने का अनुरोध किया। जैसे ही देवी ने वीणा का मधुरनाद किया, संसार के समस्त जीव-जन्तुओं को वाणी प्राप्त हो गई। जलधारा में जैसे चेतना आ गई। पवन चलने से सरसराहट होने लगी।तब ब्रह्मा ने उस देवी को वाणी की देवी सरस्वती कहा।
सरस्वती को भगवती, शारदा, वीणावादनी और वाग्देवी सहित अनेक नामों से पूजा जाता है। ये विद्या और बुद्धि प्रदाता हैं। संगीत की उत्पत्ति करने के कारण ये संगीत की देवी भी हैं। बसन्त पंचमी के दिन को इनके जन्मोत्सव के रूप में भी मनाते हैं। ऋग्वेद में भगवती सरस्वती का वर्णन किया गया है। इनकी समृद्धि और स्वरूप का वैभव अद्भुत है। पुराणों के अनुसार श्रीकृष्ण ने सरस्वती से ख़ुश होकर उन्हें वरदान दिया था कि वसंत पंचमी के दिन तुम्हारी भी आराधना की जाएगी। वसंत पंचमी का दिन मां सरस्वती का जन्मदिन माना जाता है इसीलिए इस दिन उनकी आराधना की जाती है।

रविवार, 6 फ़रवरी 2011

छत्तीसगढ़ की खबरें

जबरदस्त पैदावार फसलों को रौंद रहे किसान
रायपुर प्रदेश में गोभी की जबरदस्त पैदावार ही किसानों के लिए मुसीबत बन गई। हालत यह कि सूबे के खेतिहरों को थोक में ५क् पैसे प्रति किलो का भाव भी नहीं मिल रहा। ऐसे मे किसान गोभी की खड़ी फसल पर ट्रैक्टर चला रहे या उखाड़ कर कूड़े में फेंक रहे हैं। हालांकि बाजार में फिलहाल गोभी चिल्हर में 5 से 10 रुपए/किलो बिक रही है। किसानों ने फसल नष्ट करना शुरू कर दिया है। महीनेभर पहले गोभी के भाव आसमान पर थे। यह थोक में 10 रुपए किलो तक बिकी, लेकिन अब इसका भाव ५क् पैसे किलो से नीचे चला गया है।

राजधानी के शास्त्री बाजार में शनिवार को 15 किलो का पैकेट पांच से 10 रुपए में बिका। यानी भाव इतना गिर गया कि गोभी को खेत से बाजार ले जाने का खर्चा भी वसूल नहीं हो पा रहा है। राजधानी के करीब गोमची, अटारी, कुम्हारी, मुरमुंदा, अछोटी सहित दो दर्जन गांवों में बड़े पैमाने पर गोभी की फसल लगी है।
किसान दिलीप गोहिल के 10 एकड़ में गोभी की फसल है। उन्हें 35 हजार रुपए प्रति एकड़ खर्च आया है लेकिन अभी तक 20-25 हजार रुपए की वसूली ही हो सकी है। अब दाम इतने गिर गए हैं कि तोड़ने के लिए घर से पैसे देने पड़ रहे हैं। इसलिए वे अपने तीन एकड़ की खड़ी फसल में ट्रैक्टर चला रहे हैं। रोटावेटर से गोभी को टुकड़ों में नष्ट कर रहे हैं।
उत्पादन से पैसे नहीं मिले तो कम से कम यह खाद के रूप में काम आ जाए। यही स्थिति महेंद्र वरू, सुनील सोलंकी, अशोक महिलांग, कमलेश चौहान की है। वे भी बैंक से फाइनेंस करके खेती कर रहे हैं, लेकिन इस साल कर्ज में डूब गए हैं। नंदन वन के पास गुमची गांव के किसान विजय चावड़ा ने तीन सौ पैकेट गोभी कूड़े में फेंक दी है।
बाहर भी नहीं भेज पा रहे
किसान इससे पहले के सालों में दूसरे राज्यों में गोभी भेजकर मुनाफा कमा लिया करते थे लेकिन इस वर्ष दूसरे राज्यों में भी खेती की अच्छी फसल हुई है। इस कारण राज्य से बाहर भेजना भी संभव नहीं हो पा रहा है।
05 हजार एकड़ में फसल
35 हजार रुपए/एकड़ का खर्च
20 करोड़ रुपए की लागत
60 करोड़ रुपए का नुकसान किसानों को
(5 रुपए/किलो बेचते तो 60 करोड़ का माल)
गोभी की बंपर पैदावार से दाम गिर गए हैं। किसान इसे फेंक रहे हैं। पड़ोसी राज्यों में भी गोभी की अच्छी पैदावार हो रही है।
टी श्रीनिवास रेड्डी, कोषाध्यक्ष शास्त्री मार्केट, रायपुर


अलमारी में बंद हैं सरकारी शिक्षा योजनाएं
रायपुर डीबी स्टार ने राज्य परियोजना कार्यालय द्वारा स्कूलों में संचालित योजनाओं की हकीकत जानने के लिए छापा मारा। सामने आया कि बच्चों की डाइट समेत अन्य जानकारी प्रदर्शित करने के लिए स्कूलों में नोटिस बोर्ड खरीदे ही नहीं गए हैं। इसी तरह मल्टीग्रेड-मल्टीलेवल किट और रेडियो तो अलमारियों में ही बंद पड़े हैं।

डीबी स्टार इन्वेस्टीगेशन में सामने आया कि सर्व शिक्षा अभियान के तहत केंद्र से राज्य को सत्र २क्क्९-१क् के लिए लगभग 18क्क् करोड़ रुपए मिले हैं। इन पैसों से शाला सुधार किया जाना है, लेकिन प्रदेश के बाकी जिले तो दूर राजधानी के स्कूलों में ही हालात बदतर हैं। राजीव गांधी शिक्षा मिशन के तहत सभी स्कूलों को डाइट डाटा बोर्ड खरीदने के आदेश हुए हैं इसके बावजूद तीन महीने बीतने के बाद भी इनका पालन नहीं हो सका।
ये लापरवाही तब है जबकि राज्य परियोजना कार्यालय से इनकी खरीदी के लिए राशि भेजी जा चुकी है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक राज्य में 32,840 प्राइमरी और 13,439 मिडिल स्कूल हैं, जिन्हें हर साल क्रमश: पांच और सात हजार रुपए शाला अनुदान के रूप में दिए जाते हैं।
यह राशि कहां खर्च हो रही है इसका कोई हिसाब नहीं मांगा जाता। इसी तरह से स्कूलों में बच्चों को अंग्रेजी भाषा सिखाने के लिए रेडियो की खरीदी की गई थी। टीम के छापे में सामने आया कि अधिकतर जगह या तो वे खराब हो चुके हैं या अलमारी में बंद पड़े हुए हैं।
इसी तरह से मल्टीग्रेड-मल्टीलेवल किट योजना के तहत पठन सामग्री दिए जाने के लिए जो प्रावधान किए गए हैं उनका भी मखौल उड़ाया जा रहा है। बच्चों को पढ़ाने के लिए इनका इस्तेमाल करने के बजाय इन्हें अलमारियों के हवाले कर दिया गया है। इस तरह से लापरवाही बरतते पकड़े गए स्कूलों केजिम्मेदारों से जब सीधी बात की गई तो वे अपनी गलती दूसरों पर ढोलने लगे। वे अपने बचाव में कह रहे हैं कि निगरानी समितियां अपना काम नहीं कर रही हैं, इसलिए योजनाएं सफल भी नहीं हो पा रही हैं।

सब कुछ पेटियों में रखा हुआ है
रामेश्वर पांडे, हेडमास्टर

शासन के निर्देश के तहत स्कूलों में बच्चों को दिए जाने वाले भोजन समेत अन्य जानकारी प्रदर्शित करने के लिए व्हाइट बोर्ड खरीदना है। इसी में डाइट डाटा प्रदर्शित करना है। आपने खरीद लिया, कहां लगा रखा है?
—कौन सा बोर्ड, मुझे नहीं पता.. हमने तो इस कागज पर सब चीजें लिख रखी हैं। अभी तक कोई लिखित आदेश नहीं मिला है। मिलने पर खरीद लेंगे।
अच्छा बच्चों को खेल-खेल में पढ़ाने के लिए कोई सामग्री है क्या?
(हेडमास्टर ने सामग्रियां दिखाने के लिए बंद पेटियों को खोलना शुरू किया लेकिन उसमें भी कुछ नहीं निकला..)
—कुछ खिलौने तो थे.. यहीं कहीं रखे होंगे। हम उनका इस्तेमाल बच्चों को पढ़ाने के लिए करते हैं। क्योंकि खेल से जितनी जल्दी कोई चीज सिखाई जा सकती है उसे सामान्य तौर पर सिखाना कठिन होता है।
अच्छा तो अंग्रेजी सिखाने के लिए रेडियो तो जरूर होगा, बच्चों को कौन से प्रोग्राम सुनवाते हैं?
—(अलमारी में देखा तो नहीं मिला..) अभी बनने के लिए दिया है।
अब तो नहीं बजता रेडियो
स्कूल में खिलौने तो नहीं देखे। रेडियो.. बहुत पहले सुना था, लेकिन अब तो वह भी नहीं बज रहा है। हम तो रोज ऐसे ही पढ़ाई करते हैं.. इसके लिए खेल सामग्रियां भी नहीं मिलतीं।
मुस्कान, छात्रा, तीसरी कक्षा, शासकीय प्राथमिक कन्या शाला, गुढ़ियारी

सब पर नजर रखना संभव नहीं है
सर्व शिक्षा अभियान के तहत हर साल करोड़ों रुपए स्कूलों में बांटे जाते हैं। इनसे डाइट डाटा बोर्ड, पढ़ाई की सामग्री और रेडियो खरीदना है। बोर्ड पर स्कूल से संबंधित हर जानकारी लिखनी है, तो बाकी चीजों का इस्तेमाल बच्चों की पढ़ाई के लिए होता है। प्रत्येक स्कूल को इसका पालन करना है। जांच समितियां इसकी मॉनीटरिंग करती हैं।
के.आर. पिस्दा, संचालक, सर्व शिक्षा अभियान

गजराज बन गया सरजू...

सूरगढ़ के राजा गजानंद सिंह के राज्य में घोड़ों से भी ज्यादा हाथी थे। राजा वर्ष में एक बार हाथी मेला आयोजित करवाते थे। इस मेले में हाथियों के बीच तरह-तरह की प्रतियोगिताएं होती थीं। सर्वश्रेष्ठ रहने वाले हाथी को गजराज की उपाधि दी जाती थी। गजराज बनने का मतलब होता था, हाथी के लिए वर्षभर खाने का इंतज़ाम राजा की ओर से और दूसरा हाथी के महावत को ईनाम के तौर पर ढेर सारी नकद राशि।

इस बार मेले में सरजू नाम का एक हाथी काफी चर्चा में था। यह पहली बार ही इस मेले में आया था। इसके महावत बिरजू ने हाथी को ह्रष्ट-पुष्ट बनाने और प्रशिक्षित करने में सालभर मेहनत की थी। इसी का परिणाम था कि सरजू आखरी परीक्षा के लिए चुने गए इन हाथियों में शामिल हो गया था। सभी को उम्मीद थी कि इस बार बिरजू का सरजू ही गजराज बनेगा।
आखरी परीक्षा के समय सभी हाथी दौड़ के लिए कतार में खड़े थे। तोप चलने की आवाज़ के साथ ही हाथियों को दौड़ शुरू होनी थी।
इस परीक्षा के समय सूरगढ़ के राजा गजानंद सिंह स्वयं उपस्थित थे। राजा, रानी और राजकुमार एक ऊंचे मंच पर बैठे थे। उनसे थोड़ा नीचे बने अन्य मंच पर राज्य के सामंत, सेठ और अधिकारी बैठे थे। उनसे नीचे दौड़ने के स्थान के दोनों तरफ बल्लियां लगाकर जन साधारण के खड़े होने की जगह बनाई हुई थी। हाथियों की दौड़ देखने काफी संख्या में लोग आए थे। सभी लोग गजराज को देखने के लिए उत्सुक थे। महावत भी खूब जोश में थे। इन दस हाथियों के महावतों में हर कोई यही सोच रहा था कि उसका हाथी ही गजराज बनेगा। पर सभी आशंकित भी थे और जीत के लिए मन ही मन प्रार्थना भी कर रहे थे। बिरजू सोच रहा था, ‘उसका सरजू गजराज बन गया तो उसे खूब पैसा मिलेगा। उनसे अपने टूटे घर की जगह नया घर बना लूंगा और अपने लिए एक खेत भी खरीद लूंगा।’
इतने में तोप से गोला छूटा, महावतों ने इशारा किया और हाथी दौड़ने लगे। लोगों ने भी आवाज़ें करके और तालियां बजाकर हाथी दौड़ का स्वागत किया। देखते ही देखते सरजू सबसे आगे निकल गया। लोग ‘सरजू-सरजू’ चिल्लाने लगे। सरजू आम लोगों की भीड़ के पास से गुज़र रहा था कि अचानक उसके कदम रुक गए। वह भीड़ में खड़े एक आदमी को ध्यान से देख रहा था। वह उसका महावत बिरजू नहीं था। फिर भी वह दौड़ को छोड़कर उसकी तरफ बढ़ा। इतने में दूसरे हाथी आगे निकल गए। यह देखकर लोग हैरान रह गए। ‘अरे! यह क्या हुआ?’ के अलावा उनके मुंह से कुछ नहीं निकल रहा था। सरजू की बदलती चाल को देखकर बिरजू भी कुछ समझ नहीं पा रहा था।
सरजू इस सबसे बेखबर बल्लियों से परे खड़े गांव के लोगों की ओर बढ़ा। हालांकि दौड़ के मैदान और उनके बीच लकड़ी की मज़बूत बल्लियां थीं, फिर भी कुछ लोग डर कर पीछे हट गए। सरजू सीधा वहीं खड़े एक आदमी के पास गया। बल्ली के ऊपर से उसने अपने सूंड को बढ़ाकर उस आदमी का सिर, कंधा और हाथ छूने लगा। ऐसा लगा, जैसे वह किसी बात के लिए उसे धन्यवाद दे रहा हो। उस आदमी ने भी अपने हाथ से सरजू की सूंड सहलाई और थपकी दी।
इसके बाद सरजू दौड़ने के स्थान पर आकर फिर दौड़ने लगा। तब तक दूसरे हाथी काफी आगे निकल चुके थे। बहुत पीछे दौड़ते सरजू पर अब लोग हंस रहे थे। यह नज़ारा राजा ने भी देखा। वे हैरान थे कि सबसे आगे दौड़ने वाला सरजू अचानक रुक क्यों गया था? वह भीड़ में खड़े उस आदमी के पास क्यों गया?
दौड़ खत्म हो चुकी थी। सभी लोग गजराज की घोषणा की प्रतीक्षा कर रहे थे। लेकिन राजा ने गजराज की उपाधि की घोषणा न करके अपने सैनिकों को भेजकर भीड़ में खड़े उस आदमी को बुलाया। राजा ने पूछा, ‘तुम कौन हो और यह हाथी रुक कर तुम्हारे पास क्यों आया?’
उसने कहा, ‘महाराज, मैं एक वैद्य हूं। गांव में रहता हूं। गरीबों और जानवरों का इलाज करता हूं। मैं ना तो सरजू का मालिक हूं और न ही महावत। मैं खुद ही नहीं समझा पाया था कि यह हाथी मेरे पास क्यों आया? लेकिन कई साल पहले जड़ी-बूटियों की खोजने के लिए मैं एक जंगल में गया था। वहां एक गड्ढे में हाथी का एक बच्चा घायल पड़ा था। मैंने गड्ढे में उतरकर उसके घावों पर दवा लगाई थी। दो-तीन दिन तक उसके घावों पर दवा लगाने से वह ठीक होने लगा था। उसके बाद मैं चला आया। हो ना हो वह बच्चा ही यह हाथी है। मैंने तो इसे नहीं पहचाना, लगता है, इसने मुझे पहचान लिया है और मुझे धन्यवाद देने आया था। मुझे खुशी के साथ अफसोस भी हो रहा है। मेरे कारण यह दौड़ से बाहर हो गया और गजराज कहलाने से रह गया।’
राजा ने पूछा, ‘तुम वैद्य हो तो वहां जनसाधारण में क्यों खड़े थे? राज्य के दूसरे वैद्य तो मंच पर सामंतों और अधिकारियों के साथ बैठे हैं।
महाराज, ‘मैं गांव के गरीबों का और जानवरों का इलाज करता हूं। अमीरों का इलाज करने वाले वैद्य हमें अपने से छोटा समझते हैं। हम उनके बराबर कैसे बैठ सकते हैं?’
यह सुनकर राजा को आश्चर्य हुआ। राजा ने कहा, ‘कम पैसे लेकर गांववासियों और मूक पशुओं का इलाज करने वाला छोटा कैसे हुआ? यदि हमारी राजधानी के वैद्यों की यह सोच है, तो यह बहुत गलत है। आज के बाद तुम अपने को छोटा मत समझना। राजा का इलाज करने वाला राजवैद्य कहलाता है और गांव में चिकित्सा करने वाला वैद्य, वैद्यराज कहलाएगा। जाओ, तुम उस मंच पर बैठ जाओ।’
राजा की यह घोषणा सुनकर राजवैद्य और नगर के दूसरे वैद्यों को अपनी सोच पर शर्म महसूस हुई। वे आगे आकर उस वैद्य को अपने साथ मंच पर लेकर गए। राजा ने हाथियों की तरफ देखा और बोले, ‘दौड़ में प्रथम आने वाला हाथी ही गजराज कहलाने का अधिकारी है। पर सरजू को भी हारा हुआ कैसे कहा जाए? भला करने वाले का अहसान मानना तो मानवीय गुण है। मनुष्य में यह गुण कम होता जा रहा है। पर पशु कहलाने वाले हाथी में अभी यह गुण ज़िंदा है। सरजू ने अहसान प्रकट करने के लिए जीत-हार की परवाह भी नहीं की। इसलिए में इस बार दो हाथियों को गजराज की उपाधि देता हूं। एक सरजू को और एक प्रथम आने वाले हाथी को। इसके बाद लोगों ने इतने ज़ोर से तालियां बजाईं और नारे लगाए कि राजा के आगे की बात किसी को सुनाई ही नहीं दी।
(www.bhaskar.com)

दंत कथाः हनुमान की भक्ति

शकीला एस हुसैन (bhaskar.com)
राम के आने की खुशी में जगह-जगह समारोह हो रहे थे। राम के भक्तों में काम बांटे जा रहे थे। किसी को सजावट और किसी को रोशनी के काम दिए गए। कुछ लोगों को भोजन और तरह-तरह के पकवान बनाने की ज़िम्मेदारी दी गईं तो कुछ लोगों को स्वागत और आवभगत की ज़िम्मेदारी दी गई। इस तरह से सारे काम भक्तों में बांट दिए गए।
उसी समय हनुमान वहां पहुंचे। वे राम के सामने हाथ जोड़ कर खड़े हो गए और कहने लगे, ‘भगवन, मुझे भी कुछ काम सौंप दीजिए। मैं तो आपका परम भक्त हूं।’ राम परेशान हो गए क्योंकि सारे कामों का विभाजन पहले ही हो चुका था। अब अगर किसी भक्त से काम वापिस लेकर हनुमान के हाथों में सौंपा जाता, तो वह भी उचित नहीं लगता। श्रीराम सोच में डूब गए। एकाएक श्रीराम को जम्हाई आई, तो उन्होंने चुटकी बजाकर सुस्ती भगाई और चुटकी के साथ ही श्रीराम को एक विचार आया। उन्होंने हनुमान जी से कहा, ‘हनुमान तुम्हरा कार्य यह है कि जब भी मैं जम्हाई लूं, तुम चुटकी बजाना।’ हनुमान जी ने हाथ जोड़कर कार्य स्वीकार कर लिया। भगवान ने एक बार फिर जम्हाई ली और हनुमान जी ने तुरंत चुटकी बजाई।
कुछ समय बाद श्रीराम आराम करने के लिए अपने शयन कक्ष में चले गए और हनुमान जी सजग होकर द्वार के बाहर बैठ गए। उसी समय हनुमान जी को ख्याल आया कि अगर उनके स्वामी श्रीराम को जम्हाई आ गई तो वह चुटकी बजाने से वंचित रह जाएंगे और वह अपने कर्तव्य से चूक जाएंगे। इसलिए उन्होंने लगातार चुटकियां बजाना शुरू कर दी। उसी समय राम को भी हनुमान की स्वामीभक्ति का विचार आया और वे समझ गए कि हनुमान जी लगातार चुटकियां बजा रहे होंगे। राम जम्हाई पर जम्हाई लेने लगे ताकि उनके भक्त की चुटकी व्यर्थ न चली जाए। उधर हनुमान जी चुटकी पर चुटकी बजाते रहे कि कहीं भगवान की एक भी जम्हाई चुटकी से वंचित न रह जाए। यह सिलसिला रात भर चलता रहा।
इस पर सीता जी परेशान हो गइ कि यह राम को कैसा रोग लग गया है। न कुछ बोलते हैं और न कुछ बताते, बस जम्हाई पर जम्हाई लेते जा रहे हैं। सुबह होते ही सीता ने लक्ष्मण को राजवैद्य को बुलवाने के लिए भेजा। लक्ष्मण जी के लिए जैसे ही द्वार खुला वैसे ही श्रीराम ने जम्हाई लेना बंद कर दिया और हनुमान जी ने चुटकी बजाना बंद कर दिया।
अब सीता और लक्ष्मण आश्चर्य चकित हो गए। राम ने दोनों को पूरी बात बताई और हनुमान जी की ईश्वर भक्ति की खूब प्रशंसा की। बाद में राम ने हनुमान जी से चुटकी बजाने का कठिन काम वापिस ले लिया और उन्हें स्वागत करने वालों में शामिल कर दिया। लोग आज भी हनुमान जी की रामभक्ति को याद करते हैं। और जम्हाई लेते समय चुटकी बजाने की परम्परा तो आज भी जारी है। हो सकता है इस परम्परा की शुरुआत उसी समय से हुई हो।

आज है देव पूजा का ऐसा अद्भुत योग

हिन्दू माह के माघ माह में कल सोमवार (7 फरवरी) को देव पूजा का अद्भुत और कलहनाशक योग बना है। इस दिन विनायक चतुर्थी, माघ माह की गुप्त नवरात्रि और सोमवार के पुण्य योग पर श्री गणेश के साथ शक्ति पूजा और शिव उपासना बल, बुद्धि और सभी सांसारिक सुखों की चाहत को पूरा करने के लिए बहुत शुभ होगी।
माघ माह के शुक्ल पक्ष को विनायक चतुर्थी पर श्री गणेश उपासना का विशेष दिन है। इस दिन श्री गणेश की पूजा बुद्धि के साथ सिद्धि और संतान प्राप्ति के लिए अहम मानी जाती है।
सोमवार के दिन बने इस दुर्लभ योग पर श्री गणेश, शक्ति और शिव पूजा की सरल विधि यहां बताई जा रही है -
- सुबह स्नान कर साफ वस्त्र पहनकर घर या देवालय में शिव परिवार की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें।
- शंकर, पार्वती, श्री गणेश को पंचामृत यानि दही, दूध, शहद, घी, शक्कर से स्नान कराएं। अंत में शुद्ध जल से स्नान कराएं।
- पंचामृत स्नान के बाद कम से कम पंचोपचार पूजा यानि गंध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य पूजा जरुर करें।
- पूजा में जहां तक संभव हो हर देवता की पूजा के लिए विशेष सामग्री जरुर चढ़ाएं। जैसे श्री गणेश के लिए दूर्वा, शंकर के लिए बिल्वपत्र, माता के लिए लाल चुनरी और लाल पुष्प आदि।
- पुत्र कामना, बुद्धि प्राप्ति और विघ्र नाश की इच्छा से श्री गणेश को 11 या 21 लड्डुओं का भोग लगाएं।
- हर कामना पूर्ति करने के लिए शिव पूजा में नारियल चढ़ाएं और हर तरह से शक्ति संपन्नता के लिए देवी को हलवे का भोग लगाएं।
- आरती कर शिव परिवार का स्मरण का सुख-सौभाग्य की कामना करें।
- आरती के बाद जानकारी होने पर श्री गणेश, देवी, शिव के अलग-अलग स्त्रोत का पाठ भी करें या पूजा के दौरान इन सामान्य देव मंत्रों का उच्चारण कर लेंवे -
- श्री गणेशाय नम: या ऊँ गं गणपतये नम:
- ऊँ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चै या श्री देव्यै नम:
- ऊँ नम: शिवाय
- पूरे दिन बिना नमक और तेल का आहार ले। ब्रह्मयर्च का पालन करें। फलाहार लेना ही श्रेष्ठ होता है।
इस तरह सोमवार को विनायक और शिव-शक्ति की उपासना से संयम, सुख, शांति, शक्ति, स्वास्थ्य, धन , दाम्पत्य सुख, संतान सुख प्राप्त किया जा सकता है।
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भागवत १८३ - १८५: द्रोपदी ने कर्ण को देखा तो बोल पड़ी...

गंधर्व से कल्माषपद की और वशिष्ठ की महिमा सुनने के बाद सभी पांडवों ने धौम्य ऋषि को अपना पुरोहित बनाया और अपनी माता को लेकर द्रुपद श्रेष्ठ के देश उनके पुत्री द्रोपदी के विवाह को देखने चल पड़े। पांडव द्रुपद देश की ओर चलने लगे। रास्ते में उन्होने वेद व्यास के दर्शन किए। जब पाण्डवों ने देखा कि द्रुपद नगर निकट आ गया है तो उन्होने एक कुम्हार के घर डेरा डाल दिया और ब्राम्हा्रणों के समान भिक्षावृति करके अपना जीवन बिताने लगे। राजा द्रुपद के मन में भी इस बात की बड़ी लालसा था कि वे अपनी पुत्री का विवाह अर्जुन से किया। इसलिए अर्जुन को पहचानने के लिए उन्होंने एक ऐसा धनुष बनवाया जो कोई ओर ना तोड़ पाए। इसके अलावा उन्होंने एक ऐसा यंत्र टंगवा दिया जो चक्कर काटता रहे। द्रुपद ने यह घोषणा कर दी कि जो धनुष पर डोरी चढ़ाकर लक्ष्य का भेदन करेगा, वही मेरी पुत्री को प्राप्त करेगा।

युधिष्ठिर आदि राजा द्रुपद आदि उनका वैभव देखते हुए वहां आए और उन्हीं के पास बैठ गए।
धृष्टद्युम्र ने द्रोपदी के पास खड़े होकर मधुर वाणी में कहा यह धनुष है, यह और आप लोगों के सामने लक्ष्य है। आप लोग घूमते हुए यन्त्र में अधिक से अधिक पांच बाणों में जो भी लक्ष्य भेदन कर देगा द्रोपदी का विवाह उसी से होगा। ध्रष्टद्युम्र की बात सुनकर दुर्योधन, शाल्व, शल्य राजा और राजकुमारों ने अपने बल के अनुसार धनुष चढ़ाने की कोशिश की लेकिन ऐसा झटका लगा कि वे बेहोश हो गए और इसके कारण उनका उत्साह टूट गया। इन सभी को निराश देखकर धर्नुधर शिरोमणी कर्ण उठा।
उसने धनुष को उठाया और देखते ही देखते डोरी चढ़ा दी। उसे लक्ष्य वेधन करता देख द्रोपदी जोर से बोली मैं सुत पुत्र से विवाह नहीं करूंगी। कर्ण ने ईष्र्या भरी हंसी के साथ सूर्य को देखा और धनुष को नीचे रख दिया।उसके बाद शिशुपाल ने भी यही प्रयत्न और जरासन्ध ने भी प्रयास किया पर सफल नहीं हो पाए। उसी समय अर्जुन ने चित्त में संकल्प उठा कि मैं लक्ष्यवेधन करूं ।

बस सोचिए तो, हर काम आसान हो जाएगा
जगत के सब कार्य करते हुए उनके प्रति अनासक्त हुए बिना वैराग्य में दृढ़ता नहीं आती। वैराग्य और अभ्यास के समानान्तर पथ पर चलकर ही जीवन आध्यात्म की मंजिल, मोक्ष, ईश्वर प्राप्ति, परमानन्द प्राप्त कर सकता है। यह अत्यन्त कठिन और अत्यन्त सरल है। कठिनता और सरलता इसके प्रति दृष्टिकोण पर निर्भर करती है।
सतत् अभ्यास से सहजता आती है और सहजता सरल बनाती है। इसके विपरित कठिनता है। सब भावना का खेल है। यदि भावना हो कि मेरे प्रियतम परमात्मा मेरे अन्दर हैं और मैं सर्वव्यापी परमात्मा के अन्दर मैं हूं, बस काम आसान हो जाता है। इस भावना को आत्मबोध की संज्ञा दी जा सकती है और जब यह निरन्तर बनी रहती है तब इसे आत्मदर्शन कहा जा सकता है। इसमें दृढ़ता व अनन्यता आने पर जो अभ्यास से आती है, आत्म प्रबोधिक साधक अपने मानव जीवन के अन्तिम लक्ष्य को प्राप्त कर लेता है, इसे जीवनमुक्त अवस्था की भी संज्ञा दी जाती है।
जीवन मुक्त में अटूट आत्मबल होता है। आत्मबली का मन निश्चल, निर्मल, स्थिर और षक्ति सम्पन्न होता है।यह प्रसंग अग्नि के माध्यम से हमको समझा रहा है कि जीवन में अनासक्ति, वैराग्य का क्या महत्व है।
अब तक भागवत में आपने पड़ा कि कृष्णा कालीया नाग के आतंक से ब्रजवासियों को मुक्त करवाने के लिए यमुना में कूद पड़ते हैं और कालीया नाग का मर्दन करते है अब आगे की कथा इस प्रकार है..व्रजवासी और गौएं सब बहुत ही थक गए थे। ऊपर से भूख-प्यास भी लग रही थी। इसलिए उस रात वे व्रज में नहीं गए, वही यमुनाजी के तट पर सो रहे। गर्मी के दिन थे, उधर का वन सूख गया था। आधी रात के समय उसमें आग लग गई। उस आग ने सोये हुए व्रजवासियों को चारों ओर से घेर लिया और वह उन्हें जलाने लगी। आग की आंच लगने पर व्रजवासी घबड़ाकर उठ खड़े हुए और लीला- मनुष्य भगवान् श्रीकृष्ण की शरण में गए।
उन्होंने कहा-प्यारे श्रीकृष्ण! श्यामसुन्दर! महाभाग्यवान् बलराम! तुम दोनों का बल विक्रम अनन्त है। देखा, देखो यह भयंकर आग तुम्हारे सगे सम्बन्धी हम स्वजनों को जलाना ही चाहती है। तुम में सब सामथ्र्य है। हम तुम्हारे सुहृद् हैं, इसलिए इस प्रलय की अपार आग से हमें बचाओ। प्रभो! हम मृत्यु से नहीं डरते, परन्तु तुम्हारे अकुतोभय चरण कमल छोडऩे में हम असमर्थ हैं। भगवान् अनन्त हैं, वे अनन्त शक्तियों को धारण करते हैं, उन जगदीश्वर भगवान् श्रीकृष्ण ने जब देखा कि मेरे स्वजन इस प्रकार व्याकुल हो रहे हैं तब वे उस भयंकर आग को पी गए।


मित्रता के सूत्र सीखें कृष्ण से
प्रलंबासुर वध-कंस का भेजा गया प्रलंबासुर नामक राक्षस गोप ग्वालों के मध्य आ गया। कृष्ण ने पहचाना अपने बड़े भाई को संकेत समझा दिया और खेल में जब घोड़ा बनने की बारी आई तो बलराम उसकी पीठ पर बैठ गए वो बलराम को लेकर दूर भागा। अपने वास्तविक रूप में जब आया तो बलराम ने उसकी भलीभांति पिटाई की और वही उसका प्रणान्त हो गया।

राम और श्याम वृन्दावन की नदी, पर्वत, घाटी, कुन्ज, वन और सरोवरों में वे सभी खेल खेलते, जो साधारण बच्चे संसार में खेला करते है। एक दिन जब बलराम और श्रीकृश्ण ग्वालबालों के साथ उस वन में गौएं चरा रहे थे, तब ग्वाल के वेश में प्रलम्ब नाम का एक असुर आया। उसकी इच्छा थी कि मैं श्रीकृष्णऔर बलराम को हर ले जाऊँ।
भगवान् श्रीकृष्ण सर्वज्ञ हैं। वे उसे देखते ही पहचान गए। फिर भी उन्होंने उसका मित्रता का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। जब भी जीवन में बुराइयां प्रवेश करती है तो यह आवश्यक नहीं कि वे शत्रु बनकर ही आएं। कुछ बुराइयां मित्र भी होती हैं। भगवान ही उनको पहचान सकते हैं। वे इसे समझ जाते हैं और जब मित्र के रूप में आया संकट अपना रूप दिखाता है तो भगवान इसे तत्काल खत्म कर देते हैं।

गुरुवार, 3 फ़रवरी 2011

भागवत १७७ से 182; ब्रह्माजी ने कैसे ली श्रीकृष्ण की परीक्षा?

भागवत में अभी तक हमने पढ़ा कि भगवान श्रीकृष्ण ने वृंदावन में बकासुर, वत्सासुर व अघासुर का वध कर दिया। भगवान की लीलाओं को देखकर ब्रह्माजी ने उनकी परीक्षा लेने का मन बनाया।

एक दिन जब श्रीकृष्ण अपने साथी बाल-ग्वालों के साथ वन में गायों को चराने गए तो ब्रह्माजी भी वहां आ गए और बालकृष्ण की परीक्षा लेने का उपाय सोचने लगे। गायों को चराते-चराते कृष्ण आदि बाल-ग्वाल जब यमुना के पुलिन पर आए तो कृष्ण ने उनसे कहा कि यमुनाजी का यह पुलिन अत्यंत रमणीय है। अब हम लोगों को यहां भोजन कर लेना चाहिए क्योंकि दिन बहुत चढ़ आया है और हम लोग भूख से पीडि़त हो रहे हैं। बछड़े पानी पीकर समीप ही धीरे-धीरे हरी-हरी घास चरते रहें। सभी ने कृष्ण की बात मान ली।
उसी समय उनकी गाए व बछड़े हरी-हरी घास के लालच में घोर जंगल में बड़ी दूर निकल गए। जब ग्वालबालों का ध्यान उस ओर गया, तब वे भयभीत हो गए। तब कृष्ण उन सभी को वहीं छोड़कर स्वयं गायों व बछड़ों को लेने वन में चले गए। कृष्ण के वन में जाते ही ब्रह्माजी ने अपनी लीला दिखा दी व गौधन को अदृश्य कर दिया। बहुत ढूंढने पर भी जब गाएं आदि नहीं मिले तो कृष्ण वापस लौट आए। यहां आकर उन्होंने देखा कि उनके साथी ग्वाल-बाल भी अपने स्थान पर नहीं है।
तब उन्होंने वन में घूम-घूमकर चारों ओर उन्हें ढूंढा। परन्तु जब ग्वालबाल और बछड़े उन्हें कहीं न मिले, तब वे तुरंत जान गए कि यह सब ब्रह्माजी की ही माया है। तब भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं बछड़ों तथा उन बाल-ग्वालों का रूप बना लिया और वृंदावन चले गए। किसी को इस बात का पता नहीं चला।

ब्रह्माजी ने की श्रीकृष्ण की स्तुति
पिछले अंक में हमने पढ़ा कि ब्रह्माजी ने श्रीकृष्ण की परीक्षा लेने के लिए बछड़ों तथा उनके साथी बाल-ग्वालों को हर लिया। तब श्रीकृष्ण ने स्वयं उनका रूप धरा और वृंदावन चले गए। भगवान इस लीला में वही बात बता रहे हैं, जो बाद में महाभारत युद्ध के दौरान उन्होंने अर्जुन को बताई। सभी प्राणी उनका ही अंश हैं। सब में वे ही विराजित हैं। कोई आपकी देह यानी स्थूल रूप को तो हर कर ले जा सकता है लेकिन उसमें विराजित सूक्ष्म रूप को चुराया नहीं जा सकता।

इस तरह एक वर्ष का समय बीत गया तब एक दिन भगवान श्रीकृष्ण बलरामजी के साथ बछड़ों को चराते हुए वन में गए। तब उसी समय ब्रह्माजी बह्मलोक से वृंदावन में लौट आए। उनके कालमान से अब तक केवल एक त्रुटि (क्षण) समय व्यतीत हुआ था। यहां आकर उन्होंने देखा कि जिन बछड़ों तथा बाल-ग्वालों को मैंने हर लिया है वे सब तो यहां उपस्थित हैं। तब ब्रह्माजी ने अपनी दिव्य दृष्टि से देखा तो पता चला कि सभी बछड़ों तथा बाल-ग्वालों में तो स्वयं कृष्ण विराजमान हैं।
यह दृश्य देखकर ब्रह्माजी चकित रह गए। वे भगवान के तेज से निस्तेज होकर मौन हो गए। ब्रह्माजी के इस मोह और असमर्थता को जानकर बिना किसी प्रयास के तुरंत अपनी माया का परदा हटा दिया। वे श्रीकृष्ण के पास गए और उनकी स्तुति करने लगे। तब भगवान श्रीकृष्ण ने भी उन्हें प्रणाम किया। श्रीकृष्ण के कहने पर ब्रह्माजी ने उन बछड़ों तथा बाल-ग्वालों को छोड़ दिया। भगवान की माया से किसी को इस बात का आभास नहीं हुआ।

धेनुकासुर राक्षस का वध क्यों किया बलराम ने?
वृंदावन में रहते हुए अब बलराम और श्रीकृष्ण ने पौगण्ड-अवस्था में अर्थात छठे वर्ष में प्रवेश किया। बलरामजी और श्रीकृष्ण के सखाओं में एक प्रधान गोपबालक थे श्रीदामा। एक दिन उन्होंने बड़े प्रेम से बलराम और श्रीकृष्ण से बोला कि - हम लोगों को सर्वदा सुख पहुंचाने वाले बलरामजी। आपके बाहुबल की तो कोई थाह ही नहीं है। हमारे मनमोहन श्रीकृष्ण। दुष्टों को नष्ट कर डालना तो तुम्हारा स्वभाव ही है।

यहां से थोड़ी ही दूर पर एक बड़ा भारी वन है। उसमें बहुत सारे ताड़ के वृक्ष हैं। वे सदा फलों से लदे रहते हैं। वहां धेनुक नाम का दुष्ट दैत्य भी रहता है। उसने उन फलों पर रोक लगा रखी है। वह दैत्य गधे के रूप में रहता है। श्रीकृष्ण। हमें उन फलों को खाने की बड़ी इच्छा है।
अपने सखा ग्वालबालों की यह बात सुनकर भगवान श्रीकृष्ण और बलरामजी दोनों हंसे और फिर उन्हें प्रसन्न करने के लिए उनके साथ तालवन के लिए चल पड़े। उस वन में पहुंचकर बलरामजी ने अपनी बांहों से उन ताड़ के पेड़ों को पकड़ लिया और बड़े जोर से हिलाकर बहुत से फल नीचे गिरा दिए। जब गधे के रूप में रहने वाले दैत्य ने फलों के गिरने का शब्द सुना, तब वह बलराम की ओर दौड़ा।
बलरामजी ने अपने एक ही हाथ से उसके दोनों पैर पकड़ लिए और उसे आकाश में घुमाकर एक ताड़ के पेड़ पर दे मारा। घुमाते समय ही उस गधे के प्राणपखेरू उड़ गए।
धेनुकासुर को जिस तरह मारा, ग्वालबाल बलराम के बल की प्रशंसा करते नहीं थकते। धेनुकासुर वह है जो भक्तों को भक्ति के वन में भी आनंद के मीठे फल नहीं खाने देता। बलराम बल और शौर्य के प्रतीक हैं, जब कृष्ण हृदय में हो तो बलराम के बिना अधूरे हैं। बलराम ही भक्ति के आनंद को बढ़ाने वाले हैं। ग्वालबाल अब मीठे फल भी खा रहे हैं।

जब ग्वालों ने पी लिया विषैला जल
भगवान् श्रीकृष्ण इस प्रकार वृन्दावन में कई तरह की लीलाएं करते। एक दिन श्री कृष्ण अपने सभी सखा यानी दोस्त ग्वालों को यमुना के तट पर लेकर गए। उस दिन बलराम जी कृष्णा के साथ नहीं थे।


आषाढ़ की चिलचिलाती धुप में ग्वाले गर्मी से बेहाल थे। प्यास से उनका कण्ठ सुख रहा था। इसलिए उन्होने यमुना जी का विषैला जल पी लिया। उन्हे प्यास के कारण इस बात का ध्यान नहीं रहा था। इसलिए सभी गौएं और ग्वाले प्राणहीन होकर यमुना के तट पर गिर पड़े। उन्हे ऐसी हालत में देखकर श्री कृष्ण ने उन्हें अपनी अपनी अमृत बरसाने वाली दृष्टी से जीवित कर दिया। उनके स्वामी और सर्वस्व तो एकमात्र श्री कृष्ण थे। चेतना आने पर वे सब यमुनाजी के तट पर उठ खड़े हुए और आश्चर्यचकित होकर एक-दूसरे की ओर देखने लगे। अन्त में उन्होंने यही निष्चय किया कि हम लोग विषैला जल पी लेने के कारण मर चुके थे, परन्तु हमारे श्रीकृष्ण ने अपनी अनुग्रह भरी दृष्टि से देखकर हमें फिर से जीवित कर दिया है। यह भक्ति का वह रूप है जब भक्त अज्ञानवष कोई भयंकर भूल कर बैठता है और जीवन का सारा नियंत्रण खो देता है। तब ऐसे में भगवान ही अपने भक्तों पर इतना अनुग्रह रखते हैं कि उन्हें साक्षात् राम के बंधन से छुड़ा दें। बस, चित्त में कान्हा ही रहे।

जब कूद पड़े कान्हा विषैले जल में
में कालिया नाग का एक कुण्ड था। उसका जल विष की गर्मी से खौलता रहता था। यहां तक कि उसके ऊपर उडऩे वाले पक्षी भी झुलसकर उसमें गिर जाया करते थे। उसके विषैले जल की उत्ताल तरंगों का स्पर्श करके तथा उसकी छोटी-छोटी बूंदें लेकर जब वायु बाहर आती और तट के घास-पात, वृक्ष, पशु-पक्षी आदि का स्पर्श करती, तब वे उसी समय पर जाते थे।
भगवान् का अवतार तो दुष्टों का दमन करने के लिए ही होता है। जब उन्होंने देखा कि उस सांप के विष का वेग बड़ा प्रचण्ड है और वह भयानक विष ही उसका महान् बल है तथा उसके कारण मेरे विहार का स्थान यमुनाजी भी दूषित हो गई हैं, तब भगवान् श्रीकृष्ण अपनी कमर कसकर एक बहुत ऊंचे कदम्ब के वृक्ष पर चढ़ गए और वहां से ताल ठोंककर उस विषैले जल में कूद पड़े। यमुनाजी का जल सांप के विश के कारण पहले से ही खौल रहा था। उसकी तरंगें लाल-पीली और अत्यन्त भयंकर उठ रही थीं। पुरुशोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण के कूद पडऩे से उसका जल और भी उछलने लगा। उस समय तो कालियदह का जल इधर-उधर उछलकर चार सौ हाथ तक फैल गया। तट पर खड़े ग्वालबाल चिल्लाने लगे। कान्हा, ये क्या किया, भयंकर विष भरे जल में कूद गए। ग्वालबालों की दशा ऐसी हो गई जैसे दोबारा किसी ने उनके प्राण छीन लिए हों।
भगवान् श्रीकृष्ण कालियदह में कूदकर अतुल बलशाली मतवाले गजराज के समान जल उछालने लगे। आंख से ही सुनने वाले कालिया नाग ने वह आवाज सुनी और देखा कि कोई मेरे निवास स्थान का तिरस्कार कर रहा है। उसे यह सहन न हुआ। वह चिढ़कर भगवान् श्रीकृष्ण के सामने आ गया। उसने देखा कि सामने एक सांवला-सलोना बालक है।
उसने श्री कृ्ष्ण को मर्मस्थानों में डंसकर अपने शरीर के बन्धन से उन्हें जकड़ लिया। भगवान् श्रीकृष्ण नागपाश में बंधकर बेहोश हो गए। यह देखकर उनके प्यारे सखा ग्वालबाल बहुत ही पीडि़त हुए और उसी समय दु:ख, पश्चाताप और भय से मूच्र्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़े। क्योंकि उन्होंने अपने शरीर, सुहृद्, धन-सम्पत्ति, स्त्री, पुत्र, भोग और कामनाएं सब कुछ भगवान् श्रीकृष्ण को ही समर्पित कर रखा था। गाय, बैल, बछिया और बछड़े बड़े दु:ख से डकराने लगे। श्रीकृष्ण की ओर ही उनकी टकटकी बंध रही थी। वे डरकर इस प्रकार खड़े हो गए, मानो रो रहे हों। उस समय उनका शरीर हिलता-डोलता तक न था।
कुछ तट पर खड़े रहे, कुछ ग्वालबाल गांव की ओर दौड़ पड़े। नंदबाबा को बुलाओ, बलराम को बुलाओ पुकार मचने लगी। समाचार मिलते ही व्रजवासी भी यमुना तट पर दौड़ आए। कान्हा को कालिया नाग के चंगुल में देख उनके प्राण सूख गए।


कालिया नाग की पत्नियां कृष्णा से बोली..
कालिया नाग के एक सौ एक सिर थे। वह अपने जिस शरीर को नहीं झुकाता था, उसी को प्रचण्ड दण्डधारी भगवान् अपने पैरों की चोट से कुचल डालते। इससे कालिया नाग की जीवनशक्ति क्षीण हो चली, वह मुंह और नथुनों से खून उगलने लगा। अन्त में चक्कर काटते-काटते वह बेहोश हो गया। अपने पति की यह दशा देखकर उसकी पत्नियां भगवान् की शरण में आयीं। और बोली अपराध सह लेना चाहिए। यह मूढ है, आपको पहचानता नहीं है, इसलिए इसे क्षमा कर दीजिए। भगवन् कृपा कीजिए, अब यह सर्प मरने ही वाला है। नागपत्नियों की याचना से भगवान पिघल गए। कालिया को मृत्युदण्ड देने का इरादा त्याग दिया।
भगवान के प्रहारों से आहत कालिया का दंभ भी टूट चुका था। धीरे-धीरे कालिया नाग की इन्द्रियों और प्राणों में कुछ-कुछ चेतना आ गई। वह बड़ी कठिनता से श्वास लेने लगा और थोड़ी देर के बाद बड़ी दीनता से हाथ जोड़कर भगवान् श्रीकृष्ण से इस प्रकार बोला-हम जन्म से ही तमोगुणी और बहुत दिनों के बाद भी बदला लेने वाले-बड़े क्रोधी जीव हैं। जीवों के लिए अपना स्वभाव छोड़ देना बहुत कठिन है। इसी के कारण संसार के लोग नाना प्रकार के दुराग्रहों में फंस जाते हैं। आप सर्वज्ञ और सम्पूर्ण जगत् के स्वामी हैं। आप ही हमारे स्वभाव और इस माया के कारण हैं। अब आप अपनी इच्छा से-जैसा ठीक समझें-कृपा कीजिए या दण्ड दीजिए।