बुधवार, 2 अप्रैल 2014

दोस्ती एक एहसास है

(लेखिका-हेमलता यादव,जयपुर) दोस्ती नाम है शरारत का, मुस्कुराहट का, उम्रभर की चाहत का। दोस्ती एक अहसास है, न भूल सको वो ख्वाब है। कभी यादों में, कभी ख्वाबों में, वो हर कहीं ‍मिल जाता है। कोई आए या ना आए, दोस्त हर मुसीबत में दौड़ा चला आता है। दोस्ती जुनून है, जिसे पाकर मिलता है असीम सुख। दोस्ती सुकून है, जो हमें हर तकलीफ से निज़ात दिलाता है। दु:ख की तपन में दोस्त शीतल बयार बन आता है। कभी छेड़छाड़, कभी इकरार, हर दिन की तकरार, मगर दिलों में है प्यार। दोस्ती इसी का नाम है सरकार।

कुदरत का नायाब तोहफा है दोस्ती

(लेखिका- अपेक्षा शर्मा) दोस्ती एक ऐसा संबंध है जो मिलता तो हमें खून के रिश्तों के बाद है पर खून के रिश्तों से कम महत्वपूर्ण भी नहीं होता है। ये कुदरत का एक ऐसा नायाब तोहफा है जिसे हम अपनी पंसद नापसंद से बनाते है और निभाते हैं। किसी भी समाज से सरोकार रखने वाले मनुष्य के लिए 'रिश्ता' शब्द बड़ी अहमियत रखता है। हम परिवार में विभिन्न रिश्तों की डोर से बँधे होते हैं। लेकिन इन पारिवारिक रिश्तों के अलावा एक और महत्वपूर्ण रिश्ता हमारे जीवन में काफी महत्व रखता है और वह है दोस्ती अथवा मित्रता का रिश्ता, जो विश्वास व सहयोग के आधार पर टिका होता है। मित्र राजदार भी होते हैं और सुख-दुःख के साथी भी।
रिश्तों में जहां मर्यादा होती है वह रिश्ते की सीमा निश्चित कर देती है। रिश्तों में चाहे घुन का कीड़ा आ जाये वो एक सीमा में निभाने का हमारा कर्तव्य बन जाता है, पर दोस्ती में कोई सीमा नहीं होती । यह गंगा सी निर्मल और पवित्र होती है, दोस्त के सामने हम सब कुछ सच बोलते है क्योंकि वहा किसी मर्यादा, दिखावा या बड़प्पन का सवाल नहीं होता है। रिश्तों में अगर दोस्ती का रस डाल दिया जाये तो वह रिश्ता अति मधुर और मजबूत हो जाता है, जैसे उसके भाई, मित्र समान है, उसका पति मित्र समान है ये वाक्य जहां कहने-सुनने में अच्छे लगते है उससे कई गुना ज्यादा ये रिश्ते दृढ़ और कठोर होते हैं। एक सच्चा दोस्त आईने की भांति होता है जो हमें हमारी अच्छाई और बुराई दोनों से अवगत कराता है। जैसे भूखे से ज्यादा भोजन का स्वाद कोई और नहीं बता सकता ठीक उसी प्रकार सच्चे मित्र का परिचय संकट में फंसा इंसान ही जान सकता है। इसमें न कोई पैमाना निश्चित होता है और न ही यह "गिव एण्ड टेक पॉलिसी "पर आधारित होता है। यह ऐसा संबंध है जो समुद्र सा गहरा और अथाह सीमा लिए है। इसके उत्साह में अलग का दरिया हो या दलदल इंसान हंसते हुए पार कर सकता है। दोस्तो अभी तक मैंने जो लिखा वो एक सच्चे दोस्त के लिए है पर 21 वीं सदी के जिस पडाव पर आज युवा वर्ग जिसे मित्रता भ्रमित हो रहा है और उनके साथ आगे बढ़ता है वहां उसकी परिभाषा बदल सी गई है। आज हम अपने से उच्च वर्ग से मेलजोल रखकर उन्हें अपना मित्रा बताकर गर्व महसूस करते है उनसे मित्रता निभाने के लिए मुझे ही सैकड़ो झूठ बोलने पड़े पर हम वो सब करते है ऐसे लोग क्या कभी मित्र बन सकते है जिनकी मित्रता के लिए हम झूठ बोलते है। युवा वर्ग सोचता है कि ये सब हमे भविष्य में काम आएंगे पर वे तब तक ही काम आएंगे आते है जब तक हमारे कामजी महल उन्हें दिखते है और अगर मान भी ले कि जो हमारी मदद करते भी है तो भी मित्रता में कटुता आती ही है क्योंकि मित्रता की नीव में झूठ का खोखलापन है। एक सच्ची मित्रता में स्वार्थ, ईष्र्या और द्वेष नहीं होता है और ना ही न वह हमारा स्टेटस सिम्बल होती । दोस्ती में लोग रेलगाड़ी के अजनबी यात्री की तरह मिलते है कुछ ही क्षणो में दोस्ती भी हो जाती है तो वही कुछ से प्रगाड़ संबंध बन जाते है । बात तब बिगड़ती है जब दोनों तरफ से या एक तरफ से भावनाओं में स्वार्थ का प्रवेश होता है। किसी भी तरह की इच्छा रखने वाले हमारे अच्छे मित्र नहीं हो सकते और ना ही हम उनके। मित्रता की बुनियाद अनकंडिशनल होती है। जब किसी संबंध को रिश्ते की नाम नहीं दिया जा सकता तो उसे दोस्त कहते हैं। और स्वार्थ रिश्तों और दोस्ती में प्रवेश कर गया है। इसकी वजह से मित्र-मित्र का और भाई-भाई का शत्रु भी बन सकता है। मित्रों हमें आवश्यकता है अपने दिल की मित्रता को पहचानने की। यदि हम नजर उठाकर अपने चारो तरफ देखे तो हमें शायद एक भी मित्र ऐसा ना मिले जिसे हमसे या हमें उससे कोई स्वार्थ न हो और फिर भी हम आपस में मित्र हो, ऐसे में दोस्तों आवश्यकता है संबंधों को एक दायरे में रखने की और रिश्तों पर मित्रता की चासनी चढ़ाने की ,ताकि हमारे रिश्ते मजबूत बने रहे और दोस्ती भी एक मिसाल बने। * सच्चा मित्र वह है जो दर्पण की तरह तुम्हारे दोषों को तुम्हें दिखाए। जो तुम्हारे अवगुणों को गुण बताए वह तो खुशामदी है। * विदेश में विद्या मित्र होती है, घर में पत्नी मित्र होती है, रोगी का मित्र औषधि व मृतक का मित्र धर्म होता है। * मित्र वे दुर्लभ लोग होते हैं, जो हमारा हालचाल पूछते हैं और उत्तर सुनने को रुकते भी हैं। * ज्ञानवान मित्र ही जीवन का सबसे बड़ा वरदान है। * सच्चे मित्र हीरे की तरह कीमती और दुर्लभ होते हैं, झूठे दोस्त पतझड़ की पत्तियों की तरह हर कहीं मिल जाते हैं। * मूर्ख मित्र से बुद्धिमान शत्रु हर स्थिति में अच्छा है। * मित्र पाने की राह है, खुद किसी का मित्र बन जाना। * मित्रता करने में धैर्य से काम लो। किंतु जब मित्रता कर ही लो तो उसे अचल और दृढ़ होकर निभाओ। * अपने मित्र को एकांत में नसीहत दो, लेकिन प्रशंसा (सही) खुलेआम करो। * तुम्हारा अपना व्यवहार ही शत्रु अथवा मित्र बनाने के लिए उत्तरदायी है। लेखिका मस्कट ओमान में रहती है

शुक्रवार, 7 फ़रवरी 2014

रोमांटिक जोक : आइटम नंबर 3

एक बार एक लड़की ने अपने बॉयफ्रेंड को फोन किया, तो फोन बॉयफ्रेंड के भतीजे ने उठाया। लड़की ने प्यार से कहा- जरा अपने अंकल को फोन देना। चिंटू ने पूछा- मैं उन्हें आपका क्या नाम बताऊं? लड़की ने इतरा कर कहा- उनसे कहो कि उनकी जानेमन का फोन है। चिंटू बोला- लेकिन फोन में तो आपके नंबर के आगे आइटम नंबर 3 लिखा है।

मंगलवार, 14 जनवरी 2014

।हनुमान चालीसा।

दोहा : श्रीगुरु चरन सरोज रज, निज मनु मुकुरु सुधारि। बरनऊं रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि॥ बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार। बल बुद्धि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार॥ चौपाई : जय हनुमान ज्ञान गुन सागर। जय कपीस तिहुं लोक उजागर॥ रामदूत अतुलित बल धामा। अंजनि-पुत्र पवनसुत नामा॥ महाबीर बिक्रम बजरंगी। कुमति निवार सुमति के संगी॥ कंचन बरन बिराज सुबेसा। कानन कुंडल कुंचित केसा॥ हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै। कांधे मूंज जनेऊ साजै। संकर सुवन केसरीनंदन। तेज प्रताप महा जग बन्दन॥ विद्यावान गुनी अति चातुर। राम काज करिबे को आतुर॥ प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया। राम लखन सीता मन बसिया॥ सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा। बिकट रूप धरि लंक जरावा॥ भीम रूप धरि असुर संहारे। रामचंद्र के काज संवारे॥ लाय सजीवन लखन जियाये। श्रीरघुबीर हरषि उर लाये॥ रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई। तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई॥ सहस बदन तुम्हरो जस गावैं। अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं॥ सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा। नारद सारद सहित अहीसा॥ जम कुबेर दिगपाल जहां ते। कबि कोबिद कहि सके कहां ते॥ तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा। राम मिलाय राज पद दीन्हा॥ तुम्हरो मंत्र बिभीषन माना। लंकेस्वर भए सब जग जाना॥ जुग सहस्र जोजन पर भानू। लील्यो ताहि मधुर फल जानू॥ प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं। जलधि लाँघि गये अचरज नाहीं॥ दुर्गम काज जगत के जेते। सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते॥ राम दुआरे तुम रखवारे। होत न आज्ञा बिनु पैसारे॥ सब सुख लहै तुम्हारी सरना। तुम रक्षक काहू को डर ना॥ आपन तेज सम्हारो आपै। तीनों लोक हांक तें कांपै॥ भूत पिसाच निकट नहिं आवै। महाबीर जब नाम सुनावै॥ नासै रोग हरै सब पीरा। जपत निरंतर हनुमत बीरा॥ संकट तें हनुमान छुड़ावै। मन क्रम बचन ध्यान जो लावै॥ सब पर राम तपस्वी राजा। तिन के काज सकल तुम साजा। और मनोरथ जो कोई लावै। सोइ अमित जीवन फल पावै॥ चारों जुग परताप तुम्हारा। है परसिद्ध जगत उजियारा॥ साधु संत के तुम रखवारे। असुर निकंदन राम दुलारे॥ अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता। अस बर दीन जानकी माता॥ राम रसायन तुम्हरे पासा। सदा रहो रघुपति के दासा॥ तुम्हरे भजन राम को पावै। जनम-जनम के दुख बिसरावै॥ अन्तकाल रघुबर पुर जाई। जहाँ जन्म हरि-भक्त कहाई॥ और देवता चित्त न धरई। हनुमत सेइ सर्ब सुख करई॥ संकट कटै मिटै सब पीरा। जो सुमिरै हनुमत बलबीरा॥ जै जै जै हनुमान गोसाईं। कृपा करहु गुरुदेव की नाईं॥ जो सत बार पाठ कर कोई। छूटहि बंदि महा सुख होई॥ जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा। होय सिद्धि साखी गौरीसा॥ तुलसीदास सदा हरि चेरा। कीजै नाथ हृदय मंह डेरा॥ दोहा : पवनतनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप। राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप॥

शुक्रवार, 3 जनवरी 2014

देवी के सामने बच्चे को सुलाकर मां करती है पूजा

चढ़ावे के रूप में चढ़ती है लौकी 30 साल की मिलउतीन अपने बच्चे को देवी के सामने सुलाकर प्रार्थना कर रही है। मन ही मन बुदबुदा रही है... मां मेरे लाडले को कभी कोई बीमारी न घेरे। मंदिर से बाहर निकलती इस महिला के चेहरे पर आस्था के भाव थे, आंखें नम थीं। उसके बाहर निकलते ही चढ़ावे के लिए लौकी और तेंदू की लकड़ी लेकर टीकम अपने बच्चे के साथ भीतर जाती है। टीकम के बाद शकुंतला, सुशीला और फिर मीलों दूर से आई ज्योति तिवारी की बारी। ऐसे ही दृश्य पूरे दिन रतनपुर के शाटन देवी मंदिर में देखने को मिलते हैं। यह आम मंदिरों से कई मायनों में अनूठा और अलग है। देशभर में रतनपुर की पहचान महामाया मंदिर को लेकर है। यहां का शाटन देवी मंदिर उन लोगों के लिए अनजाना नहीं है, जिनके बच्चे किसी गंभीर बीमारी से पीडि़त हों। करीब 150 साल पुराने इस मंदिर को लेकर कई मान्यताएं हैं। यहां चढ़ावे के रूप में फल, प्रसाद या पैसे नहीं, बल्कि लौकी और तेंदू की लकडिय़ां चढ़ाई जाती हैं। रतनपुर में इसे 'बच्चों का मंदिर' और देवी को 'बच्चों की देवी के नाम से जाना जाता है। पुजारी त्रिभुवन दास वैष्णव का कहना है कि सूखा रोग से पीडि़त कई बच्चे मंदिर में आकर ठीक हुए हैं। ऐसी कोई बीमारी नहीं : शिशु रोग विशेषज्ञ डा. सुशील कुमार का कहना है कि बच्चों के पैर जुडऩे को लेकर किसी भी तरह की बीमारी नहीं होती। आए दिन इस तरह की बातें सुनने को मिलती हैं, लेकिन मेडिकल साइंस में इसका कोई आधार नहीं है। मैं देवी-देवताओं की पूजा के खिलाफ नहीं हूं, लेकिन क्या ऐसी बीमारी के ठीक होने के लिए पूजा करना उचित है, जो बीमारी ही नहीं है। कई बच्चे तो अस्पताल में ठीक नहीं हुए तो यहां लाए गए और उन्हें आराम मिला। यह अंधविश्वास नहीं, हजारों लोगों की आस्था से जुड़ा मामला है। लकड़ी और लौकी इसलिए... मंदिर में तेंदू की लकड़ी और लौकी विशेष रूप से चढ़ाई जाती है। इसकी वजह पूछने पर मंदिर के पुजारी त्रिभुवन दास वैष्णव कहते हैं कि तेंदू की लकड़ी लचकदार होती है और लौकी ते से विकसित होने का प्रतीक है। मान्यता है कि इससे बच्चे का शरीर लचकदार व तंदरुस्त होता है और वह लौकी की तरह तेजी से विकसित होता है। दूर होती है पैर सटने की बीमारी बच्चों को सूखा रोग होने पर पैर आपस में सट जाते हैं। ग्रामीणों के मुताबिक यह बीमारी देवी की पूजा से दूर हो जाती है।बच्चों की स्वास्थ्य रक्षा और संतान की मुराद भी पूरी होती है। पुजारी के मुताबिक मां नौदुर्गा का छठवां स्वरूप कात्यायनी देवी का है, जिसे संकट हरिणी, पुत्रदा और बलदा भी कहा जाता है। इसी देवी को यहां शाटन देवी और शटवाई दाई के नाम से पूजा जाता है। मंदिर का उल्लेख नहीं
जनश्रुति के मुताबिक नए मंदिर के पहले यहां छोटा सा मंदिर था, जहां ग्रामीण 150 वर्षों से कुष्मांडा देवी को शटवाई दाई के रूप में पूजते आ रहे हैं। जिन ग्रंथों में रतनपुर के बारे में जानकारी है, उनमें या बाद के ग्रंथों में इस मंदिर का उल्लेख नहीं है।

मंगलवार, 26 नवंबर 2013

भाई-बहन का रिश्ता

भाई-बहन का रिश्ता बचपन से जुड़ा होता है। दोनों खेलते-कूदते बड़े होते है और उनका रिश्ता भी उतना ही स्नेहभरा और विश्वास से भरा होता है। आपके लिए पेश है रक्षाबंधन के त्योहार पर भाई-बहन से जुड़े महत्वपूर्ण विचार :- बहन के लि‍ए, बहन एक ऐसी मि‍त्र है जि‍ससे आप बच नहीं सकते। आप जो करते हैं वो सब बहनों को पता रहता है। - एमी ली बहन बचपन की यादों की साझेदार होती है। - पाम ब्राउन ऊंघती हुई आलसी और नाजुक बहन तब शेरनी बन जाती है जब उसका भाई मुश्कि‍ल में हो। -क्‍लेरा ऑर्टेगा बहन बचपन का वो प्‍यारा हि‍स्‍सा है जो कभी खो नहीं सकता। - मेरि‍ऑन सी गैरेटी

कब हुई महिला क्रिकेट विश्वकप की शुरुआत?

महिला क्रिकेट विश्वकप की शुरुआत 1973 में इंग्लैंड में हुई थी। पहला विश्वकप इंग्लैंड की महिला टीम ने जीता था। यह बात ध्यान देने योग्य है कि पहला महिला क्रिकेट का विश्वकप पुरुषों की विश्वकप प्रतियोगिता के भी दो साल पहले हुआ था। हाल में हुई 9वीं महिला विश्वकप क्रिकेट प्रतियोगिता में इंग्लैंड की महिला टीम ने विजेता का खिताब जीता। भारत इस प्रतियोगिता में तीसरे क्रम पर रहा। अगली महिला विश्वकप क्रिकेट प्रतियोगिता 2013 में भारत में ही आयोजित की जाना है।