बुधवार, 3 फ़रवरी 2010

कहानी

जादूगर चाचा...

पंडित जवाहरलाल नेहरू मजेदार बातों के एक ऐसे जादूगर भी थे, जो एक मिनट के भीतर क्या से क्या कर सकते थे? नेहरूजी को भाषा पर अधिकार था। वे बहुत अच्छा बोलते थे।
जीवन भर तुनकते-तपते नेहरूजी, संसार में अपनी, भारत की और अहिंसा की नीति का आदर पाकर अपनी सारी गर्मी, उत्तेजना और झुंझलाहट को अपने भीतर से निकाल चुके थे।
एक बार कांग्रेस महासमिति के अधिवेशन के समय बड़ी भीड़ हुई। भीड़ इतनी बढ़ी कि महिलाओं के बैठने के स्थान के पीछे पुरुषों की भारी भीड़ जमा होकर उमड़ पड़ी।
नेहरूजी से देखा न गया, वे माइक पर आए, भीड़ की ओर देखा और बोले, आप पुरुष होकर महिलाओं में आ रहे हैं? जिनको आना हो वे सानंद आ सकते हैं, हमारी मुबारकबाद।
उफनते हुए दूध पर जैसे पानी के ठंडे छींटे पड़ गए, भीड़ पीछे खिसक गई! नेहरूजी को इतिहास के पन्नों में 'मजेदार बातों का जादूगर' भी कहा जाता है।
चतुर कविराज
एक थे चतुर कविराज, उन्हें था अपनी अकल पर बड़ा नाज। वो थे भी होशियार, राजा भी उनकी हर बात मानने को हो जाते थे तैयार।
एक दिन कविराज ने एक कविता लिखी, सुनकर राजा की तबियत खिली। बोले-'बोलो क्या माँगते हो, क्या इनाम चाहते हो।' कविराज ने सोचा देखते हुए ऊपर, फिर दिया कुछ देर बाद उत्तर-'महाराज मुझे तो दे दीजिए एक शिकारी कुत्ता' सुनकर सारे दरबारी हुए हक्का-बक्का।
सब दरबारियों ने सोचा कविराज ने एक अवसर खो दिया, खनखनाते सिक्कों से हाथ धो लिया। राजा ने कहा-'जो तुमने माँगा है वह मिल जाएगा, शिकारी कुत्ता तुम्हें दे दिया जाएगा।'
कविराज ने कहा-'महाराज आप हैं बहुत दयावान, यदि घोड़ा भी होता मेरे पास तो मैं शिकार पर जाता श्रीमान।' राजा ने कहा-'घोड़ा भी दे देते हैं, तुम्हारी इच्छा पूरी कर देते हैं।'
कविराज ने आगे कहा-'जब भी शिकार मेरे साथ आए, तो चाहता हूँ कि कोई उसे पकाकर खिलाए।'
राजा ने उसे रसोइया भी दे दिया, पर आगे कविराज ने कहा-'आपकी उदारता का नहीं है जवाब, पर मैं इतने सारे उपहार कहाँ रखूँगा जनाब?' राजा ने उसे एक महल भी दे दिया, कविराज का मन अभी भी नहीं था भरा।
फिर उसने कहा-'मैं इतनी बड़ी व्यवस्था को संभालूँगा कैसे, यह सब काम होगा कैसे?' राजा ने कहा मैं दूँगा तुम्हें एक खजूर का बाग, उसमें जमा लेना अपना सारा काम। 'मैंने देखी नहीं ऐसी दयालुता, ऐसी उदारता। मैंने जो चाहा आपने दिया। आप हैं कविता के सही कदरदान, मेरा आभार स्वीकार करें श्रीमान।'
वसंत का रहस्य

वसंत का मौसम सचमुच कितना खुशनुमा लगता है। वन में, बगियों में रंग-बिरंगे फूल खिले रहते हैं। आम की शाखा पर कोपले पंचम स्वर में कूँकती रहती हैं। भँवरे और तितली फूलों पर मँडराते रहते हैं, सूरजमुखी एवं सरसों के फूलों से अटे खेत सोने की तरह चमकते दिखाई देते हैं।
द्धि, विद्या और वाणी की देवी 'सरस्वती' का जन्मदिन 'वसंत पंचमी' के रूप में मनाया जाता है। इस दिन देवी सरस्वती की आराधना की जाती है। इस दिन पीले वस्त्र पहनना तथा पीले व्यंजन खाना शुभ समझा जाता है। वसंत ऋतु की भी एक हानि है। यूनान में अनाज और कृषि की एक देवी मानी जाती है, जिसे 'डैमेटर' कहते हैं। किसी समय इस देवी के एक रूपवान लड़की थी, जिसका नाम था फलेरी। ऐसे ही एक बार जब यूनान में वसंत ऋतु चल रही थी तो फलेरी ने चुपचाप अपनी माँ का सोने का रथ हाँका और वह आसमान से धरती पर उतरी, अपने रथ को धरती के राजा प्लेटो के शाही बगीचे में ले जाकर मस्त-मस्त रंग-बिरंगे खुशबूदार फूलों के बीच घूमने-फिरने लगी, कभी फूल तोड़ने लगी तो कभी प्यारी-प्यारी तितलियाँ पकड़ने लगी..।
राजा प्लेटो जब किसी काम से अपने शाही उपवन में आया तो उसकी नजर फूलों के बीच खड़ी खूबसूरत फलेरी पर अटकी। वह उस पर मोहित हो गया। उसने तरकीब से उसका अपहरण कर अपने महल में ले गया और उसके साथ चुपचाप विवाह रचा लिया।
इधर जब डैमेटर को अपनी बेटी स्वर्ग लोक में कहीं दिखाई न दी तो वह पृथ्वी पर उतरी। उसने पृथ्वी का चप्पा-चप्पा छान मारा, किंतु उसे अपनी बेटी कहीं नहीं मिली। अंत में वह निराश होकर एक पेड़ के नीचे बैठकर रोने लगी, जब सूर्य देवता ने डैमेटर को इस तरह रोते देखा तो उन्हें दया आ गई। उन्होंने फलेरी का पता उसे बता दिया। यह अनोखी खबर सुनते ही डैमेटर गुस्से में आग बबूला हो गई। आखिर वह भी एक देवी थी। राजा प्लेटो की यह मजाल कि वह उसकी बेटी को इस तरह चुराकर अपने महल में रख ले। उसने तुरंत घोषणा कर दी। पृथ्वी पर अनाज का एक भी दाना तब तक न निकले, जब तक कि उसकी बेटी उसे वापस नहीं मिल जाती। किसानों ने अपने खेतों में जी-तोड़ मेहनत की, खेतों को खाद से पाट दिया, किंतु सब व्यर्थ, अनाज का एक भी दाना नहीं उगा, अब तो पृथ्वी पर त्राहि-त्राहि मचने लगी। खलिहान सूने पड़े रहे। सभी देवताओं को चिंता होने लगी कि कहीं पृथ्वी पर अकाल न पड़ जाए? अंत में देवताओं के राजा जुपिटर ने यह निश्चय किया कि उसे शीघ्र ही इन दोनों में कोई समझौता करा देना चाहिए, नहीं तो अनर्थ हो जाएगा, उसने डैमेटर से आग्रह किया कि वह अपना कड़ा प्रतिबंध पृथ्वी से हटा ले...।
लेकिन, डैमेटर तो अड़ी हुई थी कि जब तक उसे अपनी बेटी वापस नहीं मिल जाती, वह पृथ्वी पर एक भी बीज नहीं फूटने देगी। इधर प्लेटो भी फलेरी को छोड़ना नहीं चाहता था। अंत में जुपिटर ने दोनों के बीच एक समझौता कराया कि फलेरी छः महीने राजा प्लेटो के पास रहेगी और छः महीने अपनी माँ के पास।
फलेरी जब अपने पति के पास होती है तो बसंत ऋतु आ जाती है, फूल खिलकर महकने लगते हैं। वृक्षों पर कोयल की सुरीली आवाज सुनाई देने लगती है और जब छः महीने के लिए अपनी प्यारी-प्यारी माँ के पास लौटती है तो पृथ्वी पर पतझड़ आ जाता है।
भगवान का साथ

एक समय की बात है। एक छोटे बच्चे ने जब बचपन से जवानी में प्रवेश किया। तब वह कहीं भी जाता तो उसके पदचिह्न के साथ एक और पदचिह्न नजर आते थे, लेकिन जब वह बूढ़ा हुआ तो ये पदचिह्न नजर आना बंद हो गए।
जब वह मरने के बाद भगवान के पास गया और उसने भगवान से प्रश्न पूछा- जब तक मैं जवान था तब तक मुझे मेरे पदचिह्न
के साथ एक और पदचिह्न नजर आते थे, तब भगवान ने कहा- वह मेरे पदचिह्न थे। इस पर उसने पूछा- जब मुझे बुढ़ापे में आपकी जरूरत थी। तब आपने मेरा साथ छोड़ दिया।
तब भगवान ने कहा- तब तू चल नहीं सकता था। तब मैं ही तुझे उठाकर चल रहा था। इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि हर क्षण- हर वक्त भगवान हमारे साथ हैं।

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