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शुक्रवार, 19 सितंबर 2014

भागवत २५२

...इसलिए अपनी जिम्मेदारी के लिए जागरूक रहना जरूरी है
पं.विजयशंकर मेहता
बलराम के जीवन से जुड़ी एक कथा है। द्विविद नाम का एक वानर था, जो भौमासुर का सखा, सुग्रीव का मंत्री और मैन्द का शक्तिशाली भाई था। जब उसने सुना कि श्रीकृष्ण ने भौमासुर को मार डाला, तब वह अपने मित्र की मित्रता के ऋण से उऋण होने के लिए राष्ट्र-विप्लव करने पर उतारू हो गया। वह वानर बड़े-बड़े नगरों, गांवों, खानों और अहीरों की बस्तियों में आग लगाकर उन्हें जलाने लगा।
वानर तो भगवान् राम के सखा और सेेवक थे लेकिन अत्यधिक बल और मद में वे इसे ही भूल गए। भौमासुर जैसे राक्षस की मृत्यु का बदला लेने निकल पड़े। श्रीकृष्ण तो उन्हें मिले नहीं लेकिन बलराम से भेंट हो गई।एक दिन वह वानर बलवान् और मदोन्मत्त द्विविद बलरामजी को नीचा दिखाने तथा उनका घोर तिरस्कार करने लगा, तब उन्होंने उसकी ढिठाई देखकर और उसके द्वारा सताए हुए देशों की दुर्दशा पर विचार करके उस शत्रु को मार डालने की इच्छा से क्रोधपूर्वक अपना हल-मूसल उठाया। द्विविद भी बड़ा बलवान था। उसने अपने एक ही हाथ से शाल का पेड़ उखाड़ दिया और बड़े वेग से दौड़कर बलरामजी के सिर पर उसे दे मारा।
अब यदुवंश शिरोमणि बलरामजी ने हल और मूसल अलग रख दिए तथा क्रुद्ध होकर दोनों हाथों से उसके जत्रुस्थान (हंसली) पर प्रहार किया। इससे वह वानर खून उगलता हुआ धरती पर गिर पड़ा। द्विविद ने जगत् में बड़ा उपद्रव मचा रखा था, अत: भगवान् बलरामजी ने उसे इस प्रकार मार डाला और फिर वे द्वारिकापुरी में लौट आए।यही द्विविद जो राम अवतार में अच्छे कार्य करता रहा, श्रीकृष्णावतार में भटक गया, बहक गया।
अपनी भूमिकाओं के प्रति सदैव सजग रहा जाए। इसलिए परमात्मा का सतत् स्मरण और आचरण में संयम बनाए रखना चाहिए।मन एकाग्र करने के लिए यह दृढ़ भावना होना आवश्यक है कि कर्म किए बिना रहा नहीं जा सकता तो प्रथम तो निष्काम कर्म किया जाए और उन्हें ईश्वर अर्पण करके किया जाए क्योंकि ईश्वर ने ही दायित्व सौंपा है वह करना है।

गुरुवार, 5 अप्रैल 2012

भागवत ३४१ से ३४३

ऐसे व्यक्ति से कभी मदद लेने की न सोचें क्योंकि....
भगवान का श्रीविग्रह उपासकों के ध्यान और धारणा का मंगलमय आधार और समस्त लोकों के लिए परम रमणीय आश्रय है।इसलिए तय कर लें, आश्रय किसका रखें। प्रभु ने सृष्टि की संरचना बड़े सुन्दर ढंग से की है। उसने जीवन के दु:खों-क्लेशों की पृष्ठभूमि में आनन्द एवं प्रेम का अथाह एवं अनन्त समुद्र छुपा कर रखा है।

यह मनुष्य के ऊपर ही छोड़ दिया है कि चाहे तो वह जगत विषयों के पीछे लग कर, जीवन में दु:ख एवं अशांति को भोगता रहे तथा चाहे तो आनन्द समुद्र में गोते लगाकर परम शान्ति को प्राप्त करे। भक्ति जगत विषयों की गंदी नालियों से निकालकर, अन्दर में ही विद्यमान प्रेम एवं आनन्द समुद्र की ओर अग्रसर करने का मार्ग है।

आवश्यकता है केवल मनुष्य के चेत जाने की। पहले तो उसे इस बात का आभास होना चाहिए कि वह विषय के दलदल में फंसकर रह गया है, उसे इसमें से बाहर निकलना है। वह निकलने का प्रयत्न भी करता है, मन को नियंत्रित करने का यत्न करता है, जप तप करता है तथा शास्त्रों में शान्ति को खोजता है, परन्तु सफल हो पाना कठिन है। दलदल से निकलने के लिए ऐसे व्यक्ति की सहायता की आवश्यकता है जो स्वयं दलदल से बाहर खड़ा हो। दलदल में फंसा दूसरा व्यक्ति भी सहायता नहीं कर सकता, क्योंकि वह तो स्वयं धंसता चला जा रहा है। मुख्यस्तु महत्कृपैव महापुरुषों, महानुभावों की कृपा प्राप्त करो, क्योंकि वह स्वयं जगत में रहकर भी जगत के बाहर हैं।

परम-प्रेम के निरन्तर प्रवाह का नाम ही भक्ति है। कभी भक्ति की, कभी उधर से उदासीन होकर जगत व्यवहार में लग गए। यह तो भक्ति नहीं, जिस प्रकार नदी की स्वाभाविक जल धारा रात-दिन, प्रतिक्षण बहती रहती है, उसी प्रकार हृदय भी परम-प्रेम से हरदम ढका रहे। वासना, कामना तथा जगत विषयों को हृदय में प्रवेश का अवसर ही प्राप्त न हो। प्रियतम प्रभु हर दम अभिमुख बना रहे। उसकी रासलीला चौबीसों घण्टे चलती रहे तथा भक्त उसके आनन्द तथा मधुरता में ही डूबा रहे, यही परम-प्रेम-रूपा भक्ति का स्वरूप है।

भागवत में लिखा है, कलयुग आएगा तो ऐसे मिलेंगे संकेत...

यदुवंश के मृत व्यक्तियों का श्राद्ध अर्जुन ने विधिपूर्वक करवाया। भगवान के न रहने पर समुद्र ने एकमात्र भगवान श्रीकृष्ण का निवास स्थान छोड़कर एक ही क्षण में सारी द्वारिका डुबो दी।पिण्डदान के पश्चात स्त्रियों, बच्चों और बूढ़ों को लेकर अर्जुन इन्द्रप्रस्थ आए। वहां सबको यथायोग्य बसाकर अनिरुद्ध के पुत्र वज्र का राज्याभिषेक कर दिया। हे परीक्षित्! तुम्हारे दादा युधिष्ठिर आदि पाण्डवों को अर्जुन से ही यह बात मालूम हुई कि यदुवंशियों का संहार हो गया है। तब उन्होंने अपने वंशधर तुम्हें राज्यपद पर अभिषिक्त करके हिमालय की वीरयात्रा की।

परीक्षित ने शापित होने के कारण शुकदेवजी से जो कथा सुनी थी उसके नायक भगवान श्रीकृष्ण थे। नायक अपनी लीला समेट कर जा चुके हैं और परीक्षित के मन में अनेक छोटे-बड़े प्रश्न पुन: तैयार हो गए हैं। शुकदेवजी परीक्षित को समझा चुके हैं कि मैंने विस्तार से कृष्ण चरित्र सुनाया है और तुम जान गए होंगे कि धर्म क्या है? जीवन का आरंभ, मध्य और समापन कैसे होता है? इस प्रकार ग्यारहवें स्कंध का समापन होता है।

आइए, इसी के साथ भागवत की कथा अब बारहवें स्कंध में प्रवेश कर रही है। यहां कलयुग का वर्णन आएगा। शुकदेवजी ने जिस बारीकी से और विस्तार के साथ कलयुग का वर्णन किया है हमारी आंखें खोलने के लिए काफी है। अब जो चित्रण आएगा उससे हम अच्छी तरह से परिचित हैं, लेकिन हमें अब उससे सीखना है कि कलयुग की घटनाएं हमारे भीतर न जन्म लेने लगे। बाहर के दुनियादारी के जीवन में कलयुग का होना स्वाभाविक है। बारहवें स्कंध से हम यह सीखें कि हमारे भीतर कलयुग की स्थिति न बन जाए।

कलयुग तो प्रतीक्षा ही कर रहा था कि भगवान जाएं और मैं आऊं। जब-जब जीवन से भगवान गए, कलयुग आया। भगवान कह रहे हैं अब मैं जा रहा हूं, आप कलयुग को पहचानिए, जानिए। द्वादश स्कंध के आरंभ में शुकदेवजी कलयुग के बारे में जानकारी दे रहे हैं। कलयुग आएगा तो हमको दिखेगा जीवन का विपरीत घट रहा है। कलयुग में वो लोग जो नीचे बैठे हुए, ऊपर नजर आएंगे। कलयुग जब आएगा तो पापी व्यक्ति जो हैं वे पूजे जाएंगे। कलयुग जब आएगा तो अयोग्य लोग समर्थों पर राज करेंगे। कलयुग जब आएगा तो जो चोर होगा वह साहूकार के रूप में पूजा जाने लगेगा। जो जोर से बोलेगा उसकी बात सुनी जाएगी। भगवान कलयुग का लम्बा-चौड़ा वर्णन करते हैं और हम तो कलयुग को अच्छी तरह से परिचित हैं।

'समय-समय की बात है और समय-समय का योग, लाखों में बिकने लगे दो कौड़ी के लोग।कलयुग में ऐसा होता है। जो पतीत है, जो चरित्र से गिरा है वह ऊपर चला जाता है। 'गिरने वाला तो छू गया बुलंदी आसमान की और जो संभलकर चल रहे थे वो रेंगते नजर आए इसका नाम कलयुग है। कलयुग में कौन किसकी मदद कर रहा है यह पता ही नहीं लगता। आपको जो सहयोगी दिख रहा है वह पीछे षडयंत्र कर रहा होगा। कलयुग में कौन आपसे प्रेम से बात कर रहा है यह ज्ञात ही नहीं होता। कलयुग में आपका शत्रु है या मित्र है यह भान ही नहीं होता। कलयुग में मनुष्य प्रेम प्रदर्शन के, एक-दूसरे से हिसाब-किताब चुकाने के नए-नए तरीके ढूंढ लेता है।

मौत से डरने वालों का ऐसा होता है हाल...
सूतजी शौनकादिजी से बोल रहे हैं- सुनो अब समापन होने जा रहा है। मैं जो कथा तुम्हें सुना रहा था, शुकदेवजी परीक्षित को सुना रहे थे अब दृश्य ऐसा हो गया शुकदेवजी गए। परीक्षित अकेले हैं, मृत्यु की प्रतीक्षा कर रहे हैं। परीक्षितजी ध्यान में बैठ गए। आंखें बंद की, अपनी ऊर्जा को ऊपर लिया, अपने प्राणों को नियंत्रण में किया। आज्ञा चक्र से उठकर ऊर्जा सहस्त्रार पर हैं और आदेश दिया अपने प्राण को मुक्त हो एकदम से प्राण मुक्त हुए, अब केवल देह रह गई। परीक्षितजी दूर खड़े अपनी देह को देख रहे हैं।

ये दृश्य बहुत कम लोग देख पाते हैं। कोई शांत मन से अपनी देह का मोह छोड़े मृत्यु के स्वागत में बैठा है। वो राजा परीक्षित सात दिन पहले जो चक्रवर्ती सम्राट थे। भगवान श्रीकृष्ण ने खुद जिन्हें जीवन दान दिया था। मृत्यु के मुख से बचाकर लाए थे। महान पांडवों का वो वंशज था। दुनियाभर के वैभव, सुख और जिसने भोग किया। परमपराक्रमी और धर्म के तत्व को जानने वाला राजा परीक्षित आज सब कुछ छोड़कर अपनी मृत्यु के इंतजार में बैठ गया है। बिना डरे, बिना किसी असमंजस के। दुनिया में कई शूरवीरों को धूल चटा देने वाला योद्धा आज खाली हाथ मौत से मिलने के लिए बैठा है।आइए उस दृश्य को देखें। तक्षक ने जैसे ही प्रवेश किया, तकक्ष यानी मृत्यु आई है। आज तक्षक के रूप मृत्यु पहली बार अपने जीवन में शरमा गई। मृत्यु ने कहा- यह क्या हुआ मेरा तो सारा आतंक, मेरा सारा अभिमान, भय है और जिस व्यक्ति को मैं मारने आई हूं यह तो निर्भय खड़ा है, दूर खड़ा देख रहा है इसको कोई फर्क नहीं पड़ रहा है और मुस्कुराते हुए स्वागत किया जा रहा है।

आज मृत्यु शरमा गई। मौत का सारा आतंक किसमें है, भय में है। दुनिया में सारा आतंक भय के कारण है अगर आपके मन से भय दूर हो जाए तो सारा आतंक खुद-ब-खुद दूर हो जाएगा।एक गांव में हैजा फैला तो हजार लोग मर गए। गांव के बाहर एक फकीर बैठा था उसने देखा रात को त्राही-त्राही मची और छम-छम करती हुई एक काली सी औरत जा रही है। उसने पूछा देवी आप कौन हैं? वह बोली- मैं मृत्यु की देवी हूं। इस गांव में हजार लोग मारने आई थी कल फिर आऊंगी, क्योंकि हजार और मारना है।

फकीर ने कहा - कल देखेंगे। कल हुआ, पर मर गए दो हजार। जब वो जा रही थी तो फकीर ने उसको रोककर पूछा- तुमने तो कहा था हजार लोग मारने आओगी, पर संख्या तो दो हजार की हो गई। जिंदगी झूठ बोलती है यह तो सुना था पर मौत भी झूठ बोलती है यह आज देखा मैंने। तुमने हजार की जगह दो हजार मार दिए। मौत ने बड़ा सुंदर जवाब दिया- मैं तो हजार ही मारने आई थी और हजार का ही विधान था, बाकी जो एक्स्ट्रा एक हजार मरे वो मेरे डर के मारे मर गए। आदमी डर के मारे ही मर जाता है।

शनिवार, 31 मार्च 2012

भागवत ३३८ से ३४०


गांधारी ने भगवान कृष्ण को क्यों और क्या शाप दिया?
कृष्णजी ने गांधारी के पैर को स्पर्श किया गांधारी बोलीं दूर हटो तुम्हारे कारण आज मेरा वंश समाप्त हो गया। कृष्ण मैं तुमसे बहुत क्रोधित हूं, मैं तुम्हें शाप देना चाहती हूं। मैं जानती हूं तुम्हारी प्रतिभा और प्रभाव को। तुम चाहते तो यह युद्ध रोक सकते थे। यह युद्ध तुमने करवाया। मेरे बेटों ने नहीं लड़ा, तुमने लड़वाया है। तुमने मेरा वंश नाश कर दिया। तुम चाहते तो अपने तर्क से, अपने ज्ञान से, अपनी समझाईश, अपनी प्रभाव से, अपने पौरूष से इस युद्ध को रोक सकते थे। तुमने अच्छा नहीं किया, एक मां से सौ बेटे छीने हैं। गांधारी रोते-रोते कहती है- कृष्ण सुनो! जैसा मेरा भरापूरा कुल समाप्त हो गया, ऐसे ही तुम्हारा वंश तुम्हारे ही सामने समाप्त होगाऔर तुम देखोगे इसे।

इसके बाद गांधारी यहीं नहीं रूकती, बड़े क्रोध और आवेश में बोलती है कि आज हम दोनों कितने अकेले हो गए हैं। देखो तो इस महल में कोई नहीं है। जिस महल में इंसान ही इंसान हुआ करते थे, मेरे बच्चे, मेरे परिवार के सदस्य मेरे पास थे कितने अकेले हो गए हैं आज हम। तुम्हारे जीवन का जब अंतकाल आएगा तुम संसार में सबसे अकेले पड़ जाओगे। तुम्हे मरता हुआ कोई देख भी नहीं पाएगा जो शाप है तुमको।भगवान तो भगवान हैं, प्रणाम किया और कहते हैं मां गांधारी मुझे आपसे इसी आशीर्वाद की प्रतीक्षा थी। मैं आपके शाप को ग्रहण करता हूं मस्तक पर।

आपका शुभ हो, आपने बड़ी दया की है। कृष्ण पलटे तब तक गांधारी को ग्लानि हुई। कृष्ण पलटे और पांडवों ने देखा कृष्णजी के चेहरे पर शापित होने का कोई भाव ही नहीं था। भगवान मुस्कुराए और पांडवों से कहा- चलो। बड़ा अजीब लगा। भगवान अर्जुन के कंधे पर हाथ रखकर कहते हैं अर्जुन लीला तो देखो मेरे यदुवंश को यह वरदान था कि उन्हें कोई दूसरा नहीं मार सकेगा, मरेंगे तो आपस में ही मरेंगे। देखो इस वृद्धा ने शाप दे दिया तो यह व्यवस्था भी हो गई।

कृष्ण का है ये फंडा, जीना है तो जीओ ऐसे
भगवान ने कहा अर्जुन मेरी मृत्यु के लिए जो कुछ भी उसने कहा है मुझे स्वीकार है। कोई तो माध्यम होगा और भगवान मुस्कुराते हुए पांडव से कहते है चलो आज वही भगवान अपने दाएं पैर को बाएं पैर पर रखकर अपनी गर्दन को वृक्ष से टिकाकर बैठे प्रतीक्षा कर रहे थे अपनी मृत्यु की।जिसने मृत्यु का इतना बड़ा महायज्ञ किया था महाभारत वह ऋषि देखते ही देखते इस संसार से चला गया। यूं चले जाएंगे ऐसा भरोसा नहीं था। एक महान अभियान का महानायक यूं छोड़कर चला गया कृष्ण एक बात कहा करते थे कि जब मैं संसार से जाऊं तो कोई रोना मत।

कृष्ण को रोना पसंद नही। कृष्ण कहते हैं रूदन मत करिए आंसू बड़ी कीमती चीज है। मुझे आंसू का अभिषेक तो अच्छा लगता है पर रोना हो तो मेरे लिए रोओ, मुझे पाने के लिए रोओ। मेरी देह पर मत रोओ, यह निष्प्राण देह पर भगवान ने कहा था कि मेरे अंतिम समय में रोना मत, क्योंकि कृष्ण का एक सिद्धांत था मैं जीवनभर खुश रहा हूं और मैंने जीवनभर लोगों को खुश रखा है। इसलिए रोना मत, दु:खी मत होना।
कृष्ण तो भगवान थे, फिर गांधारी का शाप उन्हें क्यों लग गया?
पीताम्बर वो था, जिसने अनेक लोगों की लज्जा बचाई, जिनसे इतने लोग सुरक्षित हुए, जो पीताम्बर द्रौपदी के ऊपर ओढ़ाया गया था, जिस पीताम्बर ने लोगों को ममता का आश्वासन दिया, जिस पीताम्बर में लोगों ने छिप-छिपकर पता नहीं क्या-क्या कर लिया था वह पीताम्बर आज रक्त रंजित हो गया था।

उसका रंग पहचान में नहीं आ रहा था। चारों ओर रक्त बिखरा पड़ा है। भगवान कहते हैं यहां का रक्त यहीं छोड़कर जा रहा हूं।भगवान ने अपने स्वधाम गमन से संदेश दिया कि जाना सभी को है। जिसका भी जन्म हुआ है उसकी मृत्यु होगी ही। जन्म और मृत्यु तय है। सारा खेल बीच का है। हम इस बात को समझ लें कि जिसकी मृत्यु दिव्य है समझ लो उसी ने जीवन का अर्थ समझा है।

शुकदेवजी परीक्षित को समझा रहे हैं और अब धीरे-धीरे कथा ग्यारहवें स्कंध के समापन की ओर जा रही है।शुकदेवजी कहते हैं-राजा परीक्षित्! दारुक के चले जाने पर ब्रह्माजी, शिव-पार्वती, इन्द्रादि लोकपाल, मरीचि आदि प्रजापति, बड़े-बड़े ऋषि-मुनि, पितर-सिद्ध, गन्धर्व-विद्याधर, नाग-चारण, यक्ष-राक्षस, किन्नर-अप्सराएं तथा गरुडलोक के विभिन्न पक्षी अथवा मैत्रेय आदि ब्राह्मण भगवान श्रीकृष्ण के परमधाम प्रस्थान को देखने के लिए बड़ी उत्सुकता से वहां आए थे।

गुरुवार, 29 मार्च 2012

भागवत ३३४ से ३३७

कैसे पाएं किसी संत का आशीर्वाद?
संत के पास जब उनके दर्शनार्थ जाया जाए तो अहंकार रहित नम्र बन कर जाना चाहिए। संत पुरुष इस बात को तोड़ जाते हैं कि यह नम्रता ओढ़ी हुई है अथवा स्वाभाविक। अत: नम्रता को स्वाभाविक बनाने का, साधक को प्रयत्न करते रहना चाहिए। यदि साधक विद्वान है तो विद्वत्ता का अभिमान नहीं होना चाहिए। पाण्डित्य का प्रदर्शन करने, संत की परीक्षा लेने संत के पास जाओगे तो रिक्तहस्त ही वापस आओगे।
अत्युत्तम तो यही है कि जीव में प्रभु-प्रेम की सच्ची लगन हो। बाकी सभी नम्रता, सौम्यता, निरहंकारता इत्यादि स्वाभाविक लक्षण अपनेआप प्रकट होते जाएंगे। ऐसे जीव को ही अधिकारी कहा गया है।ऐसे अधिकारी, भक्त-साधक के लिए संत अगम्य नहीं रहते। वह उनकी कृपा प्राप्त करने में, प्रभु कृपा से सफल होता है तथा परिणाम स्वरूप परम-प्रेम-रूपा भक्ति फल को प्राप्त करता है।
अब तनिक संतों की कृपा की अमोघता पर विचार करते हैं। जिस प्रकार सूर्य के सामने बैठने पर शरीर को गरमी मिलेगी, जल ग्रहण करने पर पिपासा निवृत्ति होगी ही, इसी प्रकार संत की कृपा का फल परम-प्रेम-रूपा भक्ति प्राप्त होगी ही, किन्तु रात को सोया हुआ व्यक्ति सूर्योदय हो जाने के उपरांत भी सोता ही रहे तो उसे सूर्याेदय का ज्ञान ही नहीं होगा। इसी प्रकार जब तक मनुष्य को संत की कृपा तथा उससे प्राप्त होने वाले फल का ज्ञान नहीं होता, उसका पता नहीं चलता।

भक्ति-शक्ति का अन्तुर्मुखी जाग्रत होना तथा क्रियाशीलता, यह दोनों एक दूसरे से भिन्न बातें हैं। संत कृपा होने पर मनुष्य को तत्काल उसका फल प्राप्त हो जाता है, किन्तु किन्हीं अवस्थाओं में उसके क्रियाशील होने में कुछ देर लग जाती है। जाग्रति का ज्ञान, उसके क्रियाशील होने पर ही होता है। तब तक भक्त पूर्ववत् निद्रावस्था में ही रहता है। इसमें उसके प्रबल विपरीत संस्कार ही कारण होते हैं। शक्ति को प्रथम, इन संस्कारों को हटाकर, चित्त को क्रिया योग्य बनाना होता है। यह भी क्रिया ही होती है जिसे सूक्ष्म दृष्टि से देखा-समझा जा सकता है।

संतों और महापुरूषों के सान्निध्य के लिए सबसे बड़ा सूत्र यह है कि वे क्या कर रहे हैं इस पर ध्यान न दें, वो क्या कह रहे हैं अपना मन वहां लगाएं। आजकल लोग संतों का वैभव ही देखते रहते हैं उनके शब्दों पर ध्यान नहीं देते। शब्दों को समझेंगे तो ही ज्ञान आएगा। जो वैभव है, संत उसके बिना भी रह सकते हैं, लेकिन अगर हम वैभव पर टिक गए तो फिर इसी के मोह में उलझकर रह जाएंगे। हम माया में फंसकर इसी को सबकुछ मान बैठेंगे। संतों का साथ अमोघ तभी होगा जब हम उनके रहन-सहन की बजाय उनके उपदेशों पर ध्यान देंगे।

भाव यह है कि महापुरुषों की कृपा प्राप्ति का मार्ग कहीं अधिक सरल तथा निश्चित है, किन्तु इतना सरल भी नहीं कि कोई कैसा भी हो जब चाहे, जहां चाहे उसे प्राप्त कर सकता है। यदि यह कृपा कहीं एक बार प्राप्त हो जाए तो उसका फल निश्चित है, क्योंकि वह अमोघ है। इतने पर भी भक्त कभी निराश नहीं होता। उसे प्रभु पर विश्वास होता है कि वह एक न एक दिन उसे संत दर्शन भी अवश्य कराएंगे तथा उस पर कृपा भी करेंगे।
जब हो कोई भी शुभ काम तो इस एक बात का ध्यान जरुर रखें क्योंकि....
कुसंग, व्यसन हमारे जीवन में अमंगल लाते हैं। यह प्रसंग सभी को सीखने के लिए है कि कभी मांगलिक कार्यों में व्यसनों का उपयोग मत कीजिए। कृष्ण के जीवन की यह एक महत्वपूर्ण घटना है, जिससे बहुत कुछ सीखा जा सकता है।अनिरुद्ध के विवाहोत्सव में सम्मिलित होने के लिए भगवान् श्रीकृष्ण, बलरामजी, रुक्मिणीजी, प्रद्युम्न, साम्ब आदि द्वारकावासी भोजकट नगर में पधारे।

जब विवाहोत्सव निर्विघ्न समाप्त हो गया, तब कलिंग नरेश आदि घमंडी नरपतियों ने रुक्मी से कहा कि तुम बलरामजी को पासों के खेल में जीत लो। बलरामजी को पासे डालने तो आते नहीं, परन्तु उन्हें खेलने में बड़ी रूचि है। उन लोगों के बहकावे से रुक्मी ने बलरामजी को बुलवाया और वह उनके साथ चौसर खेलने लगा।बलरामजी खुद सज्जन थे लेकिन कुसंग में पड़ गए।

हम ध्यान रखें कि किसी के दुर्गुण हम पर हावी न हों। रुक्मी रिश्तेदार थे सो उनके लिहाज में बलराम जुआ खेलने बैठ गए। भोले थे सो जल्दी हार भी गए।बलरामजी की हंसी उड़ाते हुए रुक्मी ने कहा-बलरामजी! आखिर आप लोग वन-वन भटकने वाले ग्वाले ही तो ठहरे। आप पासा खेलना क्या जानें? पासों और बाणों से तो केवल राजा लोग ही खेला करते हैं, आप जैसे नहीं? रुक्मी के इस प्रकार आक्षेप और राजाओं के उपहास करने पर बलरामजी क्रोध से आगबबूला हो उठे।

उन्होंने एक मुद्गर उठाया और उस मांगलिक सभा में ही रुक्मी को मार डाला। इतनी बड़ी घटना घट गई। विवाह के मंगल मौके पर हत्या हो गई। भगवान असमंजस में पड़ गए, किसका साथ दें। मरने वाला उनकी पत्नी का भाई और मारने वाला उनका भाई। जब हम मांगलिक कार्यों में व्यसनों को खुद ही आमंत्रित करते हैं तो अब परमात्मा क्या कह सकते हैं। वे तो मौन ही रहेंगे। इसलिए ध्यान रखें जब भी मंगल उत्सव हों, व्यसनों को दूर रखें। 

कभी भी वक्त का इंतजार नहीं करना चाहिए क्योंकि....
नारदजी कहते हैं कि उसे एक क्षण भी व्यर्थ नष्ट नहीं करना चाहिए। भक्त के जीवन में एक-एक क्षण का भी महत्व होता है। भक्त समय की कीमत जानता है। यह उसके भौतिक सुविधाओं की बहुमूल्य निधि है, जिसका उपयोग वह भक्ति के प्रति करता है। वह यह भी समझता है कि जो क्षण बीत गया, उसे कोई भी कीमत देकर भी वापस नहीं लाया जा सकता। इसलिए वह एक-एक क्षण का उपयोग भजन करने के प्रति ही करता है। यदि कोई भक्त ऐसा नहीं करता है तो उसे करना चाहिए, क्योंकि शुभ समय की केवल बाट ही देखते रहना, कुछ साधन नहीं करना यह कोई प्रतीक्षा नहीं है।

मनुष्य का जीवन अत्यंत अनिश्चित है, कितना समय उसके पास है, कहा नहीं जा सकता। अत: उसका एक-एक पल महत्वपूर्ण है। कार्य बहुत बड़ा है। इतना बड़ा कि अनेकों जन्मों की तपस्या एवं निरंतर साधना से भी पूर्ण हो पाएगा कि नहीं, कहा नहीं जा सकता। फिर भी यह सोचते रहना कि अमुक काम पूर्ण हो जाए, अमुक परिस्थिति आ जाए तो भजन करूंगा। अपने आप को धोखा देना तथा समय नष्ट करना है।

एक और महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि आज हम अच्छे सात्विक भगवद् भक्तों की संगत में हैं जिससे हमारे मन में भी प्रभु को प्राप्त करने के लिए परम-प्रेम-रूपा भक्ति जाग्रत करने की शुभ इच्छा जाग्रत है। किन्तु, यदि हम विचार ही करते रह गए, भजन कुछ किया नहीं, केवल अनुकूल समय का रास्ता ही देखा। जब अनुकूल समय प्राप्त हुआ तो हमारे मन का विचार ही बदल गया। इसलिए उत्तम यही है कि जो भी परिस्थितियां प्राप्त हों तथा जो भी समय उपलब्ध हो एवं जो कुछ आपके पास सुविधाएं हों, उनमें जैसा भी, जितना भी भजन सम्भव हो आरंभ कर दो। यह नियम जाग्रति से पूर्व एवं पश्चात दोनों अवस्थाओं में लागू होता है।

विशेषकर भजन का स्वभाव तथा भक्ति जाग्रति का उपर्युक्त समय युवावस्था ही होता है। बुढ़ापे में जब मन का स्वभाव पक जाता है, इन्द्रियों में शिथिलता आ जाती है, उठा-बैठा भी नहीं जाता, तब क्या साधन-भजन होगा। हां, यदि युवावस्था में ही ऐसा स्वभाव तथा परिस्थितियां बन जाएं तो बुढ़ापे में भी क्रम चलता रह सकता है। अत: आधा क्षण बिगाड़े बिना भी साधन में जुट जाओ। आयु तो देखते ही देखते निकली जा रही है। दिन पर दिन तथा रातों पर रातें व्यतीत होती जा रही हैं। सूर्य उदय होता है, सायं को ढल जाता है। यह क्रम घड़ीभर के लिए भी नहीं ठहरता। इसी के साथ व्यतीत हो जाता है मनुष्य का जीवन भी। सुविधा पूर्वक तथा अनुकूल समय का भजन जैसे महत्वपूर्ण कार्य के लिए प्रतीक्षा करना उचित नहीं।
महाभारत के बाद, ऐसा क्या किया धृतराष्ट्र ने कि पांडव डर गए?
भगवान को विचार आता है मुझे शाप मिला था। आज शाप को पूर्ण करने का अवसर आया है। जब महाभारत का युद्ध समाप्त हो गया था और जब पांडव विजय हो गए थे, राजतिलक हुआ और हस्तिनापुर में प्रवेश कराने के लिए भगवान स्वयं गए। भगवान कृष्ण ने पांडवों से कहा- देखो, हम जीत तो गए हैं लेकिन कौरवों के माता-पिता धृतराष्ट्र और गांधारी अब अकेले हैं, सारा महल सुनसान हो चुका है। हम वहां चलकर उनको प्रणाम करें। पांडवों को लेकर भगवान हस्तिनापुर पहुंचे। महल जिसमें आदमी ही आदमी होते थे, सेवक-सेविकाएं होती थीं।

किसी माता-पिता के सौ बच्चे हों, क्या आनंद रहा होगा। सारा हस्तिनापुर सुनसान, सब लोग मारे गए युद्ध में। केवल विधवाओं की चित्कार सुनाई दे रही थी। बच्चे किलकारी मार रहे हैं, याद कर रहे हैं अपने लोगों को। भगवान जैसे ही पहुंचे हैं धृतराष्ट्र पूछ रहा था कहां हैं पांडव। जैसे ही उनके कक्ष में पहुंचे तो वहां भीम की एक लोहे की मूर्ति रखी हुई थी। दुर्योधन भीम को मारने के लिए उस मूर्ति पर गदा अभ्यास किया करता था, उस पर प्रहार करता था। इसलिए बहुत बलवान था। पांचों पांडव आए,

भगवान आगे थे। धृतराष्ट्र खड़े हैं। भगवान कहते हैं राजा धृतराष्ट्र को प्रणाम। युधिष्ठिर जैसे ही धृतराष्ट्र को प्रणाम करते हैं धृतराष्ट्र कहता है भीम कहां है, भीम कहां है। मुझे भीम को अपनी बाहों में भरना है, हृदय से लगाना है। भीम बांवरा था एकदम दौड़ा। भगवान ने भीम को रोका और लोहे की प्रतिमा को आगे कर दिया और जैसे ही लोहे की प्रतिमा धृतराष्ट्र की बाहों में आई उसने मूर्ति को इतनी जोर से दबाया कि वह चकनाचूर हो गई। पांडव घबरा गए, कांपने लगे।

इसलिए धृतराष्ट्र पूछ रहा था, आज भीम को बाहों में भर लूं और सब समाप्त कर दूं। भगवान बोलते हैं यह जीवन है सबकुछ लुट गया इस नेत्रहीन का, फिर भी इच्छा बची है कि भीम को मार डालूं। हमारा सबकुछ चला जाता है जीवन में सारी इंद्रियां शिथिल हो गईं, सारे राज चले गए। फिर आदमी को ऐसा लगता है कि संसार को बाहों में भर लूं एक बार।
(bhaskar.com)

रविवार, 25 मार्च 2012

भागवत ३२५ से 333

यही कारण है जल्दी परिवार और रिश्तों के बिखरने का?
इन्हीं विभक्ति तत्वों से मनुष्य का यह बाहरी और भीतरी (स्थूल व सूक्ष्म) देह बना है। यहां यह उल्लेख करना आवश्यक है कि गणित-शास्त्र की दृष्टि नौ का अंक पूर्ण होता है तथा आठ का अंक घटता जाता है।इसी प्रकार हमारे निर्माता आठ तत्व न स्वयं कालान्तर में महाकाल में विलीन हो जाएंगे, बल्कि हमारी काया को घटाते हुए उसी महाकाल को हमेशा-हमेशा के लिए सौंप देंगे। समाज की सबसे छोटी इकाई परिवार है और सबसे बड़ी इकाई सरकार या राज्य। इस छोटी इकाई का प्रमुख वृद्ध होता है। सम्भवत: उसका महत्व ऊपरी तौर पर बढ़ता जाता है और प्रमुखता माँ या दादी के हिस्से परिस्थितिवश आ जाए तो पारिवारिक जटिलता भौतिक दृष्टिकोण के कारण पैदा हो जाती है। यह विवेचन का प्रश्न इसलिए पैदा हुआ कि आज हम कलि-प्रभाव में आध्यात्मिक आचार-विचार से दूर होते जा रहे हैं।
वैसे कलि-प्रभाव अभी प्रारंभिक अवस्था में है-कलियुग और द्वापरयुग की सन्धि अभी चल रही है, फिर भी जो पारिवारिक विघटन, विग्रह और विनिमय दिखाई दे रहा है यह हमारे जीवन को न केवल विशाक्त बना रहे हैं बल्कि हमें अपने सुख से तेजी से जा रहे हैं और हम स्वयं के शत्रु बन बैठे हैं-''आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मन:।। गीता 6/5जीवात्मा आप ही (तो) अपना मित्र है और आप ही आत्मा शत्रु है अर्थात् अन्य शत्रु या मित्र नहीं होता।
हम अपने व्यवहार से ऐसी स्थिति का निर्माण कर लेते हैं कि ''सियाराम मय सब जग के स्थान पर ''पराये मय सब जग बन जाता है और यदि पूछा जाए तो हमारा उत्तर होता है- 'हम क्या करें, हम तो हर प्रकार से झुकते हैं, समायोजन करते हैं, परन्तु सामने वाला इतना स्वार्थी है कि वह अपना ही अपना सोचता है और अपने ही अपने लिए कार्य करता है, जबकि हमने जीवनपर्यन्त उसके लिए या उनके लिए सर्वाधिक त्याग किया। यह उत्तर कई स्थितियों में सही होता है और यह स्थिति अनेक परिवारों में पाई जाती है, जिसमें वृद्ध या वृद्धा का महत्व या उपयोगिता शारीरिक, आर्थिक या स्वभावगत कारणों से क्षीण होता जा रहा है।

पैसों का सही उपयोग नहीं करोगे तो यही होगा हाल
जब लड़का किशोरावस्था में होता है तो माता-पिता की रोकटोक उसे बुरी लगती है। वह झल्ला जाता है। कई बच्चे तो घर तक छोड़ देते हैं। माता-पिता उसे दुश्मन लगते हैं। क्योंकि उसका मन आजाद पक्षी की तरह उडऩा चाहता है और मां-बाप की बातें उसे प्रतिबंध सी लगती हैं। वहीं बच्चा जब पालक की भूमिका में आता है तो खुद के बच्चे पर भी वही बातें लादता है जिसका कभी खुद उसी ने विरोध किया था। वाणी का यही प्रभाव होता है उसका असर एक सा होता है लेकिन मनोभाव बदलते ही वह मारक क्षमता वाला हो जाता है।
यहां भगवान ने उज्जैन को याद किया है। उज्जैन में प्रभु पढऩे भी गए थे। एक विवाह भी वहां की राजकुमारी से किया था। अब उदाहरण में भी उज्जैन को याद कर रहे हैं। भगवान भी कहते हैं कि अपने ससुराल को हमेशा याद करते रहना चाहिए। भागवत में गृहस्थी के अनेक सूत्र आते रहते हैं।
प्राचीन समय की बात है उज्जैन में एक ब्राह्मण रहता था। उस ब्राह्मण ने खेती-व्यापार आदि करके बहुत सी धन, सम्पत्ति इकट्ठी कर ली थी। वह बहुत ही कृपण, कामी और लोभी था। क्रोध तो उसे बात-बात में आ जाया करता था।
उसने अपने जाति-बन्धु और अतिथियों को कभी मीठी बात से भी प्रसन्न नहीं किया, खिलाने-पिलाने की तो बात ही क्या है। उसकी कृपणता और बुरे स्वभाव के कारण उसके बेटे-बेटी, भाईबन्धु, नौकर-चाकर और पत्नी आदि सभी दुखी रहते और मन ही मन उसका अनिष्ट चिंतन किया करते थे। कोई भी उसके मन को प्रिय लगने वाला काम नहीं करता था। अब तक धन टिका हुआ था- जाता रहा और जिसे उसने बड़े उद्योग और परिश्रम से इकट्ठा किया था, वह धन उसकी आंखों के सामने ही नष्ट-भ्रष्ट हो गया। उस नीच ब्राह्मण का कुछ धन तो उसके कुटुम्बियों ने ही छीन लिया, कुछ चोर चुरा ले गए।

समझ लें इसे क्योंकि बस यही असली आध्यात्म है...
एक क्षण ऐसा आता है जब सारे भार को कम करने ईश्वर स्वयं आ उपस्थित हो साधक को अपने में विलीन कर लेते हैं। यह स्थिति तब बनती है जब सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं ब्रजं वाली आज्ञा का सही अर्थ में साधक, भक्त, ज्ञानी या और कोई सतत् पालन करने का प्रयत्न करके अपने जीवन का गंतव्य समझ सोपान दर सोपान चढऩे लगता है। इसे ईश्वर प्रणिधान की संज्ञा ऋषि-मुनियों, योगियों, तत्वदर्शियों आदि ने दी है।भगवान श्रीकृष्ण अपने देवलोकगमन के पूर्व उद्धवजी को अद्भुत ज्ञान दे रहे हैं।
वे अब सांख्य योग पर चर्चा करते हैं। हमें अपने भीतर की स्थितियों का भी ज्ञान होना चाहिए। हमारा व्यक्तित्व जिन तत्व से संचालित होता है। उसको सूक्ष्म तरीके से समझाया है। भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं-भाई उद्धव! अब तुम्हें सांख्य शास्त्र का निर्णय सुनाता हूं। इसमें संदेह नहीं कि ब्रम्ह में किसी प्रकार का विकल्प नहीं है, वह केवल अद्वितीय सत्य है, मन और वाणी की उसमें गति नहीं है।वह ब्रम्ह ही माया और उसमें प्रतिबिम्ब जीव के रूप में दृश्य और द्रष्टा के रूप में, दो भागों में विभक्त सा हो गया। उनमें से एक वस्तु को प्रकृति कहते हैं। उसी ने जगत् में कार्य और कारण का रूप धारण किया है। दूसरी वस्तु को, जो ज्ञानस्वरूप है, पुरुष कहते हैं। मैंने ही जीवों के शुभ-अशुभ कर्मों के अनुसार प्रकृति को क्षुब्ध किया। तब उससे सत्व, रज और तम - ये तीन गुण प्रकट हुए।
उनसे क्रिया-शक्तिप्रधान सूत्र और ज्ञानशक्ति प्रधान महत्तत्व प्रकट हुए। वे दोनों परस्पर मिले हुए ही हैं। महत्व में विकार होने पर अहंकार व्यक्त हुआ। यह अहंकार ही जीवों को मोह में डालने वाला है। वह तीन प्रकार का है-सात्विक, राजस और तामस। अहंकार पंचतन्मात्रा, इन्द्रिय और मन का कारण है, इसलिए वह जड़-चेतन-उभयात्मक है। अहंकार को केवल घमण्ड न मान लिया जाए। इसको सूक्ष्मता से समझना चाहिए।अहंकार का उद्घोश शब्द मैं प्रयुक्त हो सकता है। सोऽहं के उच्चारण को इस अक्षर मैं को यदि लिया जाए तो यह ब्रम्ह बोधक होगा, अक्षर ब्रम्ह ही है। जिसका क्षरण न हो व अक्षर, शेष सारे जीवन वैभव क्षर है। सृष्टि क्षर है। सृष्टि क्रम में अहंकार निहित है। इसकी रचना के पूर्व समस्त आत्माओं की आत्मा एक पूर्ण परमात्मा थे, तब न दृष्टा थे और दृश्य था। माया का प्रादुर्भाव हुआ।
माया की व्याख्या इस प्रकार है-मा नहीं या जो अर्थात् ब्रम्ह नहीं है अथवा जिसकी स्वत: कोई सत्ता नहीं है। यह अर्थ ठीक है कि जो ईश्वर से तो आई है, परंतु ईश्वर से भिन्न गुण वाली है, अर्थात् ईश्वर का ज्ञान बंधन मुक्त करता है और माया बंधन युक्त करती है। ईश्वर से अद्भुत उसकी माया चेतन प्रकाशमयी होनी चाहिए। तस्य भासा सर्वमिदं विभाती है - यह सबकुछ उस परमात्मा से प्रकाशित हो रहा है, परंतु वह अपने स्वामी के मुख पर पर्दा डाल देती है।माया का काल, कला, नियति, इनके ज्ञान और राग इन पंच विध सीमाओं से सिमित होकर अंशी जीव का रूप धारण कर लेता है। भगवान की यह माया उन्हीं के शब्दों में ''दैवी ह्येशा गुणमयी मम माया दुरत्यया। मामेव ये प्रपधन्ते मायामेतां तरन्ति ते।।
मेरी यह तीन गुणों वाली माया से तरना कठिन है पर जो मेरी ही शरण लेते हैं, वे इस माया को तर जाते हैं। सारी सृष्टि माया का रूप है, इसमें तरने के लिए शरणागति उपाय है। हम इसे अध्यात्म का सार कहें तो उपयुक्त होगा। इसी क्रम में गीताकार ने स्पष्ट किया है कि जो शरण में नहीं जाते या जा सकते हैं वे आसुरी भाव वाले मूढ़ हैं- भजन शरणागति का व्यावहारिक स्वरूप माना जाना ठीक लगता है। चार प्रकार के भजनार्थी श्रीकृष्ण भगवान ने बताए-दु:खी, जिज्ञासु, कुछ प्राप्त करने वाले (अर्थाथी) और ज्ञानी। इनमें समभाव से भजने वाले ज्ञानी श्रेष्ठ को माना गया है। ज्ञानी कई जन्मों के अंत में भगवान को पाता है, सब वासुदेवमय है, ऐसा जानने वाला ज्ञानी महात्मा सुदुर्लभ होता है।

अगर ऐसे जिंदगी बिता रहे हैं तो आप भ्रम में हैं क्योंकि....
संसार और माया, दोनों शब्द कभी एक-दूसरे से बिलकुल अलग तो कभी एक दूसरे के विकल्प नजर आते हैं। कुछ विद्वान इस संसार को ही माया कहते हैं, तो कुछ कहते हैं कि यह संसार पूरी तरह परमात्मा की माया से घिरा हुआ है। संसारी जीव के लिए यह तय करना कठिन है कि वह इस दुनिया को समझे कैसे। उसके लिए तो यही सत्य भी है, यही माया भी। संसार और माया के बीच बहुत बारिक सी लकीर है जो इन दोनों को पूरी तरह अलग भी करती है और अगर गौर से न देखा जाए तो दोनों को एक भी दिखाती है। इस लकीर का नाम है ज्ञान, विवेक। अगर हमारे भीतर ज्ञान और विवेक जागृत है तो फिर हम संसार और माया में फर्क भी कर सकते हैं और परमात्मा को पाने के जतन भी कर सकते हैं। जिनके भीतर ज्ञान का प्रकाश नहीं होता वे लोग अक्सर अपना जीवन भ्रम में ही गुजार देते हैं।
वास्तव में देखा जाए तो संसार भ्रम और माया भी है, संसार सत्य भी है। इसके अंतर को अच्छे से समझा जाए। जब हम संसार में जीते हैं, परिवार में रहते हैं, समाज में समय बिताते हैं तो ये सब सत्य लगता है। आदमी पारिवारिक और सामाजिक जीवन में इतना उलझ जाता है कि वह परमात्मा, परमशक्ति से दूर हो जाता है। जो लोग इस संसार को ही पूरी तरह अपना मान लेते हैं, उनके लिए संसार सारी उम्र सत्य जैसा ही लगता है लेकिन जब अंतिम समय पास आता है तो फिर यह संसार मिथ्या लगने लगता है। ऐसे समय कुछ लोग कुछ सवाल उठाते हैं कि क्या पारिवारिक जिम्मेदारियां न उठाई जाएं, समाज से दूर हो जाएं, काम करना बंद कर दें, कहीं जंगल में चले जाएं? ये सब विवेकशून्यता की निशानियां हैं, व्यक्ति अपने कर्तव्य को समझ ही नहीं पाया यह साफ हो जाता है।
जो ज्ञानी है, जिसके भीतर विवेक जागृत है वो कभी ऐसी बातें नहीं करता। उसके लिए संसार और माया का फर्क हमेशा रहता है। इसे कैसे समझें। सीधा तरीका है संसार में रहें, समाज में रहें, परिवार की जिम्मेदारियां भी उठाएं, सामाजिक भूमिका का निर्वाह भी करें लेकिन इसके केंद्र में संसार नहीं हो, इन सब कामों के केंद्र में भगवान हो, परमात्मा हो, तो फि र संसार कभी भी माया नहीं लगेगा। हर काम को यह सोचकर करें कि इसे परमात्मा की प्राप्ति के लिए कर रहे हैं। जो मिल रहा है, वह परमात्मा का दिया हुआ है, जो छिन रहा है वह भी परमात्मा ही वापस ले रहा है। लेकिन यह सब व्यवहार में लाना आसान नहीं है। इसके लिए बहुत कोशिशें लगती हैं। अभ्यास करना पड़ता है। तभी संसार और माया दोनों को समझा जा सकता है।

बस ये एक बात समझ लें सफल जिंदगी का राज इसी में है....
नानक देवजी की उक्ति के अनुसार सारे संसार में राम को रमते देख कर्म करते हुए जीवन यापन करना कर्म की कुशलता है। एक उदाहरण हमें इस दिशा में
निदेशन देता है-जाजालि एक ऋषि था। उसने समुद्र तट पर बड़ी तपस्या की। उसकी जटा में पक्षियों ने घोंसला बनाया। उसे सिद्धियां प्राप्त हुईं। वह वरदान देने तथा श्राप देने में समर्थ हो गया।
एक दिन एक चिडिय़ा ने उसके ऊपर कीट कर दी, उसे बड़ा क्रोध आया। उसने चिडिय़ा को देखा, चिडिय़ा जल गई। उसे प्रसन्नता हुई लेकिन आकाशवाणी
अन्तर्मन की ध्वनि हुई मेरी तपस्या निरर्थक है। काशी निवासी तुलाधार का तप ही सच्चा तप है। उसके पास जा और उससे शिक्षा प्राप्त कर। जाजालि काशी
पहुंचा। तुलाधार के घर गया। तुलाधार अपने व्यापारिक कार्य में लगा हुआ था। जाजालि को देखते ही परिचित की भांति बोला- आइए! पधारिए, जाजालि ऋषि आपका स्वागत है और जो कुछ जाजालि के साथ व्यतीत हुआ सम्पूर्ण वृतान्त ऐसे सुनाया मानो वह स्वयं उस घटना के समय उपस्थित हो।
ऋषि को अद्भुत लगा। बड़ा आश्चर्य हुआ कि सम्पूर्ण भौतिक कर्म करते हुए यह सर्वज्ञाता कैसे हो गया। जाजालि के भ्रम को दूर करने की दृष्टि से तुलाधार ने प्रेम से कहा-महात्मा! मैं केवल भगवान की प्रसन्नता के लिए अपने प्रभु-प्रदत्त कत्र्तव्य कर्म का पालन करता हूं, उनकी इच्छा में प्रसन्न रहता हूं। मैं तो उनका आज्ञाकारी माली बनकर उनके उपवन में काम करता हूं। मेरे जीवन का व्रत है सबका हित करना व चाहना। अपने कर्तव्य का निष्ठापूर्वक पालन करता हूं। माता-पिता की भक्तिपूर्वक सेवा करता हूं। सदाचार, सद्विचार, संतोष व शांति ही मेरा जीवन है, यही मेरा तप है। इसलिए भगवान की कृपा है। तुलाधार के यहां एक पिंजरे में दो पक्षी के बच्चे थे, उनकी ओर संकेत करके वह बोले-महात्मन! ये वे ही पक्षी के बच्चे हैं जो आपकी जटा में समुद्र तट पैदा हुए थे। भगवत् कृपा से इन्हें ज्ञान हो गया है। पक्षी ऋषि जाजालि से प्रसन्न होकर कहने लगे-रागी-अज्ञानियों को वन में भी अनेक प्रकार के अहंकार, क्रोध आदि दोष उत्पन्न हो जाता है। परंतु गृह में रहता हुआ जो व्यक्ति विषयों के राग का निवारण कर इन्द्रियों का निग्रह करता है-इन्द्रियों को विषय की ओर नहीं जाने देता, यही उसका भारी तप है और जो भगवान की प्रसन्नता के लिए निमित्त हो कर्म करता है, उसके सभी कर्म पवित्र रहते हैं और उसका राग रहित घर ही तपोवन बन जाता है।
वनेऽपि दोशा: प्रभवन्ति रागिणां, गृहेऽपि पंचेन्द्रियनिग्रहस्तप:।
अकुत्सिते कमर्णि य: प्रवर्तते, निवृत्त रागास्य गृहं तपोवनम्।।

इस सद्वृत्ति के लिए मन: स्थिति को महाकाल के आधीन करके आनन्दमय जीवन बिताना शक्य होता है। महाकाल और सदाशिव एक ही है। संसार के उतार-चढ़ाव में सम बुद्धि प्राप्ति का एकमात्र उपाय भवगत समर्पण है। यह समर्पण उसकी कृपा के बिना संभव नहीं, उसकी कृपा के लिए उसी को पुकारें।

धर्म की नजर से: कैसा होना चाहिए परिवार का महौल?
व्यावहारिक रूप में जिस व्यक्ति के माध्यम से शक्ति कार्य करती है, उसे गुरु कहा जाता है, किन्तु वास्तव में गुरु व्यक्ति नहीं ईश्वर है। या ईश्वर द्वारा प्रदत्त शक्ति सम्पन्न अवतार है। रामावतार में श्रीराम ने लक्ष्मण को, हनुमानजी को, शबरी को गुरु रूप में उपदेश दिया, वही शिव ने किया। कृष्णावतार में अर्जुन, उद्धव गुरु उपदेशों से लाभान्वित हुए। भगवान कृष्ण की स्तुति में 'कृष्णं वन्दे जगत् गुरुम कहकर उन्हें सम्बोधित किया ही जाता है। अत: गुरु रूप में व्यक्ति ईश्वरावतार कहा जा सकता है। साधक अपनी साधना तथा ईश्वर (गुरु) कृपा से नाम जपते-जपते उसके अर्थ तक गहरा उतर जाता है।
'तस्य वाचक प्रणव.... प्रणव है नाम जिसका तथा नाम है प्रणव जिसका। प्रणव के अलावा राम, कृष्ण, विष्णु, हरि, शिव, गॉड, अल्लाह या जो भी नाम संस्कारवश मिल जाए उसका जप सतत तेल धारावत् होने लगता है। प्राणशक्ति का चित्त से व मन से तादात्म्य त्यागकर आत्मा में लय हो जाता है। नाम जप व हरि स्मरण मुक्ति का माध्यम बन जाता है और साधक मुक्ति की सिद्धावस्था में स्थित हो आगे और आगे या ऊपर और ऊपर बढ़ता हुआ, उठता हुआ अपने अंतिम लक्ष्य को प्राप्त करने में समर्थ होने लगता है। यह वर्तमान जन्म में या आगे के जन्मों में सम्भव होता है। निर्भर करता है कि साधना की गति कितनी तीव्र है। गृहस्थी में परिवार के सदस्यों को साधक वृत्ति रखना चाहिए।
परिवार के साथ भी परमात्मा में लीन रहा जा सकता है। परिवार भी एक तरह की तपोस्थली ही है। हमें केवल इसे व्यवहार में लाना होगा। परिवार के केंद्र में परमात्मा को रख लें, हर काम यह मानकर किया जाए कि परमात्मा का दिया काम है, परमात्मा की प्राप्ति के लिए किया जा रहा काम है। परिवार में बातचीत का आधार भी धन, सम्पत्ति या रिश्ते न होकर ज्ञान, गुण, वैराग्य और भक्ति होना चाहिए। रामायण में इसका एक सुंदर उदाहरण भी है, जब परिवार के सदस्य आपस में बातचीत करें तो उनका आधार क्या हो, उनके बीच बातचीत कैसी हो, किस विषय पर बात हो। राम, सीता और लक्ष्मण चित्रकूट में ऐसी ही बात कर रहे हैं। राम, सीता और लक्ष्मण को ज्ञान, भक्ति, गुण और वैराग्य का महत्व समझा रहे हैं। ऐसे माहौल में परिवार स्वत: परमात्मामय हो जाएगा। आपको कभी इसके लिए कोई अतिरिक्त प्रयास भी नहीं करना होंगे।

बरबादी से बचना है तो ये एक बात हमेशा याद रखें
अब भगवान और उद्धव का वार्तालाप ग्यारहवें स्कंध के छब्बीसवें अध्याय में प्रवेश कर रहा है। मनुष्य शरीर का महत्व और उद्देश्य बताते हुए भगवान प्रश्नों के उत्तरों का सिलसिला आरंभ करते हैं।भगवान कहते हैं- उद्धवजी! यह मनुष्य शरीर मेरे स्वरूप ज्ञान की प्राप्ति का मुख्य साधन है। इसे पाकर जो मनुष्य सच्चे प्रेम से मेरी भक्ति करता है, वह अन्त:करण में स्थित मुझ आनन्द स्वरूप परमात्मा को प्राप्त हो जाता है। सत्व-रज आदि गुण जो दिख रहे हैं वे वास्तविक नहीं हैं, मायामात्र हैं।
ज्ञान हो जाने के बाद पुरुष उनके बीच में रहने पर भी उनके द्वारा व्यवहार करने पर भी उनसे बंधता नहीं।इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि जो लोग विषयों के सेवन और उदरपोषण में ही लगे हुए हैं, उन असत् पुरुषों का संग कभी न करें, क्योंकि उनका अनुगमन करने वाले पुरुष की वैसी ही दुर्दुशा होती है, जैसे अंधे के सहारे चलने वाले अंधे की। उसे तो घोर अंधकार में ही भटकना पड़ता है।इसलिए आज के जमाने में आप अपने संग को लेकर बहुत सावधान रहें। हम अपने पहनावे, खानपान को लेकर तो विचार करते हैं, पर हम किन लोगों के साथ उठ-बैठ रहे हैं इस पर ध्यान नहीं देते। जो लोग हमारे जीवन में हैं उनके आचरण का सीधा असर हम पर पड़ेगा ही। इसलिए अपने संग के प्रति अतिरिक्त रूप से जागरूक रहें।
आज प्रबंधन के युग में चौबीस घण्टे हमें अच्छे और बुरे लोगों से मिलना पड़ता है। कई लोग अपना स्वार्थ साधने के लिए हमसे संबंध बना लेते हैं। हो सकता है हम भी अपना स्वार्थ साधने के लिए उनसे संपर्क रखते हों। लेकिन भागवत का भक्त इस बात के लिए सचेत रहे कि व्यावहारिक और सांसारिक संपर्कों से कहीं कुसंग न हो जाए। यहां आकर भगवान उद्धवजी को एक दृष्टांत सुनाते हैं। राजा पुरूरवा उर्वशी पर मोहित हो गए थे। कुसंग मोह पैदा करता है और आदमी का पतन हो जाता है।

इस मामले में विवेक से काम न लिया तो बचना है मुश्किल क्योंकि....
उद्धवजी! पहले तो सम्राट पुरूरवा उर्वशी के विरह से अत्यंत बेसुध हो गया था। बाद में शोक हट जाने पर उसे बड़ा वैराग्य हुआ। उर्वशी ने उनका चित्त आकृष्ट कर लिया था। उन्हें तृप्ति नहीं हुई थी। वे क्षुद्र विषयों के सेवन में इतने डूब गए थे कि उन्हें वर्षों की रात्रियां न जाती मालूम पड़ीं और न तो आतीं।पुरूरवा ने बाद में पश्चाताप के साथ कहा मेरी मूढ़ता तो देखो, कामवासना ने मेरे चित्त को कितना कलुषित कर दिया। मैं प्रजा को मर्यादा में रखने वाला सम्राट हूं।
वह मुझे और मेरे राजपाट को तिनके की तरह छोड़कर जाने लगी और मैं पागल होकर रोता-बिलखता उस स्त्री के पीछे दौड़ पड़ा। स्त्री ने जिसका मन चुरा लिया, उसकी विद्या व्यर्थ है। उसे तपस्या, त्याग और शास्त्राभ्यास से भी कोई लाभ नहीं। भगवान को छोड़कर और ऐसा कौन है, जो मुझे उसके फंदे से निकाल सके।काम हमारे मन को ढंक लेता है। शरीर को वश में कर लेता है।
इसीलिए कहा जाता है कि काम का बाण सीधे हमारे मन को बेधता है। वह सीधे मन में उतरता है और मन को वश में करके, उससे शरीर पर शासन करता है। हम में से अधिकतर लोगों के साथ यही समस्या है कि हम मन के मत से चलते हैं। मन हमारी सवारी करता है, वो जिधर ले जाता है उधर ही हम चल पड़ते हैं। मन को समझाना, साधना बहुत मुश्किल हो जाता है। मन से सीधे वो बुद्धि पर प्रहार करता है। मन काम के वश में हो जाए तो फिर बुद्धि को वश में करना कोई बड़ी बात नहीं है।
इसीलिए कहा गया है कि कई बारबुद्धिमान, ज्ञानी, तत्वज्ञानी लोग भी काम के जाल में ऐसे उलझ जाते हैं कि अच्छे बुरे के सारे भेद की समझ ही मिट जाती है। सो, काम से बचने का एक ही तरीका है, वह है ध्यान। थोड़ा मेडिटेशन हमें मन के प्रभाव से बचाता है। हम मन के अधीन नहीं होते, मन हमारे अधीन हो जाता है। जब मन सध जाए तो बुद्धि कभी पराभाव में नहीं जाएगी। मन को नहीं साधा तो काम का बाण लगना तय है। इस बाण से कोई नहीं बच सकता।
इसलिए अपनी भलाई समझने वाले विवेकी मनुष्य को चाहिए कि विषय और इन्द्रियों के संयोग से ही मन में विकार होता है, अन्यथा विकार का कोई अवसर ही नहीं है। जो वस्तु कभी देखी या सुनी नहीं गई है, उसके लिए मन में विकार नहीं होता। जो लोग विषयों के साथ इन्द्रियों का संयोग नहीं होने देते, उनका मन अपनेआप निश्चल होकर शांत हो जाता है।

शुक्रवार, 29 जुलाई 2011

भागवत ३२४

यह बात सिर्फ बुद्धिमान लोग ही समझते हैं....
ब्रम्ह सत्य है, ब्रम्ह आनन्द प्रदायक है और वह मोहक श्रेष्ठतम सुन्दर है। इसीलिए उसे सत्यम, शिवम् एवं सुन्दरम् कहा जाता है।
भगवत् गीता में-''परम ब्रम्ह अक्षर है, उसका स्वभाव अध्यात्म कहलाता है-भूतों के भाव को उत्पन्न करने वाला भूत-भाव और सृष्टि एवं संहार कर्म है।
और यही ब्रम्ह ''तपसा चीयते ब्रम्ह, तस्य ज्ञान मयं तप: मुण्डकोपनिशद 1, 1, 4-9 अर्थात् ब्रम्ह तप द्वारा निर्गुण से सगुण हो गया। चीयते का अर्थ फलना-फूलना है। यह अध्यात्म भाव है। यह आत्मज्ञान प्राधान है।
आइये जानते हैं भागवत में भगवान को उठाने के लिए श्रुतियां क्या कहती हैं। श्रुतियां कहती हैं-भगवान! आप ही सर्वश्रेष्ठ हैं, आप पर कोई विजय नहीं प्राप्त कर सकता। आपकी जय हो, जय हो। प्रभो! आप स्वभाव से ही समस्त ऐश्वर्यों से पूर्ण हैं, इसलिए चराचर प्राणियों को फंसाने वाली माया का नाश कर दीजिए। जगत में जितनी भी साधना, ज्ञान, क्रिया आदि शक्तियां हैं उन सबको जगाने वाले आप ही हैं। इसलिए आपके बिना यह माया मिट नहीं सकती।
जिस समय यह सारा जगत् नहीं रहता, उस समय भी बाप बचे रहते हैं। जैसे घट, मिट्टी का प्याला, कसोरा आदि सभी विकार मिट्टी से ही उत्पन्न और उसी में लीन होते हैं, उसी प्रकार सम्पूर्ण जगत् की उत्पत्ति और प्रलय आप में ही होती है।मनुष्य अपना पैर चाहे कहीं भी रखे-ईंट, पत्थर या काठ पर, होगा वह पृथ्वी पर ही, क्योंकि वे सब पृथ्वी स्वरूप ही हैं। इसलिए हम चाहे जिस नाम या जिस रूप का वर्णन करें, वह आपका ही नाम, आपका ही रूप है।
लोग सत्व, रज, तम-इन तीन गुणों की माया से बने हुए अच्छे-बुरे भावों या अच्छी-बुरी क्रियाओं में उलझ जाया करते हैं, परन्तु आप तो उस माया नदी के स्वामी, उसके नचाने वाले हैं।भगवन प्राणधारियों के जीवन की सफलता इसी में है कि वे आपका भजन-सेवन करें, आपकी आज्ञा का पालन करें, यदि वे ऐसा नहीं करते तो उनका जीवन व्यर्थ है और उनके शरीर में श्वास का चलना ठीक वैसा ही है, जैसा लुहार की धौंकनी में हवा का आना-जाना।
भगवन आप अनादि और अनन्त हैं। जिसका जन्म और मृत्यु काल से सीमित है, वह भला, आपको कैसे जान सकता है। जो लोग यह समझते हैं कि आप समस्त प्राणियों और पदार्थों के अधिष्ठान हैं, सबके आधार हैं और सर्वात्मभाव से आपका भजन-सेवन करते हैं, वे मृत्यु को तुच्छ समझकर उसके सिर पर लात मारते हैं अर्थात् उस पर विजय प्राप्त कर लेते हैं। जो लोग आपसे विमुख हैं, वे चाहे जितने बड़े विद्वान् हों, उन्हें आप कर्मों का प्रतिपादन करने वाली श्रुतियों से पशुओं के समान बांध लेते हैं।
इसके विपरीत जिन्होंने आपके साथ प्रेम का बन्धन जोड़ रखा है, वे न केवल अपने को बल्कि दूसरों को भी पवित्र कर देते हैं, जगत् के बन्धन से छुड़ा देते हैं। ऐसा सौभाग्य भला, आपसे विमुख लोगों को कैसे प्राप्त हो सकता है।श्रुतियां कह रही हैं-भगवन सभी जीव आपकी माया से भ्रम में भटक रहे हैं, अपने को आपसे पृथक मानकर जन्म-मृत्यु का चक्कर काट रहे हैं, परन्तु बुद्धिमान् पुरुष इस भ्रम को समझ लेते हैं और सम्पूर्ण भक्तिभाव से आपकी शरण ग्रहण करते हैं, क्योंकि आप जन्म-मृत्यु के चक्कर से छुड़ाने वाले हैं।
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गुरुवार, 28 जुलाई 2011

भागवत ३२३

ये दो बातें मुश्किलों से बचा सकती हैं...
दो चीजों को भूलमत जो चाहे कल्याण। अयंभावी मृत्यु इक और दूजे श्री भगवान।
इन दो की स्मृति साधक को अनेक दुविधाओं, कदाचरणों, ममता जनित क्लेश और विघ्न-बाधाओं से बचा सकती है। इससे ज्ञानोदय होने में सहायता मिलती है। महात्मा या सद्गुरु शक्तिपात करके विराट पुरुष के दर्शन से मिलने वाले आनन्द का अनुभव तब ही करा सकते हैं जब निष्काम कर्म द्वारा चित्त शुद्ध कर लिया गया हो, निष्ठा को अपने में प्रतिष्ठित कर लिया गया हो अपने अन्तर को कपट रहित निर्मल कर लिया हो और सब प्राणी जिसमें आश्रित हो उस परमात्मा को जानो। अन्य सबकुछ तुच्छ समझकर छोड़ दो। यह अमृत का सेतु है।
परमात्मा सत्य है। उसे सत्य निष्ठ ही जान सकता है, अन्य नहीं। सत्य का आचरण कल्याणकारी होता है। सत्य की प्रतिष्ठा से क्रिया सफल हो जाती है। सत्य से ही ब्रम्ह का अनुभव किया जा सकता है। इससे चित्त दर्पण स्वच्छ, निर्मल होता है फिर वह प्रतिबिम्ब रूप में स्पष्टत: भासित होता है। यह उसका दर्शन है। वस्तुत: वह मन, बुद्धि से परे तथा इन्द्रियातीत है। अनुभवगम्य ब्रम्ह बखानने का विषय नहीं है। फिर यह अनुभव ध्यान में हो या प्रतीक-पूजन में।
नियमित पूजन-भजन और ध्यान साधन करने वाला साधक चिन्ता, भय, विषाद, शोक आदि से सर्वथा मुक्त होकर शान्ति में प्रतिष्ठित हो जाता है। उसके सान्निध्य में अन्य भी शान्ति रूपी सुगन्ध का अनुभव कर लेते हैं।
यह पूर्ण या आंशिक ब्रम्हानुभूति का प्रभाव कहा जा सकता है। वैसे पूर्ण ब्रम्हानुभूति अत्यन्त दुष्कर है लेकिन आंशिक प्राप्ति भी बिना सत्याचरण के सम्भव नहीं। सत्याचरण इसलिए आवश्यक है कि ब्रम्ह सत्य है। उस परम सत्य को जगत-सत्य में खोजने के लिए तीर्थाटन, सत्संग, महात्माओं के दर्शन, प्रतीक दर्शन आदि किए जाते हैं। भौतिक जगत और आध्यात्मिक क्षेत्र की रचना परम सत्य के द्वारा ही की गई है, इसलिए उसे झूठा कैसे कहें, हालांकि दार्शनिक शंकर चिन्तन में ब्रम्ह सत्य जगत मिध्या स्वीकारा गया है। उसको चुनौती नहीं दी जा सकती है। नित्य-अनित्य व अक्षर-क्षर का भेद तो करना ही होगा। ब्रम्ह अक्षर अनन्त और तेजरूप चिन्मय है, जबकि जगत और जगत का सम्पूर्ण व्यवहार और स्वरूप अन्तवान है। अनन्त और अन्त में मूलभूत अन्तर तो है ही।
दूसरे ब्रम्हानुभूति चिर आनन्द का विषय हैं। जगतानुभूति चाहे प्रारम्भ में मोहवशात ब्राम्ह और क्षणिक आनन्द दे दे किन्तु वह अल्पकाल या कालान्तर में दु:खदायी होती है। पुत्र, विवाह या व्यवसाय सुख दे किन्तु विछोह महा कष्टप्रद होता है। भगवतीय विछोह या तो होता नहीं है और यदि प्रारब्धवशात् हो गया तो भी आनन्दानुभूति उसी प्रकार होती है जैसी कि महारासलीला के मध्य गोपियों को हुई थी।
तीसरे महारास लीला उस ब्रम्ह की अत्यन्त सुन्दरतम प्रेम-प्रदर्शन की लीला कही जा सकती है, जिससे प्रेम किया जाता है। उसमें सुन्दरतम देखने की दृष्टि हमेशा रहती है। वह सुन्दर दिखाई भी देता है। ब्रम्ह ने सुन्दर सुष्टि का निर्माण किया, उससे सुन्दर कोई हो नहीं सकता, क्योंकि सुन्दर ही सुन्दर का निर्माण करता है।

मंगलवार, 26 जुलाई 2011

भागवत ३२१

संबंधों को निभाएं तो कुछ इस तरह...
भागवत में ही भगवान के चौथे अवतार वामनदेव की कथा है। असुरों के राजा बलि जो भगवान के अनन्य भक्त प्रहलाद का पौत्र था ने यज्ञ का आयोजन किया। देवताओं के हित को देखकर भगवान ने वामन रूप अवतार लिया लिया और राजा बलि के यज्ञ में चले गए। दान मांगा, राजा बलि ने संकल्प लिया, गुरु शुक्राचार्य ने रोका फिर भी नहीं माने वामन को तीन पग भूमि दान दी। वामन देव ने दो ही पग में धरती और आकाश नाप लिया, तीसरा पग कहां रखूं वामन ने पूछा।
राजा बलि जो जानते थे कि देवताओं ने उनका यज्ञ रुकवाने के लिए छल किया है, फिर भी अपने संकल्प से नहीं हटे। भगवान उसे जीतने आए थे, उसने भगवान को जीत लिया। वामन ने जब बलि से पूछा कि तीसरा पैर कहा रखूं तो राजा बलि ने नि:संकोच खुद को आगे कर दिया। भगवान के पैरों के नीचे अपना सिर धर दिया। भगवान के भार से वह पाताल में चला गया लेकिन उसके सत्यव्रत और भक्तिभाव से विष्णु प्रसन्न हो गए तो वर मांगने को कहा।
बलि ने विष्णु को अपने राज्य का द्वारपाल बना लिया। भगवान भक्त के नगर की पहरेदारी करने लग गए। यह होता है समर्पण। अपना सबकुछ उसे सौंप दो फिर आपसे दूर कुछ भी नहीं रहेगा। इसी यात्रा में भगवान राजा के साथ-साथ ब्राह्मण के घर भी जाते हैं और साथ में मुनियों को भी ले जाते हैं। एक तो भगवान बताना चाहते हैं कि मेरा समानता में विश्वास है और दूसरे भगवान सतत् सक्रियता का संदेश देते हैं। मेलजोल बनाए रखो। आज जिस जीवन में जी रहे हैं मनुष्य अपनों से ही कटता जा रहा है। भगवान श्रीकृष्ण से सीखें संबंधों का निर्वहन कैसे करें।
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सोमवार, 25 जुलाई 2011

भागवत ३२०

बस यही सबसे बड़ी जीत है....
संत, ऋषि, मुनि, साधु ये सब उसी को कहते हैं जिसने विषयों को जीत लिया, मन को नियंत्रित कर लिया। सब उसी के नाम हैं। यह जरूरी नहीं है कि वह संन्यास ले, भगवा वस्त्र पहने या जंगलों में रहे। मन को जीतना ही सबसे बड़ा काम है, जिसने इसे कर लिया वह स्वत: संत हो जाएगा। फिर चाहे संसार में रहे या जंगल में।
मन को जीतने के लिए विषयों पर विजय पाना आवश्यक है। विषय हमारे लिए रुकावट पैदा करते हैं। विषयों को जीतना हमारे लिए सबसे बड़ी जंग है। विषयों को जीतने की प्रक्रिया बहुत लम्बी है। बुराइयां हर मनुष्य में होती हैं इन्हें मिटाने के लिए मन पर नियंत्रण होना चाहिए। बुराइयों से निपटने के लिए वैराग्य जगाना पड़ता है। वैराग्य जगाने के लिए परमात्मा में मन लगाना जरूरी है।
विषयों से वैराग्य तब ही होगा जब निर्विषयी मन बनेगा। मन को निर्विषयी बनाना उसका पथान्तर करना है, इसकी सहज वृत्ति जगतमुखी है, इसे परमात्मा मुखी बनाने का अभ्यास करना आवश्यक है। महापुरुषों के वचनों सद्ग्रन्थों के स्वाध्याय, सत्संग, भजन, एकान्तवास, कीर्तन, गायन (भक्ति गीत) आदि ऐसी आध्यात्मिक साधन युक्त परिस्थितियां उत्पन्न करते हैं जिससे मन एकाग्रता के अनुकूल बनता है। इन्हें ध्यान का अंग भी कहा जा सकता है।
फिर वही सवाल उठता है कि महापापी-वैरी पुन: पुन: उपद्रव करे, बाधाएं डाले तब साधक के सामने शरणागति के अलावा कोई मार्ग नहीं रहता। वह अपने इष्ट से, अपनी अंतरात्मा से, अपनी अंतरशक्ति से निरन्तर प्रार्थना करता रहे। दुर्गासप्तसती में ऐसी ही प्रार्थना की गई है-''सर्वबाधा प्रशमनं त्रेलोक्यस्याखिलेश्वरी। एवमेव त्वया कार्यमस्मद्वैरि विनाशनम।
सर्वेश्वरी-तुम इसी प्रकार तीनों लोकों की बाधाओं को शान्त करो और हमारे शत्रुओं का नाश करो।राजसिक- प्रमाद, अनियमितता, तन-अ-रक्षण आदि बाधाएं हैं और शत्रु है-काम, क्रोध, लोभ, मोह इत्यादि। यह हमें याद रखना है। माँ के भौतिक रूप में कोई शत्रु नहीं सब उसकी सन्तान हैं।
बाधाएं और शत्रु जब समाप्त हो जाते हैं, तब मन में उठती तरंगें शान्त हो उसे निर्मल, निर्विकारी जल की मानिन्द स्तब्ध या स्थिर कर देती है। तब परमात्मा को जानने या उसके दर्शन करने की स्थिति बनती है। उसका प्रतिबिम्ब जो अन्तर आत्मा में है दृश्य होता है।

शनिवार, 23 जुलाई 2011

भागवत २१८-२१९

वो हमें गिरने नहीं देते, सभांल लेते हैं...
अर्जुन को यह अनुभव होता था कि वह अकेला ही श्रीकृष्ण का बड़ा भक्त है लेकिन कृष्ण ने उसे उस ब्राह्मण से मिलाकर यह भ्रम दूर कर दिया। भगवान की यह विशेषता है कि अगर उनका भक्त अभिमान के वशीभूत होने लगे, किसी बुराई के समीप जाने लगे तो भगवान उसे गिरने नहीं देते, उसे संभाल लेते हैं। भक्त को अहसास भी नहीं होने देते हैं और उसके सारे कष्ट, अभिमान, कुराइयां हर लेते हैं। अगर भक्त लायक है तो स्वत: ही समझ जाता है। भगवान ऐसी ही लीलाएं दिखा रहे हैं, अर्जुन का अभिमान अब जाता रहा। भक्ति निष्काम हो गई। अर्जुन श्रीकृष्ण के और नजदीक हो गए। अभी सर्वस्व समर्पित नहीं किया था अब वह भी कर दिया। भक्त और भगवान एक हो गए हैं।

वैसे भी माना जाता है कि अर्जुन श्रीकृष्ण एक ही हैं, नर और नारायण के अवतार हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं सभी में मेरा अंश है। हम भी उन्हीं नारायण के अंश हैं।
एक कथा है - एक गांव में कोई ग्वाला था, भगवान को बहुत मानता था। गांवों में जात-पात की परम्परा बहुत थी उन दिनों। ब्राम्हण और क्षत्रियों का दबदबा था। अछूतों का कोई दर्जा नहीं था उनके बीच। गांव में सबसे अलग उनका स्थान था।
एक दिन गांव में कोई संत पहुंचे। वे जात-पात नहीं मानते थे सो हर किसी को उनके दर्शन करने की, उपदेश सुनने की आजादी थी। फिर भी श्रेष्ठी वर्ग का दबदबा था सो छोटी जात वालों को दर्शन के लिए बाद में बुलाया जाता।संत से यह सुब देखा न गया। उन्होंने समझाया कि सब समान हैं, सभी भगवान का अंश हैं। उस ग्वाले ने संत की बात सुनी, वह बात उसके दिल में बैठ गई। वह भी सबसे कहने लगा कि हम भी भगवान के ही बनाए हैं, उसके ही अंश हैं। यह सुन ऊंचे समाज वालों से नहीं रहा गया। गरीबों पर अत्याचार और बढ़ गए। संत से यह अमानवीयता देखी न गई। वे गांव छोड़कर चले गए।

रावण क्यों मारा गया, उसका सारा वैभव क्यों नष्ट हो गया?
कहने का आशय यह है कि हम भले ही मूर्ति पूजा करें लेकिन चित्त को उसमें स्थिर करके करें। बस उसी में खुद को पूरी तरह टिका दें। भगवान उस प्रतिमा, उस पत्थर से भी प्रकट हो जाएगा।ऐसी ही भक्ति के हमारे शास्त्रों में दो उदाहरण हैं। एक भक्त प्रहलाद का जिसे उसके पिता ने खम्भे से भगवान को बुलाने की चुनौती दी और खम्भा तोड़कर खुद नारायण नृसिंह के रूप में प्रकट हो गए। दूसरा उदाहरण मीराबाई का है, जिन्होंने कृष्ण की प्रतिमा को ही अपना पति मान लिया। जिन्दगीभर उसी प्रतिमा को लेकर भक्ति की। जब जहर दिया गया तो गोविन्द का नाम लेकर हंसकर पी गई। मीराबाई को कुछ नहीं हुआ, उधर प्रतिमा नीली पड़ गई।
मिथिला के राजा का नाम था बहुलाष्व। उनमें अहंकार का लेश भी न था। श्रुतदेव और बहुलाष्व दोनों ही भगवान श्रीकृष्ण के प्यारे भक्त थे। एक बार भगवान श्रीकृष्ण ने उन दोनों पर प्रसन्न होकर दारुक से रथ मंगवाया और उस पर सवार होकर द्वारका से विदेह देश की ओर प्रस्थान किया। भगवान के साथ नारद, वामदेव, अत्रि, वेदव्यास, परशुराम, असित, आरुणि, शुकदेव, बृहस्पति, कण्व, मैत्रेय, च्यवन आदि ऋषि भी थे। वे जहां-जहां पहुंचते, वहां-वहां के नागरिक और ग्रामवासी प्रजा पूजा की सामग्री लेकर उपस्थित होती।
भगवान अपने साथ अनेक ऋषिमुनियों को लेकर चलते हैं। वैसे भी श्रीकृष्ण अकेले कम ही रहे। उनका उद्देश्य रहता है भक्तों को साधु-संत और विद्वान पुरुषों की निकटता प्राप्त हो। कृष्ण का हमेशा यही प्रयास रहा कि पूजनीय संत, विद्वान उनके आसपास रहें। किसी भी समय वे अकेले न रहें। हर परेशानी के समय विद्वान और संत उनके पास रहें। दरअसल श्रीकृष्ण ने मानवजाति को यह संदेश दिया है कि आप स्वयं कितने ही विद्वान क्यों न हो जाएं। कितने ही सक्षम क्यों न हों फिर भी आपके साथ विद्वानों का होना जरूरी है। हमेशा संतों की छत्रछाया में रहें। आप पर आती मुश्किलें स्वत: लौट जाएंगी।
यह बात विचारणीय है कृष्ण के जीवन के हर पल में मानव जाति के लिए कई संकेत छिपे हैं। संतों का, विद्वानों का साथ क्यों जरूरी है, वो भी श्रीकृष्ण जैसे सर्वसमर्थ पूर्णावतार को। यह जिन्दगी के लिए एक संकेत है। हम अपने मद में संत-विद्वानों का अपमान कर देते हैं। इससे हमारी सिद्धि नष्ट हो जाती है।
रावण क्यों मारा गया, सारा वैभव क्यों नष्ट हो गया उसका। रावण ने तमाम जिन्दगी संतों, विद्वानों का विरोध किया, तपस्वियों को मरवा डाला। उसकी लंका में भी एक ही साधु पुरुष था विभीषण। रावण अगर सुरक्षित था तो वह केवल लंका में विभीषण की उपस्थिति के कारण। याद रखिए आप तब तक सुरक्षित रहेंगे जब तक एक भी सज्जन आपके साथ है, जैसे ही संत पुरुष आपका साथ छोड़ दें समझ लें कि अब अंत नजदीक है। विभीषण को छोडऩे के बाद रावण खुद कितने दिन जी पाया।इसलिए श्रीकृष्ण कहते हैं कि संतों का साथ हमेशा चाहिए। अगर जीवन में कोई पुण्य काम न आए तो आपको एक यही पुण्य बचा सकता है।
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गुरुवार, 21 जुलाई 2011

भागवत ३१७

जरूरी है जिम्मेदारियों को निभाना क्योंकि....
गृहस्थ का उद्देश्य परमात्मा के निकट जाने का नहीं उसे अपने निकट बुलाने का है। यह एक तरह का वशीकरण है। संन्यास में संन्यासी भगवान के निकट पहुंचकर उसे अपने वश में करने का प्रयास करता है, गृहस्थ का वशीकरण इससे विपरीत खुद भगवान के प्रति समर्पित होने का है। उसके रचे संसार का पालन कर, कर्तव्यों का निर्वहन कर वह भगवान को समर्पित हो जाता है। फिर भगवान खुद उसके वश में होकर उसे ढूंढने निकल पड़ते हैं। एक कथा है कि एक संन्यासी किसी गांव में पहुंचा। वहां मंदिर में एक पुजारी रहता था, जो बहुत धार्मिक स्वभाव का था, उसके पत्नी और बच्चे भी आज्ञाकारी थे। पुजारी भगवान की सेवा तो करता था लेकिन उसका मन फिर भी बेचैन रहता था कि भगवान को पाना है। साधु गांव में पहुंचे तो उसकी इच्छा और अधिक बलवती हो गई।
पुजारी ने संन्यास लेने की ठान ली और परिवार को रोता-बिलखता छोड़ साधु के साथ चला गया। गांववालों ने बहुत समझाया, पत्नी और पुत्र ने पैर पकड़ लिए लेकिन वह नहीं माना। उसकी पत्नी भी काफी समझदार और धार्मिक थी, सो नियति का खेल समझकर इसे स्वीकार कर लिया। पुत्र की जिम्मेदारी, मंदिर की सेवा और खेती भी उसके जिम्मे आ गई।
वह सारी बातें भूलकर अपनी जिम्मेदारी निभाने लगी। पुत्र को गुरु के पास भेज दिया अच्छी शिक्षा के लिए। मंदिर में सुबह-शाम पूजा का सिलसिला भी बंद नहीं होने दिया और खेती भी मुरझाने नहीं दी। वह जब भी भगवान की पूजा करती तो एक ही बात दोहराती कि मेरे पति को भगवान आपकी प्राप्ति जल्दी हो, जिसके लिए उन्होंने अपना सबकुछ त्याग दिया है।
उधर पुजारी साधु के साथ वन-वन भटकने लगा। एक दिन उसे भगवान नारायण गुजरते दिखाई दिए। उसने पैर पकड़ लिए, भगवान आपके दर्शन हो गए। भगवान ने उससे कहा-हट जा मैं अभी तेरे लिए नहीं आया हूं। मुझे कहीं और जाना है। कोई मेरा इंतजार कर रहा है। पुजारी ने पूछा मैं भी तो आपके लिए सबकुछ छोड़कर भटक रहा हूं। आपका इंतजार कर रहा हूं। मेरे लिए कब आएंगे।
नारायण ने कहा-अभी तुम्हें बहुत समय लगेगा। तुमने मेरी तलाश तो की लेकिन मैंने तुम्हें जो काम सौंपा था वह नहीं किया।
जारी बोला-कौन सा काम भगवन, मैं तो दिन-रात आपकी ही सेवा कर रहा हूं। इसके सिवा तो मेरी जिंदगी में कुछ और रह ही नहीं गया है।भगवान बोले- मैंने अपनी एक भक्त और उसके पुत्र की जिम्मेदारी तुम्हें सौंपी थी लेकिन तुम उस जिम्मेदारी से मुंह छिपाकर भाग आए। पुजारी को समझते देर नहीं लगी कि वह अपनी पत्नी और बच्चे को छोड़कर आया है। बस उसकी आंखें खुल गई। फिर गांव की ओर लौट पड़ा।
गांव में आया तो देखा उसकी पत्नी की चारों ओर जय-जयकार हो रही है। कच्चे मकान की जगह महल खड़ा है। पुत्र राजकुमारों जैसे कपड़े पहने था। घर में नौकर-चाकरों की कतार लगी थी।मंदिर में गया तो खुद नारायण बैठे, उसकी पत्नी का बनाया भोग खा रहे हैं। पत्नी की सेवा और जिम्मेदारियों के पालन से भगवान प्रसन्न हो गए। पुजारी ने अपनी पत्नी से क्षमा मांगी। नारायण ने उसे आशीर्वाद दिया। कहा-तुझे तेरे तप के कारण नहीं, तेरी पत्नी के सेवाभाव और तुम्हारे प्रति उसकी श्रद्धा के कारण दे रहा हूं।कथा का सारांश यह है कि भगवान ने आपको जो जिम्मेदारियां दी हैं सबसे पहले उसका पालन करें।
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बुधवार, 20 जुलाई 2011

bhagavat

आपका भविष्य तय करती है आपकी संगत
एक सुंदर कथा है। संतों की संगत का असर हम पर कैसे पड़ता है।कथा है एक नगर के बाहर जंगल में कोई साधु आकर ठहरा। संत की ख्याति नगर में फैली तो लोग आकर मिलने लगे। प्रवचनों का दौर शुरू हो गया।
संत की ख्याति दिन रात दूर-दूर तक फैलने लगी। लोग दिनभर संत को घेरे रहते थे। एक चोर भी दूर से छिपकर उनको सुनता था। रात को चोरी करता और दिन में लोगों से छिपने के लिए जंगल में आ जाता। वह रोज सुनता कि संत लोगों से कहते हैं कि सत्य बोलिए। सत्य बोलने से जिंदगी सहज हो जाती है। एक दिन चोर से रहा नहीं गया, लोगों के जाने के बाद उसने अकेले में साधु से पूछा-आप रोजाना कहते हो कि सत्य बोलना चाहिए, उससे लाभ होता है लेकिन मैं कैसे सत्य बोल सकता हूं।संत ने पूछा-तुम कौन हो भाई?चोर ने कहा-मैं एक चोर हूं।संत बोले तो क्या हुआ। सत्य का लाभ सबको मिलता है। तुम भी आजमा कर देख लो।
चोर ने निर्णय लिया कि आज चोरी करते समय सभी से सच बोलूंगा। देखता हूं क्या फायदा मिलता है। उस रात चोर राजमहल में चोरी करने पहुंचा। महल के मुख्य दरवाजे पर पहुंचते ही उसने देखा दो प्रहरी खड़े हैं। प्रहरियों ने उसे रोका-ऐ किधर जा रहा है, कौन है तूं।
चोर ने निडरता से कहा-चोर हूं, चोरी करने जा रहा हूं। प्रहरियों ने सोचा कोई चोर ऐसा नहीं बोल सकता। यह राज दरबार का कोई खास मंत्री हो सकता है, जो रोकने पर नाराज होकर ऐसा कह रहा है। प्रहरियों ने उसे बिना और पूछताछ किए भीतर जाने दिया।

चोर का आत्म विश्वास और बढ़ गया। महल में पहुंच गया। महल में दास-दासियों ने भी रोका। चोर फिर सत्य बोला कि मैं चोर हूं, चोरी करने आया हूं। दास-दासियों ने भी उसे वही सोचकर जाने दिया जो प्रहरियों ने सोचा। राजा का कोई खास दरबारी होगा।अब तो चोर का विश्वास सातवें आसमान पर पहुंच गया, जिससे मिलता उससे ही कहता कि मैं चोर हूं। बस पहुंच गया महल के भीतर।
कुछ कीमती सामान उठाया। सोने के आभूषण, पात्र आदि और बाहर की ओर चल दिया। जाते समय रानी ने देख लिया। राजा के आभूषण लेकर कोई आदमी जा रहा है। उसने पूछा-ऐ कौन हो तुम, राजा के आभूषण लेकर कहां जा रहे हो।चोर फिर सच बोला-चोर हूं, चोरी करके ले जा रहा हूं। रानी सोच में पड़ गई, भला कोई चोर ऐसा कैसे बोल सकता है, उसके चेहरे पर तो भय भी नहीं है। जरूर महाराज ने ही इसे ये आभूषण कुछ अच्छा काम करने पर भेंट स्वरूप पुरस्कार के रूप में दिए होंगे। रानी ने भी चोर को जाने दिया। जाते-जाते राजा से भी सामना हो गया। राजा ने पूछा-मेरे आभूषण लेकर कहां जा रहे हो, कौन हो तुम?
चोर फिर बोला- मैं चोर हूं, चोरी करने आया हूं। राजा ने सोचा इसे रानी ने भेंट दी होगी। राजा ने उससे कुछ नहीं कहा, बल्कि एक सेवक को उसके साथ कर दिया। सेवक सामान उठाकर उसे आदर सहित महल के बाहर तक छोड़ गया।
अब तो चोर के आश्चर्य का ठिकाना न रहा। उसने सोचा झूठ बोल-बोलकर मैंने जीवन के कितने दिन चोरी करने में बरबाद कर दिए। अगर चोरी करके सच बोलने पर परमात्मा इतना साथ देता है तो फिर अच्छे कर्म करने पर तो जीवन कितना आनंद से भर जाएगा।चोर दौड़ा-दौड़ा संत के पास आया और पैरों में गिर पड़ा। चोरी करना छोड़ दिया और उसी संत को अपना गुरू बनाकर उन्हीं के साथ हो गया।संत की संगत ने चोर को बदल दिया। कथा का सार यही है कि जो सच्चा संत होता है वह हर जगह अपना प्रभाव छोड़ता ही है।

सोमवार, 18 जुलाई 2011

भागवत 315

रिश्ता बनाएं तो क्या ध्यान रखें?
शारीरिक बल या आर्थिक स्थिति रिश्तों को कायम करते समय देखा जाना चाहिए लेकिन केवल हम दो पात्रताओं को ध्यान में रखकर ही कोई रिश्ता न बनाएं। शारीरिक बल या सुंदरता और आर्थिक स्थिति भक्ति के चारित्रिक प्रमाण पत्र नहीं होते हैं। कई लोग आज भी लड़कियों का रिश्ता तय करते समय बस इन्हीं दो बातों को ध्यान रखते हैं। एक वह शारीरिक रूप से सक्षम हो और दूसरा आर्थिक रूप से। इसके अलावा सारी बातें गौण हो जाती हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं -हमें चरित्र देखना चाहिए, व्यवहार देखना चाहिए, अपने कुटुम्ब और मित्रों में उसके रिश्ते कैसे हैं यह देखना चाहिए। इसी से उसकी योग्यताओं का अनुमान लगाया जा सकता है। अगर इन मापदण्डों पर वह खरा उतरे तो फिर रिश्ते के लिए आगे सोचना चाहिए। हम यह देखें कि उसकी महत्वाकांक्षाएं क्या हैं, उसके भीतर धर्म कितना गहरा उतरा हुआ है। धर्म के लिए उसका नजरिया कैसा है। फिर रिष्श्ता तय करें। अगर वह इन परिमाणों पर खरा है तो फिर बात आगे बढ़ाई जाए।
तीसरी बात जो कृष्ण ने कही है वह भी बहुत गौर करने वाली है। कृष्ण कहते हैं हम जब रिश्ते तय करते हैं तो यह देखें कि उस युवक का भविष्य क्या है। कृष्ण दुर्योधन का भविष्य जानते थे सो दुर्योधन के खिलाफ थे। उन्हें अर्जुन के भविष्य को लेकर निश्चिंतता थी, सो वे अर्जुन के पक्ष में थे। हम इन बातों पर विचार कर अगर बेटियों के रिश्ते तय करेंगे तो हमें कभी भी अपने निर्णयों पर लज्जित या दुखी नहीं होना पड़ेगा। कृष्ण से सीखें रिश्ते कैसे जोड़े जाते हैं।

रविवार, 17 जुलाई 2011

भागवत 314

इस कहानी में छुपे हैं जिंदगी के सारे राज क्योंकि....
सुभद्रा और अर्जुन का विवाह हो गया। भगवान ने फिर इस सुंदर प्रसंग के जरिए हमें जीवन का सार सिखाया। कृष्ण के जीवन प्रसंग महज सुनने के लिए नहीं हैं, उन्हें जीवन में उतारिए। उसे गौर से देखिए, समझिए उसमें हमारे जीवन के लिए क्या संदेश, संकेत छिपे हैं। उन्हें पकडऩे का प्रयास कीजिए। अवतारों का उद्देश्य भी यही होता है। वे केवल अधर्म या धर्म की लड़ाई के लिए धरती पर नहीं आते।
उनके आने के बड़े उद्देश्य होते हैं। सबसे बड़ा उद्देश्य मानवों को प्रेरणा देना होता है। राम हो या कृष्ण सभी अवतारों ने जीवन में बहुत संघर्ष किया। कृष्ण का अवतार मानव में देवत्व जगाने का प्रयास है। कृष्ण ने पूर्ण अवतार होने के बाद भी साधारण मनुष्यों की तरह ही सारे कर्म किए लेकिन उसके पीछे उद्देश्य था मानवों में देवत्व कैसे जगाया जाए, हम कैसे अपने कर्मों से महान बन सकते हैं, किस तरह अपनी इन्द्रियों को संचालित किया जाए कि सारे कार्य हमारे अनुकूल हों। सुभद्रा-अर्जुन प्रसंग से कृष्ण ने कई संकेत किए हैं।
यह संकेत वे हैं जो आज हमारे बड़े उपयोग के हैं। इन्हीं को साधकर भी हम अपने लिए जिन्दगी की राहें आसान कर सकते हैं। समझिए कृष्ण ने अपने बड़े भाई की इच्छा के विरूद्ध बहन का विवाह अर्जुन से करवा दिया। आखिर क्यों? इसके कारणों में झाकेंगे तो बड़ी सुन्दर नीतियां मिलेंगी। मानवीय रिश्तों की ऐसी मिसाल जो हमारे जीवन में हमेशा ही उपयोगी होगी। बलराम सुभद्रा के लिए दुर्योधन को पसंद कर चुके थे। लगभग निर्णय ही ले लिया था सुभद्रा की इच्छा के विरूद्ध। हमारे देश की रूढिय़ों में यह कुप्रथा सदियों से है, अपनी बेटियों का विवाह आज भी कई लोग बिना उसकी इच्छा के अपने अनुसार तय कर देते हैं।
बेटी हमारी जिम्मेदारी है लेकिन ध्यान रखें कि वह भावी मां और संस्कृति को विस्तार करने वाली भी है। उसे अपनी मर्जी से किसी को न सौपें। उसका जीवन साथी कैसा हो, यह तय करने का अधिकार भी उसे दें। उससे पूछें। बलराम ने यह नहीं किया, सीधा निर्णय ही सुना दिया। कई लोग आज भी यही कर रहे हैं। बलराम ने दुर्योधन में केवल दो बातें ही देखी, एक उसका योद्धा होना और दूसरा उसका राजपुत्र होना।

शुक्रवार, 15 जुलाई 2011

भागवत 312-313

जीना इसी का नाम है...
कृष्ण ने अपने जीवन में उन दोनों के महत्व को भलीभांति समझा है। गुरु से शिक्षा ली, शिक्षा अमूल्य थी सो उसका मूल्य भी ऐसा चुकाया जो इतिहास बन गया। गुरु के मृत पुत्र को सालों बाद यमराज से ले आए। फिर माता के उन पुत्रों को जीवित कर दिया जिन्हें कंस ने मार दिया था। माता ने कृष्ण के लिए लाखों कष्ट सहे। अपने सात पुत्रों को अपनी आंखों के सामने मरते देखा। अब कृष्ण की बारी थी, अपनी माता के उस ऋण को चुकाने की। माता ने इच्छा की और कृष्ण ने उसे क्षण भर में पूरा कर दिया। माता-पिता और गुरु के लिए जीवन में अगर कुछ भी करना पड़े, उसे कर दीजिए। उनके लिए किया गया कोई कार्य निष्फल नहीं जाता। कृष्ण ने इस घटना में जो संदेष दिया वह भी बहुत अद्भुत है। कई जन्मों की तपस्या के बाद देवकी ने कृष्ण को पुत्र रूप में पाया था। वह विष्णु की अनन्य भक्त थीं।
वसुदेव भी उसके साथ तपस्या में लीन थे। दोनों की एक ही इच्छा थी भगवान को पुत्र रूप में प्राप्त करने की। भगवान को ही उन्होंने अपना सर्वस्व दे दिया। हर जन्म विष्णु भक्ति के लिए ही था। सो अब भगवान उनके घर प्रकट हुए। यह संकेत है कि अगर हम भगवान की भक्ति में खो जाते हैं तो भगवान भी फिर हमारे लिए किसी नियम या सिद्धांत में बंधकर नहीं रहता। वह अपने भक्त के लिए हर सीमा से ऊपर चला जाता है। सृष्टि का नियम भी बदलना पड़े तो, बदलता है। कृष्ण ने देवकी और वसुदेव को इसी भक्ति का फल दिया है।
सांदीपनि ने भी बरसों तक तप कर शिव को प्रसन्न किया। महाकाल शिव जब आए तो उन्होंने वरदान दिया कि खुद नारायण उनके शिष्य बनेंगे। अवंतिका की पावन भूमि पर कृष्ण षिक्षा ग्रहण करने आएंगे। दूसरा वरदान दिया कि अवंति क्षेत्र में कभी सूखा नहीं पड़ेगा, अकाल नहीं पड़ेगा। सांदीपनि ने कृष्ण को शिष्य स्वीकार किया। वे जानते थे कि जगत् गुरु नारायण ही उनके शिष्य हैं। उन्होंने कृष्ण की क्षमता देख कर ही उनसे अपना मृत पुत्र वापस मांगा था।कथा आगे गति पकड़ रही है। कृश्ण ने जीवन की गति की शिक्षा दी है, उन्होंने बताया है कि जीवन में हर दिन एक नई चुनौती आपके सामने आएगी और हर दिन आपको संघर्षकरना है। जीवन में आराम नहीं है। आराम तो केवल भक्ति में है।

भगवान कृष्ण ने अपनी बहन का ही हरण क्यों करवा दिया?
कथा आगे गति पकड़ रही है। कृष्ण ने जीवन की गति की शिक्षा दी है, उन्होंने बताया है कि जीवन में लोगों के मन में यह प्रश्न उठता है कि भगवान ने अपनी ही बहिन का अपहरण क्यों करवाया? सुभद्रा हरण का प्रसंग व्यक्ति की निजी स्तंत्रता से जुड़ा है। भगवान कहते हैं सबको अपने स्वतंत्र निर्णय लेने का अधिकार होना चाहिए। सुभद्रा पर बलरामजी ने दुर्योधन से विवाह का दबाव बनाया था
बलराम बहुत सीधे थे, दुर्योधन ने उन्हें अपना गुरु बना लिया, गदा युद्ध सीखा। बलराम दुर्योधन की इस चाल को समझ नहीं पाए। वे समझते थे कि दुर्योधन सहज ही मुझ पर स्नेह रखता है। वह योद्धा भी था और राजपुत्र भी, सो उन्होंने सुभद्रा का विवाह दुर्योधन से करने का मन बना लिया।
कृष्ण दुर्योधन का भविश्य जानते थे, वे ये भी जानते थे कि सुभद्रा अर्जुन को पसंद करती है।
सुभद्रा लेकिन बलरामजी का विरोध करना भी नहीं चाहती थीं और दुर्योधन से विवाह भी नहीं करना था, ऐसे में केवल कृष्ण ही थे जिससे वह अपने मन की बात कह सकती थीं। कृष्ण सुभद्रा की मनोदशा को समझ गए। कथा आगे बढ़ती है-परीक्षित ने प्रश्न पूछा शुकदेवजी से मेरे दादा अर्जुन ने यह विवाह किस प्रकार किया था।एक बार अर्जुन तीर्थयात्रा के लिए प्रभासक्षेत्र पहुंचे। वहां उन्होंने यह सुना कि बलरामजी सुभद्रा का विवाह दुर्योधन के साथ करना चाहते हैं और वसुदेव, श्रीकृष्ण आदि उनसे इस विषय में सहमत नहीं हैं।
अब अर्जुन के मन में सुभद्रा को पाने की इच्छा जग आई। वे त्रिदण्डी वैष्णव का वेष धारण करके द्वारका पहुंचे। वे वहां वर्षाकाल में चार महीने तक रहे। द्वारका वालों और बलरामजी को यह पता न चला कि ये अर्जुन हैं। एक दिन बलरामजी ने आतिथ्य के लिए उन्हें निमंत्रित किया और उनको वे अपने घर ले आए। अर्जुन ने भोजन के समय वहां विवाह योग्य सुभद्रा को देखा।
उन्होंने उसे पत्नी बनाने का निश्चय कर लिया। सुभद्रा ने भी मन में उन्हीं को पति बनाने का निश्चय किया। कृष्ण की सहमति पहले ही थी सो कोई डर भी नहीं था। कृष्ण ने देवकी और वसुदेव को भी समझाया कि अर्जुन का भविष्य धर्ममय है, दुर्योधन अधर्मी है और एक दिन उसका अंत बहुत बुरा ही होगा। वे भी सहमत हो गए।

बुधवार, 13 जुलाई 2011

भागवत 311: इन दोनों के बिना ही जीवन अधूरा है...

अर्जुन को भगवान् ने दृष्टि दी तब ही वह परम् तेजोमय के दर्शन कर सका (11वां अध्याय)। यह कृपा उन्होंने महापुरुष कृष्ण रूप में अवतार ग्रहण करके की थी। जब कोई महापुरुष प्रभु शक्ति सम्पन्न हो कृपा पाता है तब ही सम्भव होता है, किन्तु इस निमित्त धरातल दैवी गुणों से पुष्ट होना आवश्यक है, इसे हम अभ्यास की कोटि में रचाना उपयुक्त समझते हैं। सतत् अभ्यास अटूट साधन के माध्यम से होता है। भजन, प्रार्थना, ध्यान, स्वाध्याय, पूजा इत्यादि साधन के साध्य अंग हैं। यत्न साध्यों की सहज, परिणिति हेतु जो अभ्यास किया जाता है उसमें महापुरुष या गुरु के मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है।
देवकीजी भगवान से कहती हैं कि मेरे सात पुत्रों को कंस ने मारा तू ले आ। भगवान उन सातों पुत्रों को लाकर मिलाते हैं। भगवान ने यमराज को आदेश दिया कि मेरे सारे मृत भाइयों को लौटा लाओ, मेरी माता की आज्ञा है, यह मेरा निर्देश है कि इनके कोई कर्म-प्रारब्ध या किसी दोष का ध्यान न रखा जाए। यमराज ने ऐसा ही किया। ये दूसरी बार था जब भगवान ने अपने किसी के लिए सृष्टि के नियम भी बदल दिए। उनको जीवित कर दिया जिन्हें मरे को सालों बीत गए थे। यहां भगवान ने दो बातों का संकेत दिया है।
इसे समझना बहुत जरूरी है। पहली बार भगवान ने अपने गुरु ऋषि सांदीपनि के पुत्र को यमराज से मांगा था। वह भी बहुत पहले मारा जा चुका था, दूसरी बार अपने भाइयों को जीवित किया। सृष्टि के नियम बदल दिए। यहां जो दो संकेत हैं वे भी स्पष्ट हैं। पहला जीवन में गुरु और माता का महत्व। गुरु विद्यार्थी को माता की तरह संवारता है और माता बच्चे की पहली गुरु होती है। दोनों का पद समान है, दोनों की महिमा भी एक सी है। दोनों का जीवन में समान महत्व है और दोनों के बिना ही जीवन अधूरा है।

मंगलवार, 12 जुलाई 2011

भागवत 310 : उपासना का मतलब क्या है?

देवकीजी द्वारा श्रीकृष्ण की जो उपासना की गई थी यह प्रसंग उसका परिणाम है। उपासना क्या है, इस पर संतों ने कहा है कि उपासना का अर्थ है परमेश्वर के पास बैठना। बड़ों के पास बैठने का अर्थ है तद्रूप बनना। परमेश्वर अर्थात सत्य। अतएव सत्य रूप बनना उपासना है। सत्य रूप बनने की तीव्र इच्छा करना, उसके लिए भगवान् से विनती करना प्रार्थना है।
महात्मा गांधी की यह दृष्टि एकदम व्यावहारिक है। हमारे लगभग सब आध्यात्मिक ग्रंथ गांधीजी की इस दृष्टि को पुष्ट करते हैं। सत्यरूप आचरण शुद्धि के लिए स्पष्ट संकेत हैं। बिना आचरण शुद्धि के निर्विकार स्थिति नहीं आती। गांधीजी आगे स्पष्ट करते हैं कि निर्विकार बनने के लिए विकारी विचार भी न उठने देना। मन कभी खाली नहीं रहता। वह विकारी विचारों को अपने में समेटे रहेगा या सत्य (परमेश्वर) के प्रति बढ़ेगा। राम, कृष्ण, विष्णु, अल्लाह, प्रभु, ग्रंथ-साहिब, महावीर स्वामी, बुद्ध या अन्य कोई प्रतीक वस्तुत: सत्य के मूर्तिरूप हैं। उनका स्मरण करना नाम-स्मरण है। यह स्मरण हृदयगत जब होता है तब तद्रूपता की संभावना बलवती हो जाती है। हमें स्मरण रखना होगा कि उपासना बुद्धि का नहीं, श्रद्धा का और विश्वास का विषय है। उपासना करते-करते निर्मलता या शुद्धता आती है। नित्य उपासना-प्रार्थना करते रहने से आत्मा पुष्ट होती है। आत्मा की शुद्धता (निर्मलता) और पुष्टता में ही ईश्वरीय तत्व की झलक मिलना शक्य होता है। उपासना एकाकी या सामुहिक या दोनों हो सकती है।
पंथानुसार उपासना के स्वरूप अलग-अलग होते हैं। वैष्णव, शैव, शाक्त, बौद्ध, जैन, इस्लामी, ईसाई या अन्य उपासना पद्धति ईश्वरीय स्वरूप और निज स्वरूप को एकाकार करने के लिए होती है। यह एकाकारिता बिना तीव्र, श्रद्धाविश्वास के संयुक्त प्रवाह के संभव नहीं यह शक्ति और शिव की परम कल्याणमयी अभिव्यक्ति कही जा सकती है।प्राय: पाया जाता है और साधकों या उपासकों का अनुभव भी बतलाता है कि श्रद्धा और विश्वास होने के बाद भी मन नाना प्रकार के सात्विक, राजसिक, विचारों में मगन रहता है।

सोमवार, 11 जुलाई 2011

bhaagavat 309 देवकी की आंखों से यह दृश्य देखकर आंसु बहने लगे....

समय वहां सर्व देवमयी देवकीजी भी बैठी हुई थीं। वे बहुत पहले से ही यह सुनकर अत्यंत विस्मित थीं कि श्रीकृष्ण और बलरामजी ने अपने मरे हुए गुरुपुत्र को यमलोक से वापस ला दिया। अब उन्हें अपने उन पुत्रों की याद आ गई जिन्हें कंस ने मार डाला था। उनके स्मरण से देवकीजी का हृदय आतुर हो गया, नेत्रों से आंसू बहने लगे। उन्होंने श्रीकृष्ण और बलरामजी को सम्बोधित करते हुए कहा-भूमि के भारभूत उन राजाओं का नाश करने के लिए ही तुम दोनों मेरे गर्भ से अवतीर्ण हुए हो।
मैंने सुना है कि तुम्हारे गुरु सान्दीपनिजी के पुत्र को मरे बहुत दिन हो गए थे। उनको गुरुदक्षिणा देने के लिए उनकी आज्ञा तथा काल की प्रेरणा से तुम दोनों ने उनके पुत्र को युमपुरी से वापस ला दिया था। तुम दोनों योगीश्वरों के भी ईश्वर हो। इसलिए आज मेरी भी अभिलाषा पूर्ण करो। मैं चाहती हूं कि तुम दोनों मेरे उन पुत्रों को, जिन्हें कंस ने मार डाला था, लो दो और उन्हें मैं भर आंख देख लूं।
माता देवकी की यह बात सुनकर भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजी दोनों ने योगश किया। जब दैत्यराज बलि ने देखा कि भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजी सुतल लोक में पधारे हैं। उन्होंने भगवान् के चरणों में प्रणाम किया।भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा-दैत्यराज! स्वायम्भुव मन्वन्तर में प्रजापति मरीचिका की पत्नी ऊर्णा के गर्भ से छ: पुत्र उत्पन्न हुए थे। वे सभी देवता थे। वे यह देखकर कि ब्रम्हाजी अपनी पुत्री से समागम करने के लिए उद्यत हैं, हंसने लगे। इस परिहास रूप अपराध के कारण उन्हें ब्रम्हाजी ने शाप दे दिया और वे असुर योनि में हिरण्यकशिपु के पुत्र रूप से उत्पन्न हुए।
अब योगमाया ने उन्हें वहां से लाकर देवकी के गर्भ में रख दिया और उनके उत्पन्न होते ही कंस ने मार डाला। दैत्यराज! माता देवकीजी उन पुत्रों के लिए अत्यंत शोकातुर हो रही हैं और वे तुम्हारे पास हैं। अत: हम अपनी माता का शोक दूर करने के लिए इन्हें यहां से ले जाएंगे। इसके बाद ये शाप से मुक्त हो जाएंगे और आनन्दपूर्वक अपने लोक में चले जाएंगे। इनके छ: नाम हैं-स्मर, उद्गीथ, परिश्वंग, पतंग, क्षुद्रभृत और घृणि। इन्हें मेरी कृपा से पुन: सद्गति प्राप्त होगी। इतना कहकर भगवान् श्रीकृष्ण चुप हो गए।
दैत्यराज बलि ने उनकी पूजा की, इसके बाद श्रीकृष्ण और बलरामजी बालकों को लेकर फिर द्वारिका लौट आए तथा माता देवकी को उनके पुत्र सौंप दिए।इसके बाद उन लोगों ने भगवान् श्रीकृष्ण, माता देवकी, पिता वसुदेव और बलरामजी को नमस्कार किया। तदन्तर सबके सामने ही वे देवलोक में चले गए। देवकी यह देखकर अत्यंत विस्मित हो गईं कि मरे हुए बालक लौट आए और फिर चले भी गए। उन्होंने ऐसा निश्चय किया कि यह श्रीकृष्ण की ही कोई लीला-कौशल है।
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शनिवार, 9 जुलाई 2011

bhaagavat 308 : कैसे भगवान भक्तों को अपना बना लेते हैं?

द्रौपदी उनकी बातें सुनकर थकती न थीं। वह कृष्ण की लीलाओं का रस ले रही थीं। कैसे भगवान अपने भक्तों को अपना बना लेते हैं, उन पर किसी प्रकार की विपत्ति नहीं आने देते। मित्रविन्दा ने कहा-द्रौपदीजी! मेरा स्वयंवर हो रहा था। वहां आकर भगवान् ने सब राजाओं को जीत लिया और जैसे सिंह झुंड के झुंड कुत्तों में से अपना भाग ले जाए, वैसे ही मुझे अपनी शोभामयी द्वारिकापुरी में ले आए।
मेरे भाइयों ने भी मुझे भगवान् से छुड़ाकर मेरा अपकार करना चाहा, परन्तु उन्होंने उन्हें भी नीचा दिखा दिया। मैं ऐसा चाहती हूं कि मुझे जन्म-जन्म उनके पांव पखारने का सौभाग्य प्राप्त होता रहे।सत्या ने कहा-द्रौपदीजी! मेरे पिताजी ने मेरे स्वयंवर में आए हुए राजाओं के बल-पौरुष की परीक्षा के लिए बड़े बलवान् और पराक्रमी, तीखे सींगवाले सात बैल रख छोड़े थे। उन बैलों ने बड़े-बड़े वीरों का घमंड चूर-चूर कर दिया था।

उन्हें भगवान् ने खेल-खेल में ही झपटकर पकड़ लिया, नाथ लिया और बांध दिया, ठीक वैसे ही, जैसे छोटे-छोटे बच्चे बकरी के बच्चों को पकड़ लेते हैं। इस प्रकार भगवान् बल-पौरुष के द्वारा मुझे प्राप्त कर चतुरंगिणी सेना और दासियों के साथ द्वारिका ले आए। मार्ग में जिन क्षत्रियों ने विघ्न डाला, उन्हें जीत भी लिया। मेरी यही अभिलाषा है कि मुझे इनकी सेवा का अवसर सदा-सर्वदा प्राप्त होता रहे।
भद्रा ने कहा-द्रौपदीजी! भगवान् मेरे मामा के पुत्र हैं। मेरा चित्त इन्हीं के चरणों में अनुरक्त हो गया था। जब मेरे पिताजी को यह बात मालूम हुई, तब उन्होंने स्वयं ही भगवान् को बुलाकर अक्षौहिणी सेना और बहुत सी दासियों के साथ इन्हीं के चरणों में समर्पित कर दिया। मैं अपना परम कल्याण इसी में समझती हूं कि कर्म के अनुसार मुझे जहां-जहां जन्म लेना पड़े, सर्वत्र इन्हीं के चरणकमलों का संस्पर्श प्राप्त होता रहे।

शुक्रवार, 8 जुलाई 2011

bhaagavat 307-308

कैसे किया था कृष्ण ने अपनी पत्नियों से विवाह?
जिस समय दूसरे लोग इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्ण की स्तुति कर रहे थे, उसी समय यादव और कौरव-कुल की स्त्रियां एकत्र होकर आपस में भगवान् की त्रिभुवन विख्यात लीलाओं का वर्णन कर रही थीं।कृष्ण की सोलह हजार पत्नियों के साथ द्रौपदी बात कर रही थीं। कृष्ण की प्रिय सखी सबसे कृष्ण से विवाह संबंधी सवाल कर रही थीं।
द्रौपदी ने पूछा- हे श्रीकृष्णपत्नियों! तुम लोग हमें यह तो बताओ कि स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण ने अपनी माया से लोगों का अनुकरण करते हुए तुम लोगों का किस प्रकार पाणिग्रहण किया?
रुक्मिणीजी ने कहा-द्रौपदीजी! जरासन्ध आदि सभी राजा चाहते थे कि मेरा विवाह शिशुपाल के साथ हो, इसके लिए सभी शस्त्रास्त्र से सुसज्जित होकर युद्ध के लिए तैयार थे। परन्तु भगवान् मुझे वैसे ही हर लाए, जैसे सिंह बकरी और भेड़ों के झुंड में से अपना भाग छीन ले जाए। क्यों न हो जगत् में जितने भी अजेय वीर हैं, उनके मुकुटों पर इन्हीं की चरणधूली शोभायमान होती है। द्रौपदीजी! मेरी तो यही अभिलाषा है कि भगवान् के समस्त सम्पत्ति और सौन्दर्यों के आश्रय चरणकमल जन्म-जन्म मुझे आराधना करने के लिए प्राप्त होते रहें, मैं उन्हीं की सेवा में लगी रहूं।
सत्यभामा ने कहा-द्रौपदीजी! मेरे पिताजी अपने भाई प्रसेन की मृत्यु से बहुत दुखी हो रहे थे, अत: उन्होंने उनके वध का कलंक भगवान् पर ही लगाया। उस कलंक को दूर करने के लिए भगवान् ने ऋक्षराज जाम्बवान् पर विजय प्राप्त की और वह रत्न लाकर मेरे पिता को दे दिया। अब तो मेरे पिताजी मिथ्या कलंक लगाने के कारण डर गए। अत: यद्यपि वे दूसरे को मेरा
वाग्दान कर चुके थे, फिर भी उन्होंने मुझे स्यमन्तक मणि के साथ भगवान् के चरणों में ही समर्पित कर दिया।जाम्बवती ने कहा-द्रौपतीजी! मेरे पिता ऋक्षराज जाम्बवान् को इस बात का पता न था कि यही मेरे स्वामी भगवान् सीतापति हैं। इसलिए वे इनसे सत्ताईस दिन तक लड़ते रहे। परन्तु जब परीक्षा पूरी हुई, उन्होंने जान लिया कि ये भगवान् राम ही हैं, तब इनके चरणकमल पकड़कर स्यमन्तक मणि के साथ उपहार के रूप में मुझे समर्पित कर दिया। मैं यही चाहती हूं कि जन्म-जन्म इन्हीं की दासी बनी रहूं।
कालिन्दी ने कहा-द्रौपतीजी! जब भगवान् को यह मालूम हुआ कि मैं उनके चरणों का स्पर्श करने की आशा-अभिलाषा से तपस्या कर रही हूं, तब वे अपने सखा अर्जुन के साथ यमुना तट पर आए और मुझे स्वीकार कर लिया। मैं उनका घर बुहारने वाली उनकी दासी हूं।इस तरह हर रानी ने अपनी कथा कह सुनाई। सबको कृष्ण कैसे खुश करते होंगे। यहां कृष्ण गृहस्थी का संदेश दे रहे हैं।


कृष्ण सभी को कैसे खुश रखते थे?
इस तरह हर रानी ने अपनी कथा कह सुनाई। सबको कृष्ण कैसे खुश करते होंगे। यहां कृष्ण गृहस्थी का संदेश दे रहे हैं। इस तरह हर रानी ने अपनी कथा कह सुनाई। सबको कृष्ण कैसे खुश करते होंगे। यहां कृष्ण गृहस्थी का संदेश दे रहे हैं। भगवान् अपने प्रत्येक विवाह से गृहस्थी में आध्यात्मिक जीवनशैली का संदेश दे रहे हैं। निवृत्ति मार्ग और प्रवृत्ति मार्ग में प्रथम को त्याग के माध्यम से प्राप्त किया जाता है और दूसरा संस्कारों से युक्त बलात मनुष्य या साधक द्वारा अपना लिया जाता है, यह उसे कालान्तर में सहज लगने लगता है। प्रवृत्ति मार्ग की दिशा बदलने का प्रयत्न योग शक्ति में निहित है।
यह योग ज्ञानयोग हो, कर्मयोग हो या भक्तियोग, कोई अन्तर नहीं पडऩा चाहिए श्रद्धा विश्वास और निष्ठा में। ज्ञान और कर्म अर्थात् निष्काम कर्म दोनों श्रेष्ठ हैं, किन्तु भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा-''सन्यास: कर्म योगश्च नि: श्रेयसकरावुभौ। तयोस्तु कर्म सन्यासात्कर्मयोगो विषिश्यते।। 2।। 5।। गीताकर्मों का त्याग और योग दोनों मोक्ष देने वाले हैं। उनमें भी कर्म-संन्यास से कर्मयोग श्रेयस्कर है। यहां स्पष्ट होना आवश्यक है कि वस्त्र त्याग या चोला बदलना यानी भगवा, पीले या सफेद वस्त्र धारण करने को संन्यास नहीं कहा जा सकता। वस्तुत: जो मनुष्य द्वेष और इच्छा से मुक्त है उसे नित्य संन्यासी जानना चाहिए।
इस पर गांधीजी की टिप्पणी विचारणीय है-''संन्यास का खास लक्षण कर्म का त्याग नहीं है, वरन् द्वन्दातीत होना ही है। एक मनुष्य कर्म करते हुए भी संन्यासी हो सकता है। ब्रम्हलीन स्वामी श्री विष्णुतीर्थजी महाराज ने गीतातत्वामृत में इसकी व्याख्या करके विषय को अधिक सरल और स्पष्ट कर दिया है। उनकी व्याख्या इस प्रकार है।......जिसकी पूर्व आश्रमों में श्रेय के मार्ग पर योगारूढ़ होने की तैयारी नहीं हुई है वह संन्यासी होकर भी नाम-मात्र का संन्यासी है और जिसकी कर्मकाण्ड में रहकर तैयारी हो गई है, वह संन्यास न लेने पर भी संन्यासी तुल्य ही है।
जो गृहस्थ भी कर्मों का फल न चाहकर और अन्त:करण शुद्धि को साधन समझकर नियतकर्म करता है वह आरुरुक्ष (संकल्पों विकल्पों का त्यागी, स्थिरचित्त, मनो निग्रही) की श्रेणी में आ जाता है। जब तक अन्त:करण की शुद्धि नहीं होती, मनुष्य जितेन्द्रिय नहीं होता, मन पर उसका वश नहीं होता, उसे ज्ञान की उपलब्धि नहीं हो सकती।