पर्यटन लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
पर्यटन लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शुक्रवार, 8 जुलाई 2016

भारत के ये 30 मंदिर सुनाते हैं आस्था और वैभव की दास्तां

कहा जाता है कि भारत की भूमि विद्वानों की भूमि है, जिसके पीछे भारत का गौरवशाली इतिहास गवाह रहा है. चिकित्सा से ले कर विज्ञान के क्षेत्र में आगे होने के बावजूद यह देश कई मायनों में बाकी देशों से हटकर है जिसमें आस्था भी एक अहम भूमिका निभाती है, जो इस देश को इतनी विविधता होने के बावजूद एक धागे में बांधे रखता है.इस आस्था को बनाये रखने में यहां मौजूद मंदिरों की भूमिका को भी नकारा नहीं जा सकता. चलिए आज हम आपको भारत के ऐसे ही 30 मंदिरों की सैर पर ले चलते हैं जो लोगों की आस्था का केंद्र तो है ही, इसी के साथ-साथ भारत के गौरवशाली इतिहास को भी समेटे हुए है.  - अरुण बंछोर

1. बद्रीनाथ मंदिर
उत्तराखंड का चमोली डिस्ट्रिक्ट, अलकनंदा नदी का किनारा भगवान बद्रीनाथ के घर के नाम से भी जाता है. बद्रीनाथ मंदिर हिन्दू धर्म के चार पवित्र धामों में से एक है. इसके अलावा बद्रीनाथ में भी एक छोटा चार धाम है जिसमे भगवन विष्णु के एक सौ आठ मंदिर हैं जो भगवन विष्णु को समर्पित हैं.
भगवान विष्णु की यात्रा करने वाले लोगों का यहां तांता लगा रहता है पर यहां पर की जाने वाली यात्रा केवल अप्रैल से ले कर सितम्बर तक ही रहती है. इस मंदिर से सम्बंधित दो खास फेस्टिवल हैं जो इसकी खासियत को और बढ़ाते हैं. माता मूर्ति का मेला: भगवान बद्रीनाथ की पूजा शुरू हो कर यह मेला सितम्बर तक चलता है जब तक कि मंदिर के कपाट बंद नहीं हो जाते.बद्री-केदार फेस्टिवल: आठ दिनों तक चलने वाला यह मेला बद्रीनाथ और केदारनाथ दोनों जगहों पर जून के महीने में मनाया जाता है.

2. सूर्य मंदिर, कोणार्क
ओड़िसा की पूरी डिस्ट्रिक्ट के पास है कोणार्क जो मंदिर के रूप में वास्तुकला का अद्भुत नमूना है. यह मंदिर भगवान सूर्य को समर्पित है. रथ के आकार में बने इस मंदिर में बारह पहिये हैं जिसे सात घोड़े खींचते हुए महसूस होते है.रबीन्द्रनाथ टैगोर ने इस मंदिर की खूबसूरती के बारे में कहा था की "यहां पत्थरों की भाषा इंसानों की भाषा को मात देती नज़र आती है".

3. बृहदीस्वरा मंदिर
बृहदीस्वरा मंदिर, को पेरुवुडइयर कोविल, राजराजेस्वरम भी कहा जाता है जिसे ग्याहरवीं सदी में चोल साम्राजय के राजा चोल ने बनवाया था. भगवान शिव को समर्पित यह मंदिर भारत के सबसे बड़े मंदिरों में से एक है. यह मंदिर ग्रेनाइट की विशाल चट्टानों को काटकर वास्तु शास्त्र के हिसाब से बनाया गया है. इसमें एक खासियत यह है कि दोपहर बारह बजे इस मंदिर की परछाई जमीन पर नहीं पड़ती.

4. सोमनाथ मंदिर
गीता, स्कंदपुराण और शिवपुराण जैसी प्राचीन किताबों में भी सोमनाथ मंदिर का जिक्र मिलता है. सोम का मतलब है चन्द्रमा और सोमनाथ का मतलब, चन्द्रमा की रक्षा करने वाला. एक कहानी के अनुसार सोम नाम का एक व्यक्ति अपने पिता के श्राप की वजह से काफी बीमार हो गया था. तब भगवान शिव ने उसे बीमारी से छुटकारा दिलाया था, जिसके बाद शिव के सम्मान में सोम ने यह मंदिर बनवाया.
यह मंदिर भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है जो शौराष्ट्र के प्रभास क्षेत्र में है. ऐसी मान्यता है कि यह वही क्षेत्र है जहां कृष्ण अपना शरीर त्यागा था.
यह मंदिर अरब सागर के किनारे बना हुआ है और साउथ पोल और इसके बीच कोई जमीन नहीं है.

5.केदारनाथ मंदिर
हिमालय की गोद, गढ़वाल क्षेत्र में भगवान शिव के अलोकिक मंदिरों में से एक केदारनाथ मंदिर स्थित है. एक कहानी के अनुसार इसका निर्माण पांडवों ने युद्ध में कौरवों की मृत्यु के प्राश्चित के लिए बनवाया था. आठवीं सदी में आदि शंकराचार्य ने इसको दोबारा restored करवाया. यह उत्तराखंड के छोटे चार धामों में से एक है जिसके लिए यहां आने वालों को 14 किलोमीटर के पहाड़ी रास्तों पर से गुजरना पड़ता है.
यह मंदिर ठन्डे ग्लेशियर और ऊंची चोटियों से घिरा हुआ है जिनकी ऊंचाई लगभग 3,583 मीटर तक है. सर्दियों के दौरान यह मंदिर बंद कर दिया जाता है. सर्दी अधिक पड़ने की सूरत में भगवन शिव को उखीमठ ले जाया जाता है और पांच-छह महीने वहीं उनकी पूजा की जाती है.

6.सांची स्तूप
सांची, मध्य-प्रदेश के रायसेन डिस्ट्रिक्ट का एक सा गांव है जो कि बौद्धिक व ऐतिहसिक इमारतों का घर है जो यहां तीसरी ईसा पूर्व और बारवीं सदी के दौरान बनाये गए थे. इन सबमें सबसे प्रमुख है सांची स्तूप जहां महात्मा बुद्ध के अवशेष संभाल कर रखे गये हैं.इस स्तूप का निर्माण सम्राट अशोक द्वारा कराया गया था. इसके चार दरवाजे हैं जो प्रेम, श्रद्धा, शांति और विश्वास को दर्शाते हैं. UNESCOc द्वारा सांची स्तूप को वर्ल्ड हेरिटेज का दर्जा दिया चुका है.

7.रामनाथस्वामी (रामेश्वरम) मंदिर
ये मंदिर तमिलनाडु के पास एक छोटे से द्वीप के समीप है जिसे रामेश्वरम के नाम से जाना जाता है. यह हिन्दू धर्म की मान्यताओं के अनुसार उनके चार पवित्र धामों में से एक है.एक मान्यता के अनुसार जब भगवान राम, रावण को हरा कर आये थे तो पश्चाताप के लिए उन्होंने शिव की पूजा करने की योजना बनाई क्योंकि उनके हाथों से एक ब्राह्मण की मृत्यु हो गयी थी. शिव की पूजा के लिए उन्होंने हनुमान को कैलाश भेजा जिससे वह उनके लिंग रूप को वहां ला सकें. पर जब तक हनुमान वापिस लौटते तब तक सीता माता रेत का एक लिंग बना चुकी थी. हनुमान द्वारा लाए गए लिंग को विश्वलिंग खा गया जबकि सीता द्वारा बनाये गए लिंग को रामलिंग कहा गया. भगवान राम के आदेश से आज भी रामलिंग से पहले विश्वलिंग की पूजा की जाती है.

8.वैष्णो देवी मंदिर
जम्मू कश्मीर के कटरा से 12 किलोमीटर त्रिकुट की पहाड़ियों पर जमीन से 5200 फ़ीट की ऊंचाई पर स्थित है वह पवित्र गुफा जहां माता वैष्णो देवी के दर्शन होते है.आज वहां वैष्णो देवी तीन पत्थरों के रूप में रहती है जिसे पिंडी कहा जाता है. हर साल लाखों लोग माता से आशीर्वाद लेने यहां आते हैं ऐसी मान्यता है कि माता अपने यहां आने वाले लोगों को खुद decide करती हैं और कोई भी व्यक्ति उन्ही की इच्छा से उन तक पहुंच पाता है.

9.सिद्धिविनायक मंदिर
मुंबई के प्रभा देवी में स्थित है सिद्धिविनायक मंदिर जिसे अठारवीं सदी में बनाया गया था. ऐसा माना जाता है कि किसी भी काम को शुरू करने से पहले गणेश जी की पूजा की जाती है इसलिए उन्हें विघ्नहर्ता भी कहा जाता है.वैसे तो इस मंदिर में श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है, पर मंगलवार के दिन खासतौर पर यहां भीड़ रहती है.

10.गंगोत्री मंदिर
उत्तराखंड के उत्तरकाशी के गंगोत्री को गंगा का उद्भव स्थल माना जाता है. जब भागीरथ गंगा को स्वर्ग से लेकर आये थे तो यहीं पर भगवान शिव ने उन्हें जटाओं में बांधकर जमीन पर उतारा था. अठांरवीं सदी में बना यह मंदिर सफ़ेद ग्रेनाइट से बना हुआ है.

11.गोल्डन टेम्पल, अमृतसर
गोल्डन टेम्पल को हरमंदिर साहिब के नाम से भी जाना जाता है. यह सिखों के पवित्र स्थानों में से एक है. इस गुरुद्वारे के चार दरवाजे है जो कि यह दर्शाते है कि इस मंदिर के दरवाजे सभी के लिए खुले हुए हैं, चाहे वह किसी धर्म को मानने वाला हो, किसी भी सम्प्रदाय का हो. यह मंदिर यूनिवर्सल भाईचारे का अद्भुत नमूना है. गुरु ग्रन्थ साहिब को सबसे पहले इसी मंदिर में रखा गया था.

12.काशी विश्वनाथ मंदिर, बनारस
काशी विश्वनाथ मंदिर, पवित्र एवं प्राचीन शहर बनारस में स्थित है. यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है. विश्वनाथ का मतलब होता है विश्व का स्वामी. यह इस मंदिर की खासियत ही थी जो यहां गुरु नानक से लेकर तुलसीदास, विवेकानंद और आदि शंकराचार्य जैसे लोगों को खुद तक खींच लाई. ऐसा मानना है कि इस मंदिर को देखने मात्र से मोक्ष के सारे दरवाजे खुल जाते हैं.

13.जगन्नाथ मंदिर
बारवीं सदी में बना यह मंदिर उड़ीसा के पुरी में बना हुआ है जिस कारण इसे जगन्नाथ पुरी के नाम से भी जाना जाता है. यह मंदिर भगवान कृष्णा के साथ-साथ उनके भाई बलभद्र और उनकी बहन सुभद्रा को समर्पित है. इस मंदिर में गैर हिन्दुओं का प्रवेश वर्जित है.

14.यमुनोत्री टेम्पल
उत्तराखंड के उत्तरकाशी में उन्नीसवीं सदी का बना यह मंदिर कई बार प्राकृतिक आपदाओं के कारण नष्ट हो चुका है. गंगा के बाद यमुना को भी काफी पवित्रता कि दृष्टि से देखा जाता है.जमीन से 3291 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है, जहां यमुना देवी कि पूजा की जाती है. मंदिर के दरवाजे अक्षय त्रित्या से लेकर दिवाली तक श्रद्धालुओं के लिए खुले रहते है

15.मिनाक्षी टेम्पल, मदुरई
मदुरई का मीनाक्षी मंदिर न केवल श्रद्धालुओं के बीच प्रसिद्ध है बल्कि यह कला के दीवानों के लिए भी किसी जन्नत से कम नहीं है. यह मंदिर देवी पार्वती और उनके पति शिव को समर्पित है.मंदिर के बीचों बीच एक सुनहरा कमल रुपी तालाब है. मंदिर में करीब 985 पिल्लर हैं, हर पिल्लर को अलग अलग कला कृतियों द्वारा उकेरा गया है. इस मंदिर का नाम विश्व के सात अजूबों के लिए भी भेजा जा चुका है.

16.अमरनाथ केव टेम्पल
जम्मू कश्मीर की बर्फीली पहाड़ियों में ज़मीन से 3888 मीटर ऊपर 5000 साल पुरानी गुफ़ा मौजूद है, जहां पहुंचने के लिए श्रद्धालुओं को 5 दिनों में 40 मील की चढ़ाई करनी पड़ती है.यह क्षेत्र साल भर बर्फ़ से ढका रहता है, यहां कि यात्रा केवल गर्मियों के दौरान ही की जाती है.उस समय भी यह क्षेत्र काफ़ी हद तक बर्फ़ से ढका हुआ रहता है.

17.लिंगराज मंदिर
मंदिरों के शहर उड़ीसा में एक और मंदिर है जो बड़ा होने के साथ-साथ अपने साथ इतिहास को भी समेटे हुए है. यह मंदिर श्रद्धालुओं के साथ साथ इतिहासकारों को भी अपनी तरफ आकर्षित करता है जिसकी वजह यहां कि एतिहासिक इमारते है.वैसे तो यह मंदिर शिव को समर्पित है पर यहां शिव के साथ साथ भगवान विष्णु कि भी पूजा कि जाती है, जिस कारण यह हरिहर के नाम से भी जाना जाता है.

18.तिरुपति बालाजी
आन्ध्र प्रदेश की तिरुमाला पहाडियों में बसा है तिरुमाला वेंकटेश्वारा मंदिर जिसे तिरुपति बालाजी के नाम से जाना जाता है, भगवान विष्णु को समर्पित है. यह मंदिर भारत में मौजूद सबसे अमीर मंदिरों में शुमार है. यहां पर प्रसाद के रूप में मिलने वाला लड्डू अपने स्वाद के लिए पूरे विश्व में प्रसिद्ध है.यहां पर मन्नत पूरी हो जाने पर लोग अपने बालों का चढ़ावा चढ़ाते हैं, जिससे यहां लगभग लाखों डॉलरों की कमाई होती है.

19.कांचीपुरम मंदिर
कांचीपुरम, साड़ियों के अलावा एक और चीज़ के लिए पहचाना जाता है. वो है यहां पर मौजूद हजारों मंदिर, जिसकी वजह से इसे मंदिरों का शहर भी कहा जाता है.

20.खजुराहो टेम्पल
इस मंदिर की खासियत का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि UNESCO द्वारा इसे वर्ल्ड हेरिटेज साईट घोषित किया गया है.यहां पर 10 वीं और 12 वीं सदी के कई मंदिर मौजूद है जो जैन और हिन्दू देवी-देवताओं को समर्पित हैं, जिनकी नक्काशी किसी को भी अपनी तरफ़ खींचने की क्षमता रखती है.

21.विरूपक्षा टेम्पल
7 वीं सदी में हम्पी में बना यह मंदिर आज भी अपने पूजा पाठ के लिए जाना जाता है. इसे unesco द्वारा राष्ट्रीय धरोहर घोषित किया जा चुका है.
यह मंदिर धार्मिक दृष्टि के अलावा पर्यटन कि दृष्टि से भी काफी महत्व रखता है.

22.अक्षरधाम मंदिर
यमुना का किनारा जहां एक ओर दिल्ली को दो भागों में बांटता है, वहीं अक्षरधाम मंदिर आस्था के जरिये दिल्ली के दोनों किनारों को आपस में जोड़ता है.
अक्षरधाम मंदिर, वास्तुशास्त्र और पंचशास्त्र के नियमों को ध्यान में रख कर बनाया गया है. इसका मुख्य गुम्बद मंदिर से करीब 11 फीट ऊंचा है.इस मंदिर को बनाने में राजस्थानी गुलाबी पत्थरों का उपयोग किया गया है.यहां पर होने वाला लाइट और म्यूजिक शो मंदिर कि सुन्दरता में चार चांद लगा देता है

23.श्री दिगंबर जैन लाल मंदिर
पुरानी दिल्ली अपने आप में कई तह्ज़ीबों और संस्कृतियों को खुद में समेटे हुए है इन्हीं संस्कृतियों में से एक है श्री दिगंबर जैन लाल मंदिर, जिसे मुग़ल शासक शांहजहां के समय में बनाया गया था.यह मंदिर होने के साथ साथ पक्षियों के लिए एक चैरिटेबल हॉस्पिटल भी चलाता है, जहां असहाय पक्षियों का ईलाज किया जाता है.

24.गोमतेश्वर मंदिर
10 वीं सदी में कर्णाटक के श्रवानाबेलागोला में बना यह मंदिर भगवान बाहुबली को समर्पित है जिन्हें गोमतेश्वर के नाम से भी जाना जाता है. यह मंदिर जैन धर्म के अनुयायियों के लिए काफी महत्व रखता है.इस मंदिर की सबसे बड़ी खासियत यह है कि हर 12 साल बाद यहां महामस्तक अभिषेक किया जाता है, जो जैनियों के लिए एक महत्वपूर्ण त्यौहार है.

25.रणकपुर मंदिर
उदयपुर और जोधपुर के बीच पाली डिस्ट्रिक्ट में गांव रणकपुर में यह मंदिर स्थित है जिसे जैन धर्म के 5 पवित्र स्थलों में शुमार किया जाता है.यह पूरा मंदिर हल्के सफ़ेद रंग के मार्बल से बना हुआ है. जिसमें 1400 नक्काशी किये हुए पिलर लगे हुए हैं. यह मंदिर केवल प्राक्रतिक रौशनी का ही इस्तेमाल करता है, जिससे आध्यात्म में मदद मिलती है.

26.साईं बाबा मंदिर, शिर्डी
मुंबई से 296 किलोमीटर दूर शिर्डी में साईं बाबा कि समाधी पर यह मंदिर बना हुआ है. हर साल लगभग 25000 श्रद्धालु यहां बाबा के दर्शन के लिए आते है. राम नवमी, दशहरा और गुरु पूर्णिमा के दिन यहां खासतौर पर मेला लगता है.

27.श्री पद्मनाभस्वामी टेम्पल
केरला के तिरुवनंतपुरम में श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर स्थित है जो कि भगवान विष्णु को समर्पित है. यहां केवल हिन्दू ही प्रवेश कर सकते है. इस मंदिर में प्रवेश के लिए पुरुषों को सिर्फ धोती, जबकि औरतों को साड़ी पहनना जरुरी होता है.

28.द्वारकाधीश मंदिर
जैसा कि इस मंदिर के नाम से प्रतीत होता है, यह द्वारका में है और भगवान कृष्ण को समर्पित है. इसको जगत मंदिर भी कहा जाता है. यहां के प्रवेश द्वार को स्वर्ग द्वार और मोक्ष द्वार भी कहते है.

29.लक्ष्मी नारायण मंदिर
दिल्ली में इस मंदिर को बल्दो दास बिरला ने बनवाया था जबकि इसका उद्घाटन महात्मा गांधी ने किया था जो कि हर जाति वर्ग के लिए खुला था.
वैसे तो यह मंदिर लक्ष्मी और नारायण को समर्पित है पर मंदिर में इनके अलावा शिव, गणेश व अन्य भगवानों की मूर्तियां भी है.

30.इस्कॉन मंदिर
इस्कॉन मंदिर को कृष्ण बलराम मंदिर भी कहा जाता है जिसे 1975 में वृन्दावन में इस्कॉन समूह द्वारा बनवाया गया था. इस्कॉन मंदिर अपनी पवित्रता और सफाई के लिए विश्व भर में प्रसिद्ध है.इसके अंदर कृष्ण, राधा और बलराम कि पूजा की जाती है.

सोमवार, 4 जुलाई 2016

पर्यटकों की पहली पसंद है भारतीय शहर

भारत के टॉप 10 ऐतिहासिक स्थल, जहाँ लगता है पर्यटकों का मेला
भारत दुनिया भर से पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करता है। यहां की संस्कृति पूरी दुनिया में मशहूर है। पर्यटक यहां शांति की खोज के लिए भी आते हैं। यहां पर्यटन के लिए बहुत सुंदर स्थल हैं। गौरतलब है कि भारत तेज़ी से विदेशी पर्यटकों के लिए पसंदीदा स्थल के रूप में उभर रहा है। हर साल यहां दुनिया के कोने कोने से पर्यटक आते हैं और यहां की सुंदरता और विविधता का आनंद लेते हैं। कभी त्यौहार, तो कभी किसी समारोह में आने वाले विदेशी पर्यटक यहां के रंग में रंग जाते हैं। भारत के लोगों का अपनापन भी पर्यटकों को अपनी ओर खींचता है। आज हम आपको भारत के कुछ चुनिंदा ऐतिहासिक स्थलों के बारे में बता रहे हैं। यहां फैमिली या पार्टनर के साथ भी आया जा सकता है।आइए हम आपको भारत के 10 खूबसूरत शहरों का भ्रमण कराते हैं|                      - अरुण बंछोर    
--------------------------------------------------

हवा महल, जयपुर
गुलाबी नगरी जयपुर की आलीशान इमारत ‘हवामहल’ राजस्थान के प्रतीक के रूप में दुनियाभर में प्रसिद्ध है। इस इमारत में 365 खिड़कियां और झरोखे बने हैं। इसका निर्माण 1799 में जयपुर के महाराजा सवाई प्रताप सिंह ने करवाया था। राजस्थानी और फारसी स्थापत्य शैलियों के मिले-जुले रूप में बनी यह इमारत जयपुर के ‘बड़ी चौपड़’ चौराहे से चांदी की टकसाल जाने वाले रास्ते पर स्थित है। हवामहल के आनंदपोल और चांदपोल नाम के दो द्वार हैं। आनंदपोल पर बनी गणेश प्रतिमा के कारण इसे गणेश पोल भी कहते हैं। गुलाबी नगरी का यह गुलाबी गौरव अपनी अद्भुत बनावट के कारण ही आज विश्वविख्यात है।

चारमीनार, हैदराबाद
हैदराबाद शहर की पहचान बन चुका चारमीनार इस्लामिक वास्तुकला का बेहतरीन नमूना है। चारमीनार 1591 में शहर के अंदंर प्लेग की समाप्ति की खुशी में मुहम्मद कुली कुतुबशाह द्वारा बनवाई गई वास्तुकला का एक नमूना है। शहर की पहचान मानी जाने वाली चारमीनार चार मीनारों से मिलकर बनी एक चौकोर प्रभावशाली इमारत है। इसके मेहराब में हर शाम रोशनी की जाती है, जो एक अविस्मरणीय दृश्य बन जाता है। हैदराबाद हवाई जहाज, रेल, बस और टैक्सी से पहुंचा जा सकता है। चारमीनार हैदराबाद रेलवे स्टेशन से लगभग सात किलो मीटर की दूरी पर है। यह बस स्टेशन से पांच किलो मीटर की दूरी पर है। निजी परिवहन से भी यहां आसानी से पहुंचा जा सकता है।

सांची स्तूप
मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल और विदिशा के बीच बसा सांची स्तूप दुनियाभर के सैलानियों के आकर्षण का केन्द्र है। ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी में सम्राट अशोक ने यह सांची स्तूप बनवाया था। यह स्तूप शांति,आस्था, साहस और प्रेम का प्रतीक है।सम्राट अशोक ने इस स्तूप का निर्माण बौद्ध धर्म की शिक्षा को जन-जन तक पहुंचाने के लिए करवाया था। लंबे समय तक गुमनामी के अंधेरे में रहने वाला सांची स्तूप अब न सिर्फ दुनियाभर में मशहूर हो चुका है,बल्कि अपने ऐतिहासिक महत्व के कारण यूनेस्को के विश्व धरोहर की सूची में भी शामिल है। सांची के लिए हवाई जहाज, रेल, बस आदि के द्वारा आराम से प्रस्थान किया जा सकता है।

फतेहपुर सीकरी
आगरा जिले का छोटा सा शहर फतेहपुर सीकरी आज भी अपनी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत को सहेजे हुए है। मुगल बादशाह अकबर ने इस शहर को बसाया था। इस शहर में मुगल सभ्यता,कला और संस्कृति की झलक मिलती है।एक दशक से भी ज़्यादा समय तक फतेहपुर सीकरी मुगलों की राजधानी था।
यहां की सबसे ऊंची इमारत बुलंद दरवाज़ा है और इसकी ऊंचाई 280 फुट है। इसे अकबर ने 1602 ई. में गुजरात विजय के स्मारक के रूप में बनवाया था। इसके अलावा जामा मस्जिद,शेख सलीम चिश्ती की समाधि,दिवान-ए-आम,दिवान-ए-खास,पंचमहल, बीरबल का महल आदि यहां की मुख्य इमारते हैं। फतेहपुर सीकरी जाने के लिए आगरा नज़दीकी एयरपोर्ट है। यहां से फतेहपूर की दूरी 40 किमी है। यहां नजदीकी रेलवे स्टेशन फतेहपुर सीकरी है।

मैसूर पैलेस
महाराजा पैलेस, राजमहल मैसूर के कृष्णराजा वाडियार चतुर्थ का है। इससे पहले का राजमहल चन्दन की लकड़ियों से बना था।एक दुर्घटना में इस राजमहल की बहुत क्षति हुई जिसके बाद यह दूसरा महल बनवाया गया।मैसूर पैलेस दविड़, पूर्वी और रोमन स्थापत्य कला का अद्भुत संगम है। नफासत से घिसे सलेटी पत्थरों से बना यह महल गुलाबी रंग के पत्थरों के गुंबदों से सजा है।महल में एक बड़ा सा दुर्ग है जिसके गुंबद सोने के पत्थरों से सजे हैं। ये सूरज की रोशनी में खूब जगमगाते हैं।दूसरे महलों की तरह यहां भी राजाओं के लिए दीवान-ए-खास और आम लोगों के लिए दीवान-ए-आम है। यहां बहुत से कक्ष हैं जिनमें चित्र और राजसी हथियार रखे गए हैं। राजसी पोशाकें, आभूषण, तुन (महोगनी) की लकड़ी की बारीक नक्काशी वाले बड़े-बड़े दरवाज़ें और छतों में लगे झाड़-फानूस महल की शोभा में चार चांद लगाते हैं। यह महल सुबह 10 से शाम के 4.30 बजे तक खुला रहता है। शाम के समय रोशनी में नहाए मैसूर पैलेस की शोभा देखते ही बनती है। यह महल अब म्यूज़ियम में तब्दील हो चुका है।

लाल किला, दिल्ली
लाल किले की नींव शाहजहां के शासन काल में पड़ी थी। इसे पूरा होने में 9 साल का समय लगा। अधिकांश इस्लामिक इमारतों की तरह यह किला भी अष्टभुजाकार है। उत्तर में यह किला सलीमगढ़ किले से जुड़ा हुआ है। लाहौरी गेट के अलावा यहां प्रवेश का दूसरा द्वार हाथीपोल है। इसके बारे में माना जाता है कि यहां पर राजा और उनके मेहमान हाथी से उतरते थे।लाल किले के अन्य प्रमुख आकर्षण हैं मुमताज महल, रंग महल, खास महल, दीवान-ए-आम, दीवान-ए-खास, हमाम और शाह बुर्ज। यह किला भारत की शान है। इसी किले पर स्वतंत्रता दिवस के दिन भारत के प्रधानमंत्री राष्ट्रीय ध्वज फहराते हैं और भाषण देते हैं। 1562-1572 के बीच बना यह मकबरा आज दिल्ली के प्रमुख पर्यटक स्थलों में एक है। इसके फारसी वास्तुकार मिरक मिर्जा गियायुथ की छाप इस इमारत पर साफ देखी जा सकती है। यह मकबरा यमुना नदी के किनारे संत निजामुद्दीन औलिया की दरगाह के पास स्थित है। यूनेस्को ने इसे विश्वश धरोहर का दर्जा दिया है।

पुराना किला, दिल्ली 
इस किले का निर्माण सूर वंश के संस्थापक शेरशाह सूरी ने 16वीं सदी में करवाया था। 1539-40 में शेरशाह सूरी ने मुगल बादशाह हुमायूं को हराकर दिल्ली और आगरा पर कब्जा कर लिया। 1545 में उनकी मृत्यु के बाद हुमायूं ने पुन: दिल्ली और आगरा पर अधिकार कर लिया था। शेरशाह सूरी द्वारा बनवाई गई लाल पत्थरों की इमारत शेर मंडल में हुमायूं ने अपना पुस्तकालय बनाया। यह किला केवल देशी-विदेशी पर्यटकों को ही आकर्षित नहीं करता बल्कि इतिहासकारों को भी लुभाता है। हाल ही में भारतीय पुरातत्व विभाग की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि जिस स्थान पर पुराना किला बना है उस स्थान पर इंद्रप्रस्थ बसा हुआ था। इंद्रप्रस्थ को पुराणों में महाभारत काल का नगर माना जाता है। इसमें प्रवेश करने के तीन दरवाजे हैं- हुमायूं दरवाजा, तलकी दरवाजा और बड़ा दरवाजा।वर्तमान में यहां एक बोट क्लब है जहां नौकायन का आनंद लिया जा सकता है। पास ही चिड़ियाघर भी है।

आमेर महल, जयपुर 
जयपुर के प्रमुख ऐतिहासिक स्थलों में शुमार है आमेर का शानदार महल। अरावली की मध्यम ऊंचाई पर स्थित आमेर महल का निर्माण सोलहवीं सदी में किया गया था। इस शानदार महल को देखते हुए उस समय की उत्कृष्ट मुगल और राजपूत निर्माण शैली का अंदाजा लगाया जा सकता है। इस भव्य महल की तुलना दुनिया के शानदार महलों से की जाती है। आमेर महल में विशाल जलेब चौक, शिला माता मंदिर, दीवाने आम, गणेश पोल, शीश महल, सुख मंदिर, मुगल गार्डन, रानियों के महल आदि सब देखने लायक हैं। शीश महल में कांच की नक्काशी का जादू ऐसा है कि मुगले आजम से लेकर जोधा अकबर तक दर्जनों बॉलीवुड फिल्मों में अपनी धाक जमा चुका है। हाल ही आमेर महल से जयगढ़ जाने के लिए एक पुरानी टनल को पर्यटकों के लिए खोला गया है।जयगढ़ किले पर रखी जयबाण तोप एशिया की विशाल तोपों में से एक है।

जलमहल, जयपुर 
जलमहल पानी पर तैरते खूबसूरत शिकारे की तरह लगने वाला एक शानदार ऐतिहासिक स्थल है।  जयपुर शहर से लगभग 8 किमी उत्तर में आमेर रोड पर जलमहल स्थित है। मानसागर झील के बीच स्थित इस महल की खूबसूरती बेमिसाल है। इसका निर्माण आमेर में लगातार पानी की कमी के चलते कराया गया था। जयपुर के राजा महाराजा यहां अवकाश मनाने के लिए आते थे। वर्तमान में यह पर्यटन का प्रमुख केंद्र है। जलमहल तक पहुंचने के लिए शहर से सिटी बस उपलब्ध हैं। इसके अलावा निजी वाहन या टैक्सी से भी यहां पहुंचा जा सकता है। जलमहल के अंदर पहुंचने के लिए नौकाओं की व्यवस्था है।

जैसलमेर का किला
राजस्थान में थार की मरूभूमि के हृदय स्थल पर चस्पा जैसलमेर एक ऐसा रेतीला परिवेश है, जहां सुनहरे सपनों की फसलें खूब फलती-फूलती हैं। यह क्षेत्र मरूभूमि पर सुनहरी मरीचिका के समान है जहां एक बार जाने के बाद पर्यटक बार-बार जाने का मोह नहीं छोड़ पाते। जैसलमेर के दर्शनीय स्थलों में यहां का प्राचीनतम किला सबसे खास है। यह किला नगर के सामान्य भू-स्तर से लगभग 100 मीटर ऊपर स्थित है। यहां स्थापित समाधियों की छतों में बारीक नक्काशी देखने लायक है। यही नहीं, यहां पूर्व सम्राटों की नक्काशीदार घुड़सवार मूर्तियों का जादू भी सिर चढ़कर बोलता है। कब जाएं: जैसलमेर जाने का सबसे सही समय अक्टूबर से मार्च होता है। हर साल जनवरी-फरवरी में जैसलमेर में रेगिस्तान उत्सव मनाया जाता है। इस दौरान ऊंट की दौड़, लोक संगीत और नृत्य और पपेट शो आयोजित किए जाते हैं।

बुधवार, 15 अक्टूबर 2014

मणिपुर की सम्पूर्ण जानकारी

मणिपुर में कई रोचक पहलू हैं, जो लोग घूमने - फिरने के बहुत शौकीन हैं, उनके लिए मणिपुर में बहुत कुछ खास है। भारत के इस पूर्वोत्‍तर राज्‍य में सिरउई लिली, संगाई हिरण, लोकतक झील में तैरते द्वीप, दूर - दूर तक फैली हरियाली, उदारवादी जलवायु और परंपरा का सुंदर मिश्रण देखने का मिलता है। इस जगह की यात्रा कभी कठिन नहीं होती और हमेशा रोचक रहती है।

मणिपुर
सोशल नेटवर्क पर इसे शेयर करें
मणिपुर राज्‍य, उत्‍तर में नागालैंड, दक्षिण में मिजोरम, पश्चिम में असम और पूर्व में वर्मा की सीमा से जुड़ा हुआ है।
यात्रा के विषय में जानकारी - मणिपुर में पर्यटकों की रूचि के अनुरूप स्‍थल
इम्‍फाल, मणिपुर की राजधानी है जो प्राकृतिक सुंदरता और वन्‍यजीवन से घिरी हुई है। कई लोग इस बात को सुनकर आश्‍चर्यचकित हो जाते हैं कि पोलो खेल की उत्‍पत्ति इम्‍फाल में हुई थी। इसजगह कई प्राचीन अवशेष, मंदिर और स्‍मारक हैं। इम्‍फाल में द्वितीय विश्‍व युद्ध के इम्‍फाल के युद्ध और कोहिमा के युद्ध का उल्‍ल्‍ेख मिलता है। यह स्‍थल यहां आने वाले पर्यटकों को मणिपुर के साथ जोड़ता है। श्री गोविंद जी मंदिर, कांगला पैलेस, युद्ध स्‍मारक, महिलाओं के द्वारा चलाया जाने वाले बाजार - इमा केथेल, इम्‍फाल घाटी और दो बगीचे इस जगह को पूरी तरह से पर्यटन के लायक बनाते हैं।
मणिपुर पर्यटन का सबसे अह्म पहलू चंदेल है जो एक जिला और शहर है, साथ ही इसे म्‍यांमार के लिए प्रवेश द्वार भी माना जाता है। चंदेल और तामेंगलांग में चारों तरफ वनस्‍पतियों और जीवों की विविध प्रजातियां पाई जाती हैं। चंदेल में मोरेह, मणिपुर के व्‍यावसायिक केंद्र होने के लिए होता है। तामेंगलांग में ऑरेंज महोत्‍सव, यहां के स्‍थानीय निवासियों और आने वाले पर्यटकों के बीच फल उत्‍सव के रूप में जाना जाता है, जो आंगतुकों के लिए खासा आकर्षण है।
सेनापति में कई छोटे - छोटे गांव हैं जो इस क्षेत्र को पर्यटन के लिए विशिष्‍ट बनाते हैं। माराम खुलेन, मक्‍खेल और इतिहास में दर्ज यांगखुल्‍लेन चोटी, माओ मणिपुर राज्‍य के लिए प्रवेश द्वार हैं। वहीं पुरूल, ताऊटो की भूमि है जो राज्‍य का लोकप्रिय खेल है।
सिर्फ घूमना - फिरना और मस्‍ती : झीलों, गार्डन और चोटियों की सैर
लोकतक झील, दुनिया की सबसे बड़ी बहने वाली झीलों में से एक है और इसमें तैरने वाले द्वीपों के कारण यह मणिपुर के बिश्‍नुपुर में एक पर्यटन आकर्षण है। इन द्वीपों पर मछुआरे अस्‍थायी रूप से निवास करते हैं। लोकतक झील पर सेन्‍द्रा द्वीप एक पिकनिक स्‍पॉट है जहां सैर के लिए अवश्‍य जाना चाहिए। यहां केईबुल लाम्‍जाओ राष्‍ट्रीय पार्क भी है जहां संगाई हिरण पाएं जाते हैं और इस पार्क के पास में ही एक झील भी बहती है।
तामेंगलांग में जाईलद झील एक बेहद खूबसूरत स्‍थल है और साहसिक गतिविधियों में रूचि रखने वाले पर्यटक यहां आने के लिए उत्‍सुक रहते हैं। वहीं मणिपुर के थौबेल जिले की बेथोउ झील भी अपने आसपास फैली सुंदरता के कारण विख्‍यात है और भारी संख्‍या में लोग यहां सैर करने आते है।
मणि‍पुर का थौबल जिला एक कृषि प्रधान क्षेत्र है जहां धान की पैदावार भारी मात्रा में होती है, ये फसल इस क्षेत्र को देखने में बेहद सुंदर बना देती है। थौबल में इकॉप झील, लाउसी झील, पुमलेन झील व अन्‍य झीलें शामिल हैं। वहीं उखरूल में स्थित काचाऊफुंग झील एक प्राकृतिक संरचना है जो खायांग झरने के पास में स्थित है। चुराचांदपुर में नगालोई झरना और खुगा बांध भी पर्यटन स्‍थल हैं।
हालांकि, उखरूल की शिरूउई कुशांग चोटी, में शिरूउई लिली दूर - दूर तक फैले हैं जो गर्मियों के दौरान यहां के वातावरण को बेहद खास और प्‍यारा बना देते हैं। चंदेल का घास का मैदान यहां काफी दूर तक फैला हुआ है जो असमान और ऊंचा - नीचा है इसके बावजूद भी यहां खिलने वाले जंगली लिली के कारण गर्मियों का मौसम पर्यटन के लायक होता है। इसीलिए मणिपुर की सुंदरता हमेशा पर्यटकों को लुभाती है कि वह यहां आएं और भ्रमण करें, जितना अन्‍य कोई स्‍थान उन्‍हे प्राकृतिक सुंदरता को देखने के लिए आकर्षित नहीं करता।

सिक्किम की सम्पूर्ण जानकारी

 (सिखिम भी) भारत का एक पर्वतीय राज्य है। सिक्किम की जनसंख्या भारत के राज्यों में न्यूनतम[1] तथा क्षेत्रफल गोआ के पश्चात न्यूनतम है। सिक्किम नामग्याल राजतन्त्र द्वारा शासित एक स्वतन्त्र राज्य था, परन्तु प्रशासनिक समस्यायों के चलते तथा भारत से विलय के जनमत के कारण १९७५ में एक जनमत-संग्रह के अनुसार भारत में विलीन हो गया।[2] उसी जनमत संग्रह के पश्चात राजतन्त्र का अन्त तथा भारतीय संविधान की नियम-प्रणाली के ढाचें में प्रजातन्त्र का उदय हुआ।[3]
अंगूठे के आकार का यह राज्य पश्चिम में नेपाल, उत्तर तथा पूर्व में चीनी तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र तथा दक्षिण-पूर्व में भूटान से लगा हुआ है। भारत का पश्चिम बंगाल राज्य इसके दक्षिण में है।[4] अंग्रेजीनेपालीलेप्चाभूटियालिंबू तथा हिन्दी आधिकारिक भाषाएँ हैं परन्तु लिखित व्यवहार में अंग्रेजी का ही उपयोग होता है। हिन्दू तथाबज्रयान बौद्ध धर्म सिक्किम के प्रमुख धर्म हैं। गंगटोक राजधानी तथा सबसे बड़ा शहर है।[5]
अपने छोटे आकार के बावजूद सिक्किम भौगोलिक दृष्टि से काफ़ी विविधतापूर्ण है। कंचनजंगा जो कि दुनिया की तीसरी सबसे ऊंची चोटी है, सिक्किम के उत्तरी पश्चिमी भाग में नेपाल की सीमा पर है और इस पर्वत चोटी को प्रदेश के कई भागो से आसानी से देखा जा सकता है। साफ सुथरा होना, प्राकृतिक सुंदरता एवं राजनीतिक स्थिरता आदि विशेषताओं के कारण सिक्किम भारत में पर्यटन का प्रमुख केन्द्र है।

नाम का मूल

'सिक्किम' शब्द का सर्वमान्य स्रोत लिम्बू भाषा के शब्दों सु (अर्थात "नवीन") तथा ख्यिम (अर्थात "महल" अथवा "घर" - जो कि प्रदेश के पहले राजा फुन्त्सोक नामग्याल के द्वारा बनाये गये महल का संकेतक है) को जोड़कर बना है। तिब्बती भाषा में सिक्किम को दॅञ्जॉङ्ग, अर्थात "चावल की घाटी" कहा जाता है।[6]

इतिहास

गुरु रिन्पोचे, सिक्किम के संरक्षक सन्त की मूर्ति.नाम्ची की मूर्ति १८८ फीट पर विश्व में उनकी सबसे ऊँची मूर्ति है।
बौद्ध भिक्षु गुरु रिन्पोचे (पद्मसंभव) का ८वीं सदी में सिक्किम दौरा यहाँ से सम्बन्धित सबसे प्राचीन विवरण है। अभिलेखित है कि उन्होंने बौद्ध धर्म का प्रचार किया, सिक्किम को आशीष दिया तथा कुछ सदियों पश्चात आने वाले राज्य की भविष्यवाणी की। मान्यता के अनुसार १४वीं सदी में ख्ये बुम्सा, पूर्वी तिब्बत में खाम केमिन्यक महल के एक राजकुमार को एक रात दैवीय दृष्टि के अनुसार दक्षिण की ओर जाने का आदेश मिला। इनके ही वंशजों ने सिक्किम में राजतन्त्र की स्थापना की। १६४२ इस्वी में ख्ये के पाँचवें वंशज फुन्त्सोंग नामग्याल को तीन बौद्ध भिक्षु, जो उत्तर, पूर्व तथा दक्षिण से आये थे, द्वारा युक्सोम में सिक्किम का प्रथम चोग्याल(राजा) घोषित किया गया। इस प्रकार सिक्किम में राजतन्त्र का आरम्भ हुआ।
फुन्त्सोंग नामग्याल के पुत्र, तेन्सुंग नामग्याल ने उनके पश्चात १६७० में कार्य-भार संभाला। तेन्सुंग ने राजधानी को युक्सोम से रबदेन्त्से स्थानान्तरित कर दिया। सन १७०० में भूटान में चोग्याल की अर्ध-बहन, जिसे राज-गद्दी से वंचित कर दिया गया था, द्वारा सिक्किम पर आक्रमण हुआ। तिब्बतियों की सहयता से चोग्याल को राज-गद्दी पुनः सौंप दी गयी। १७१७ तथा १७३३ के बीच सिक्किम को नेपाल तथा भूटान के अनेक आक्रमणों का सामना करना पड़ा जिसके कारण रबदेन्त्से का अन्तत:पतन हो गया।[3]
सिक्किम के पुराने राजशाही का ध्वज
1791 में चीन ने सिक्किम की मदद के लिये और तिब्बत को गोरखा से बचाने के लिये अपनी सेना भेज दी थी। नेपाल की हार के पश्चात, सिक्किम किंग वंश का भाग बन गया। पड़ोसी देश भारत में ब्रतानी राज आने के बाद सिक्किम ने अपने प्रमुख दुश्मन नेपाल के विरुद्ध उससे हाथ मिला लिया। नेपाल ने सिक्किम पर आक्रमण किया एवं तराई समेत काफी सारे क्षेत्रों पर कब्जा कर लिया। इसकी वज़ह से ईस्ट इंडिया कम्पनी ने नेपाल पर चढ़ाई की जिसका परिणाम १८१४ कागोरखा युद्ध रहा।
सिक्किम और नेपाल के बीच हुई सुगौली संधि तथा सिक्किम और ब्रतानवी भारत के बीच हुई तितालिया संधि के द्वारा नेपाल द्वारा अधिकृत सिक्किमी क्षेत्र सिक्किम को वर्ष १८१७ में लौटा दिया गया। यद्यपि, अंग्रेजों द्वारा मोरांग प्रदेश में कर लागू करने के कारण सिक्किम और अंग्रेजी शासन के बीच संबंधों में कड़वाहट आ गयी। वर्ष १८४९ में दो अंग्रेज़ अफसर, सर जोसेफ डाल्टन और डाक्टर अर्चिबाल्ड कैम्पबेल, जिसमें उत्तरवर्ती (डाक्टर अर्चिबाल्ड) सिक्किम और ब्रिटिश सरकार के बीच संबंधों के लिए जिम्मेदार था, बिना अनुमति अथवा सूचना के सिक्किम के पर्वतों में जा पहुंचे। इन दोनों अफसरों को सिक्किम सरकार द्वारा बंधी बना लिया गया। नाराज़ ब्रिटिश शासन ने इस हिमालयी राज्य पर चढाई कर दी और इसे १८३५ में भारत के साथ मिला लिया। इस चढाई के परिणाम वश चोग्याल ब्रिटिश गवर्नर के आधीन एक कठपुतली राजा बन कर रह गया।[7]
१९४७ में एक लोकप्रिय मत द्वारा सिक्किम का भारत में विलय को अस्वीकार कर दिया गया और तत्कालीन भारतीय प्रधान मंत्री जवाहर लाल नेहरू ने सिक्किम को संरक्षित राज्य का दर्जा प्रदान किया। इसके तहत भारत सिक्किम का संरक्षक हुआ। सिक्किम के विदेशी, राजनयिक अथवा सम्पर्क संबन्धी विषयों की ज़िम्मेदारी भारत ने संभाल ली।
सन १९५५ में एक राज्य परिषद् स्थापित की गई जिसके आधीन चोग्याल को एक संवैधानिक सरकार बनाने की अनुमति दी गई। इस दौरान सिक्किम नेशनल काँग्रेस द्वारा पुनः मतदान और नेपालियों को अधिक प्रतिनिधित्व की मांग के चलते राज्य में गडबडी की स्थिति पैदा हो गई। १९७३ में राजभवन के सामने हुए दंगो के कारण भारत सरकार से सिक्किम को संरक्षण प्रदान करने का औपचारिक अनुरोध किया गया। चोग्याल राजवंश सिक्किम में अत्यधिक अलोकप्रिय साबित हो रहा था। सिक्किम पूर्ण रूप से बाहरी दुनिया के लिये बंद था और बाह्य विश्व को सिक्किम के बारे मैं बहुत कम जानकारी थी। यद्यपि अमरीकन आरोहक गंगटोक के कुछ चित्र तथा अन्य कानूनी प्रलेख की तस्करी करने में सफल हुआ। इस प्रकार भारत की कार्यवाही विश्व के दृष्टि में आई। यद्यपि इतिहास लिखा जा चुका था और वास्तविक स्थिति विश्व के तब पता चला जब काजी (प्रधान मंत्री) नें १९७५ में भारतीय संसद को यह अनुरोध किया कि सिक्किम को भारत का एक राज्य स्वीकार कर उसे भारतीय संसद में प्रतिनिधित्व प्रदान किया जाए। अप्रैल १९७५ में भारतीय सेना सिक्किम में प्रविष्ट हुई और राजमहल के पहरेदारों को निःशस्त्र करने के पश्चात गंगटोक को अपने कब्जे में ले लिया। दो दिनों के भीतर सम्पूर्ण सिक्किम राज्य भारत सरकार के नियंत्रण में था। सिक्किम को भारतीय गणराज्य मे सम्मिलित्त करने का प्रश्न पर सिक्किम की ९७.५ प्रतिशत जनता ने समर्थन किया। कुछ ही सप्ताह के उपरांत १६ मई १९७५ मे सिक्किम औपचारिक रूप से भारतीय गणराज्य का २२ वां प्रदेश बना और सिक्किम मे राजशाही का अंत हुआ।
वर्ष २००२ मे चीन को एक बड़ी शर्मिंदगी के सामना तब करना पड़ा जब सत्रहवें कर्मापा उर्ग्यें त्रिन्ले दोरजी, जिन्हें चीनी सरकार एक लामा घोषित कर चुकी थी, एक नाटकीय अंदाज में तिब्बत से भाग कर सिक्किम की रुम्तेक मठ मे जा पहुंचे। चीनी अधिकारी इस धर्म संकट मे जा फँसे कि इस बात का विरोध भारत सरकार से कैसे करें। भारत से विरोध करने का अर्थ यह निकलता कि चीनी सरकार ने प्रत्यक्ष रूप से सिक्किम को भारत के अभिन्न अंग के रूप मे स्वीकार लिया है।
चीनी सरकार की अभी तक सिक्किम पर औपचारिक स्थिति यह थी कि सिक्किम एक स्वतंत्र राज्य है जिस पर भारत नें अधिक्रमण कर रख्खा है।[3][8] चीन ने अंततः सिक्किम को २००३ में भारत के एक राज्य के रूप में स्वीकार किया जिससे भारत-चीन संबंधों में आयी कड़वाहट कुछ कम हुई। बदले में भारत नें तिब्बत को चीन का अभिन्न अंग स्वीकार किया। भारत और चीन के बीच हुए एक महत्वपूर्ण समझौते के तहत चीन ने एक औपचारिक मानचित्र जारी किया जिसमें सिक्किम को स्पष्ट रूप मे भारत की सीमा रेखा के भीतर दिखाया गया। इस समझौते पर चीन के प्रधान मंत्री वेन जियाबाओ और भारत के प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह ने हस्ताक्षर किया। ६ जुलाई २००६ को हिमालय के नाथुला दर्रे को सीमावर्ती व्यापार के लिए खोल दिया गया जिससे यह संकेत मिलता है कई इस क्षेत्र को लेकर दोनों देशों के बीच सौहार्द का भाव उत्पन्न हुआ है।[9]

भूगोल

सिक्किम के पश्चिम में हिमालय की चोटियाँ
अंगूठे के आकार का सिक्किम पूरा पर्वतीय क्षेत्र है। विभिन्न स्थानों की ऊँचाई समुद्री तल से २८० मीटर (९२० फीट) से ८,५८५ मीटर (२८,००० फीट) तक है।कंचनजंगा यहाँ की सबसे ऊंची चोटी है। प्रदेश का अधिकतर हिस्सा खेती। कृषि के लिये अन्युपयुक्त है। इसके बावजूद कुछ ढलान को खेतों में बदल दिया गया है और पहाड़ी तरीके से खेती की जाती है। बर्फ से निकली कई धारायें मौजूद होने की वजह से सिक्किम के दक्षिण और पश्चिम में नदियों की घाटियाँ बन गईं हैं। यह धारायें मिलकर टीस्ता एवं रंगीत बनाती हैं। टीस्ता को सिक्किम की जीवन रेखा भी कहा जाता है और यह सिक्किम के उत्तर से दक्षिण में बहती है। प्रदेश का एक तिहाई हिस्सा घने जंगलों से घिरा है।
सिक्किम के उत्तर में हिमालय पर्वत श्रंखला
उत्तर सिक्किम में स्थित गुरुडांगमार सरोवर
हिमालय की ऊँची पर्वत श्रंखलाओं ने सिक्किम को उत्तरी, पूर्वी और पश्चिमी दिशाओं मे अर्धचन्द्राकार। अर्धचन्द्र में घेर रखा है। राज्य के अधिक जनसंख्या वाले क्षेत्र अधिकतर राज्य के दक्षिणी भाग मे, हिमालय की कम ऊँचाई वाली श्रंखलाओं मे स्थित हैं। राज्य मे अट्‌ठाइस पर्वत चोटियाँ, इक्कीस हिमानी, दो सौ सत्ताईस झीलें। झील (जिनमे चांगु झीलगुरुडोंग्मार झील और खेचियोपल्री झीलें। खेचियोपल्री झीले शामिल हैं), पाँच गर्म पानी के चश्मे। गर्म पानी का चश्मा और सौ से अधिक नदियाँ और नाले हैं। आठ पहाड़ी दर्रे सिक्किम को तिब्बत, भूटान और नेपाल से जोड़ते हैं।[4]
Cities and towns of Sikkim.

भूतत्व

सिक्किम की पहाड़ियाँ मुख्यतः नेस्ती(gneissose) और अर्द्ध-स्कीस्तीय(half-schistose) पत्थरों से बनी हैं, जिस कारण उनकी मिट्टी भूरी मृत्तिका, तथा मुख्यतः उथला और कमज़ोर है। यहाँ की मिटटी खुरदरी तथा लौह जारेय से थोड़ी अम्लीय है। इसमें खनिजी और कार्बनिक पोषकों का अभाव है। इस तरह की मिट्टी सदाबहार और पर्णपाती वनों के योग्य है।
सिक्किम की भूमि का अधिकतर भाग केम्ब्रिया-पूर्व(Precambrian) चट्टानों से आवृत है जिनकी आयु पहाड़ों से बहुत कम है। पत्थर फ़िलीतियों। फ़िलीत(phyllite) और स्कीस्त से बने हैं इस कारणवश and therefore the slopes are highly susceptible to weathering and prone to erosion. This, combined with the intense rain, causes extensive soil erosion and heavy loss of soil nutrients through leaching. इस के परिणाम स्वरूप यहां आये दिन भूस्खलन होते रहते हैं, जो बहुत से छोटे गावों और कस्बों का शहरी इलाकों से संपर्क विछ्छेद कर देते हैं।[4]

गरम पानी के झरने

सिक्किम में गरम पानी के अनेक चश्मे हैं जो अपनी रोगहर क्षमता के लिये विख्यात हैं। सबसे महत्वपूर्ण गरम पानी के च्श्मे फुरचाचुयुमथांगबोराँगरालांग,तरमचु और युमी सामडोंग हैं। इन सभी चश्मों में काफी मात्रा में सल्फर पाया जाना है और ये नदी के किनारे स्थित हैं। इन गरम पानी के चश्मों का औसत तापमान ५० °C (सेल्सियस) तक होता है।

मौसम

यहाँ का मौसम जहाँ दक्षिण में शीतोष्ण कटिबंधी है तो वहीं टुंड्रा प्रदेश के मौसम की तरह है। यद्यपि सिक्किम के अधिकांश आवासित क्षेत्र में, मौसम समशीतोष्ण (टैंपरेट) रहता है और तापमान कम ही 28 °सै (82 °फै) से ऊपर यां 0 °सै (32 °फै) से नीचे जाता है। सिक्किम में पांच ऋतुएं आती हैं: सर्दीगर्मीबसंत औरपतझड़ और वर्षा, जो जून और सितंबर के बीच आती है। अधिकतर सिक्किम में औसत तापमान लगभग 18 °सै (64 °फै) रह्ता है। सिक्किम भारत के उन कुछ ही राज्यों में से एक है जिनमे यथाक्रम वर्षा होती है। हिम रेखा लगभग ६००० मीटर (१९६०० फीट) है।
मानसून के महीनों में प्रदेश में भारी वर्षा होती है जिससे काफी संख्या में भूस्खलन होता है। प्रदेश में लगातार बारिश होने का कीर्तिमान ११ दिन का है। प्रदेश के उत्तरी क्षेत्र में शीत ऋतु में तापमान -४० °C से भी कम हो जाता है। शीत ऋतु एवं वर्षा ऋतु में कोहरा भी जन जीवन को प्रभावित करता है जिससे परिवहन काफी कठिन हो जाता है।[4]

उपविभाग

सिक्किम के चार जनपद और उनके मुख्यालय
सिक्किम में चार जनपद हैं। प्रत्येक जनपद (जिले) को केन्द्र अथवा राज्य सरकार द्वारा नियुक्त जिलाधिकारी देखता है। चीन की सीमा से लगे होने के कारण अधिकतर क्षेत्रों में भारतीय सेना का बाहुल्य दिखाई देता है। कई क्षेत्रों में प्रवेश निषेध है और लोगों को घूमने के लिये परमिट लेना पड़ता है। सिक्किम में कुल आठ कस्बे एवं नौ उप-विभाग हैं।
यह चार जिले पूर्व सिक्किमपश्चिम सिक्किमउत्तरी सिक्किम एवं दक्षिणी सिक्किम हैं जिनकी राजधानियाँ क्रमश: गंगटोकगेज़िंगमंगन एवं नामची हैं।[5] यह चार जिले पुन: विभिन्न उप-विभागों में बाँटे गये हैं। "पकयोंग" पूर्वी जिले का, "सोरेंग" पश्चिमी जिले का, "चुंगथांग" उत्तरी जिले का और "रावोंगला" दक्षिणी जिले का उपविभाग है।[10]

जीव जंतु एवं वनस्पति

बुरुंश (रोह्डोडैंड्रौन) सिक्क्म का राजवृक्ष है
सिक्किम हिमालय के निचले हिस्से में पारिस्थितिक गर्मस्थान में भारत के तीन पारिस्थितिक क्षेत्रों में से एक बसा हुआ है। यहाँ के जंगलों में विभिन्न प्रकार के जीव जंतु एवं वनस्पतियाँ पाई जाती हैं। अलग अलग ऊँचाई होने की वज़ह से यहाँ ट्रोपिकल, टेम्पेरेट, एल्पाइन और टुन्ड्रा तरह के पौधे भी पाये जाते हैं। इतने छोटे से इलाके में ऐसी भिन्नता कम ही जगहों पर पाई जाती है।
The flora of Sikkim includes the rhododendron, the state tree, with a huge range of species occurring from subtropical to alpine regions.Orchidsfigslaurelbananassal trees and bamboo in the lower altitudes of Sikkim, which enjoy a sub-tropical type climate. In the temperate elevations above 1,500 metres, oakschestnutsmaplesbirchsalders, and magnolias grow in large numbers. The alpine type vegetation includes juniperpinefirscypresses and rhododendrons, and is typically found between an altitude of ३,५०० metres to ५,००० m. Sikkim boasts around ५,००० flowering plants, ५१५ rare orchids, ६० primulas species, ३६ rhododendrons species, ११ oaks varieties, २३ bamboos varieties, १६ conifer species, ३६२ types of ferns and ferns allies, ८ tree ferns, and over ४२४ medicinal plants. The orchid Dendrobium nobile is the official flower of Sikkim.
The fauna includes the snow leopard, the musk deer, the Bhoral, the Himalayan Tahr, the red panda, the Himalayan marmot, the serow, the goral, the barking deer, the common langur, the Himalayan Black Bear, the clouded leopard, the Marbled Cat, the leopard cat, the wild dog, the Tibetan wolf, the hog badger, the binturong, the jungle cat and the civet cat. Among the animals more commonly found in the alpine zone are yaks, mainly reared for their milk, meat, and as a beast of burden.
सिक्किम के पक्षी जगत में प्रमुख हैं - Impeyan pheasant, the crimson horned pheasant, the snow partridge, the snow cock, the lammergeyerand griffon vultures, as well as golden eaglesquailploverswoodcocksandpiperspigeonsOld World flycatchersbabblers and robins. यहां पक्षियों की कुल 550 प्रजातियां अभिलिखित की गयी हैं, जिन में से कुछ को विलुप्तप्रायः घोषित किया गया है।[4]

अर्थ-व्यवस्था

वृहत् अर्थव्यवस्थासंबंधी प्रवाह[संपादित करें]

यह सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय द्वारा जारी सिक्किम के सकल घरेलू उत्पाद के प्रवाह की एक झलक है (करोड़ रुपयों में)[11]
सालसकल घरेलू उत्पाद
१९८०५२
१९८५१२२
१९९०२३४
१९९५५२०
२०००९७१
२००३२३७८.६ [1]
२००४ के आँकड़ों के अनुसार सिक्किम का सकल घरेलू उत्पाद $४७८ मिलियन होने का अनुमान लगाया गया है।
सिक्किम एक कृषि प्रधान। कृषि राज्य है और यहाँ सीढ़ीदार खेतों में पारम्परिक पद्धति से कृषि की जाती है। यहाँ के किसान इलाईचीअदरकसंतरासेबचायऔर पीनशिफ आदि की खेती करते हैं।[5]चावल राज्य के दक्षिणी इलाकों में सीढ़ीदार खेतों में उगाया जाता है। सम्पूर्ण भारत में इलाईची की सबसे अधिक उपज सिक्किम में होती है। पहाड़ी क्षेत्र होने के कारण और परिवहन की आधारभूत सुविधाओं के अभाव में यहाँ कोई बड़ा उद्योग नहीं है। मद्यनिर्माणशाला,मद्यनिष्कर्षशालाचर्म-उद्योग तथा घड़ी-उद्योग सिक्किम के मुख्य उद्योग हैं। यह राज्य के दक्षिणी भाग में स्थित हैं- मुख्य रूप से मेल्ली और जोरेथांग नगरों में। राज्य में विकास दर ८.३% है, जो दिल्ली के पश्चात राष्ट्र भर में सर्वाधिक है।[12]
इलायची सिक्किम की मुख्य नकदी फसल है
हाल के कुछ वर्षों में सिक्किम की सरकार ने प्रदेश में पर्यटन को बढ़ावा देना प्रारम्भ किया है। सिक्किम में पर्यटन का बहुत संभावना है और इन्हीं का लाभ उठाकर सिक्किम की आय में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है। आधारभूत संरचना में सुधार के चलते, यह उपेक्षा की जा रही है पर्यटन राज्य में अर्थव्यवस्था के एक मुख्य आधार के रूप में सामने आयेगा। ऑनलाइन सट्टेबाजी राज्य में एक नए उद्योग के रूप में उभर कर आया है। "प्लेविन" जुआ, जिसे विशेष रूप से तैयार किए गए अंतकों पर खेला जाता है, को राष्ट्र भर में खूब वाणिज्यिक सफलता हासिल हुई है।[13][13] राज्य में प्रमुख रूप से ताम्बाडोलोमाइटचूना पत्थरग्रेफ़ाइटअभ्रकलोहा औरकोयला आदि खनिजों का खनन किया जाता है।[14]
जुलाई ६२००६ को नाथूला दर्रा, जो सिक्किम को ल्हासातिब्बत से जोड़ता है, के खुलने से यह आशा जतायी जा रही है कि इससे सिक्किम की अर्थव्यवस्था को बढ़ावा मिलेगा, भले वे धीरे-धीरे ही देखने को मिलें। यह दर्रा, जो १९६२ में १९६२ भारत-चीन युद्ध। भारत-चीन युद्ध के पश्चात बंद कर दिया गया था, प्राचीन रेशम मार्ग का एक हिस्सा था और ऊनछाल और मसालों। मसाला के व्यापार में सहायक था।[9]

परिवहन

सिक्किम में कठिन भूक्षेत्र के कारण कोई हवाई अड्डा अथवा रेल स्टेशन नहीं है। समीपतम हवाईअड्डा बागदोगरा हवाईअड्डासिलीगुड़ीपश्चिम बंगाल में है। यह हवाईअड्डा गंगटोक से १२४ कि०मी० दूर है। गंगटोक से बागदोगरा के लिये सिक्किम हेलीकॉप्टर सर्विस द्वारा एक हेलीकॉप्टर सेवा उपलब्ध है जिसकी उड़ान ३० मिनट लम्बी है, दिन में केवल एक बार चलती है और केवल ४ लोगों को ले जा सकती है।[15]गंगटोक हैलीपैड राज्य का एकमात्र असैनिक हैलीपैड है। निकटतम रेल स्टेशन नई जलपाईगुड़ी में है जो सिलीगुड़ी से १६ किलोमीटर। कि०मी० दूर है।[5]
राष्ट्रीय राजमार्ग ३१A सिलीगुड़ी को गंगटोक से जोड़ता है। यह एक सर्व-ऋतु मार्ग है तथा सिक्किम में रंग्पो पर प्रवेश करने के पश्चात तीस्ता नदी के समानान्तर चलता है। अनेक सार्वजनिक अथवा निजी वाहन हवाई-अड्डे, रेल-स्टेशन तथा और सिलिगुड़ी को गंगटोक से जोड़ते हैं। मेल्ली से आने वाले राजमार्ग की एक शाखा पश्चिमी सिक्किम को जोड़ती है। सिक्किम के दक्षिणी और पश्चिमी शहर सिक्किम को उत्तरी पश्चिमी बंगाल के पर्वतीय शहर कलिम्पोंग और दार्जीलिंग से जोड़ते हैं। राज्य के भीतर चौपहिया वाहन लोकप्रिय हैं क्योंकि यह राज्य की चट्टानी चढ़ाइयों को आसानी से पार करने में सक्षम होते हैं। छोटी बसें राज्य के छोटे शहरों को राज्य और जिला मुख्यालयों से जोड़ती हैं।[5]

जनसांख्यिकी

मानवजातीय रूप से सिक्किम के अधिकतर निवासी नेपाली हैं जिन्होंने प्रदेश में उन्नीसवीं सदी में प्रवेश किया। भूटिया सिक्किम के मूल निवासियों में से एक हैं, जिन्होंने तिब्बत के खाम जिले से चौदवीं सदी में पलायन किया और लेप्‍चा, जो स्थानीय मान्यतानुसार सुदूर पूर्व से आये माने जाते हैं। प्रदेश के उत्तरी तथा पूर्वी इलाक़ों में तिब्बती बहुतायत में रहते हैं। अन्य राज्यों से आकर सिक्किम में बसने वालों में प्रमुख हैं मारवाड़ी लोग। मारवाड़ी, जो दक्षिण सिक्किम तथा गंगटोक में दुकानें चलाते हैं;बिहारी जो अधिकतर श्रमिक हैं; तथा बंगाली लोग। बंगाली
हिन्दू धर्म राज्य का प्रमुख धर्म है जिसके अनुयायी राज्य में ६०.९% में हैं।[16] बौद्ध धर्म के अनुयायी २८.१% पर एक बड़ी अल्पसंख्या में हैं।[16] सिक्किम में ईसाई। ईसाइयों की ६.७% आबादी है जिनमे मूल रूप से अधिकतर वे लेपचा हैं जिन्होंने उन्नीसवीं सदी के उत्तरकाल में संयुक्त राजशाही। अंग्रेज़ीधर्मोपदेशकों के प्रचार के बाद ईसाई मत अपनाया। राज्य में कभी साम्प्रदायिक तनाव नहीं रहा। मुसलमानों की १.४% प्रतिशत आबादी के लिए गंगटोक के व्यापारिक क्षेत्र में और मंगन में मस्जिद। मस्जिदें हैं।[16]
नेपाली सिक्किम का प्रमुख भाषा है। सिक्किम में प्रायः अंग्रेज़ी और हिन्दी भी बोली और समझी जाती हैं। यहाँ की अन्य भाषाओं मे भूटियाजोङ्खाग्रोमागुरुंगलेप्चालिम्बुमगरमाझीमझवारनेपालभाषा,दनुवारशेर्पासुनवार भाषा। सुनवारतामाङथुलुंगतिब्बती और याक्खा शामिल हैं।[5][17]
५,४०,४९३ की जनसंख्या के साथ सिक्किम भारत का न्यूनतम आबादी वाला राज्य है,[18] जिसमें पुरुषों की संख्या २,८८,२१७ है और महिलाओं की संख्या २,५२,२७६ है। सिक्किम में जनसंख्या का घनत्व ७६ मनुष्य प्रतिवर्ग किलोमीटर है पर भारत में न्यूनतम है। विकास दर ३२.९८% है (१९९१-२००१)। लिंगानुपात ८७५ स्त्री प्रति १००० पुरुष है। ५०,००० की आबादी के साथ गंगटोक सिक्किम का एकमात्र महत्तवपूर्ण शहर है। राज्य में शहरी आबादी लगभग ११.०६% है।[10] प्रति व्यक्ति आय ११,३५६ रु० है, जो राष्ट्र के सबसे सर्वाधिक में से एक है।[17]

संस्कृति

ल्होसारके दौरान लाचुंग में गुम्पा नृत्य
सिक्किम के नागरिक भारत के सभी मुख्य हिन्दू त्योहारों जैसे दीपावली और दशहरा, मनाते हैं। बौद्ध धर्म के ल्होसारलूसोंगसागा दावाल्हाबाब ड्युचेनड्रुपका टेशी और भूमचू वे त्योहार हैं जो मनाये जाते हैं। लोसर - तिब्बती नव वर्ष लोसर, जो कि मध्य दिसंबर में आता है, के दौरान अधिकतर सरकारी कार्यालय एवं पर्यटक केन्द्र हफ़्ते भर के लिये बंद रहते हैं। गैर-मौसमी पर्यटकों को आकर्षित करने के लिये हाल ही में बड़ा दिन। बड़े दिन को गंगटोक में प्रसारित किया जा रहा है।[19]
पाश्चात्य रॉक संगीत यहाँ प्रायः घरों एवं भोजनालयों में, गैर-शहरी इलाक़ों में भी सुनाई दे जाता है। हिन्दी संगीत ने भी लोगों में अपनी जगह बनाई है। विशुद्ध नेपाली रॉक संगीत, तथा पाश्चात्य संगीत पर नेपाली काव्य भी काफ़ी प्रचलित हैं। फुटबॉल एवं क्रिकेट यहाँ के सबसे लोकप्रिय खेल हैं।
नूडल पर आधारित व्यंजन जैसे थुक्पा, चाउमीन, थान्तुक?, फाख्तु?, ग्याथुक? और वॉनटन? सर्वसामान्य हैं। मःम, भाप से पके और सब्जियों से भरे पकौडि़याँ, सूप के साथ परोसा हुआ भैंस का माँस। भैंस अथवा सूअर का माँस। सुअर का माँस लोकप्रिय लघु आहार है। पहाड़ी लोगों के आहार में भैंस, सूअर, इत्यादि के माँस की मात्रा बहुत अधिक होती है। मदिरा पर राज्य उत्पाद शुल्क कम होने के कारण राज्य में बीयर?, विस्की?, रम? और ब्रांडी इत्यादि का सेवन किया जाता है।
सिक्किम में लगभग सभी आवास देहाती हैं जो मुख्यत: कड़े बाँस के ढाँचे पर लचीले बाँस का आवरण डाल कर नानाये? जाते हैं। आवास में ऊष्मा का संरक्षण करने के लिए इस पर गाय के गोबर का लेप भी किया जाता है। राज्य के अधिक ऊँचाई वाले क्षेत्रों में अधिकतर लकड़ी के घर बनाये जाते हैं।

राजनीति और सरकार

The White Hall complex houses the residences of the Chief Minister and Governor of Sikkim.
भारत के अन्य राज्यों के समान, केन्द्रिय सरकार द्वारा निर्वाचित राज्यपाल राज्य शासन का प्रमुख है। उसका निर्वाचन मुख्यतः औपचारिक ही होता है, तथा उसका मुख्य काम मुख्यमंत्री के शपथ-ग्रहण की अध्यक्षता ही होता है। मुख्यमंत्री, जिसके पास वास्तविक प्रशासनिक अधिकार होते हैं, अधिकतर राज्य चुनाव में बहुमत जीतने वाले दल अथवा गठबंधन का प्रमुख होता है। राज्यपाल मुख्यमंत्री के परामर्श पर मंत्रीमण्डल? नियुक्त करता है। अधिकतर अन्य राज्यों के समान सिक्किम में भी एकसभायी (एकसदनी? unicameral) सदन वाली विधान सभा ही है। सिक्किम को भारत की द्विसदनी विधानसभा के दोनों सदनों, राज्य सभा तथा लोक सभा में एक-एक स्थान प्राप्त है। राज्य में कुल ३२ विधानसभा सीटें? हैं जिनमें से एक बौद्ध संघ के लिए आरक्षित है। सिक्किम उच्च न्यायालय देश का सबसे छोटा उच्च न्यायालय है।[20]
State symbols[5]
राज्य पशुलाल पाण्डा
राज्य पक्षीरक्त महूका?
राज्य वृक्षबरुंश?
राज्य फूलपीनशिफ?
१९७५ में, राजतंत्र के अंत के उपरांत, कांग्रेस को १९७७ के आम चुनावों में बहुमत प्राप्त हुआ। अस्थिरता के एक दौर के बाद, १९७९ में,सिक्किम संग्राम परिषद पार्टी के नेता नर बहादुर भंडारी के नेतृत्व में एक लोकप्रिय मंत्री परिषद का गठन हुआ। इस के बाद, १९८४ और १९८९ के आम चुनावों में भी भंडारी ही विजयी रहे। १९९४ में सिक्किम डेमोक्रेटिक फ्रन्ट के पवन कुमार चामलिंग राज्य के मुख्यमंत्री बने। १९९९ और २००४ के चुनावों में भी विजय प्राप्त कर, यह पार्टी अभी तक सिक्किम में राज कर रही है।[7][15]

अवसंरचना

तिब्ब्त विज्ञान संग्रहालय एवं शोध केन्द्र
सिक्किम की सड़कें बहुधा भूस्खलन तथा पास की धारों द्वारा बाढ़ से क्षतिग्रस्त हो जाती हैं, परन्तु फिर भी सिक्किम की सड़कें अन्य राज्यों की सड़कों की तुलना में बहुत अच्छी हैं। सीमा सड़क संगठन(BRO), भारतीय सेना का एक अंग इन सड़कों का रख-रखाव करता है। दक्षिणी सिक्किम तथा रा०रा०-३१अ की सड़कें अच्छी स्थिति में हैं क्योंकि यहाँ भूस्खलन की घटनाएँ कम है। राज्य सरकार १८५७.३५ कि०मी० का वह राजमार्ग जो सी०स०सं० के अन्तर्गत नहीं आता है, का रख-रखाव करती है।[10]
सिक्किम में अनेक जल विद्युत बिजली स्टेशन (केन्द्र) हैं जो नियमित बिजली उपलब्ध कराते हैं, परन्तु संचालन शक्ति अस्थिर है तथा स्थायीकारों (stabilisers) की आवश्यकता पड़ती है। सिक्किम में प्रतिव्यक्ति बिजली प्रयोग १८२ kWh है। ७३.२% घरों में स्वच्छ जल सुविधा उपलब्ध है,[10] तथा अनेक धाराओं के परिणाम स्वरूप राज्य में कभी भी अकाल या पानी की कमी की परिस्थितियाँ उत्पन्न नहीं हुई हैं। टिस्टा नदी पर कई जलविद्युत केन्द्र निर्माणशील हैं तथा उनका पर्यावरण पर प्रभाव एक चिन्ता का विषय है।

पत्राचार

रुम्टेक विहार सिक्किम की सबसे प्रसिद्ध धरोहर है तथा वर्ष २००० में यह समाचारों में थी
दक्षिणी नगरीय क्षेत्रों में अंग्रेजी, नेपाली तथा हिन्दी के दैनिक पत्र हैं। नेपाली समाचार-पत्र स्थानीय रूप से ही छपते हैं परन्तु हिन्दी तथा अंग्रेजी के पत्र सिलिगुड़ी में। सिक्किम में नेपाली भाषा में प्रकाशित समाचार पत्रों की मांग विगत दिनों में बढ़ी हैं। समय दैनिकहाम्रो प्रजाशक्तिहिमाली बेला और साङ्गीला टाइमस्इत्यादि नेपाली समाचार पत्र गंगटोक से प्रकाशित होते हैं जिनमें हाम्रो प्रजाशक्ति राज्य का सबसे बड़ा और लोकप्रिय समाचार पत्र है। अंग्रेजी समाचार पत्रों मेंसिक्किम नाओ और सिक्किम एक्सप्रेसहिमालयन मिरर स्थानीय रूप से छपते हैं तथा द स्टेट्समैन तथा द टेलेग्राफ़ सिलिगुड़ी में छापे जाते हैं जबकि द हिन्दू तथा द टाइम्स ऑफ़ इन्डिया कलकत्ता में छपने के एक दिन पश्चात् गंगटोकजोरेथांगमेल्ली तथा ग्याल्शिंग पहुँच जाते हैं। सिक्किम हेराल्ड सरकार का आधिकारिक साप्ताहिक प्रकाशन है। हाल-खबर सिक्किम का एकमात्र अंतर्राष्ट्रिय समाचार का मानकीकृत प्रवेशद्वार है। सिक्किम सें 2007-में नेपाली साहित्य का ऑनलाइन पत्रिका टिस्टारंगीत शुरु हुई है जिस का संचालन साहित्य सिर्जना सहकारी समिति लिमिटेड] करती है।
अन्तर्जाल सुविधाएँ जिला मुख्यालयों में तो उपलब्ध हैं परन्तु ब्रॉडबैंड सम्पर्क उपलब्ध नहीं है तथा ग्रामीण क्षेत्रों में अभी अन्तर्जाल सुविधा उपलब्ध नहीं है। थाली विद्युत-ग्राहकों (Dish antennae) द्वारा अधिकतर घरों में उपग्रह दूरदर्शन सरणि (satellite television channels) उपलब्ध हैं। भारत में प्रसारित सरणियों के अतिरिक्त नेपाली भाषा के सरणि भी प्रसारित किये जाते हैं। सिक्किम केबलडिश टी० वी०दूरदर्शन तथा नयुम (Nayuma) मुख्य सेवा प्रदाता हैं। स्थानीय कोष्ठात्मक दूरभाष सेवा प्रदाताओं (cellular phone service provider) की अच्छी सुविधाएँ उपलब्ध हैं जिनमें भा०सं०नि०लि० की सुविधा राज्य-विस्तृत है परन्तुरिलायन्स इन्फ़ोकॉम तथा एयरटेल केवल नगरीय क्षेत्रों में है। राष्ट्रिय अखिल भारतीय आकाशवाणी राज्य का एकमात्र आकाशवाणी केन्द्र है।[21]

शिक्षा

साक्षरता प्रतिशत दर ६९.६८% है, जो कि पुरुषों में ७६.७३% तथा महिलाओं में ६१.४६% है। सरकारी विद्यालयों की संख्या १५४५ है तथा १८ निजी विद्यालय भी हैं जो कि मुख्यतः नगरों में हैं।[10] उच्च शिक्षा के लिये सिक्किम में लगभग १२ महाविद्यालय तथा अन्य विद्यालय हैं। सिक्किम मणिपाल विश्वविद्यालय आभियान्त्रिकी, चिकित्सा तथा प्रबन्ध के क्षेत्रों में उच्च शिक्षा प्रदान करता है। वह अनेक विषयों में दूरस्थ शिक्षा भी प्रदान करता है। राज्य-संचालित दो बहुशिल्पकेंद्र, उच्च तकनीकी प्रशिक्षण केन्द्र (Advanced Technical Training Centre) तथा संगणक एवं संचार तकनीक केन्द्र (Centre for Computers and Communication Technology) आदि आभियान्त्रिकी की शाखाओं में सनद पाठ्यक्रम चलाते हैं। ATTC बारदांग, सिंगताम तथा CCCT चिसोपानि,नाम्ची में है। अधिकतर विद्यार्थी उच्च शिक्षा के लिये सिलीगुड़ीअथवा कोलकाता जाते हैं। बौद्ध धार्मिक शिक्षा के लिए रुमटेक गोम्पा द्वारा संचालित नालन्दा नवविहार एक अच्छा केंद्र है।