बुधवार, 17 मार्च 2010

कविता, कविता कब लगती है


कविता में भाषा की, शब्दों की एक खास भूमिका होती है। गद्य से कुछ अलग। यह अलग क्या है, इस पर नाना प्रकार से विचार होता रहा है। विन्यास, संगीत, लय, छलाँगें, संवेग, विचार और संवेदना की गहरी-उथली घाटियाँ और शब्दों के बीच की जगहें। ये ही वे समवेत चीजें हैं जो मोटे तौर पर उसे गद्य से अलगा सकती हैं लेकिन भाषा एकमात्र पहला और अनिवार्य तत्व होते हुए भी इतना आत्मनिर्भर और निर्णायक तत्व नहीं है कि बाकी चीजों को दरकिनार किया जा सके।
मेरे लिए केवल भाषा से, शब्दों भर से कविता संभव नहीं होगी। वह कुछ और चमत्कृत कर सकनेवाली चीज हो तो सकती है मगर कविता नहीं। जहाँ तक कविता में लोकशब्दों की आवाजाही का प्रश्न है तो यह शब्द-प्रवेश अपनी परंपरा, बोध और सहज आकस्मिकता की वजह से होगा ही।
कवि की अपनी पृष्ठभूमि और उसके जनपदीय सांस्कृतिक जुड़ाव से शब्द-संपदा स्वयमेव तय होती है। ठूँसे हुए शब्द अलग से दिखते हैं, चाहे फिर वे अंग्रेजी के हों, महानगरीय आधुनिकता में पगे हों या फिर लोक से आते दिखते हों। इसलिए महत्वपूर्ण यही है कि कविता में वे किस तरह उपस्थित हैं।
बहुत पीछे न जाएँ तो अस्सी के दशक में भी अरुण कमल की कविता में उनके लोक और अंचल के अनेक शब्द आते हैं और वे कोई लोकभाषा के कवि नहीं है। भगवत रावत और ज्ञानेंद्रपति की कविता में अनेक जनपदीय शब्दों की जगह है । बोलियों के शब्द हैं।
बद्रीनारायण, नवल, एकांत, बोधिसत्व में भी यह छटा है। दूसरी तरफ अनेक श्रेष्ठ कवि ऐसे हैं जिनकी कविता महानगरीय शुद्ध खड़ी बोली के मानकीकृत शब्दों से ही परिचालित है। मुझे इसमें कोई भलाई या बुराई नहीं दिखती है। मेरे तईं पाठक के लिए महत्वपूर्ण है कि आखिर कविता कुल रूप में कैसी है। बहरहाल, कविता में शब्द प्रवेश को लेकर कोई निषेधाज्ञा लागू नहीं की जा सकती, न ही कोई इस तरह के नियम बनाए जा सकते हैं। बोलियों के, लोक के शब्द कविता में संपन्नता और वैविध्य को जगह दे सकते हैं।
लेकिन बोलियों को समकालीन कविता का प्रचलित रूप बचाएगा, इसमें मुझे संदेह है। याददिलाही के स्तर तो बात ठीक है। बोलियों को साहित्य बचा लेता है, यह अवधारणा भी विमर्श योग्य है। क्या 'रामचरितमानस' ने अवधी बचा ली है और क्या वह इसे अमर बनाए रखेगी? अथवा अवधी को अवध का लोक ही बचाएगा?
बोलियों का प्रयोग यदि जीवन में नहीं रहेगा तो साहित्य में उनकी उपस्थिति एक ऐतिहासिक सहजता और अपने समकाल की स्मृति भर है। दरअसल, जीवन की विशालता और जीवंत लोक ही बोलियों और शब्दों को बचाते हैं, बाकी काम तो सिर्फ अकादमिक रह जाता है इसलिए कविता में सहज शब्द प्रवेश और रचना के स्वाभाविक हिस्से के रूप में शब्दों की उपस्थिति ही कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है। वे प्रासंगिक और संप्रेषणीय हों, फिर उन शब्दों के स्रोत कहाँ हैं, यह जानना-समझना गौण है।

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