शनिवार, 24 अप्रैल 2010

मैं समग्र जगत का हूँ - विवेकानंद

कुछ पुरातनपंथी हिन्दुओं द्वारा यह आरोप लगाए जाने पर कि वे विधर्मियों के साथ एक ही मेज पर बैठकर निषिद्ध भोजन ग्रहण करते हैं, स्वामी जी ने मुँहतोड़ उत्तर देते ‍हुए लिखा -

क्या तुम यह कहना चाहते हो कि मैं इन, केवल शिक्षित हिन्दुओं में ही पाए जाने वाले जातिभेद-जर्जरित, अंधविश्वासी, दयाहीन, कपटी और नास्तिक कायरों में से एक बनकर जीने-मरने के लिए पैदा हुआ हूँ?

मुझे कायरता से घृणा है। मैं कायरों के साथ कोई संबंध नहीं रखना चाहता। मैं जैसे भारत का हूँ वैसे ही समग्र जगत का भी हूँ। इस विषय को लेकर मनमानी बातें बनाना निरर्थक है। ऐसा कौन सा देश है, जो मुझ पर विशेष अधिकार का दावा करता है? क्या मैं किसी राष्ट्र का क्रीतदास हूँ?... मुझे अपने पीछे एक ऐसी शक्ति दिखाई दे रही है, जो‍कि मनुष्य, देवता या शैतान की शक्तियों से कहीं अधिक सामर्थ्यशाली है। मुझे किसी की सहायता नहीं चाहिए, जीवन भर मैं ही दूसरों की सहायता करता रहा हूँ।

इसी शैली में उन्होंने एक-दूसरे भारतीय शिष्य को लिखा -
मुझे आश्चर्य है कि तुम लोग मिशनरियों की मूर्खतापूर्ण बातों को इतना महत्व दे रहे हो। यदि भारतवासी मेरे नियमानुसार हिन्दू-भोजन के सेवन पर बल देते हैं तो उनसे एक रसोइया एवं उसके रखने के लिए पर्याप्त रुपयों का प्रबंध करने के लिए कह देना। फिर मिशनरी लोग यदि कहते हों कि मैंने कामिनी-कांचन त्याग रूपी संन्यास के दोनों व्रत तोड़े हैं, तो उनसे कहना कि वे झूठ बोलते हैं। मेरे बारे में इतना ही जान लेना कि मैं किसी के भी कथनानुसार नहीं चलूँगा, किसी भी रा्ष्ट्र के प्रति मेरी अंधभक्ति नहीं है। मैं कायरता को घृणा की दृष्टि से देखता हूँ। कायर तथा मूर्खतापूर्ण बकवासों के साथ मैं अपना संबंध नहीं रखना नहीं चाहता। किसी प्रकार की राजनीति में मुझे विश्वास नहीं है। ईश्वर तथा सत्य ही इस जगत में एकमात्र राजनीति है, बाकी सब कूड़ा-कचरा है।

शि‍शु को बचाएँ डायरिया से
स्वच्छ पानी एवं ताजा खाना खिलाएँ।
आजकल रोटा वायरस डायरिया की रोकथाम का टीका आ गया है। इसकी दो खुराक चार महीने की उम्र के पहले ही बच्चों को दिलवाएँ इसकी जानकारी शिशुरोग विशेषज्ञ से लें।

नीबू पानी, मठा, नारियल पानी, दाल का पानी एवं खाना देते रहें।
दस्त होने पर ओआरएस का घोल एवं साधारण पानी बीच-बीच में देते रहें।

अतिथि सत्कार का प्रभाव
महाभारत काल की बात है। कुरुक्षेत्र में मुद्‍गल नाम के एक श्रेष्ठ ऋषि रहते थे। वे सत्यनिष्ठ, धर्मात्मा और जितेंद्रिय थे। क्रोध व अहंकार उनमें बिल्कुल नहीं था। जब खेत से किसान अनाज काट लेते और खेत में गिरा अन्न भी चुन लेते, तब उन खेतों में बचे-खुचे दाने मुद्‍गल ऋषि अपने लिए एकत्र कर लेते थे।
कबूतर की भाँति वे थोड़ा सा अन्न एकत्र करते और उसी से अपने परिवार का भरण-पोषण करते थे। पधारे हुए अतिथि का सत्कार भी उसी अन्न से करते, यहाँ तक कि पूर्णमासी तथा अमावस्या के श्राद्ध तथा आवश्यक हवन भी वे संपन्न करते थे। महात्मा मुद्‍गल एक पक्ष (पंद्रह दिन) में एक दोने भर अन्न एकत्र कर लाते थे। उतने से ही देवता, पितर और अतिथि आदि की पूजा-सेवा करने के बाद जो कुछ बचता था, उससे परिवार का काम चलाते थे।

महर्षि मुद्‍गल के दान की महिमा सुनकर महामुनि दुर्वासाजी ने उनकी परीक्षा करने का निश्चय किया। उन्होंने पहले सिर घुटाया, फिर फटे वस्त्रों के साथ पागलों-जैसा वेश बनाए हुए, कठोर वचन बोलते मुद्‍गल जी के आश्रम में पहुँचकर भोजन माँगने लगे। महर्षि मुद्‍गल ने अत्यंत श्रद्धा के साथ दुर्वासाजी का स्वागत किया। उनके चरण धोए, पूजन किया और फिर उन्हें भोजन कराया। दुर्वासाजी ने मुद्‍गल के पास जितना अन्न था, वह सब खा लिया तथा बचा हुआ जूठा अन्न अपने शरीर में पोत लिया। फिर वहाँ से उठकर चले आए।

इधर महर्षि मुद्‍गल के पास भोजन को अन्न नहीं रहा। वे पूरे एक पक्ष में दोने भर अन्न एकत्र करने को जुट गए। जब भोजन के समय देवता और पितरों का भाग देकर जैसे ही वे निवृत्त हुए, महामुनि दुर्वासा पूर्व की तरह कुटी में आ पहुँचे और फिर भोजन करके चले गए। मुद्‍गल जी पुन: परिवार सहित भूखे रह गए।

एक-दो बार नहीं पूरे छह माह तक इसी प्रकार दुर्वासा जी आते रहे। प्रत्येक बार वे मुनि मुद्‍गलजी का सारा अन्न खाते रहे। मुद्‍गल जी भी उन्हें भोजन कराकर फिर अन्न के दाने चुनने में लग जाते थे। उनके मन में क्रोध, खीज, घबराहट आदि का स्पर्श भी नहीं हुआ। दुर्वासा जी के प्रति भी उनका आदर भाव पहले की भाँ‍ति ही बना रहा।

महामुनि दुर्वासा आखिर में प्रसन्न होकर कहने लगे- महर्षि! विश्व में तुम्हारे समान ईर्ष्या व अहंकार रहित अतिथि सेवा कोई नहीं है। क्षुधा इतनी बुरी होती है कि वह मनुष्य के धर्म-ज्ञान व धैर्य को नष्ट कर देती है, लेकिन वह तुम पर अपना प्रभाव तनिक भी नहीं दिखा सकी। तुम वैसे ही सदाचारी और धार्मिक बने रहे। विप्रश्रेष्ठ! तुम अपने इसी शुद्ध शरीर से देवलोक में जाओ।'

महामुनि दुर्वासाजी के इतना कहते ही देवदूत स्वर्ग से विमान लेकर वहाँ आए और उन्होंने मुद्‍गलजी से उसमें बैठने की प्रार्थना की। महर्षि मुद्‍गल ने देवदूतों से स्वर्ग के गुण-दोष पूछे और उनकी बातें सुनकर बोले - 'जहाँ परस्पर स्पर्धा है, जहाँ पूर्ण तृप्ति नहीं और जहाँ असुरों के आक्रमण तथा पुण्य क्षीण होने से पतन का भय सदैव लगा रहता है, वह देवलोक स्वर्ग में मैं नहीं जाना चाहता।'

आखिर में देवदूतों को विमान लेकर लौट जाना पड़ा। महर्षि मुद्‍गलजी ने कुछ ही दिनों में अपने त्यागमय जीवन तथा भगवद्‍ भजन के प्रभाव से प्रभु धाम को प्राप्त किया।
सौजन्य से - देवपुत्र

शिष्य की लगन
यह कहानी है एक साधारण से व्यक्ति के झेनमेन की जो कि इतना सीधा था कि कोई भी उसे मारे तो वह पलटकर उन्हें कोई जवाब नहीं देता था। उसके इसी स्वभाव से सभी उसे मारते रहते, इस वजह से वह बेहद परेशान था। वह एक सुप्रसिद्ध कराटे गुरु के पास गया और कहा - क्या आप मुझे कराटे सिखाएँगे। उन्होंने कहा - मैं किसी भी ऐसे-वैसे व्यक्ति को कराटे नहीं सिखाता। वैसे भी झेनमेन बहुत ही गरीब परिवार से था। उन्होंने झेनमेन को कहा कि - मैं तुम्हें कराटे नहीं सिखा सकता। परंतु झेनमेन ने बहुत प्रार्थना की कि मुझे सीखना है। उसके बहुत कहने पर उन्होंने उसे अपने घर में पानी लाने का काम सौंपा और कहा कि इस काम को लगन से करना। वह काम लगन से करता था।

एक दिन वह पानी लेकर आ रहा था, कि पीछे गुरुजी ने उसे जोर का धक्का दिया और चले गए। उसने फिर से पानी भरा और पानी रखकर गुरुजी के पास गया और बोला कि गुरुजी मुझसे क्या गलती हो गई? जो आपने मुझे धक्का दिया। गुरुजी ने कहा - आगे से सावधान रहना। एक बार जब वह कपड़े सुखा रहा था तभी गुरुजी आए और उसको एक बाँस मार दिया। वह नीचे गिर गया फिर जल्दी-जल्दी अपना सारा काम किया। वह यह सब काम मन लगाकर करता था। फिर गुरुजी ने उसे रसोई घर का काम सौंप दिया।

वह रसोई घर में भोजन बनाने का काम करता था। उस समय भी जब वह भात बना रहा था। तभी गुरुजी आए और झेनमेन को उन्होंने जोर से धक्का दिया। तभी झेनमेन ने खुद को बचा लिया लेकिन उसके हाथों से भात का पात्र नीचे गिर गया। गुरुजी तो चले गए पर उसका एक और काम बढ़ गया। उसके बात वह सोता भी तो इतना सतर्क कि कोई मारे तो वह बच जाए।

एक बार जब वह रसोई घर की ओर जा रहा था तभी गुरुजी ने उसे एक जोरदार थप्पड़ मारना चाहा परंतु नहीं मार पाए क्योंकि झेनमेन ने हवा की सरसराहट से यह जान लिया कि कोई है और नीचे बैठ गया। अब वह हमेशा सतर्क रहता व अब सारे शिष्य कराटे सीखते तब वह सिर्फ बचने का तरीका सीखता था ताकि गुरुजी से बच सके। ऐसे ही एक साल पूरे हो गए। जब सभी शिष्यों को प्रमाण पत्र देने का समय आया तो सभी को प्रमाण पत्र मिले। उसके बाद देखा गया कि सबसे बड़ा योद्धा कौन है?

तो गुरुजी ने वहाँ झेनमेन को लाकर खड़ा कर दिया कि यह है सबसे बड़ा योद्धा। सब देखकर आश्चर्यचकित हो गए। सारे शिष्यों ने कहा - कि यह कैसे महान योद्धा है यह तो हमारे रसोई घर का नौकर है। तब गुरुजी ने दावा किया कि मेरे प्रिय शिष्यों इसको तुम आजमा सकते हो जिसने भी इसके शरीर को या किसी के भी शस्त्र ने अगर, इसको छू लिया तो समझो वही महान योद्धा है। सबने आजमाया पर सब हार गए।
सौजन्य से - देवपुत्र

साधो और माधो
एक छोटे से शहर में एक लालची नाई साधो रहता था। उसके पास किसी चीज की कमी नहीं थी। परंतु एक ही सपना देखता था कि वह किसी भी तरह अमीर बन जाए। उसी शहर में माधो नाम का एक गरीब व्यक्ति भी रहता था। वह प्रतिदिन नियम से भगवान शिव की पूजा करता था। माधो सिर्फ पूजा-पाठ ही नहीं करता था बल्कि वह अच्छा आदमी था। दूसरों की मदद के लिए वह हमेशा तैयार रहता था। एक बार उसे पैसों की बहुत सख्त जरूरत पड़ी। कहीं से भी पैसों का इंतजाम नहीं हो सका। माधो बड़ा परेशान रहने लगा। परेशानी वाले दिनों में ही एक रात सपने में माधो को भगवान शिव दिखाई दिए।

भगवान ने कहा कि माधो हम तेरे जैसे सच्चे भक्त से बड़े खुश हैं, कहो क्या चाहिए? माधो बोला- प्रभु मैं आनंद मैं हूँ, बस इन दिनों धन की ही थोड़ी जरूरत है। भगवान ने कहा- बस इतनी सी बात। कल सुबह तुम स्नान करके किसी नाई से अपना मुंडन करवाकर अपने घर के पास की झाड़ियों के पीछे छिप जाना। उस समय एक मोटा डंडा अपने हाथ में जरूर रखना। तुम्हारे पास से जो भी पहला व्यक्ति निकले उसे डंडा मार देना और वह सोने के ढेर में बदल जाएगा। सोने को पाकर तुम धनवान हो जाओगे और तुम्हारी तकलीफें दूर हो जाएँगी।

अगले दिन सुबह जागकर माधो ने वैसा ही किया। वह नहाकर पड़ोस में रहने वाले साधो नाई के पास गया और उससे मुंडन करवाकर अपने घर के पीछे झाड़ियों में छिप गया। लेकिन उसे पता नहीं था कि साधो नाई एक पेड़ के पीछे छुपकर उसे देख रहा है। दरअसल माधो को इतनी सुबह-सुबह मुंडन कराने आया देखकर साधो को आश्चर्य हुआ था। इसी का पता लगाने के लिए वह पेड़ के पीछे छुपकर माधो को देख रहा था। इधर जैसे ही पहला व्यक्ति वहाँ से गुजरा, माधो ने उसे डंडा मारा और वह व्यक्ति सोने के ढेर में बदल गया। यह सारी घटना लालची साधो ने देख ली।

डंडे की चोट से पहलवान के सिर में टेमला पड़ गया। पहलवान ने साधो के हाथ में डंडा देखा और उसकी हड्‍डी-पसली एक कर दी। पिटाई ऐसी उड़ी कि अगले महीने भर तक साधो बिस्तर पर पड़ा रहा। अगले दिन साधो नाई ने खुद ही अपना सिर मूँड लिया और अपने घर के पास ही एक मोटा डंडा लेकर खड़ा हो गया और उधर से गुजरने वाले किसी व्यक्ति का इंतजार करने लगा। अचानक किसी के आने की आवाज सुनाई दी और साधो तैयार हो गया। ठीक समय पर उसने निकलने वाले आदमी को जोर से डंडा मारा। डंडे की चोट जिसे लगी वह गाँव का पहलवान रामलाल था। डंडे की चोट से पहलवान के सिर में टेमला पड़ गया। पहलवान ने साधो के हाथ में डंडा देखा और उसकी हड्‍डी-पसली एक कर दी। पिटाई ऐसी उड़ी कि अगले महीने भर तक साधो बिस्तर पर पड़ा रहा। इस तरह लालची साधो को उसकी लालच का फल मल गया।

बच्चो, अच्छे बनो!

हर काम के लिए व्यक्ति के अंदर शक्ति का होना आवश्यक है। शक्ति दो प्रकार की होती है। शारीरिक तथा मानसिक। जो व्यक्ति जीवन में सफल होना चाहता है उसके शरीर और मन दोनों में शक्ति होना आवश्यक है। शरीर की शक्ति आती है शरीर को स्वस्थ रखने से और शरीर को स्वस्थ रखने से और मन की शक्ति आती है सत्य के आचरण से। शरीर और मन दोनों की शक्तियाँ जब तक व्यक्ति में हों तभी तक वह सच्चे अर्थों में शक्तिशाली कहलाने का दावा कर सकता है। दोनों में से केवल एक ही शक्ति रखने वाला व्यक्ति अपने जीवन में सफल नहीं हो सकता।

कालू नाम का एक लड़का था। वह रोज नियमपूर्वक कसरत करता था, अच्छी तरह खाता-पीता था। अपने स्वास्थ्‍य का बहुत ही ध्यान रखता था, किंतु न तो वह पढ़ता-लिखता था, न ही ज्ञान-चर्चा करता था। बड़ा होने पर वह शरीर से हट्‍टा-कट्‍टा तो हुआ, परंतु मानसिक बल उसके पास कुछ नहीं था। लोगों को मारपीट की धमकी देकर ही उनसे रुपया-पैंसा ऐंठ लेता था और उसी से अपना काम चलाता था।

ऐसा करते-करते एक दिन वह डाकुओं के दल में जा मिला। पुलिस के डर से भयभीत वह हमेशा अपने आप को छिपाए-छिपाए रहता था। शरीर में इतना बल रखते हुए भी उसे एक दिन पुलिस की गोली का शिकार होना पड़ा। क्या कालू को हम शक्तिशाली कह सकते हैं? नहीं, मानसिक बल न रहने के कारण उसका शारीरिक बल व्यर्थ ही नहीं गया, उसकी मृत्यु का कारण भी बना।

इसके विपरीत रामानुजम नाम का लड़का था। वह गणित में बहुत ही अधिक कुशल था। उसे केवल अपनी किताबों से ही प्रेम था। हिसाब बनाते-बनाते न उसे खाने-पीने की सुध रहती न अपने शरीर के आराम की। छोटी-सी उम्र में ही उसने बहुत कुछ जान लिया। यहाँ तक कि उसके एक अँगरेज प्रोफेसर उसे विश्वविख्यात कैंब्रिज विश्वविद्यालय में ले गए ताकि उसे गणित के अध्ययन में सुविधा हो। लेकिन निरंतर अवहेलना के कारण उसके शरीर का सारा बल जाता रहा था। उसे टीबी हो गई और 25 साल की आयु में उसकी मृत्यु हो गई। वह संसार को बहुत कुछ दे सकता था, किंतु शरीर के बल के अभाव के कारण उसका जीवन एक प्रकार से व्यर्थ हो गया।

इन दो उदाहरणों से स्पष्ट हो जाता है‍ कि शारीरिक और मानसिक बल एक-दूसरे के बिना निरर्थक हैं। शरीर में बल प्राप्त करने के लिए उसकी देखभाल बहुत आवश्यक है। जब तक बच्चा छोटा रहता है, उसका स्वास्थ्य की जिम्मेदारी उसके माता-पिता पर रहती है। बड़े होने पर अपने शरीर की देखभाल स्वयं करना बहुत आवश्यक है। आरंभ से ही ठीक आदतें डालनी चाहिए। समय से खानापीना, सोना, खेलना शरीर के स्वास्‍थ्‍य के लिए अनिवार्य है। इसके अतिरिक्त भोजन को रुचि तथा प्रेम से करना भी बहुत आवश्यक है।

स्वाद वस्तु में नहीं जीभ में होता है। स्वस्थ आदमी जब क्ष‍ुधा के साथ भोजन पर बैठेगा तो परोसी हुई हर अच्छी वस्तु खाने की आदत डालना बहुत अच्छा रहता है। खाने-पीने की कुछ चीजें अवश्य ही हानिकारक हैं - जैसे सड़े-गले फल, सड़क पर बिकने वाली खुली भोजन सामग्री, बिना धुली गंदी चीजें, तंबाकू शराब इत्यादि। इन चीजों से दूर रहना ही श्रेयस्कर है। इसके अतिरिक्त नियमित रूप से कसरत करना, टहलना भी स्वास्थ्य के लिए अनिवार्य है। शरीर भगवान की एक अनमोल देन है। उसे भगवान का वरदान मानकर हमेशा स्वस्थ, साफ-सुथरा और सुंदर रखना प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य है, तभी शरीर में बल रहता है और तभी व्यक्ति अपने जीवन के उद्‍देश्य की प्राप्ति के लिए पूरी तरह चेष्टा कर सकता है।

जो व्यक्ति शरीर की देखभाल नहीं करते, वे बहुत बड़ी भूल करते हैं। शरीर की देखभाल का स्थान प्रत्येक बुद्धिमान व्यक्ति की दिनचर्या में होना नितांत आवश्यक है।

स्वस्थ शरीर के बिना सफल जीवन की कामना करना व्यर्थ है। शरीर की शक्ति ही मन की विविध शक्तियों को कार्य रूप देने में सफल हो सकती है। स्वस्थ जीवन बल यही शरीर की एकमात्र शक्ति है, किंतु इसके विपरीत मन की शक्तियाँ ही कई प्रकार की होती हैं। उनके नाम हैं बुद्धि, दृढ़ता और कल्पना। ये शक्तियाँ सब व्यक्तियों में समान रूप से निहित नहीं होतीं, लेकिन न्यूनाधिक मात्रा में हर एक के पास विद्यमान रहती हैं। स्वस्थ मन वाला व्यक्ति यदि चाहे तो इनका और अधिक विकास भी सहज ही कर सकता है।

यह सच है कि मन के स्वास्थ्य के लिए शरीर का स्वस्थ होना आवश्यक है और साथ ही शरीर के स्वास्थ्य के लिए मन का स्वस्थ होना भी आवश्यक है। दोनों ही एक-दूसरे पर निर्भर हैं। मन सूक्ष्म है, उसकी देखभाल करना शरीर की देखभाल करने की अपेक्षा अधिक कठिन है। इसलिए पहले शरीर को स्वस्थ बनाकर ही मन के स्वास्थ्‍य पर ध्यान देना उचित है। स्वस्थ मन वह है जिसकी बुद्धि हमेशा अच्छी बातों की प्रेरणा देती है तथा निरंतर ज्ञान के पथ पर अग्रसर होने की चेष्टा करती है। स्वस्थ मन की दृढ़ता व्यक्ति को उत्साहित रखती है और उसे अपने हर काम को पूरा करने में मदद देती है। स्वस्थ मन की कल्पना व्यक्ति को ऊँचा उठाने और अधिक अच्‍छा बनने में सतत सहायता करती है।

अस्वस्थ मन को बुद्धि बुरी दिशा की तरफ ले जाती है। अस्वस्थ मन में दृढ़ता होती ही नहीं और अस्वस्थ मन की कल्पना सदा भयावह होती है। बुद्धि दूसरों की बुराई सोचती है। दृढ़ता न रहने के कारण अस्वस्थ मन वाला व्यक्ति कोई भी काम नहीं कर पाता। उसकी कल्पना उसे असफलता तथा पतन की तस्वीरें ही उसके आगे प्रस्तुत करती है।

अब प्रश्न उठता है कि मन को स्वस्थ कैसे रखा जाए? मन को स्वस्थ रखने के लिए दो बातें बिल्कुल ही आवश्यक हैं। भगवान में दृढ़ विश्वास और सत्य का आचरण। भगवान में विश्वास न रहने पर व्यक्ति का जीवन अव्यवस्थित हो उठता है। उसे पता नहीं चलता कि वह जीवित ही क्यों है? ऐसे प्रश्न मन में उठकर उसे अशांत बना देते हैं और उसकी बुद्धि उद्‍भ्रांत-सी रहती है।

भगवान में विश्वास रखने वाला व्यक्ति यह जानता है कि भगवान ने उसे बनाया है, उसकी आत्मा भगवान का ही एक अंश है। भगवान ने उसे संसार में एक खास उद्‍देश्य से भेजा है - वह सुखी रहे, ज्ञान प्राप्त करे और अपने प्राप्त किए हुए ज्ञान को संसार को अच्छा करने में काम में लाए। ऐसा सोचने वाले व्यक्ति का मन सदा प्रसन्न, सदा शांत रहता है और अपने आप में वह शक्ति का अनुभव करता है। जो व्यक्ति यह जान लेता है कि वह एक उद्‍देश्य से संसार में आया है वह कभी भी बुरा आचरण नहीं करता है। सत्य को अपने जीवन की धुरी बनाकर वह हमेशा कठिन काम करता है।

अपना कर्तव्य भली-भाँति निभाता है और उसका मन सशक्त और प्रफुल्ल रहता है। मन में शक्ति रहने के कारण वह व्यक्ति समाज में सदा प्रतिष्ठित रहता है। दूसरे लोगों का श्रद्धा-पात्र रहता है।

मन को स्वस्थ रखने के लिए मन पर नियंत्रण रखना भी बहुत आवश्यक है। आज के संसार में बहुत सारे व्यक्ति ऐसे मिलेंगे जो यह कहते हैं कि यदि भगवान ने हमें इच्छा, अभिलाषा, भावनाएँ, अनुभूतियाँ दी हैं तो हम उन्हें ‍छिपाकर क्यों रखें? मन जो कहे वही करना उचित है। ऐसा करने वाले लोग मन और प्रवृत्तियों के अंतर को स्पष्ट नहीं समझ सकते हैं। हम किसी के घर जाते हैं, वहाँ कोई बड़ी लुभावनी वस्तु यदि हमारे सामने आए तो क्या उसे हम उठा लेंगे? नहीं, प्रवृत्ति कहती है, 'वह हमारी हो जाए' लेकिन मन कहता है, नहीं, वह किसी और की है, हम उसे नहीं ले सकते। बीमार रहने पर कई बार हमारी जीभ, हमारा स्वाद चाहता है कि अमुक वस्तु खाएँ, लेकिन मन समझाता है, 'नहीं, यह ठीक नहीं। इसे खा लेने पर हम और अधिक बीमार हो जाएँगे।

पुस्तक 'बच्चो अच्छे बनो' से।

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