गुरुवार, 1 अप्रैल 2010

रिश्तों का ताना-बाना

वे जो बदल रहे हैं दुनिया
सेब पेड से टूट कर सन 1666 में कोई पहली बार जमीन पर नहीं गिरा था। सेब जबसे पैदा हो रहा है तभी से वह टूटने के बाद जमीन पर ही गिरता आ रहा है, कभी आसमान की ओर नहीं उछला। लोग सिर्फ सेब ही नहीं, आम-अमरूद आदि सभी फलों को टूटकर जमीन पर ही गिरते देखते आ रहे हैं और इसे ही उनकी नियति मानते आ रहे हैं। सभी सिर्फ इतना ही जानकर संतुष्ट रहे हैं कि ऐसा ही होता है। ऐसा क्यों होता है, यह सवाल न्यूटन से पहले किसी के मन में नहीं उठा। हालांकि न्यूटन के मन में जब यह सवाल उठा तो इसे किसी वैज्ञानिक जिज्ञासा के रूप में नहीं देखा गया, फितूर कहा गया। यह अलग बात है कि इसी फितूर के भीतर से सर आइजक न्यूटन यानी एक महान वैज्ञानिक का जन्म हुआ और आज गुरुत्वाकर्षण का आधारभूत सिद्धांत दुनिया की थाती है।
अगर सबकी तरह वे भी पेड से गिरते सेब को देखकर लपके होते और खाने के बाद निश्चिंत होकर खेलने में जुट गए होते तो? क्या आज गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत हमारे पास होता? शायद नहीं, या हो सकता है कि किसी और को ऐसा ही काम करना पडा होता। आम तौर पर हम यही सोचते हैं मुर्गी पहले आई या अंडा ऐसे चक्कर में पडने से क्या फायदा! आपने गौर किया होगा, बच्चे आज भी ऐसे ही सवाल करते हैं। अकसर हम इसे उनका भोलापन मानकर हंसते हैं और अपनी सीमित समझ के अनुसार कोई टालू सा जवाब दे देते हैं। कई बार तो हद ही हो जाती है, जब वे ऐसे सवालों की झडी लगा देते हैं। अकसर हम उन्हें बेवकूफ मान कर डांट देते हैं। यह सोचे बगैर कि इसका नतीजा क्या होगा। अकसर यही छोटी-छोटी बातें बच्चों के लिए कुंठा का कारण बन जाती हैं।

सफलता और समझ
हालांकि हम ऐसा करते यह मानकर हैं कि इसी में उनका भला निहित है। इन फालतू बातों में क्या रखा है! उन्हें अपने काम से काम रखना चाहिए। रट्टा मार कर अच्छे मा‌र्क्स लाने चाहिए। चाहे विषय को वे समझें या न समझें। क्योंकि आज जीवन के अधिकतर क्षेत्रों में सफलता मा‌र्क्स पर निर्भर है, बजाय समझ के। क्या यह आज की दुनिया का दुर्भाग्य नहीं है? खास तौर से तब जबकि हम यह बात अच्छी तरह जानते हैं और हजारों उदाहरण भी हमारे पास ऐसे हैं जिनसे यह साबित होता है कि दुनिया में कुछ खास वही कर सके हैं जिन्होंने लीक से हटकर सोचा है। सिर्फ दुनिया ही नहीं, अपनी स्थितियां भी वही बदल सके हैं जिन्होंने दुनिया को अपनी नजर से देखने का साहस जुटाया। अगर उन्हें परिजनों-मित्रों का सहयोग मिला तो उनके रास्ते थोडे आसान हो गए हैं, नहीं मिला तो थोडे मुश्किल और अगर सहयोग की जगह विरोध झेलना पडा तो थोडा ज्यादा मुश्किल। पर जिनके भीतर कुछ अलग कर गुजरने की आग होती है, उन्हें न तो विरोध की परवाह होती है और न मुश्किलों की। वे तो बस अपनी धुन में मगन होते हैं। बिना फल की चिंता किए सिर्फ कर्म का मजा लेते हैं। एक दिन जब मजे लेकर किया गया उनका कर्म रंग लाता है तो सब उन्हें सलाम करने खडे हो जाते हैं। तब वे माता-पिता, जिन्हें बच्चे की ऊटपटांग हरकतों के कारण ऐसा लगता है कि इसके भविष्य का क्या होगा, उन्हें पहले की गई अपनी हरकतों पर लज्जित होना पडता है। आखिर क्या वजह है इस स्थिति की? सिर्फ इतना कि हमें दिखता है बच्चे का जुनून और हम चाहते हैं उसकी सफलता। यह सोचे बगैर कि बिना जुनून के सफलता कैसे मिल सकती है और ऐसे काम के लिए वह अपने भीतर जुनून कैसे पैदा कर सकता है, जिससे उसका मिजाज नहीं मिलता!

भगत सिंह पैदा तो हों पर..
कहावत ही बन गई है, हर आदमी चाहता है कि भगत सिंह पैदा हों पर अपने घर नहीं, पडोसी के यहां। अकसर जब व्यवस्था या समाज की विसंगतियों पर बात होती है और उनमें बदलाव की जरूरत महसूस की जाती है तो हर भारतीय यह जुमला दुहरा देता है। जब हम यह बात कहते हैं तो हमारा भाव खिल्ली उडाने का जरूर होता है, पर खिल्ली हम सिर्फ व्यवस्था की ही नहीं, खुद अपनी हिप्पोक्रेसी, सोच व व्यक्तित्व के खोखलेपन और अपनी बेबसी की भी उडा रहे होते हैं। हालांकि दोहरे मूल्यों की यह मजबूरी कोई आज से नहीं, जमाने से चली आ रही है। आप क्या सोचते हैं कि युवा नरेंद्र ने जब अचानकविवाह न कर संन्यास लेने का फैसला किया तो उनके माता-पिता प्रसन्न हुए होंगे? जी नहीं, उन्हें भी झटका लगा था और नरेंद्र को भी दुनियादारी समझाने की कोशिश की गई थी। अगर उन्होंने समझ लिया होता तो आज न तो वे स्वामी विवेकानंद बन पाते और न भारतीय संस्कृति दुनिया के फलक पर गौरवपूर्वक खडी हो पाती। भगत सिंह जब खेतों में बंदूकें बोने की बात करते थे और चंद्रशेखर जब अपना नाम आजाद बताते थे तो उनके माता-पिता को भी उनके भविष्य की चिंता सताती रही होगी। बहुतेरे प्रतिभाशाली युवाओं का सपना आज भी प्रशासनिक अफसर बनना होता है, लेकिन सुभाष चंद्र बोस ने जब आईसीएस को दरकिनार कर आजाद हिंद फौज खडी करनी शुरू की होगी तो उनके परिजनों को भी कष्ट हुआ होगा। युवाओं को लोग अकसर यह भी समझाते हैं कि पहले अपने हालात देखो और फिर सपने बुनो। अगर यही सही तरीका है तो क्या लाल बहादुर शास्त्री भारत का प्रधानमंत्री या डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम राष्ट्रपति बनने के बारे में सोच सकते थे?

सीमाओं के आग्रह
ये सिर्फ कुछ उदाहरण हैं, घटनाएं तो ऐसी अनगिनत हैं। हम जानते हैं कि जिस किसी को भी बडा बनना है उसे कुछ अलग हटकर करना ही होता है। इसके बावजूद खुद इसके लिए हम तैयार नहीं होते हैं। जैसे ही अपने बच्चे ऐसा कुछ करने की दिशा में बढते हैं हमारी रूह कांप जाती है। हम यह तो चाहते हैं कि वे बडे बनें, पर यह बिलकुल नहीं सोच सकते कि वे लीक छोडें। हम चाहते हैं कि वे करें वही जो औसत दर्जे के लोग करते हैं। कमाएं, खाएं व मस्त रहें। दुनिया की फिक्र अपने सिर लेने से क्या फायदा! तमाम उदाहरणों और अनुभवों के बावजूद आखिर क्यों हम नहीं उबर पाते अपनी ही बनाई सीमाओं के आग्रह से?

बेशक इसका कारण कुछ हद तक व्यवस्था की विसंगतियां हैं। शिक्षा लगातार महंगी होती जा रही है और उसमें मूल्यांकन समझ के बजाय सिर्फ याद्दाश्त का हो रहा है। प्रतिस्पर्धा रुचियों और क्षमताओं के बजाय अंकों की हो रही है। बेकारी दुनिया भर में बहुत बडी समस्या बन चुकी है। इसके बावजूद हम यह भी तो देख रहे हैं कि जिनमें क्षमताएं हैं, वे वह सब हासिल कर रहे हैं जो चाहते हैं। यह सही है कि कुछ लोग गलत तरीकों से भी काफी कुछ हासिल कर ले रहे हैं, पर वस्तुत: इस तरह उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल करने वालों की संख्या बहुत कम है। बडी उपलब्धियां आज भी वही हासिल कर रहे हैं जो अपने चुने हुए क्षेत्र में पूरी रुचि रखते हैं और समर्पित भाव से काम कर रहे हैं। कहने को सभी यह बात जानते हैं कि किसी भी क्षेत्र में बडी उपलब्धि वे ही लोग हासिल कर पाते हैं जो अपने काम के प्रति पूरी तरह समर्पित होते हैं। लेकिन क्या यह भी कभी सोचा है कि ऐसे काम के प्रति किसी के मन में समर्पण का भाव आएगा कैसे जिसमें उसकी रुचि न हो?

दिशा दें, भटकाएं नहीं
कई बार जब हम अपने बच्चों या छोटे भाई-बहनों को उनके जुनून और उनकी रुचियों की परवाह किए बगैर अपनी इच्छानुसार कोई खास दिशा देने की कोशिश करते हैं, तब हम असल में उन्हें भटका रहे होते हैं। क्योंकि हमारी चुनी हुई दिशा हमारे लिए तो बेहतर हो सकती है, पर किसी दूसरे के लिए इसका सही होना जरूरी नहीं है। अधिकतर पेरेंट्स ऐसा अपनी अधूरी रह गई महत्वाकांक्षाएं पूरी करने के लिए करते हैं। यह देखे बगैर कि अपनी महत्वाकांक्षा अगर हम हासिल नहीं कर सके तो क्यों? कहीं ऐसा तो नहीं कि जो लक्ष्य हमने अपने लिए तय किया था, उसे पाने की हमारे अंदर सिर्फ चाहत थी, रुचि नहीं! कम से कम अप्रैल के महीने में तो आत्ममूल्यांकन की जोखिम उठाने जैसी भूल की ही जा सकती है!

पढाई में हो फन एलिमेंट
ऐसे लोगों की जरूरत दुनिया को हमेशा रहेगी जो लीक से हटकर कुछ नया कर रहे हों। पांच साल पहले एक दौर ऐसा आया था जिसमें सभी एक-दूसरे की कॉपी कर रहे थे। रीमिक्स का दौर था। मौलिकता कहीं दिख ही नहीं रही थी। फिल्में हों या धारावाहिक, रिपिटीशन सब तरफ था। तब भी दर्शकों को लीक से हटकर स्क्रिप्ट और फिल्म की जरूरत थी और आज भी है। धीरे-धीरे डायरेक्टर, प्रोड्यूसर और लेखक सबने इस दिशा में काम शुरू किया तो इधर दो साल से कुछ धारावाहिक और फिल्में अलग बननी शुरू हुई और लोगों ने उन्हें सराहा भी। लीक से हटकर काम करने वालों की अपनी अहमियत है। फितूर और शरारत में ही महान खोजें छिपी होती हैं। यह अलग बात है कि अपने समय में उनकी कद्र न हो। अब अगर आप हिंदी सिनेमा के महान कॅमेडियन केश्टो मुखर्जी को ही लें। वह शराबी की भूमिका में बहुत नजर आते थे। पर हीरो के बाद अगर कोई दूसरा किरदार याद रहता था तो वह केश्टो का ही होता था। उनका रोल भले ही छोटा और बेवकूफी वाली हरकतों से भरा होता था, पर वह लोगों को हंसा-हंसा कर पागल कर देते थे। उनके कंट्रीब्यूशन के बिना फिल्म पूरी नहीं हो सकती थी।

फितूर में जीने वाले लोगों में मुझे किशोर दा याद आते हैं। उन्होंने कभी कोई रूल फॉलो नहीं किया। न एक्टिंग की क्लास ली और न गायन सीखा, पर वैसा कोई दूसरा गायक नहीं हुआ। वह कहते थे कि दुनिया कहती है मुझको पागल, पर मैं हूं मस्तमौला।
एक खास माहौल या तबके में अगर कोई कुछ अलग सोच रहा होता है तो उसे बहुत कम लोग ही समझ पाते हैं। सोच को भौतिक सुख-साधनों तक ही सीमित रखने वाले ऐसे लोगों को कभी समझ नहीं पाते। शिक्षा प्रणाली भी इस बात को समझ नहीं पा रही है। फन आज कोर्स से गायब है। जबकि वह हर चीज में होना चाहिए। हमारे समय में सिर्फ एग्जाम की टेंशन होती थी, डिप्रेशन-टेंशन और प्रेशर जैसे शब्द हम नहीं जानते थे। आज के बच्चे का जीवन बिलकुल अलग है। एक छोटे से बच्चे को स्पो‌र्ट्स में भी अच्छा परफॉर्मेस दिखाना है, एक्स्ट्रा क्युरिक्युलर एक्टिविटीज में भी और साथ-साथ सभी विषयों भी। फिर मां-बाप के ख्वाब भी उस पर थोपे जाते हैं। इतनी चुनौतियों से जूझते हुए जब बच्चा आगे बढ रहा है, तो उसकी स्टडी में फन एलिमेंट डालकर ही तनाव को थोडा कम किया जा सकता है।

ज्ञान को केंद्र में रखना होगा
में जो भी सार्थक बदलाव हुए हैं उनके मूल में हमेशा कोई ऐसा शख्स रहा है, जिसे पहले झक्की-खब्ती या बेवकूफ.. आदि कहा गया। क्योंकि जो अपने समय से आगे की बात सोचता है, उसकी बात सबकी समझ में आती नहीं। सबका अपना-अपना नजरिया होता है। मां अपने ढंग से देखती है, पिता अपने ढंग से देखते हैं, रिश्तेदार और मित्र अपने ढंग से देखते हैं। कुछ लोग सिर्फ अपना हित देखते हैं तो कुछ पूरे समाज का। माता-पिता या करीबी रिश्तेदार किसी को धारा के विरुद्ध जाते इसलिए नहीं देखना चाहते क्योंकि वे उसके निजी हितों को लेकर चिंतित होते हैं। समाज को वह क्या देकर जाएगा, यह उनके लिए महत्वपूर्ण नहीं होता।

मैंने अपनी जिंदगी में न तो खुद के संबंध में कभी इसकी परवाह की और न बच्चों के लिए। साहित्य के तमाम मठाधीशों के प्रबल विरोध के बावजूद मैंने वही रचा जो रचना चाहा। इसके लिए अकसर मुझे पागल ही समझा गया। रही बात बच्चों की तो मैं अपने बच्चों को भगत सिंह बनने के लिए कह तो नहीं सकता, पर अगर कोई बनना चाहे तो उसे रोकूंगा भी नहीं। क्योंकि इसके लिए एक इंस्टिंक्ट जरूरी है। जिसमें वह आग होगी, उसे रोका भी नहीं जा सकेगा। वैसे यह सही है कि कोई भी व्यक्ति अपने बेटे के ऐसे निर्णय पर कभी खुश नहीं हुआ होगा। विवेकानंद ने जब युवावस्था में विवाह के बजाय संन्यास का फैसला किया तो उनकी मां भी इससे प्रसन्न नहीं हुई। हर मां अपने बच्चे को सुखी देखना चाहती है और बेटे के लिए भी सुख की परिभाषा उसकी अपनी होती है।
आज की जो शिक्षा पद्धति है, वह बच्चे के भीतर उसकी मौलिकता के विकास को रोक रही है। यह शिक्षा पद्धति सिर्फ याद्दाश्त का ही मूल्यांकन करती है। विवेक जागृत होने का मौका ही नहीं देती। हमारी प्राचीन गुरुकुल पद्धति विवेक को जागृत करने पर ही ध्यान देती थी। आज पढाई रिजल्ट ओरिएंटेड हो गई है। लोग ज्ञान के लिए नहीं पढ रहे हैं, डिग्री के लिए पढ रहे हैं और उसका अंतिम उद्देश्य आजीविका है। अगर बिना पढाई किए डिग्री मिल जाए तो 90 प्रतिशत लोगों को पढाई की जरूरत महसूस नहीं होगी। ठीक यही हाल आगे भी होगा। अगर बिना डिग्री के नौकरी मिल जाए तो डिग्री भी नहीं चाहिए और अगर बिना नौकरी के वेतन मिल जाए तो नौकरी भी नहीं चाहिए। इस मानसिकता से उबरने की जरूरत है। ज्ञान को केंद्र में रखना होगा।

बदलाव जरूरी है
सीमा बिस्वास, अभिनेत्री
मैं इस मामले में बेहद लकी रही कि मुझे मेरे घर में कभी किसी ने कुछ भी करने से रोका नहीं। मेरे पेरेंट्स का मुझ पर इतना विश्वास था कि मैं जो कुछ भी करूंगी, ठीक ही करूंगी। इसलिए मुझे इस मामले में कभी संघर्ष नहीं करना पडा। मैंने हमेशा वही किया जो करना चाहा और हमेशा अपने मन की सुनी। इस तरह बहुत कुछ अपने-आप लीक से हटकर बिलकुल अलग होता गया। हालांकि जब मैंने वे काम करने चाहे तब ऐसा कुछ खास सोच कर नहीं किया था। फिल्मों का चयन भी मैं ऐसे ही करती हूं। अभी मैं जो फिल्म कर रही हूं सिटी ऑफ गोल्ड वह भी इस नजरिये से अलहदा है। यह कल्पना की दुनिया से बिलकुल अलग सीधे हकीकत की कहानी है। इस तरह देखें तो यह बिलकुल क्रांतिकारी फिल्म होगी। इसके पहले बैंडिट क्वीन के साथ भी कुछ ऐसा ही था।
मैं जानती हूं कि इसमें काफी जोखिम उठाना पडता है। जो भी ऐसा करता है उसे कीमत चुकानी पडती है। इसके बावजूद यह सच है कि समाज को ऐसे ही लोगों की सबसे ज्यादा जरूरत है। बहुत लोग ऐसे प्रयासों का विरोध करते हैं, पर कुछ लोग तारीफ भी करते हैं। दुनिया को अब तक जो कुछ भी दिया है, ऐसे ही लोगों ने दिया है। इसके बावजूद जब छोटे-छोटे बच्चे मौलिक ढंग से कुछ करने की कोशिश कर रहे होते हैं तो उन्हें तमाम तरह की टोकाटाकी झेलनी पडती है। इसके लिए बहुत हद तक तो हमारा वैल्यू सिस्टम जिम्मेदार है और किसी हद तक एजूकेशन सिस्टम भी। दूसरे देशों की तुलना में देखें तो हम इस मामले में काफी पीछे छूटते जा रहे हैं। हमें अपने एजूकेशन सिस्टम को ऐसा बनाना होगा कि जो बच्चों को उनका एक स्वतंत्र व्यक्तित्व दे सके। मीडिया भी इसमें बहुत अच्छी भूमिका निभा सकती है।

सभी ने उठाए सवाल
1982 में मुझ पर यह आरोप लगा कि मैं अपने देश के लिए नहीं, दूसरे देश के लिए खेल रहा था। सभी ने सवाल उठाए। बेजोड मेहनत, बस में कंडक्टरी, ट्रेन के टॉयलेट एरिया में बैठकर सफर तक..सब कुछ किया था मैंने भारतीय हॉकी टीम में शामिल होने के लिए। अपने सबसे बुरे सपने में भी मैंने ये नहीं सोचा था कि जिस खेल को मैंने अपना सब कुछ दिया, उससे मुझे बेगाना कर दिया जाएगा। लेकिन मैंने हार नहीं मानी। टीम से निकाले जाने के बावजूद रोजाना ग्राउंड पर जाता रहा। घंटों सिर्फ देखता रहता था। मेरे जुनून को मेरे साथी खूब समझते थे और उन्होंने ही मुझे हॉकी से इतने साल जोडे रखा। सोलह साल तक हॉकी से दूर होते हुए भी मेरा उससे रिश्ता बना रहा। कोच के रूप में मुझे मौका मिलने लगा। मेरे दोस्त ज्योति कुमारन ने बहुत साथ दिया। हॉकी फेडरेशन के सेक्रेटरी जनरल बने तो उन्होंने मुझे मेल हॉकी टीम का कोच बनाया। यही मेरे लिए टर्निग प्वाइंट था। हमने बहुत मेहनत की और 1998 के एशियन गेम्स में भारत को गोल्ड दिलाया। खुशी का वह एक पल मेरी सोलह वर्षो की गुरबत पर भारी था। उसके बाद लोगों का मुझ पर दोबारा विश्वास जगा और लोगों ने समझा कि मैंने कोई गद्दारी नहीं की। उसके बाद मैं फीमेल हॉकी टीम से भी जुडा और सफलता के नए आयाम देखे। मेरा जुनून सभी मुश्किलों पर भारी पडा। फिर यशराज ने मेरी सच्चाई पूरी दुनिया को चकदे इंडिया के रूप में दिखाई। हॉकी का यह पैशन मैंने अपने बच्चों में भी डालना चाहा, पर सफल नहीं हुआ। मेरा बडा बेटा, जो अब इस दुनिया में नहीं है, कुकरी का शौकीन था। जो मुझे सख्त नापसंद था। छोटा बेटा हॉकी का अच्छा खिलाडी रहा, पर वह एमबीए की राह पर चल पडा। अब मुझे ग्लानि होती है कि मेरे बच्चे शायद मेरे दबाव के कारण ही इस राह पर नहीं चले। आज अगर मेरा बडा बेटा वापस आ जाए तो मैं उसे उसकी मर्जी पर चलने से नहीं रोकूंगा। मैंने अपने पिता का सपना पूरा किया, क्योंकि मेरा भी वही सपना था। मैं यह समझ नहीं पाया कि मेरे बच्चों के सपने जुदा हैं। बुरा लगता है कि मैंने शुरुआती दिनों में उनका साथ नहीं दिया, पर अब मैं उनके साथ हूं। बच्चों पर प्रेशर डालने से वे अकसर अपनी रुचि भी छोड देते हैं।

किंग होते हैं ऐसे लोग
जब दिमाग में गलत किस्म का फितूर होता है तो खतरनाक हो जाता है। लेकिन अगर सही दिशा में हो तो आविष्कार बन जाता है। आज ही नहीं, पहले भी ऐसे लोगों की दुनिया में जरूरत थी। उन्हीं के योगदान के कारण आज हम लैविश लाइफ जी रहे हैं। समझदार लोग ऐसे लोगों की कद्र भी करते हैं। दिमाग में खुराफात का संतुलन जरूरी है। क्योंकि यह जरूरत से ज्यादा हो तो समाज के लिए नुकसानदेह हो सकता है और संतुलित हो तो महान खोज भी कर सकता है। मस्तमौला अपना काम करता रहता है। उसे दुनिया से कोई लेना-देना नहीं होता है। मैं लीक से हटकर कुछ करने वालों का सम्मान करती हूं। ऐसे लोग मस्तमौला होते हैं। मैं मुंबई में एक प्ले कर रही हूं टाइम पास नाम से। उसमें एक ऐसा ही किरदार है। फितूर से भरा कुछ अलग किस्म का। बिलकुल इडियट किस्म का रोल करती है वह औरत। ऐसे लोग बहुत अच्छे होते हैं। जो बच्चे या लोग किसी बात पर अधिक सवाल करते हैं, या कुछ ऐसा पूछ बैठते हैं जो आपने पहले कभी सोचा न हो तो लोग उन्हें इडियट का दर्जा देने लगते हैं। यह गलत है। ऐसे में इडियट वे नहीं, बल्कि उन्हें कहने वाले ही होते हैं।
शिक्षा प्रणाली को मैं पूरी तरह दोषी नहीं मानती। बच्चे पर हर तरफ से प्रेशर है। हमारी मम्मी कहानियां सुनाकर, खेल-खेल में जाने कितनी चीजें सिखा दिया करती हैं। आजकल मां-बाप दोनों व्यस्त हैं। उनके पास अपने बच्चे के लिए क्वालिटी टाइम कम ही होता है। स्कूल का टाइम लंबा, कोर्स अधिक और अपेक्षाएं दुगनी होती हैं। ऐसे में अगर सब कुछ फन के साथ किया जाए, या फिर दबाव के बिना किया जाए तो परिणाम अच्छा हो सकता है।

गंभीर फलसफे को नहीं मानता
प्रवाह के साथ जो तैरते हैं उन्हें अमूमन लोग अक्लमंद मानते हैं और जो धारा के विरुद्ध बहते हैं उन्हें बेवकूफ माना जाता है। फिर भी धारा के विरुद्ध जाने वालों की कोई कमी समाज में कभी नहीं रही है। मैं भी शायद उन्हीं बेवकूफों में एक हूं..। मैं दुनिया की बनाई लकीरों पर नहीं चला, वही किया जो मेरे दिल ने कहा। मेरी अब तक की जिंदगी कभी समतल राहों से नहीं गुजरी। शुरू-शुरू में मुझे अकसर मेरे अपनों और बेगानों ने भी इडिअट का ताज पहनाया, पर मेरी सोच नहीं बदली। मुझे लगता है कि मेरे जैसे सरफिरे लोगों की तादाद बहुत बडी है। हर इंसान जो भी जिंदगी में बनता है, वो वैसा क्यों बना, इसके पीछे कोई तो लॉजिक होती है।

मैंने कोई अहम निर्णय जान-बूझकर नहीं लिया। न कभी यह सोचा कि मुझे लोगों के विपरीत जाना है या लीक से हटकर कुछ नई राह लेनी है। बस इतना है कि मुझे खुद जब जो कदम उठाना सही लगा, मैंने वही उठाया। न तो मेरे प्रवाह के विरुद्ध जाने वाले निर्णय जबर्दस्ती के फंडे थे, न कभी ऐसा ही लगा कि मेरे खयाल तो क्रांतिकारी हैं और न कभी यह सोचा कि कल मेरा क्या होगा।

मेरे व्यावसायिक और निजी जीवन के लगभग सारे मामले ऐसे ही लिए-गए। जो सोचा न था, करता गया। कहीं न कहीं महसूस होता रहा कि मेरे भीतर कुछ है- उसी को क्रिएटिव अर्ज कहते हैं, यह खबर नहीं थी मुझे। रीडिंग भी खूब की। पर मुझ पर कार्टून कैरेक्टर स्पायडरमैन का कुछ ज्यादा ही असर है। यह स्पायडरमैन हजारों तकलीफों से जूझता है, पर वह सब कर गुजरता है जो चाहता है। मैं जीवन के गंभीर फलसफे को नहीं मानता।

पेरेंटिंग को लेकर मुझे लगता है, अपने देश में कुछ ज्यादा ही हंगामा होता चला आ रहा है। मेरा खयाल है कि 5 साल तक के बच्चों को तो सिखाना पडता है, पर इसके बाद सिर्फ गाइड करें। बच्चों को करिअर के बारे में जितनी नसीहत न दें, उतना ही अच्छा। वैसे फ्रेंडली एडवाइस को कोई भी बुरा नहीं मानता। जहां तक सुधार की बात है, उसकी जरूरत शिक्षा ये ज्यादा समाज व्यवस्था को है। कभी-कभी लगता है कि गाइडेंस की जरूरत पेरेंट्स को है, बच्चों को नहीं।

धारा के खिलाफ ही चल रहा हूं
कला-क्षेत्र में आना ही हमारे समाज में धारा के विपरीत बहना होता है। मेरे परिवार में कला का माहौल नहीं था। घर वाले चाहते थे कि चार्टर्ड एकाउंटेंट बनूं, सो कोर्स किया। दो साल काम भी किया और मुंबई के एक कॉलेज में पढाया भी। पर मेरी रुचि शास्त्रीय नृत्य में थी, मैंने भरतनाट्यम सीखा। हमारे परिवार में किसी पुरुष का नृत्य सीखना अजीब समझा जाता था। फिर भी मैंने नृत्य में ही रिसर्च शुरू की। शुरू से ही धारा के खिलाफ चला। बहुत मुश्किलें आई, विरोध भी झेलना पडा। आर्ट क्रिटिक होना तकलीफदेह है। आलोचना में निष्पक्ष होकर लिखना जरूरी है, पर यह क्षेत्र दोस्तों को भी खिलाफ कर देता है कई बार।

कुछ भी नया करने के लिए जोखिम उठाना जरूरी है। बिना खोए कुछ पा नहीं सकते।

वैसे मेरी कला मुझे आक्रामक नहीं बनाती। मैं गांधी के आदर्शो पर चलना पसंद करता हूं। सत्यं वद, प्रियं वद.. मेरा आदर्श वाक्य है। हालांकि ऐसा व्यवहार में मुश्किल होता है। मैं कला समीक्षक हूं, लेकिन अगर कुछ अच्छा देखता हूं तो उसे खुलकर सराहता भी हूं। कला की खूबी यही है कि यह बहुत से राग-द्वेष से मुक्त करती है। यह अलग बात है कि आज नृत्य में भी सभी को पुरस्कार चाहिए, विदेश भ्रमण चाहिए। ऐसा नहींकि पुरस्कार मिलना अच्छा नहीं, पर उसके लिए लालायित रहना ठीक नहीं। अच्छा काम करते रहें तो पहचान मिलती ही है। यामिनी कृष्णामूर्ति, कमला देवी चट्टोपाध्याय, मृणालिनी साराभाई, मल्लिका साराभाई, रुक्मिणी देवी, बिरजू महाराज जी जैसे तमाम लोगों ने मुझे बहुत मार्गदर्शन दिया और मैंने अपनी राह बना ही ली। मैंने शादी नहीं की, इसलिए मेरे घर में कोई आइंस्टाइन या चार्ली चैप्लिन पैदा होता तो कैसा महसूस करता, नहींबता सकता। वैसे हर बच्चे को अपना सपना पूरा करने का हक है। शिक्षा व्यवस्था में कला-संस्कृति को महत्व देना जरूरी है। शिक्षा कभी बोझ नहीं बननी चाहिए। उसे सहजता से विद्यार्थियों तक पहुंचना चाहिए। यह तभी संभव है, जब उसमें रैट रेस के बजाय थोडा सा इंसान बने रहने की गुंजाइश हो।

मैं भी बुद्धू हूं
हर दूसरे जीनियस आदमी के जीवन का यह दुखद सच है कि वह चाहता कुछ था, पर हुआ कुछ और। सेब गिरते न्यूटन ने देखा. पर क्या उनके नन्हे दिमाग में यह बात आई होगी कि उन्हें वैज्ञानिक बनना है? मेरे पिता चिंतामणि किरकिरे और मां निलांबरी दोनों क्लासिकल सिंगर हैं। संगीत की रुचि मुझे विरासत में मिली। क्लासिकल संगीत की शिक्षा भी मैंने ली। माता-पिता आश्वस्त थे कि मैं बडा होकर क्लासिकल सिंगर बनूंगा। मैं जैसे-जैसे बडा होता गया, पता नहीं कैसे मुझमें एक्टिंग की चाह पैदा हो गई। मैंने कॉमर्स में इंदौर में ही डिग्री ली, फिर 1993 में एनएसडी आ गया। वहां से पास होने के बाद मुझे कोशिश तो एक्िटग के लिए करनी चाहिए थी। पर कनफ्यूजन की हद तब हो गई जब तीन साल तक वक्त, पैसा और मेहनत सब लगाने के बाद मैं फिर सोचने लगा कि अब करें क्या? इसी उधेडबुन में मुंबई आया। फिल्म निर्देशक सुधीर मिश्रा से मुलाकात हुई और उन्हें असिस्ट करने लगा। मेरे पिताजी ने मुझे पूछा, बेटा स्वानंद तू आखिर करना क्या चाहता है जिंदगी में?

उनके सवाल का मेरे पास कोई जवाब नहीं था। मैं अपना ही गीत- बावरा मन.. गुनगुनाया करता था। उन्होंने उस गीत को सुनते ही फिल्म में ले लिया और तबसे इस नाचीज का जन्म गीतकार के रूप में हुआ। फिर क्या, सुधीर मिश्रा के दोस्त प्रदीप सरकार ने मुझे परिणीता के गीत लिखने की जिम्मेदारी दी। प्रयोग के इरादे से मैंने हां कह दिया। परिणीता के गीत पॉपुलर हुए और मुझ पर उभरते गीतकार का ठप्पा लगा। फिर बंदे में था दम गीत से राष्ट्रीय पुरस्कार तक बात पहुंची। जो मैंने और मेरे माता-पिता ने नहीं सोचा, वो होता गया। मैं किसी भी शिक्षा पद्धति पर कोई फब्तियां नहीं कसना चाहता। न तो एजूकेशन सिस्टम में कमी है, न अभिभावकों की सोच में। बच्चा हो या युवा, वही करना चाहता है जो उसे करना चाहिए। वैसे माता-पिता की निगाहों में मैं भी बुद्धू हूं। क्या करें? अकसर इडिअट्स अच्छा काम कर लेते हैं। दुनिया का यही दस्तूर है।

रिश्तों का ताना-बाना
मीरा और मुजफ्फर अली वैन ह्यूजेन इंडिया मेंस फैशन वीक के दौरान मजफ्फर अली बड़े बेचैन से दिख रहे थे। शो का इतना टेंशन मजफ्फर अली साहब के चेहरे पर पहले कभी नहीं दिखा। परेशानी का स्तर ये कि वे कई बार भीड़ से बचने के लिए वेन्यू के बाहर भी अकेले खड़े दिखे। जब उनसे उनकी बेचैनी की वजह पूछी तो बता दिया कि मीरा की तबीयत नासाज है और यह कलेक्शन उन्हें अकेले पेश करना पड़ रहा है। कुछ यही है उनके रिश्ते की गहराई जो उनके खूबसूरत कोटवारा कलेक्शन के बारीक काम में भी साफ दिखती है। अगर कहें कि कोटवारा मीरा और मजफ्फर अली के प्रेम का वास्तविक स्वरूप है तो गलत नहीं होगा। यह कपल बड़े प्यार से एक-दूसरे की कमियों को पूरा करते हुए कपड़े डिजाइन करते हैं। इनके साथ बातचीत के कुछ अंश पेश हैं आप दोनों अलग किस्म के क्रिएटिव बैकग्राउंड्स से हैं। आप किस तरह सामंजस्य बिठाते हैं? मुजफ्फर- मेरा मानना है कि जब तक दो लोगों के बीच अहं नहीं आता और वे एक-दूसरे की संवेदना को अछी तरह समझते हैं, तब तक वे एक साथ काम कर सकते हैं चाहे वे किसी भी बैकग्राउंड से क्यों न हों! मीरा - हम दोनों एक-दूसरे के पूरक के तौर पर काम करते हैं। जब हम कपड़े डिजाइन करते हैं, मुजफ्फर स्केचिंग करते हैं और मैं उनके स्केचेज को सिलुएट्स में तब्दील करती हूं। कई बार मजफ्फर इतने ज्यादा क्रिएटिव हो जाते हैं कि हमारे डिजाइंस की कॉमर्शियल वैल्यू फीकी पड़ जाती है, तो मैं उन्हें वहां रोकती हूं। एक-दूसरे को संतुलन देते हुए हम कोटवारा पर काम करते हैं। क्या कभी आप दोनों में डिजाइंस को लेकर मतभेद होते हैं? मुजफ्फर - हां, कई बार। जब दो दिमाग मिलेंगे तो कहीं-न-कहीं तो मतभेद होंगे ही, लेकिन हम दोनों बीच का रास्ता ढूंढ लेते हैं। मीरा- हम दोनों का एक ही मकसद है- सर्वश्रेष्ठ प्रस्तुत करना। अगर मतभेद हो जाएं तो हम बात करके मसले को समझते हैं और जो बेहतर होता है, वही करते हैं। क्या एक की कमी दूसरे को खलती है? मुजफ्फर- मेंस फैशन वीक के दौरान मैंने मीरा को बहुत मिस किया। एक तो उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं था, दूसरे वे बैकस्टेज आती भी नहीं। यह पहला मौका था जब मीरा एक खास माके पर मेरे साथ नहीं थीं और मैं मानता हूं कि मैं अधूरा-सा महसूस कर रहा था। मीरा- हम दोनों पर्सनली और प्रोफेशनली इतना करीब हैं कि अगर जुदा हों तो कमी जरूर महसूस होती है।

परवेश-जय
कॉलेज की मस्ती अगर जिंदगी भर आपके जीवन का हिस्सा बनी रहे तो कहने ही क्या! डिजाइनर जोड़ी परवेश और जय की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। निफ्ट चंडीगढ़ के ये दो पासआउट आज अपनी दोस्ती के सहारे फैशन जगत का एक जाने-माने नाम बन चुके हैं। वो दिन और थे जब परवेश सीनियर होने के नाते जय की टांग खींचने का एक मौका भी नहीं गंवाते थे, लेकिन आज दोनों एक-दूसरे की राय का पूरा सम्मान करते हैं, चाहे वह निजी जिंदगी हो या प्रोफेशनल। कॉलेज की दोस्ती बिजनेस पार्टनरशिप में कैसे बदली? जय - हम दोनों एक-दूसरे का साथ इतना ज्यादा एंजॉय करते थे कि हमने साथ ही काम करना बेहतर समझा। आज हमारी जिंदगियां कुछ इस तरह हैं कि हम एक जैसा हीसोचते हैं। हमारे घर पास-पास ही हैं तो हम कई बार एक-दूसरे के घर में ही रह जाते हैं। हम वार्डरोब तक शेयर करते हैं। इन नजदीकियों का असर हमारे कलेक्शन में दिखता है। परवेश- जय के साथ काम करने का निर्णय कॉलेज के दिनों में ही ले लिया था। डिजाइनिंग से उसका प्यार और उसकी निष्ठा का स्तर मुझसे भी ज्यादा है। हमारी दोस्ती को हमारे परिवारों ने भी बहुत सपोर्ट किया। जय खाने का बहुत शौकीन है। मेरी मां उसके आने से पहले उसकी पसंद का खाना तैयार करवाती हैं। मेरे पापा से भी वह बहुत घुला-मिला है। मुझसे ज्यादा वह जय से बात करते हैं। हमारी पत्नियां भी एक-दूसरे की अच्छी दोस्त हैं। यही वजह है कि हमारी केमिस्ट्री एक अच्छे वर्क रिलेशन में तब्दील हो सकी। क्या कभी आप दोनों में डिजाइंस को लेकर मतभेद होते हैं? जय- बहुत बार। लेकिन हम दोनों ने इसका एक आसान रास्ता निकाल लिया है। डिजाइनिंग तो हम दोनों एक साथ करते हैं, लेकिन प्रोडक्शन और मार्केटिंग का डिपार्टमेंट हमने बांट लिया है। मैं प्रोडक्शन देखता हूं और वह मार्केटिंग। हम दोनों एक-दूसरे के इनपुट्स लेते हैं और एक-दूसरे की राय का सम्मान करते हैं। परवेश- मतभेदों का तो पूछिए मत! कई बार तो झगड़े काफी दिनों तक चलते हैं, लेकिन हम दोनों एक राय जरूर बना लेते हैं। या फिर दोनों ऑप्शंस छोड़कर तीसरा विकल्प तलाशते हैं। मुझे याद है जब हम अपना स्टूडियो डिजाइन कर रहे थे तो जय लाल रंग के पीछे पड़ा था और मैं काला लगवाना चाहता था। हम दोनों में कई दिन इसे लेकर झगड़ा रहा और हम दोनों अपनी-अपनी बात पर अड़े रहे। न जाने कहां से जय ने पिंक का सुझाव दिया और मुझे वो पसंद आ गया। आज हम अपने निर्णय से बहुत खुश हैं क्योंकि पिंक वाकई बहुत खूबसूरत लगता है। क्या कभी एक-दूसरे को स्ट्रेस का टारगेट बनाते हैं? जय- स्ट्रेस का टारगेट तो नहीं, लेकिन हम में से एक भी तनाव में होता है दूसरा स्थिति संभालता है। परवेश- हमारी अच्छी बात है कि हम एक-दूसरे को 'फॉर-ग्रांटेड' नहीं लेते। शो से पहले तो हम दोनों ही नर्वस होते हैं लेकिन एक-दूसरे को संभालते हुए हम शो को सफल बनाने की पूरी कोशिश करते हैं।

अंजना और अंकिता भार्गव
बेटी को बिजनेस पार्टनर बनाने का निर्णय लेने में अंजना को समय लगा, लेकिन अंकिता का डिजाइनिंग के प्रति कमिटमेंट कुछ इस स्तर का था कि उन्हें मानना ही पड़ा। जिस बच्चे को डिजाइनिंग का ककहरा सीखते देखा हो, उसके साथ डिजाइनिंग के कॉन्सेप्ट्स पर बहस करना एक अजीब लेकिन बड़ा ही खूबसूरत अनुभव है अंजना के लिए। घर की चहारदीवारी में भले ही मां-बेटी की मर्यादाएं हों, लेकिन स्टूडियो में अंजना और अंकिता एकदम प्रोफेशनल रहती हैं। कब तय किया कि एक-दूसरे के साथ काम करना है? अंजना- अंकिता लंदन में अपना फैशन डिजाइनिंग का कोर्स करने गई। उसके बाद उसने बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन का कोर्स किया। उस समय तक मुझे नहीं पता था कि अंकिता और मैं कभी साथ काम करेंगे। सच कहूं तो मुझे यकीन भी नहीं था कि अंकिता कभी डिजाइनिंग में हाथ डालेगी। लेकिन वापस आकर अंकिता ने काम में दिलचस्पी दिखाई। एक दिन उसने कहा कि वो मेरे साथ अपना लेबल लॉन्च करना चाहती है। मन में मैं श्योर नहीं थी, लेकिन उसने मुझे बोला तो मैंने हामी भर दी। अंकिता को उसका टारगेट पता था। उसने पूरी तन्मयता से अपने लेबल पर रिसर्च किया और मुझे कनविंस किया कि वह मेरी बिजनेस पार्टनर बनने के लिए तैयार है। अंकिता- बचपन से ही मैं मम्मी को डिजाइनिंग करते देखती थी और सोचती थी कि एक दिन मैं भी ऐसा ही कुछ करूंगी। डिजाइनिंग के मामले में मैंने मम्मी से काफी कुछ सीखा है, लेकिन हम दोनों का काम करने का स्टाइल एकदम अलग है। मम्मी पहले फैब्रिक वगैरह चूज करके डिजाइन करती हैं, लेकिन मैं पहले डिजाइन करती हूं, उसके बाद गारमेंट के फैब्रिक आदि के बारे में सोचती हूं। क्या कभी आप दोनों में डिजाइंस को लेकर मतभेद होते हैं? अंजना- बिलकुल। हम दोनों स्टूडियो में प्रोफेशनल की तरह रहते हैं। हम एक-दूसरे की राय का सम्मान करते हैं। अंकिता की आदत है कि वह बहुत रिसर्च करती है, जिसका फायदा हमें मिलता है। अंकिता- हम लोगों में बहस होती है, लेकिन अच्छी बात है कि इससे हमारे क्रिएशंस को बहुत फायदा होता है। हम एक-एक चीज की डीटेलिंग पर काम करते हैं, जिससे हमारे कलेक्शन में बहुत फायदा होता है। फैशन शो के दौरान स्ट्रेस का क्या स्तर होता है? अंजना- स्ट्रेस होता है, लेकिन मन में इस बात का संतोष होता है कि कोई है जो संभाल लेगा। अंकिता- स्ट्रेस तो बहुत ज्यादा होता है, लेकिन कॉन्फिडेंस बना रहता है कि मम्मी साथ में हैं।

आशिमा-लीना
आशिमा-लीना का नाम आज ब्रैंड की तरह बिकता है। इसके पीछे है उनकी कड़ी मेहनत, लगन और एक अनूठा रिश्ता। ननद-भाभी का रिश्ता आमतौर पर लोगों के गले नहीं उतरता, लेकिन जब जिक्र आशिमा-लीना का हो तो इस रिश्ते के मायने पूरी तरह बदल जाते हैं। उनके बीच के रिश्ते को परिभाषित करना उतना आसान नहीं, लेकिन उनके कलेक्शन में उनके रिश्ते की ताकत साफ नजर आती है। आप दोनों का बैकग्राउंड एकदम अलग है, लेकिन आपकी डिजाइनिंग में यह अंतर नजर नहीं आता आशिमा- आशिमा-लीना ब्रैंड डिजाइनिंग और मार्केटिंग टिंग के प्रयासों का नतीजा है। मैं डिजाइनिंग करती हूं और लीना मार्के टिंग। हम दोनों एक-दूसरे के कामों में बिलकुल हस्तक्षेप नहीं करते। लीना अपना जिम्मा संभालती हैं और मैं अपने काम पर ध्यान देती हूं। जरूरत पड़ने पर दोनों एक-दूसरे का पूरा सहयोग करते हैं। लीना- रिश्ता कोई भी हो, यदि आपस में भरोसा और एडजस्टमेंट न हो तो उसमें प्यार नहीं रह सकता। हम दोनों को पता है कि कहां एडजस्ट करना है। क्या कभी मनमुटाव होता है? आशिमा- इसके बिना मजा कहां है! बिना झगड़े के प्यार संभव ही नहीं है। हम भी एक-दूसरे की आलोचना करते हैं, लड़ते-झगड़ते हैं, पर यह सब क्षणिक होता है। अच्छी बात ये है कि हम स्टूडियो में प्रोफेशनल हैं, लेकिन वहां से निकलते ही हम ये सब छोड़ देते हैं। लीना- उतार-चढ़ाव तो हर रिश्ते का अहम हिस्सा हैं। छोटी-मोटी बहस अलग बात है, लेकिन हम लोगों में झगड़ा-फसाद कभी नहीं होता। अगर कुछ हो भी जाए तो हमें उसे भूलने में ज्यादा समय नहीं लगता। आप दोनों के विचारों में कितनी समानता है? आशिमा- हम दोनों अपने समय और साथ को पूरी तरह इंज्वॉय करते हैं। विचारों में समानता तो पहले से ही है, नहीं होती तो कोई तीसरा रास्ता ढूंढ़ लेते हैं। लीना - विचारों में समानता नहीं होगी तो रिश्ते किस तरह निभाए जाएंगे!

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