रविवार, 2 मई 2010

स्वाभिमान


 (अरुण कुमार बंछोर)

विशेष और श्रेया प्रथम श्रेणी से लेकर ग्रेजुएशन तक साथ-साथ पढे। गहरी मित्रता और अपनापन था दोनों में। लंच साथ करते, जरूरत पडने पर एक-दूसरे का होमवर्क भी करते। क्लास में भी कभी विशेष फ‌र्स्ट आता, कभी श्रेया। कभी ईष्र्या या स्पर्धा नहीं होती दोनों में। धीरे-धीरे बचपन की सीमा लांघ कर दोनों युवा हुए, लेकिन मित्रता बरकरार थी। दोनों की तरफ से कोई मांग या शर्त भी कभी सामने नहीं आई थी। अजीब थी उनकी दोस्ती, जिसके आडे दोनों की युवा होती देह और उडान भरता रंगीन सपनों का भविष्य भी कभी रुकावट नहीं बनता था। सहज ढंग से मिलते, कैंटीन में या पार्क में, लेकिन कभी एक-दूसरे से आगे संबंध बनाने की इच्छा नहीं जगी। उनकी दोस्ती एक खुली किताब की तरह थी। मित्रों ने कई बार उनके बीच आने की चेष्टा की, लेकिन विफल रहे। श्रेया और विशेष बस अच्छे दोस्त थे। गहरा विश्वास था दोनों के बीच। शायद उन्हें याद नहीं था कि हमारे समाज में लडका-लडकी की दोस्ती को स्वस्थ ढंग से नहीं देखा जा सकता।
एक दिन विशेष एम.बी.ए. करने के लिए अमेरिका चला गया। श्रेया ने भारत में ही एक यूनिवर्सिटी में एम.बी.ए. करने का मन बनाया। फोन, चिट्ठियों से बातें होने लगीं। समय बीत रहा था और श्रेया के माता-पिता उसके लिए लडका तलाश रहे थे। यह तो तय था कि वह माता-पिता की इच्छा से ही शादी करेगी। विशेष को लेकर उसने कभी शादी के बारे में नहीं सोचा था। एम.बी.ए. करने के बाद विशेष भारत लौट आया। उसके पिता नहीं थे और मां भी उसकी शादी करके निश्चिंत हो जाना चाहती थीं। एक दिन मां ने नाश्ता करते-करते पूछ ही लिया कि वह कब शादी करना चाहता है। विशेष भी बोला, मां, जब आप कहें, शादी कर लूंगा, आपकी पसंद से। मां को जैसे समझ नहीं आया। बोलीं, बेटा पसंद तो तुम्हारी होनी चाहिए, जीवन तुम्हें बिताना है। मां, मैंने इस बारे में कभी सोचा ही नहीं, मेरे लिए आपकी खुशी सबसे बडी है। आप अपने जैसी ही लडकी ढूंढो, जो आपको पसंद हो।

मां कुछ पल मौन रहकर बोलीं, तुम्हारी दोस्त है श्रेया, उसके बारे में क्या खयाल है?

श्रेया? मां वह तो बस मेरी मित्र है।

अच्छी दोस्त पत्‍‌नी नहींबन सकती क्या? इस बार मां ने आश्चर्य से पूछा।

नहीं मां, मैंने तो इस बारे में कभी सोचा ही नहीं। हम बचपन के दोस्त हैं। साथ पले-बढे, पढे और साथ बैठकर करियर को लेकर सोचा। शादी जैसी बातें हमारे मन में कभी आई नहीं। मैं तो यह भी नहीं जानता वह क्या सोचती है।
मैं पूछूं श्रेया से, वह क्या सोचती है?
मां की बात पर वह बोला, नहीं मां, छोडो, मैं ही बात करता हूं।
जल्दी कर लेना। यह बात तो तुम्हें पहले ही सोचनी थी। श्रेया के माता-पिता उसके लिए लडका ढूंढ रहे हैं। तुम तो बीस वर्र्षो से उसके परिवार को जानते हो।
आपकी बात सही है मां। लेकिन हमने सचमुच कभी शादी के बारे में नहीं सोचा। हम दोस्त रहे हैं और इसके अलावा कुछ नहीं सोचा।

नहीं बेटा, लडका-लडकी के बीच दोस्ती लंबे समय तक नहीं चल सकती और एक बार अगर अलग-अलग घर में शादी हो गई तो यह दोस्ती भी खत्म हो जाएगी। जरूरी नहींकि तुम जैसे सोचते हो, श्रेया के घरवाले भी उस ढंग से सोचें। कल ये भी तो हो सकता है कि उसके घरवालों को इस दोस्ती पर संदेह होने लगे। तब क्या तुम सहन कर सकोगे? ऐसे समाज में मन की पवित्रता कौन देखता है? मां ने शायद अपना अनुभव बांटा।

विशेष देर रात तक सोचता रहा था। हर पहलू से उसने इस बात पर विचार किया और अंत में इस निर्णय तक पहुंचा कि श्रेया से बात करनी ही होगी। सुबह होते ही वह श्रेया के घर चला गया और हिम्मत बांधकर उसने कहा, श्रेया तुमसे एक बात करनी है।

कहो। श्रेया ने सहज भाव से कहा।
मां ठीक कहती हैं।
क्या कहती हैं, कुछ बोलोगे?
काफी देर चुप रहने के बाद वह बोला, मां का कहना है कि अब हमें इस मित्रता को रिश्ते में बदल देना चाहिए।
रिश्ता? कैसा रिश्ता? श्रेया चौंक कर बोली।
स्त्री-पुरुष में मित्रता के अलावा पति-पत्नी का रिश्ता भी हो सकता है।
विशेष, मैंने इस बारे में कभी सोचा ही नहीं। मैं मम्मी-पापा से बात करूंगी। तभी तुम्हें कोई जवाब दे पाऊंगी।
श्रेया इसमें सोचना कैसा? क्या तुम कभी चाहोगी हमारे बीच कोई तीसरा आए।
दोस्ती तो दोस्ती होती है विशेष। इसमें तीसरे की बात कहां से आ गई?
शादी के बाद सोच और दृष्टि बदल जाती है। विशेष ने सोचते हुए कहा।
ऐसा तुम्हारा सोचना है, मेरा नहीं। श्रेया फिर बोली।
कुछ पल दोनों चुप रहे। विशेष घर लौट गया। श्रेया गहरी सोच में डूब गई। अगले दिन उसने मां से बात की। मां ने पिता को श्रेया की पसंद के बारे में बताया। उन दोनों को विशेष पहले भी पसंद था। अब चूंकि विशेष ने ही रिश्ते की पहल की तो उन्हें कोई आपत्ति नहींथी। अगले दिन दोनों विशेष की मां से मिलने गए और विवाह की बात पक्की हो गई। जल्दी ही दोनों का विवाह हो गया। एक-दूसरे का साथ पाकर दोनों बेहद खुश थे। उन्हें लगने लगा था कि मनुष्य का मन देह पर निर्भर न सही, लेकिन देह निरपेक्ष या उससे स्वतंत्र भी कहां होती है। मन चाहे तो देह की सीमाओं को बांध सकता है, लेकिन उससे स्वतंत्र नहीं हो सकता।

यह नहीं होता कि हम एक ढंग से जिएं, दूसरे ढंग से सोचें और तीसरे ढंग से आचरण करें। भले ही हम इसे नकारें, भावनाओं को नियंत्रण में रखने का दावा करें, शरीर को मन से ज्यादा समय तक अलग नहीं किया जा सकता।

श्रेया और विशेष की शादी को कुछ समय बीत चुका था। दोनों मन से एक-दूसरे की करीबी महसूस करते थे, लेकिन शादी के बाद मन और शरीर दोनों का जो साम्य होना चाहिए, वह उन दोनों के बीच नहींपनप पा रहा था। कुछ समय बाद इसे लेकर दोनों कुंठित रहने लगे। साथ होने के बावजूद वे अंतरंग क्षणों को जी नहींपाते थे। एक दिन बहुत सोच-समझकर श्रेया ने विशेष को सुझाव दिया कि वह किसी अच्छे डॉक्टर से मिले। विशेष का एक दोस्त डॉक्टर था। दोनों उसके पास गए, जहां दोनों के कई टेस्ट हुए। रिपोर्ट में श्रेया को सामान्य बताया गया। फिर समस्या कहां है? श्रेया के पूछने पर डॉक्टर दोस्त ने विशेष से हिचकिचाते हुए कहा, समस्या तुम्हारे भीतर है विशेष। तुम पिता नहींबन सकते। दरअसल तुम.., डॉक्टर ने आगे कुछ न कहते हुए श्रेया को सुझाव दिया कि अगर वह बच्चा चाहती है तो कुछ समय बाद बच्चा गोद ले ले या फिर चाहे तो नई तकनीक के जरिये खुद मां बन सकती है।

रिपोर्ट हाथ में लेते हुए दोनों के हाथ कांप रहे थे। श्रेया निराश तो थी, लेकिन वह विशेष के सामने मजबूत दिखना चाहती थी। वह अपने पति से बहुत प्यार करती थी और नहींचाहती थी कि ऐसे समय में उसका साथ छोडे। वह ऐसी हालत में घर पर सास का सामना नहींकरना चाहती थी, लिहाजा वे पल वह घर से बाहर बिताना चाहती थी। वह विशेष को स्थिति का सामना करने की शक्ति देना चाहती थी। उसने सोच लिया था कि इस रहस्य को खुद तक ही सीमित रखेगी, कभी किसी को कुछ पता नहीं चलेगा। वह विशेष को इतना प्यार, भरोसा और अपनापन देगी कि वह सब भूल जाएगा। ऐसा ही हुआ भी..।

कुछ वर्र्षो तक इस बात को लेकर घर में कोई चर्चा नहीं हुई। दोनों अपनी-अपनी नौकरी में व्यस्त रहे। धीरे-धीरे विशेष सहज होने लगा था। श्रेया ने रिपोर्ट छिपाकर रखी थी। विशेष से उसका रिश्ता एक बार फिर दोस्ती का हो गया था। सास कभी कुछ पूछना चाहतींतो कह देती कि सब ठीक है। अभी बच्चे के लिए समय ही कहां है, दोनों व्यस्त हैं। जब समय होगा-देखा जाएगा। माता-पिता भी जब जोर देने लगे तो श्रेया ने उकता कर कहा, अगर आप लोगों को बहुत चाह है तो एक बच्चा गोद ले लेते हैं। विशेष न रोता, न हंस पाता, मौन रह जाता। श्रेया प्यार से उसकी हथेली को दबाते हुए कहती, मस्त रहो विशेष। कोई चिंता नहीं। हमारे जैसे लोग बहुत से हैं दुनिया में। समय आने पर किसी बच्चे को गोद ले लेंगे, किसी अनाथ का भला हो जाएगा। क्या हमारे बीच दोस्ती काफी नहीं?

श्रेया दफ्तर से लौटकर मस्त गुनगुनाते हुए रसोई में खाना बना रही थी। आज विशेष की बुआ आई थीं। श्रेया-विशेष की शादी को सात वर्ष पूरे हो गए थे। दोनों के बीच सब ठीक चल रहा था। मां ने भी सवाल करना छोड दिया था। बुआ और मां बातें कर रही थीं। विशेष उनके पास बैठा था। बुआ गुस्से में थीं। कह रही थीं, क्या रखा है इस बांझ में जो सात सालों में एक बच्चा भी नहींदे सकी। मेरा तो भाई भी नहीं रहा, अब वंश आगे कैसे चलेगा? विशेष, तुझे भी कोई चिंता नहीं है। कुछ तो सोच।

तभी मां बोलीं, बेटा बुआ ठीक ही तो कह रही हैं।

तभी बुआ बोलीं, बेटा, श्रेया को भी रखो, वह कमाती है, तुम पर बोझ नहींबनेगी। लेकिन घर में बच्चा तो होना ही चाहिए। दूसरी शादी कर लो। मैंने तुम्हारे लिए एक लडकी भी देख ली है।

विशेष मौन था। मां आज तक चुप बैठी थीं, बुआ का सहारा पाकर बोलने लगी थीं। विशेष पहले तो चुप रहा। फिर खडा होकर बोला, अच्छा, ठीक है। देख लो लडकी..। इतना कह कर वह कमरे से बाहर चला गया। मां और बुआ खुश थीं कि बेटे ने बात मान ली है। वैसे भी विशेष मां की हर इच्छा पूरी करता था।

रसोई में खाना बनाते हुए श्रेया को जैसे खुद से घृणा होने लगी। वह बेवकूफ थी, जो इतने समय तक भावुक होकर विशेष से जुडी रही। मां-बुआ कुछ कहतींतो वह सहन कर लेती, वे सच्चाई नहीं जानती थीं। लेकिन विशेष तो जानता है कि कमी उसमें ही है। वह कैसे मौन रह गया? कैसे वह दूसरी शादी कर सकता है?

श्रेया आज पहली बार उस पुरुष को समझ पा रही थी। उसके मन में बहुत कुछ उबल रहा था। भयंकर विस्फोट के बाद वह सब ऊपर आ गया। कैसा दोस्त और पति है विशेष? आज तक सब कुछ भुलाकर जो पत्‍‌नी समर्पिता बनी हुई है, उससे इस तरह बदला ले रहा है? श्रेया ने कभी शिकायत नहीं की, कभी उसे एहसास नहींहोने दिया कि मां न बन पाने का दुख कई बार उसे भी होता है..।

लेकिन अब इस भावुक मन:स्थिति से बाहर आने का समय था। स्त्री होने के स्वाभिमान को बचाना था। अब उसे इस देहरी को पार करना होगा। स्थितियों से सीधे मुठभेड करनी होगी। हर बार समाज स्त्री पर ही उंगली क्यों उठाए? क्यों वही बांझ हो? डायन, वेश्या, दूसरी औरत, व्यभिचारिणी जैसे संबोधन सिर्फ उसके लिए ही क्यों हों? क्यों वह पुरुष के भी सारे अपराध अपने जिम्मे ले?

श्रेया रसोई में खाना बनाते हुए अपने आगामी संघर्ष के बारे में सोच रही थी। वह खुद से ही नाराज थी, खुद से ही सवाल कर रही थी। आर्थिक स्वतंत्रता क्या सचमुच स्वाभिमान व आत्मसम्मान भी देती है? उसने देखा, विशेष की मौन स्वीकृति से मां व बुआ खुश थीं। वह रसोई में थी। विशेष उसकी प्रतीक्षा करते-करते सो गया था। श्रेया कमरे में आई तो वह गहरी नींद में था। निश्चिंत होकर उसने अलमारी खोली और रिपोर्ट निकाली। फिर उसने अपनी सास के नाम एक छोटा सा पत्र लिखा-

मां, मैं घर छोडकर जा रही हूं। आपका बेटा नपुंसक है, वह कभी पिता बनने का सुख नहींले सकता। इस सच को पिछले सात सालों से मैंने छुपाकर रखा था, क्योंकि मैं विशेष से प्यार करती थी। मेरे लिए प्रेम का अर्थ देह नहीं, मन का समर्पण है। मैं उसे अपमानित होते नहींदेखना चाहती थी, लेकिन आज अनजाने में आपने और बुआ जी ने मुझे इतनी बडी गाली दे दी कि मेरा अहं जाग उठा। मेरा बस यही अनुरोध है कि किसी दूसरी लडकी की जिंदगी न बर्बाद करें..।

पत्र मेज पर रखकर एक सूटकेस में उसने अपने कपडे रखे। फिर धीरे-धीरे सीढियां उतरकर सुनसान-अंधेरी सडक पर आ गई। उसने बांह पर चुटकी काटी यह जानने के लिए कि क्या सचमुच वह देहरी लांघ आई है? क्या उसे अब अपनी मंजिल मालूम है?


मंदी-मंदी सब कहैं.. मंदी ना जाने कोय
इधर मालूम हुआ है कि सारे विश्व में मंदी महामारी की तरह फैल गई है। कई देश इसकी चपेट में आ गए हैं। अमेरिका जैसे पहलवानों को भी कई महीनों से ज्वर चढा हुआ है। हर देश की नब्ज मंदी ने मंद कर रखी है। अलबत्ता अपना भारत इस इन्फेक्शन से काफी हद तक बचा हुआ है। बचपन में सरकारी सब्सिडियों के घोर टीकाकरण का लाभ लेने और जवानी में नित्य नेशनलाइजेशन का स्वास्थ्यवर्धक टॉनिक पीने वाली हमारी अर्थव्यवस्था थोडे से जुकाम या छीं-छूं के बावजूद लगभग तंदुरुस्त है और मंदी से ग्रस्त मुल्कों को देखकर मंद-मंद मुसकरा रही है।

वैसे भी हमें मंदी से घबराने की कोई खास आवश्यकता नहीं है। हमारे यहां प्रागैतिहासिक काल से ही मंदी का महत्व निर्विवाद रूप से स्थापित है। हमारे देवगण सदैव से मंद-मंद स्मित द्वारा अपने भक्तजनों को आह्लादित करते रहे हैं। हमारे उपवनों-कुंजों एवं वाटिकाओं में मलय पर्वत से आने वाली सुगंधित समीर सदैव से मंद-मंद संचरण करती रही है। हमारे सर-सरित-निर्झर इत्यादि सदैव से मंद-मंद ध्वनि गुंजित करते हुए प्रभावित रहे हैं। हमारी कोमलांगी, चंद्रवदना पद्मिनी नायिकाएं सदैव से मंद-मंद मुसकान बिखेर कर इत्र-उत्र कमल-श्रेणियां खिलाती रही हैं। अपने मंद-मंद गमनागमन के कारण ही ये गजगामिनियां कहलाई हैं। इन्होंने जब भी मंद-मंद स्वर से कुछ कहा है, सदैव मानो पुष्प वर्षा हुई है। और तो और.. जब भगवान राम वनवास हेतु चले थे तो ऋषि वाल्मीकि के अनुसार उन्होंने भी मंद-मंद प्रस्थान ही किया था। जब हमें मंद-मंद सदैव से इतना प्रिय रहा है तो अब मंदी के प्रति भय-भ्रम-भ्रांति क्यों?

यही नहीं, हमारे यहां मंद-मंद का एक अन्य पर्यायवाची भी खूब प्रचलित रहा है और वह है धीरे-धीरे। महत्व इसका भी उतना ही विशिष्ट है जितना मंद-मंद का। संत कबीर ने गहन-गंभीर अंदाज में संतों को समझाया है-

धीरे-धीरे रे मना, धीरे ही सब होय।

माली सींचे सौ घडा, ऋतु आए फल होय।।

चलचित्र कवि शिरोमणि आनंद बक्षी भी जन-मन को वार्तालाप के मर्म का साक्षात्कार कराते कहते हैं, धीरे धीरे बोल कोई सुन ना ले..।

कुछ कवियों ने धीरे-धीरे के एक अन्य रूप हौले-हौले का भी उत्कृष्ट प्रयोग किया है। हिंदी साहित्य के रीतिकाल के श्रृंगार-धुरंधर बिहारी के विषय में तो ज्ञात नहीं, परंतु फिल्म काल के प्रेम कवि एसएच बिहारी की नायिका तीव्र गति से चल रहे नायक की तेजी को मंदी में बदलने के उद्देश्य से कहती है-

जरा हौले-हौले चलो मोरे साजना/ हम भी पीछे हैं तुम्हारे..

हिंदी साहित्य के फिल्मकाल के ही एक अन्य प्रेमवादी कवि भरत व्यास के नायक-नायिका भी जो कर रहे हैं, वह स्लो मोशन में ही कर रहे हैं। पहले नायिका का उद्गार देखें-

हौले-हौले घूंघट पट खोले सजनवा बेदर्दी..

अब नायक के प्रत्युत्तर पर गौर फरमाएं-

हौले-हौले जहर काहे घोले नयनवा बेदर्दी..

फिल्मकाल के उर्दू शायर भी इससे अछूते नहीं रह सके हैं। उन्होंने मंद-मंद, धीरे-धीरे एवं हौले-हौले के स्थान पर प्रयोग किया है- आहिस्ता-आहिस्ता - मुहब्बत रंग लाती है मगर आहिस्ता-आहिस्ता..

यही नहीं, फिल्म काल के एक दृश्य काव्य का तो नाम ही है - आहिस्ता-आहिस्ता।

कुछ अन्य ने रफ्ता-रफ्ता एवं खरामा-खरामा का प्रयोग भी किया है। यथा, रफ्ता-रफ्ता देखो आंख मेरी लडी है.. या फिर

वो आने लगे मेरे दिल में खरामा-खरामा..। संस्कृति और साहित्य ही नहीं, इस मंद-मंद प्रवृत्ति का हमारे जनजीवन पर भी गहरा असर है। जनसंख्या, महंगाई, बेरोजगारी एवं भ्रष्टाचार को छोडकर सब-कुछ मंद-मंद गति से सरक रहा है।

जैसे-विकास हो रहा है, परंतु मंद-मंद। साक्षरता बढ रही है, परंतु धीरे-धीरे। जागरूकता आ रही है, पर हौले-हौले। प्रति व्यक्ति आय बढ रही है, मगर आहिस्ता-आहिस्ता। नव-निर्माण चल रहा है, मगर रफ्ता-रफ्ता। अदालतों में मुकदमों का निपटारा हो रहा है, मगर खरामा-खरामा..।

हम इस धीरे-धीरे के इतने दीवाने हैं कि हमने सडकों-रास्तों पर बडे-बडे बोर्ड लगा रखे हैं-धीरे चलें, धीरे चलें-सुरक्षित पहुंचे, दुर्घटना से देर भली, स्पीड थ्रिल्स बट किल्स.. आदि। यही कारण है कि हमारी ट्रेनें मंद-मंद गति से चलते-चलते रास्ते के सारे बोर्ड पढते-पढते इतनी लेट हो जाती हैं कि सवारियों को प्लेटफार्म पर लेट-लेट कर ट्रेन की प्रतीक्षा करनी पडती है। हमारे लोकजीवन में भी इस हौले-हौले को बेहद सराहा गया है। सहज पके सो मीठा होय, जल्दी का काम शैतान का, जल्दी की घानी आधा तेल आधा पानी, धीरा सो गंभीरा जैसे कई मुहावरे और लोकोक्तियां हमारे लोकजीवन में प्रचलित हैं। और तो और.. हमारे पंचतंत्र में तीव्र गति से भागने वाले खरगोश को मंद-मंद गति से चलने वाले कछुए से हारते हुए दिखाया गया है। स्लो एंड स्टेडी विंस द रेस।

अब आप ही बताएं, हमारे जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाने वाली मंदी में आखिर क्या बुराई है? अजी! शब्द मंदी ही अपने आपमें कमाल का है। इसे अक्ल के साथ लगाइए तो अक्लमंदी बन जाता है, अगर हुनर के साथ लगाया जाए तो हुनरमंदी हो जाता है और अगर यह नियाज के साथ लगे तो उसे नियाजमंदी कर देता है। अगर आप इसे हमारी रजा के साथ जोड दें तो इस मामले में आपकी रजामंदी भी मिल जाए।

हमारे इस मंदी-विवेचन का यदि आप पर अभी भी कोई प्रभाव नहीं पडा है तो आइए आपको मंदी के तार्किक विश्लेषण के लिए अपने एक मित्र के पास ले चलें। हैं तो वे अर्थशास्त्री, परंतु हमें सदैव व्यर्थ शास्त्री ही लगते रहे हैं। फिर भी हमने एक दिन मन मार कर उनसे पूछ ही लिया-सर जी! यह जो चार-चुफेरे मंदी-मंदी का अखंड जाप चल रहा है, यह आखिर है क्या? आप तो अर्थ के शास्त्री हैं। मंदी पर तनिक मंद-मंद प्रकाश तो डालें।

अर्थशास्त्री महोदय ने जब हमें अपने चरणों में प्रश्नवाचक की मुद्रा में दंडवत पडे देखा तो उनके सप्लाई-डिमांड ग्राफ जैसे चेहरे पर अनर्थशास्त्रियों जैसी मंद-मंद मुसकान फैल गई। उन्होंने हमें उठाया और अपने रिजर्व बैंक जैसे कोरे-कठोर सीने से लगाने की कोशिश की, परंतु मुद्रा-स्फीति सा फूलता जा रहा उनका पेट मध्य में आ गया।

खैर, उन्होंने गला खंखार कर साफ किया और अपने (अर्थ) शास्त्रीय संगीत की सुरीली तान छेड दी- मित्र श्रेष्ठ! मंदी का अर्थ है कि जनता सयानी हो गई है। वास्तव में बडे-बडे मुल्कों की बडी-बडी कंपनियों ने बडे-बडे बैंकों से बडे-बडे कर्जे लेकर बडे-बडे उत्पाद बनाए, ताकि जनता के बडे वर्ग को अपने बडे-बडे प्रोडक्ट बडे-बडे मुनाफे लेकर बेचे जा सकें। परंतु लोग बडे सयाने निकले। वे बडे-बडे दावों और बडे-बडे सब्जबागों के चक्कर में नहीं आए और बाजार में बडी-बडी खरीदारियां नहीं कीं। इससे बडे-बडे मैन्युफैक्चरर्स बडे-बडे घाटों में आ गए। सो बडे-बडे कर्जे वापस न हो सके और बडे-बडे बैंक डूब गए। मंदी की इस बडे कमाल की परिभाषा को हमने दही में पडे बडे के समान डूबते-उतराते आश्चर्य से सुना। वे आगे बोले-मंदी हो या न हो, जनता के बडे वर्ग को बडे संघर्ष में जीवन जीना होता है। उनके जीवन के बडे हिस्से में कोई बडा बदलाव नहीं आता या बडा फर्क नहीं पडता।

इतना कहकर वे मंद-मंद मुसकराने लगे। हमने मंद स्वर से उन्हें धन्यवाद ज्ञापित किया और उनके घर से अपने घर की ओर मंद-मंद प्रस्थान किया। कदाचित अब आपके हृदय में भी मंदी के भय की तीव्रता मंद पडने लगी होगी।

कोई टिप्पणी नहीं:

टिप्पणी पोस्ट करें