शनिवार, 30 अक्तूबर 2010

रामायण क्या-क्या सिखाती है?


रामायण पौराणिक ग्रंथों में सबसे ज्यादा पढ़ी जाने वाली किताब है। रामायण को केवल एक कथा के रूप में देखना गलत है, यह केवल किसी अवतार या कालखंड की कथा नहीं है, बल्कि यह जीवन जीने का रास्ता बताने वाली सबसे महत्वपूर्ण पुस्तक है। रामायण में सारे रिश्तों पर लिखा गया है, हर रिश्ते की आदर्श स्थितियां, किस परिस्थिति में कैसा व्यवहार करें, विपरित परिस्थिति में कैसे व्यवहार करेंं, ऐसी सारी बातें हैं।
जो आज हम अपने जीवन में अपनाकर उसे बेहतर बना सकते हैं।
- दशरथ ने अपनी दाढ़ी में सफेद बाल देखकर तत्काल राम को युवराज घोषितकर उन्हें राजा बनाने की घोषणा भी कर दी। हम जीवन में अपनी परिस्थिति, क्षमता और भविष्य को देखकर निर्णय लें। कई लोग अपने पद से इतने मोह में रहते हैं कि क्षमता न होने पर भी उसे छोडऩा नहीं चाहते।
- राजा बनने जा रहे राम ने वनवास भी सहर्ष स्वीकार किया। जीवन में जो भी मिले उसे नियति का निर्णय मानकर स्वीकार कर लें। विपरित परिस्थितियों के परे उनमें अपने विकास की संभावनाएं भी तलाशें। परिस्थितियों से घबराएं नहीं।
- सीता और लक्ष्मण राम के साथ वनवास में भी रहे, जबकि उनका जाना जरूरी नहीं था। ये हमें सिखाता है कि किसी की परिस्थितियां बदलने से हमारी उसके प्रति निष्ठा नहीं बदलनी चाहिए। हमारी निष्ठा और प्रेम ही हमें ऊंचा पद दिलाते हैं।
- भरत ने निष्कंटक राज्य भी स्वीकार नहीं किया, राम की चरण पादुकाएं लेकर राज्य किया। हमारा धर्म अडिग होना चाहिए। अधिकार उसी चीज पर जमाएं जिस पर नैतिक रूप से आपका अधिकार हो और आप उसके योग्य हों। भरत ने खुद को हमेशा राम के अधीन समझा, इसलिए जो राजा पद राम को मिलना था, उसे भरत ने स्वीकार नहीं किया।
- राम ने सुग्रीव से मित्रता की, सुग्रीव को उसका राज्य और पत्नी दोनों दिलवाई। आप भी जीवन में मित्रता ऐसे व्यक्ति से करें, जो आपकी परेशानी, आपके दु:ख को समझ सके।
- राम हमेशा भरत की प्रशंसा करते, उसे ही अपना सबसे प्रिय भाई बताते, जबकि राम के साथ सारे दु:ख लक्ष्मण ने झेले, इसके बावजूद भी लक्ष्मण ने कभी इसका विरोध नहीं किया। आप कोई भी काम करें तो उसे कर्तव्य भाव से करें, प्रशंसा की अपेक्षा न रखें, प्रशंसा की इच्छा हमेशा काम से विचलित करती है।

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