बुधवार, 20 अक्तूबर 2010

कलाकार को गिफ्ट

"एक उभरते हुए कलाकार के लिए!" बिशु काका बोले।
झुमका ने उस सुंदर नीले रंग के डिब्बे की ओर देखा, जो उसके बिशु काका ने अभी-अभी उसे उपहार में दिया था। रंगों का वह डिब्बा उस मशहूर कंपनी का था जो चित्रकला से संबंधित सामान बनाने के लिए विश्व-स्तर पर सबसे बेहतरीन मानी जाती थी। झुमका के बिशु काका को अपनी कंपनी की तरफ से विदेश भेजा गया था। काका विदेश से अपने भतीजे-भतीजियों के लिए ढेर सारे उपहार लेकर लौटे थे।

रंजू के लिए शतरंज का सेट, टुबलू के लिए रेलगाड़ी, शुभा के लिए पोनीटेल वाली गुड़िया और भी न जाने क्या-क्या उपहार वे लाए थे। झुमका के लिए रंगों का यह डिब्बा था। "कितना सुंदर है यह?" माँ उत्साहित होकर बोली, "इससे प्यारा रंगों का डिब्बा मैंने पहले कभी नहीं देखा था।" डिब्बा सचमुच खूबसूरत था। इससे पहले उसके पास रंगों के जितने डिब्बे थे, उनमें साधारणतः नीले, भूरे और लाल रंग ही होते थे। लेकिन इस डिब्बे की सूची में तो इन रंगों के नामों की जगह अल्ट्रामेरीन, बर्न्ट सिएना और स्कारलेट लिखा था।
यह डिब्बा था ही ऐसा कि किसी भी चित्रकार बच्चे को मिलता तो वह बहुत ही प्रसन्न होता। जब बिशु काका अपनी विदेश-यात्रा के किस्से सुनाने में मस्त हुए, झुमका धीरे से वहाँ से चली आई। एक और रंगों का डिब्बा! झुमका उदास हो गई। क्या कोई भी नहीं समझ पाता कि उसे रंगों के बजाय एक गुड़िया चाहिए? उसे तो बस एक गुड़िया चाहिए।
झुमका ने जब से हाथ में पेंसिल या ब्रश को सीधा पकड़ना सीखा था, तभी से उसे ड्राइंग और पेंटिंग का बहुत शौक रहा। उसके अंदर यह प्रतिभा थी और सब लोग भी ऐसा ही मानते थे। जब वह बहुत छोटी थी, तब भी वह इतने आकर्षक चित्र बना लेती थी कि उन्हें पोस्टर की तरह चिपका लिया जाता या टाँग लिया जाता। उसकी माँ ने इसीलिए थर्माकोल का एक बोर्ड लॉबी में लगा दिया था। इस बोर्ड पर वह उन सभी पेंटिंगों और स्केचों को लगा दिया करती, जिन्हें झुमका लगभग रोज ही बनाती थी।
आने-जाने वाले उस बोर्ड पर लगी तस्वीरों को देखते और झुमका की प्रशंसा करते व उसे प्रोत्साहन देते। उनके घर में आने वाले रिश्तेदार उनकी बनाई तस्वीरों को घर में या ऑफिस में सजाने के लिए माँगकर ले जाते। एक बार झुमका बिशु काका के ऑफिस गई थी। उसने देखा कि काका ने उसके बनाए स्केच अपनी मेज के शीशे के नीचे लगा रखे थे। यह देखकर वह बहुत खुश हुई थी।
"झुमका सचमुच कलाकार है," झुमका के माता-पिता, उनके पड़ोसी, रिश्तेदार सभी कहते- "झुमका को बढ़ावा देना चाहिए।" झुमका को प्रोत्साहित करने के लिए हर कोई उसे रंगों के डिब्बे, पोस्टर-कलर, ड्राइंग के कागज व पेंट-ब्रश, कलर-प्लेट और ईजॅल देते थे। नया साल हो या जन्मदिन, दीपावली हो या अन्य कोई त्योहार, या त्योहार न भी हो तो झुमका को बस चित्र बनाने का ही सामान मिलता। उसकी गीता आंटी ने तो उसे कला के इतिहास पर एक बहुत मोटी पुस्तक ही दे डाली थी, "हिस्ट्री ऑफ आर्ट"। इस किताब में ढेर सारे चित्र थे, और बहुत-से ऐसे शब्द जिन्हें झुमका कभी समझ न पाई।
"मैं शायद ठीक नहीं कर रही, झुमका खुद से कहती, "लेकिन कभी-कभी मेरी भी तो इच्छा होती है कि कोई मुझे पेंटिंग के सामान की जगह कुछ और दे। यह रंगों का डिब्बा कितना प्यारा है, लेकिन काश, बिशु काका इस डिब्बे को शुभा को दे देते और मुझे उसकी वाली गुड़िया। " "मैं गुड़िया को तरह-तरह के कपड़े पहनाती, उसके बाल सँवारती और उसका घर बनाती, उसमें गुड़िया का ढेर सारा फर्नीचर रखती तो कितना मजा आता।"
झुमका थोड़ी देर बाद अपनी बहन से बोली-"शुभा, तुम मेरा रंगों का डिब्बा ले लो। इसके बदले में मुझे अपने गुड़िया दे दो ना!" "बिलकुल नहीं," शुभा ने झुमका के हाथों से गुड़िया छीनते हुए कहा- "गुड़िया मेरी है, बिशु काका इसे मेरे लिए लाए हैं।"हाँ, लेकिन तुम्हारे पास तो पहले से ही बहुत सारी गुड़िया हैं। और उस दिन तुम भी तो मेरे रंगों से खेल रही थीं। क्यों न हम अपने उपहार बदल लें?"
शुभा ने झुमका को जीभ चिढ़ाई और अपनी गुड़िया लेकर भाग गई। थोड़ी दूर पहुँचकर वह चिल्लाई, "मैं बिशु काका को बता दूँ कि तुम्हें रंगों का डिब्बा नहीं चाहिए?"
"अरे, नहीं-नहीं, प्लीज चुप रहो," झुमका जल्दी से बोली, "प्लीज, तुम बिशु काका या किसी से कुछ भी मत कहना।"
तभी फोन की घंटी बज उठी। फोन अनिता मासी का था। "जरा बताओ, आज शाम को मैं अपने साथ किसको ला रही हूँ?" उनकी आवाज में खुशी थी। "चित्रकार जानकी अम्मा को।"आज अचानक वो मुझे मिल गईं, तुम विश्वास नहीं करोगी झुमका, उन्होंने मुझे तुरंत पहचान लिया। उन्हें दीदी, यानी तुम्हारी माँ भी याद है। उनको देखते ही मुझे खयाल आया कि क्यों न उन्हें तुम्हारे घर बुला लूँ? तुम्हारे लिए यह बहुत अच्छा रहेगा।"
माँ भी अनिता मासी से फोन पर बात करके बहुत खुश हुई और मेहमान के लिए तैयारियाँ करने लगी।
झुमका माँ से जानकी अम्मा के बारे में बहुत कुछ सुनती रहती थी। झुमका को माँ ने एक किताब भी दिखाई थी जिसमें अम्मा की तस्वीर छपी थी। अम्मा की तस्वीर प्रभावशाली थी। पेंट-ब्रश आम तौर पर हमेशा उनके जूड़े में खुंसे रहते थे। झुमका ने भी स्वयं को उनसे मिलने के लिए तैयार किया।
बिशु काका झुमका को समझाने लगे कि उसे अम्मा जैसी महान कलाकार के सामने कैसे पेश आना चाहिए। "उनसे पूछना कि वे किस तरह के रंग इस्तेमाल करती हैं, फिर मैं वही रंग तुम्हारे लिए ला दूँगा।"
माँ ने बाबा को फोन करके बता दिया था। बाबा भी ऑफिस से एक घंटा पहले आ गए थे। सब मिलकर, जानकी अम्मा की प्रतीक्षा करने लगे। थोड़ी देर बाद ही जानकी अम्मा के साथ आती हुई अनिता मासी के चेहरे पर गर्व का भाव साफ झलक रहा था। अम्मा के सफेद बाल चाँदी की तरह चमक रहे थे और जूड़े में ढीले-ढाले बँधे हुए थे। जूड़े में से कई ब्रश अब भी बाहर कले हुए थे।
अम्मा ने बहुत महीन कढ़ाई वाली सुंदर साड़ी पहनी थी, पर उसमें भी जगह-जगह रंगों के दाग लगे थे।
'लगता है, अम्मा अपने काम में बहुत व्यस्त थीं, झुमका ने सोचा। उसने अंदाज लगाया‍ कि जब अनिता मासी ने इन्हें काम से अलग किया होगा तो इन्होंने अपने हाथ साड़ी से पोंछे होंगे और जल्दी सेब्रश जूड़े में खोंसकर, साथ में चली आई होगी।
उनके कंधे पर एक भरा हुआ झोला लटक रहा था। रंगीन चमकीले कागजों में लिपटे उपहार उस झोले में रखे हुए दिख रहे थे। 'तो तुम बेंगलुरू में मेरे पड़ोस में रहने वाली दो छोटी लड़कियों में से बड़ी वाली! जानकी अम्मा ने माँ से मुस्कुराते हुए कहा, 'और अब तुम्हारी अपनी भी दो बच्चियाँ हो गई हैं।'
शुभा और झुमका का उनसे अच्छी तरह से परिचय कराया गया। शुभा ने अपनी वही कविता सुनाई जो वह हर आने वाले को सुनाया करती थी। वह बीच-बीच में हँसती भी जाती थी। अब झुमका की बारी थी। हमेशा की तरह, बड़ी सावधानी से झुमका ने अपनी स्केचबुक के पन्ने पलटे, दीवार पर टँगी फ्रेम की गई तस्वीरों की ओर इशारा किया, और फिर बड़ी मेहनत के साथ लॉबी में लगे थर्माकोल के बोर्ड को उतारकर ले आई, जिस पर उसके चित्र देखती गईं और कुछ चित्रों को देर तक देखती रहीं। 'मुझे यह वाली बहुत पसंद आई,' अम्मा ने उस तस्वीर को देखकर देखा जिसे अम्मा ने बिल्कुल बेकार कहा था।
इसमें बहुत जान है,' 'उन्होंने झुमका द्वारा बनाए गए अनिता मासी के पोट्रेट को देखकर कहा - जिसे मासी बिल्कुल पसंद नहीं करती थीं। अम्मा ने सारी तस्वीरें देख लीं तब झुमका को पास बुलाया और कहा, तुम्हारे अंदर सचमुच प्रतिभा है। अचानक ही बिशु काका ने झुमका को इशारा किया कि इनसे पूछो कि सबसे अच्छा रंग कौन-सा है?'
'मैडम, इसे अपन तरफ से कुछ बेशकीमती सलाह दीजिए,' बाबा ने जोर दिया। 'हाँ, इसे बताइए यह कैसे आगे बढ़े?'
माँ ने जोड़ा।
अनिता मासी ने भी पूछा कि यह कैसे ज्यादा बेहतर चित्र बना सकती है। जानकी अम्मा ने मुस्कुराते हुए कहा - 'इसे ये सब बातें खुद ही जानने दीजिए। मेरे पास इसके लायक कोई सलाह नहीं है। ओह हाँ मैं तो भूल ही गई। मैं तुम दोनों के लिए कुछ लाई हूँ।'
अम्मा के झोले में शुभा और झुमका के लिए उपहार थे, उपहार पर लपेटा कागज खोलने से पहले ही झुमका समझ गई कि उसमें क्या है। गुड़िया! लेकिन... लेकिन! बाबा, माँ, बिशु काका व ‍अनिता मासी, सभी एक स्वर में बोल पड़े। 'क्या हुआ?' अम्मा ने पूछा।
'हमने तो सोचा था..' अनिता मासी ने कह ही दिया, कि आप एक कलाकार हैं और वो भी इतनी बड़ी, तो आपका तोहफा कुछ कला से संबंधित होगा या आप उसे कुछ खास सलाह देंगी। कम से कम हमारी झुमका के लिए, जिसके बारे में मैंने आपको पहले बताया भी था..'
जानकी अम्मा ने झुमका की ओर शरारती आँखों से देखा।
'क्या तुम इस तरह का उपहार लेना पसंद करोगी? उन्होंने पूछा।
बिल्कुल नहीं, झुमना भी अपनी भड़ास निकाल ही दी, मैं कितने दिनों से चाह रही थी कि मेरे पास एक गुड़िया हो लेकिन मैं यह बात किसी से कह नहीं पाई।' इसके पहले कि झुमका को दूसरों की भावनाओं को ठेस पहुँचने की बात याद आती, वह अपनी बात कह चुकी थी, लेकिन आपको कैसे मालूम 'हाँ, इस बात का अंदाजा तो हम कभी लगा ही नहीं पाए।
बिशु काका ने दूसरे सब लोगों की तरफ देखते हुए कहा जो अब भी चुप खड़े थे।
मैं भी जब इसी तरह की छोटी बच्ची थी तो इसी तरह के मिलने वाले उपहारों से थोड़ा ऊब जाती थी। मुझे याद है कि टेडी बियर लेने की मेरी बहुत इच्छा थी। लेकिन किसी ने मुझे नहीं दिया। मुझे जो कुछ भी मिलता, उसमें क्रेयॉन होते या रंग या फिर इसी तरह की कुछ और चीजें। इससे भी खराब और मिलता तो वह थी सलाह! आखिर उभरते हुए प्रतिभाशाली बच्चे को भी जरूरत होती है। एक टेडी बियर की, जिसे वह गले से चिपटा सके या एक गुड़िया की जिसे वह सजा सके। याद रखिए कि प्रतिभाशाली बच्चा भी आखिर है तो एक बच्चा ही।'
'हम यह बात हमेशा याद रखेंगे, 'माँ ने झुमका को गले लगाते हुए कहा, जो अपनी गुड़िया को चिपकाए खड़ी थी।

कोई टिप्पणी नहीं:

टिप्पणी पोस्ट करें