सोमवार, 1 नवंबर 2010

स्नेह-संबंध

हमारी बिट्टू बडी सुन्दर होने की वजह से वह हर किसी की नजर अपनी ओर आकर्षित कर ही लेती है, लेकिन जो बात सबका मनमोह लेती है, वह है उसकी मुस्कान। किसी को अपनी ओर देखते पाकर एकटक उसकी ओर देखेगी, फिर अपनी बडी-बडी पलकों को अधमुंदी कर ऐसे थिरक कर मुस्करा देगी कि सामने वाला बस ठगा सा रह जाए। अभी तीन साल की भी पूरी नहीं हुई है, पर अपनी बालसुलभ विलक्षण बुद्धि का प्रयोग वह लोगों को प्रसन्न करने में बडी सफलता से करती है।

एक दिन सुबह बिट्टू एक कांच का प्याला तोडने पर मां से पिटाई खा कर रो रही थी। बहलाने के लिए मैं उसे पास के मंदिर में ले गया। बस उस दिन के बाद यह क्रम बन गया। उस दिन भगवान को नमस्कार कर जो आंख खोली तो बगल में एक महिला को खडा पाया। मैंने देखा कि वह हाथ जोडे खडी थी, पर निहार रही थी एकटक बिट्टू को जो भगवान की देहली पर जलती अगरबत्ती के लहराते धुएं को अपनी मुट्ठी में पकडने की कोशिश कर रही थी। अद्भुत लावण्यमयी थी वह महिला। मुझे तो अचानक ऐसा लगा, जैसे बिट्टू ही हठात बडी हो कर बगल में आ खडी हुई है।
मैं उसकी तरफ देख रहा था, इसका उसे कतई ख्याल नहीं था। एकटक वह बिट्टू को देखे जा रही थी। भगवान को दोनों हाथ जोड बिट्टू जब पलटी तो महिला को अपनी ओर इस मुद्रा में देखते पाकर क्षण भर ठिठकी, मुस्करा दी और फिर हाथ जोडकर उसे जय जय कर दी। प्रत्युत्तर में वह महिला भी मुस्करा दी। बिट्टू बढकर उसके सामने खडी हो गई और उसने उसे गोद में उठा लिया। बिट्टू ने अपनी दोनों हथेलियां उसके गालों पर जमाई और उसका चेहरा अपनी ओर घुमा उसकी आंखों में देखने लगी। महिला ने उसे गले से लगा लिया और उसने अपनी दोनों बांहें उसके गले में डाल अपना गाल उसके गाल से सटा दिया। महिला कुछ बोली नहीं, बिट्टू को गोदी में लिये लिये परिक्रमा करने लगी।
कुछ दिनों में तो मंदिर पहुंचते ही बिट्टू छिटककर गोद से उतर जाती, भगवान से पहले आंटी को जय जय करती और फिर उसकी गोद में या उस की उंगली पकडे पकडे परिक्रमा करती, हाथ जोडती, टीका लगाती और प्रसाद लेती। जितनी देर उसके साथ रहती, चहकती रहती। मैंने उस महिला को कभी बोलते नहीं सुना। बिट्टू जैसे उसकी आंखों की भाषा से ही सब समझ जाती थी। मैं चप्पल पहन चुकने पर जब आवाज लगाता, आओ, बिट्टू तो वह आंखों से कुछ कहती और बिट्टू टाटा करके चली आती।
दो दिनों के लिए मैं बाहर गया हुआ था, लौटा तो मालूम हुआ कि बिट्टू मंदिर जाने के लिए खूब रोई थी। मैं बिट्टू को लेकर जल्दी ही मंदिर चला गया। जाते ही वहां के पुजारी ने पूछा, दुई दिन से आए नहीं, बाबूजी? काम से बाहर गया था, मैंने बताया। पुजारी बोला, तभी कहूं, नहीं तो जरूर आवते। वो बहन जी रोज आके यहां घंटों बैठी रहती हैं। मुझे सुनकर आश्चर्य हुआ। मैंने सोचा, रोज मिलती है तो बिट्टू को प्यार कर लेती है, बिट्टू है भी तो प्यार करने लायक, लेकिन वह इस प्रकार बिट्टू से बंध गई है, मुझे विश्वास नहीं था।
पुजारी ने बताया कि उसके यहां भगवान का दिया सब कुछ है, बस संतान नहीं है। सात साल शादी को हो गए हैं।
रक्षाबंधन के दिन पुजारी जी घर पर राखी बांधने आए, तब मैं बिट्टू को अस्पताल ले जा रहा था। उसकी तबियत अचानक खराब हो गई थी। उधर पत्नी पहले से ही बीमार पडी थी। दूसरे दिन बिट्टू की तबियत और खराब हो गई। दस्तों में खून आता था। खून की जरूरत थी। डाक्टर कह गए थे, किसी से खून दिलवाने का इंतजाम करूं। उसकी आंखें मुंदी तो नर्स से उसे देखते रहने को कह कर मैं ब्लड बैंक में गया, और बेड नंबर बता कर मैंने खून देने के लिए कहा।
वहां के डाक्टर ने बडे आश्चर्य से कहा, चिल्ड्रन वार्ड में ग्यारह नंबर के लिए? उसके लिए तो बच्चे की मां कब का खून दे गई है। मैच भी हो गया है, उसी ग्रुप का है। आप कौन हैं? मैंने कहा, आपको गलतफहमी हुई है, बच्चे की मां तो घर पर बीमार पडी है। डाक्टर ने रजिस्टर खोला और पूछा, बेड नंबर ग्यारह, चिल्ड्रन-वार्ड?
मैंने कहा, हां
डाक्टर कुछ देर मेरी ओर देखता रहा। फिर बोला, आप कौन हैं? आप ने बताया नहीं।
बिट्टू मेरी बेटी है, मैंने जवाब दिया।
डाक्टर कहने लगा, कमाल है! आप कह रहे हैं कि आपकी पत्नी बीमार हैं और अभी जो खून देकर गई हैं वह तो खूब भली चंगी थीं। हां, रो बहुत रही थीं। जाइए, उन्हें संभालिये, खून दे कर उन्होंने आराम भी नहीं किया है। मेरा माथा ठनका। वापस पहुंचा तो वही महिला बिट्टू के पलंग के पास की खिडकी के सामने बरामदे में खडी थी। उसके साथ एक सज्जन भी थे।
मैंने, हाथ जोडकर उन्हें नमस्कार किया और कहा, आपने बडी मेबरबानी की, मैं तो आप को जानता भी नहीं। मैंने पहली बार महिला की आवाज सुनी, कांपती आवाज में उन्होंने पूछा, मैं बिट्टू को देख आऊं?
क्यों नहीं? इसमें पूछने की क्या बात है? मैंने कहा। आंखों में उमडते आंसुओं के साथ वह बोली, कहीं आप सोचें, मुझ अभागिन.. छि:, ऐसा मत सोचिए, मैंने उनकी बात काट दी, और उसके बाद जो वह जाकर बिट्टू की बगल में बैठी तो उठी ही नहीं। उसके पति मुझे अक्सर घर पर अपनी पत्नी की देखभाल के लिए भेज देते। उन्होंने बिट्टू की देखभाल मां-बाप की तरह की।
एक दिन बाद जब वार्ड में पहुंचकर मैंने बिस्तर खाली देख सिस्टर से मरीज के बारे में पूछा तो उसका जवाब था, उसके मां बाप उसे जरा टहलाने ले गए हैं।

पिता और पुत्र
[कृष्ण बिहारी]
हमदान स्ट्रीट पर अहल्या एक्सचेंज सेंटर के सामने बस पार्किग और पिक एंड ड्रॉप स्पॉट पर कार पार्क करके इंतजार कर रहा हूं। ठण्ड के इस मौसम में भी गरमी लग रही है। तीन लेन वाली सडक पर सौ से ऊपर की रफ्तार में कारें सन्न-सन्न गुजर रही हैं। वह बैंक से निकलने वाला है। रात के साढे नौ बज रहे हैं। वह आएगा और कार में मेरी ड्राइविंग सीट के साथ वाली सीट पर बैठने के बाद पूछेगा, क्या सोचा मेरे बारे में? यह लडका जो मेरा बेटा है कुछ समझता ही नहीं। ऐसे मनहूस समय में नौकरी को लात मारने पर आमादा है। इसी महीने में इस लडके को जॉब में कन्फर्म होना है और वेतन सत्तर हजार रुपये हो जाएगा। और यह नौकरी.. यह नौकरी भी ऐसे ही नहीं मिली है। सिफारिश से मिली है।

इस लडके की समझ को हुआ क्या है, यह मेरी समझ से बाहर है.. अब यह हर रोज एक ही बात बोलता है, मैं रिजाइन करुंगा.. यह नौकरी मैं नहीं कर सकता.. इस नौकरी में रह गया तो जिंदगी खत्म हो जाएगी.. इस नौकरी में काम का कोई सिस्टम नहीं है.. यहां काम का प्रॉपर डिस्ट्रीब्यूशन नहीं है.. कोई ऑर्डर नहीं है.. काम का बोझ है.. यह रॉटेन इण्डियन सिस्टम है.. कम से कम पैसे में अधिक से अधिक काम लो.. सब छोडना चाहते हैं लेकिन कोई रिस्क नहीं लेता.. नहीं ले सकता.. अभी नहीं छोडा तो मैं भी फिलीपोज हो जाऊंगा.. मैं फिलीपोज होना नहीं चाहता.. जानते हैं आप फिलीपोज को? मैं कहता हूं कि जानता हूं फिलीपोज को। वह तीस साल से एक ही कुर्सी पर बैठा है। और यह भी जानता हूं कि नौकरी में किसी को खुशी नहीं मिलती। नौकरी खुशी की चीज नहीं है मगर करनी पडती है। सब करते हैं। दो-चार साल करो यह नौकरी। कुछ पैसे बचा लो। फिर छोड देना। कौन तुम्हारी बीवी-बच्चे घर में बैठे हैं कि तुम उनके साथ क्वालिटी टाइम स्पेण्ड नहीं कर पा रहे हो.. दो तीन साल में ही तुम्हारे पास इतना पैसा हो जाएगा कि कोई भी फैसला तुम स्वतंत्र रूप से ले सकोगे.. मगर नहीं.. वह आगे बोलता है, इस नौकरी में अपने लिए ही नहीं है.. और सुनिए.. मुझे पैसा नहीं कमाना है..जीवन को सादगी से जीने के लिए जितना पैसा चाहिए वह मैं कमा लूंगा.. आप पर बोझ नहीं बनूंगा. आपसे कुछ मांगूगा नहीं.. हां, यह जरूर है कि आपको कुछ दे नहीं सकूंगा.. मुझे मालूम है कि मम्मी और आपने सोचा होगा कि लडका बडा होगा.. बडा नाम करेगा.. ऐसा कुछ मैं करने वाला नहीं.. मैंने फैसला कर लिया है कि मैं रिजाइन करूंगा..। उसकी बातें मुझे थर्रा देती हैं। इण्डिया जाएगा तो कहां जाएगा? कहां रहेगा? क्या सोचेगा और क्या करेगा? जब एक भारतीय बैंक की कार्य प्रणाली को रॉटेन सिस्टेम कह रहा है तो जहां पूरा देश ही रॉटेन सिस्टेम से ग्रस्त हो वहां यह क्या करेगा? बी.बी.ए. के तीन साल को छोडकर जन्म से विदेश में रहा है। उन तीन सालों में भी इस तरह रहा कि जैसे राजकुमार हो। मैं बात को घुमाकर उससे कहता हूं, ठीक है तुम्हें गाडी-बंगला नहीं चाहिए.. मान लिया कि शादी भी नहीं करोगे.. मैं इसके लिए कभी तुम पर दबाव भी नहीं बनाऊंगा.. लेकिन कहीं तो रहोगे तुम.. तो उसके लिए किराया चाहिए.. जब घर पर नहीं रहोगे.. मामा के पास नहीं जाओगे तो जहां रहोगे वहां किराया देना होगा.. फोन.. मोबाईल.. इण्टरनेट.. पानी-बिजली चाहिए कि नहीं.. खाना खाओगे या केवल हवा पीकर जियोगे? यह सब क्या मुफ्त में मिलता है? चलो यह भी मान लिया कि तुम हमें किसी तरह का कोई सपोर्ट नहीं दोगे, तो क्या यह तुम्हारा फर्ज नहीं बनता कि तुम कम से कम हमारे बारे में कुछ तो सोचो। तुम तो पल्ला ही झाडकर चलने की सोच रहे हो.. काम से भी.. और जीवन से भी.. किसी लडकी-वडकी का चक्कर हो तो बता दो.. आप नहीं समझ रहे हैं.. समझेंगे भी नहीं.. मैं काम और जिंदगी से भाग नहीं रहा.. मैं अपने ढंग से जीना चाहता हूं और काम भी अपने मन का करना चाहता हूं.. आप बताएं, आप क्यों लिखते हैं? आप ऑथर बनना चाहते थे? बने न? लेकिन मुझे अपने काम से कोई खुशी नहीं मिल रही। कुछ कर पाऊंगा या नहीं यह सब फिलहाल अंधकार में है.. और लडकी-वडकी का कोई मामला नहीं है.. होता तो सबसे पहले आपको ही बताता.. मुझे उसकी सवाल पूछती और स्पष्ट बातें तर्कातीत् लगती हैं लेकिन मेरे पास जवाब है, लिखने से मुझे खुशी मिलती है इसीलिए लिखता हूं.. लेकिन लिखने के लिए मैं जीवन से भागा नहीं.. मैं भी शादी नहीं करना चाहता था। उसके कारण भी थे.. फिर भी, न चाहते हुए भी शादी की.. और जब की, तो उसे निभाया भी.. अब यह अलग बात है कि वह तुम लोगों के पैमाने पर खरी उतरी या नहीं.. लिखना बंद नहीं हुआ क्योंकि यह मेरे जीने की शर्त है.. मगर.. इसके साथ-साथ मैंने और क्या-क्या है जो नहीं किया? अखबार की नौकरी की.. पार्ट टाइम रेडियो पर काम किया.. अनुवाद का काम किया.. टीचर की नौकरी की.. ट्यूशंस कीं.. एक के बाद दूसरी नौकरी छोडी लेकिन तुम्हारी तरह भागा नहीं.. आप समझ नहीं रहे.. मैं भाग नहीं रहा.. निकल रहा हूं, उस दलदल से जिसमें फंस गया हूं.. अब तक जो किया है वह आपके कहने पर.. मैं शुरू से कह रहा था कि जो पढाई आप करा रहे हैं वह मेरे किसी काम की नहीं.. पढाई नहीं करते तो क्या करते? स्कूल-कॉलेज में यही पढाई होती है। इसके बाद ही लोग अपनी मर्जी से भविष्य चुनते हैं.. पापा, मैं यह नौकरी छोडना चाहता हूं.. आपने मेरे लिए जो किया है वह मैं जानता हूं.. अब मुझे अपनी मर्जी से कुछ करने तो दीजिए.. जो होगा उसके लिए मैं किसी को दोष नहीं दूंगा। पिछले तीन-साढे तीन महीनों से हमारी बातचीत लगभग ऐसे ही किसी मुकाम पर आकर ठहर जाती है। मुझे कभी तो उसके आत्मविश्वास पर गर्व होता है तो कभी लगता है कि क्या बकवास कर रहा है यह लडका। जो सुनता है वही अचरज प्रकट करते हुए कहता है कि समझाओ उसे कि यह मंदी समय नौकरी छोडने का नहीं बल्कि नौकरी को बचाए रखने का है। इंतजार करते हुए पंद्रह मिनट से अधिक हो गए हैं। मैं फिर कार में बैठ गया हूं। निगाहें सामने चौराहे के सिग्नल पर जमीं हैं। लोग सडक क्रास कर रहे है। वह दिख गया है। मगर यह क्या.. उसकी चाल बदली हुई है। उडान भरती हुई। बेफिक्र.. मस्त.. बेहद बिन्दास। वह पहले की तरह निश्चित दिख रहा है। चाल भी तेज है। बढते कदमों से आकर उसने कार का दरवाजा खोला और बैठ गया है। मैं पूछता हूं, बडे खुश हो? हां.. रेजिग्नेशन की नोटिस दे दी.. अब मुक्त हूं.. चलाइए कार.. कुछ मत सोचिए.. मैं बिल्कुल टेंस नहीं हूं और आप भी टेंशन मत लें.. चलें। मैंने कार को डी पर डालकर हैण्ड ब्रेक रिलीज कर दिया है। कार जिंदगी की तरह आगे बढ चली है..i



खेल
[डॉ. विनयकुमार मालवीय]
राममिलन की ट्रेन एक घंटा लेट थी, वह प्लेटफार्म पर बैठकर घर की पूडी खाने लगा। तभी एक भिखारिन उसके पास पहुंची और बोली, बाबूजी एक पूडी दे दीजिए। बडी भूख लगी है। परन्तु राममिलन ने उसकी ओर ध्यान नहीं दिया। इस पर वह गिडगिडाते हुए फिर बोली, बाबूजी, बडी भूख लगी है। एक पूडी दे दीजिए। भगवान आपका भला करेंगे।
यह सुनकर राममिलन ने उसकी ओर देखा और उसे एक पूडी दे दी। वह औरत कुछ दूर जाकर उसे खाने लगी। खाते ही वह खों-खों करने लगी। ऐसा लगा मानो उसे उल्टी होने वाली है। तभी एक सिपाही उसके पास पहुंचा और पूछा, क्या बात है?
साहब, सामने जो बाबू जी बैठे हैं, उन्होंने मुझे यह पूडी खाने के लिए दी थी। इसे खाते ही उल्टी होने लगी। भिखारिन बोली। चलो मेरे साथ, देखो कौन आदमी है? सिपाही ने कहा। भिखारिन सिपाही के साथ राममिलन के पास गयी। वहां सिपाही ने राममिलन को डांटते हुए पूछा, क्या तुमने इस औरत को पूडी दी थी?
जी हां। राममिलन घबडाते हुए बोला। तो तुम लोगों को खराब पूडी देते हो। सिपाही ने डांटते हुए पूछा। नहीं साहब, ऐसा नहीं है। मैं अपने घर की पूडी खा रहा था। यह आकर मांगने लगी तो मैंने इसे एक पूडी दे दी। देखिए, मैं तो अब भी पूडी खा रहा हूं। राममिलन बोला। तुम झूठ बोलते हो। तुमने इसे पूडी क्यों दी? देखो तुम्हारी पूडी खाने से इसे उल्टी होने लगी। चलो मेरे साथ। सिपाही ने डांटते हुए कहा।
कहां चलूं? मेरी ट्रेन आने वाली है। राममिलन ने कहा। मैं जो कहता हूं उसे सुनो और चुपचाप मेरे साथ चलो। सिपाही जोर से डांटते हुए बोला।
अब राममिलन क्या करता। वह सिपाही के साथ चल दिया। उसके पीछे-पीछे भिखारिन भी चल दी।
कुछ दूर जाने पर सिपाही ने राममिलन को कुछ समझाया। पहले तो वह सिपाही की बातों से सहमत नहीं हुआ लेकिन फिर उसने जेब से कुछ रुपये निकाल कर उसे दे दिये और वहां से तेजी से चल दिया। कुछ कदम चलने के बाद उसने पीछे मुडकर देखा तो भिखारिन हंसते हुए रुपये गिन रही थी।


पूजा पाठ
[वैद्यनाथ झा]
सबेरे का समय। नहा धोकर पूजा करने बैठा था। धूप-दीप के बाद पाठ करने का उपक्रम कर ही रहा था कि काम वाली लडकी मेरे कमरे में आई। उसे उस कमरे में पोंछा लगाना था। उसे देखकर मैं उठने लगा ताकि वह पोंछा लगा सके। उसने टोका- अंकल, पूजा पूरी किए बिना नहीं उठते। मैं अवाक्। चौदह-पंद्रह साल की गंवई लडकी ने सीधी सच्ची बात बिना किसी लागलपेट के कह दी। वह मुस्करा रही थी। एक सहज निश्छल, निष्कपट, मुस्कराहट।
मैंने यूं ही पूछ लिया- तू पूजा पाठ करती है?
वह बोली- हां अंकल, करती तो हूं मगर आपकी तरह नहीं। उसकी मुस्कराहट का विस्तार हो रहा था।
फिर कैसे करती हो?
भी अपने ढंग से पूजा करती हूं। आपकी पूजा का वक्त आगे-पीछे हो सकता है मगर मेरा नहीं। और अपनी पूजन सामग्री साथ रखती हूं। रुकिए आपको दिखाती हूं। कमरे से बाहर गई और झाडू, पोंछे का कपडा और बर्तन मांजने वाला ब्रश ले आई। दिखाते हुए बोली- ये है धूप-दीप।
कहते हुए खिलखिलाकर हंस पडी। मैं समझ नहीं पा रहा था कि लडकी का कथन मात्र मजाक के रूप में लूं, गहरे व्यवहार दर्शन के रूप में लूं या अनजाने ही मेरे ज्ञान को अप्रत्यक्ष चुनौती मानूं। जो भी हो, यह जरूर जानता था कि लडकी समय की इतनी पाबंद है कि उससे घडी मिलाई जा सकती है।

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