रविवार, 28 नवंबर 2010

भागवत: १२९: जब सुदर्शन चक्र से घबराकर भागे ऋषि दुर्वासा


मनु पुत्र नवभ के घर पर नाभाग हुए और भगवान शंकर की कृपा से नाभाग के घर भगवान अम्बरीष का जन्म हुआ। अम्बरीष मर्यादा भक्ति के आचार्य हैं। एक बार अम्बरीष ने संकल्प लिया। वर्ष भर एकादशी व्रत के लिए पूजा की और तब वहां दुर्वासा ऋषि पधार गए। अम्बरीष ने उन्हें यथोचित सत्कार कर भोजन के लिए आमंत्रित किया। दुर्वासा ने निमंत्रण स्वीकार किया और स्नान के लिए नदी तट पर चले गए। दुर्वासा को आने में विलम्ब हो गया और द्वादशी समाप्त होने को आई। राजा संशय में डूब गये क्योंकि ऋषि को भोजन कराए बिना भोजन करना सम्भव नहीं था, अतिथि दोष का भागी बनता और यदि भोजन नहीं करते तो सारा व्रत निष्फल जाता है।
पंडितों ने कहा कि जल ही भोजन है तो राजा ने जल पी लिया। जब दुर्वासा लौटे तो उन्हें ज्ञात हुआ कि राजा ने जल पी लिया है। दुर्वासा ने अपनी जटा से एक बाल उखाड़कर क्रोध से जैसे ही पृथ्वी पर पटका तो एक कृत्या प्रकट हई उसके हाथ में एक तलवार थी और वह तलवार लेकर राजा पर झपटी। कृत्या को अपनी ओर आता देख राजा स्थान से विचलित नहीं हुआ तभी भक्त की सहायता के लिए भगवान ने अपना चक्र भेजा और उस चक्र ने कृत्या को वहीं भस्म कर दिया। फिर वह चक्र दुर्वासा ऋषि की ओर बढ़ा और दुर्वासा ऋषि सुदर्शन चक्र के प्रहार से बचने के लिए नदी, वन, कंद्रास समुद्र आदि-आदि स्थानों पर भागते रहे। कहीं भी उनको स्थान नहीं मिला। निराश होकर ब्रह्माजी की शरण में गए। शंकरजी की शरण में गए, उन्होनें भी यही कहा कि साक्षात भगवान विष्णु की शरण में जाओ।
ऋषि दुर्वासा भगवान विष्णु के पास गए और प्रार्थना करने लगे। भगवान ने उन्हें अपने भक्त को निरर्थक ही दु:ख देने के अपराध में बहुत कुछ कहा, बहुत समझाया और कहा कि वे अंबरीष से क्षमायाचना करें। दुर्वासा अंबरीष के पास आए और क्षमा याचना की। उन्हें प्रणाम करने लगे तो राजा ने कहा कि नहीं, महाराज आप वन्दन नहीं करें यह आपको शोभा नहीं देता। प्रणाम तो मुझे आपको करना चाहिए। राजा ने सुदर्शन चक्र से प्रार्थना की कि आप शांत हो जाइये। सुदर्शन शांत होकर वापस लौट गया।

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