बुधवार, 1 जून 2011

भागवत 268

छल को छल से नहीं जीता जा सकता
कर्ण जैसा योग्य और ज्ञानी लेकिन उलझा हुआ था दुर्योधन में। सब लोग बैठे हैं, तैयारी की। घोषणा की गई, द्रौपदी आई। सबसे कहा पराक्रम दिखाएं। कोई नहीं दिखा पाया। जैसे ही कर्ण खड़ा हुआ सभी जानते थे कि कर्ण निशाना लगा देगा। यह बिल्कुल तय था।
द्रौपदी ने एकदम से घोषणा की कि इनको रोकिए यह इस स्वंयवर के योग्य नहीं हैं। मैं इनको अनुमति नहीं देती और नहीं मैं इनको वरूंगी क्योंकि यह सूत पुत्र है, क्षत्रिय नहीं हैं। कर्ण बड़ा अपमानित हुआ। कर्ण को लगा यह तो मेरा सीधा-सीधा अपमान है। बैठ गया। दुर्योधन तमतमा गया और फिर बारी आई एक ब्राह्मण की। ब्राह्मण युवक गठीला, अर्जुन।
पाण्डव वेष बदलकर स्वयंवर में आए थे क्योंकि कौरव पहचान लेंगे तो फिर आक्रमण करेंगे, छिपते फिर रहे थे। मां डरी हुई थी कि बेटा तुम में से एक चला जाएगा। तो अपना प्रकाशन मत करो। इनको यही समझने दो कि हम मर गए। बाद में हम नीति बनाएंगे, यह तो छल पर उतर आए हैं। एक बात याद रखिए छल का कोई इलाज नहीं है। छल का इलाज छल है तो आप भी छली हो जाएंगे। छल का इलाज सिर्फ भगवान हैं। छल को छल से नहीं जीता जा सकता और प्रयास भी मत करिएगा।

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