शुक्रवार, 17 जून 2011

ऐसा करने से मिलता है तीर्थ यात्रा का सौ गुना फल

युधिष्ठिर नारदजी द्वारा तीर्थों की महिमा सुनने के बाद अपने भाइयों से सलाह की और उन सभी की सहमति से वे धौम्य ऋषि के यहां पहुंचे। युधिष्ठिर ने अपने पुरोहित धौम्य ऋषि से कहा अर्जुन तपस्या के लिए वन गया है। अर्जुन हम सब में सर्वश्रेष्ठ है। आप कृपा करके कोई ऐसा पवित्र और रमणीय वन बताइए। जहां सत्पुरूष रहते हों।तब धौम्य ऋषि ने कहा तीर्थो का महात्म्य सुनने से पुण्य मिलता है और उसके बाद उनकी यात्रा करने से सौ गुना फल की प्राप्ति होती है। उसके बाद धौम्य ऋषि ने कहा कि मैं आपको पूर्व दिशा के तीर्थों का महत्व व वर्णन सुनाता हूं। नैमिषारणाय नाम का एक तीर्थ हैं जहां गोमती नदी के तट पर अनेक देवता व ऋषि यज्ञ करते हैं। गया का नाम तो आपने सुना ही होगा।
गया के संबंध में प्राचीन विद्वानों का मत है कि मनुष्य का पुत्र अगर उसका पिण्डदान गया के किनारे करे तो उसका बहुत जल्दी उद्धार होता है। गया क्षेत्र में एक महानदी नाम का और गयशिर पाम का तीर्थ स्थान है। वहां एक अक्षयवट नाम का महावट है।जहां पिण्डदान करने पर अक्षय फल मिलता है। विश्वामित्र की तपस्या का स्थान कौशिकी नदी हैं जहां उन्होंने ब्राह्मणत्व प्राप्त किया था। भागीरथी नदी भी पूर्व दिशा में ही बहती हैभागीरथी नदी जिसके तट पर राजा भागीरथ ने कई यज्ञ किए व दक्षिणाएं दी। प्रयाग भी पूर्व दिशा में ही है। अगस्त्य मुनि का आश्रम व अन्य कई ऋषियों की तपोभूमि भी पूर्व ही है।
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