बुधवार, 22 जून 2011

भागवत २८५

उन लोगों को बिना मांगे ही मिल जाता है सबकुछ जो...
यहां से सुदामा का प्रसंग शुरू होता है।एक दिन भगवान् को द्वारिका में एक सूचना दी गई कि द्वार पर फटेहाल ब्राह्मण आया है और आपसे मिलने का आग्रह कर रहा है और यह मिलने का समय नहीं है। भगवान् रानियों से सेवा करा रहे थे। कोई रानी पंखा कर रही है, कोई चरण स्पर्श कर रही हैं। आठों पटरानियां आसपास हैं। इस समय भगवान् किसी से नहीं मिलते। द्वारपाल आकर बोला- वह बड़ा हठीला है, रोने लगा और इतना दीन-हीन है कि जब वह कहने लगा कि मिला दो, मिला दो, तो हमें उस पर दया आ गई। आपसे मिलना चाहता है
भगवान् ने कहा-इस समय कौन है, क्या समस्या आ गई। द्वारपाल ने कहा- वह अपना नाम सुदामा बताता है। इतना सुनकर एकदम कूदे भगवान् पलंग से। रानियों को लगा, यह क्या हो गया। एकदम से कूदे, सुदामा मेरा बालसखा है यह कहकर एकदम दौड़े भगवान्। यह देख द्वारपाल घबरा गए कि क्या हुआ स्वास्थ ठीक नहीं है, रानियां भी चौंक गईं। तब तक तो द्वार पर पहुंच गए। सुदामा भगवान् का बालसखा था, सांदीपनि आश्रम में पढ़ता था। उसकी पत्नी का नाम सुशीला था। कुछ कमा-धमा नहीं पाया बहुत ही दीन-हीन था।
एक दिन तो खाने के लाले पड़ गए तो उसकी पत्नी ने कहा-तुम रोज घर में तो घटनाएं सुनाते हो हमको कि तुम कृष्ण के साथ पढ़े हो, द्वारिकाधीष के साथ पढ़े हो। घर में कई लोग यही किस्सा सुनाते हैं, किसी बड़े आदमी के साथ पढ़े हो तो जीवनभर याद करता है उसको। अपने बच्चों को सुनाता है कि वो हमारे साथ पढ़ते थे। हमारे साथ रहते थे, हमारे मोहल्ले में रहते थे। पुराने जो आगे बढ़ जाते हैं उनके किस्से तो चलते ही हैं। बच्चों को यही सिखाता, यही सुनाता है कि कृष्ण मेरे साथ पढ़े हैं। एक दिन उसकी पत्नी ने बोला-इतनी तारीफ करते हो कुछ मांग लो बच्चे भूखे मर रहे हैं।
आटा घोलकर पिलाती हूं दूध की जगह, जाओ अपने मित्र के पास।
इस प्रकार सुदामाजी की पत्नी ने उनसे कई बार बड़ी नम्रता से प्रार्थना की, तब उन्होंने सोचा कि धन की तो कोई बात नहीं है, परन्तु भगवान् श्रीकृष्ण का दर्शन हो जाएगा, यह तो जीवन का बहुत बड़ा लाभ है। ज्ञानी पुरुषों की विशेषता ही यह होती है कि वे हर बात में अध्यात्म और भक्ति का समावेश कर लेते हैं। सुदामा की पत्नी बच्चों की चिंता में थी, गरीबी और भुखमरी से ग्रस्त थी लेकिन सुदामा इसमें भी श्रीकृष्ण के दर्शनों का लाभ देख रहे हैं। मन में जब ऐसी घटनाएं आ जाएं तो फिर परमात्मा से कुछ मांगने की आवश्यकता नहीं पड़ती। बिना मांगे ही भण्डार भर जाता है।

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