बुधवार, 27 जुलाई 2011

इससे हो सकता है हमारा और समाज का विकास...

अच्छी बातें जहां कहीं भी मिलें स्वीकार करके अपने भीतर उतारना चाहिए लेकिन इसी समय यह भी ध्यान रखना चाहिए कि अच्छाई और शांति हमारे भीतर से फिर बाहर निकले और समूचे समाज में फैले। यह जब दो तरफा होगा तभी इसके परिणाम सही मिलेंगे।
स्वामी अवधेशानंद गिरिजी एक जगह कहते हैं- प्रत्येक व्यक्ति इस तरह का जीवन जी रहा है कि उसकी जिंदगी कई हिस्सों में बंट जाती है- भौतिक शरीर, मन, बुद्धि। और इन सबके अलावा एक आध्यात्मिक पक्ष है भगवान। इन स्तरों पर हम अपने आप को बिखरा हुआ महसूस करते हैं जबकि इनमें तालमेल होना चाहिए, एक रिदम होना चाहिए, एक भरोसा होना चाहिए।
हम सही तरीके से पूरे व्यक्तित्व के रूप में संगठित नहीं हो पाते। इसका एक कारण यह है कि हम लोग अपने आध्यात्मिक पक्ष से ठीक से परिचित नहीं हो पाते। यदि अपने व्यक्तित्व को सम्पूर्ण बनाना है तो अपने आध्यात्मिक पक्ष को विकसित भी करना पड़ेगा और उससे परिचित भी होना होगा। इसमें एक बाधा है अहंकार।
अहंकार हमें तोड़ता है, जोड़ता नहीं। लेकिन अहंकार का भाव आसानी से जाता भी नहीं है। आप इसे जितना मिटाने की कोशिश करेंगे यह उतना ही नई-नई शक्लों में सामने आ जाता है। और कुछ नहीं तो विनम्रता के रूप में ही आ जाएगा। अहंकार को मिटाने से अच्छा है उसे समझा जाए। बिना इसे समझे यह मिटेगा नहीं, बल्कि समझ आई और यह गया। अहंकार के अंधकार को हटाने के लिए समझ एक दीए का काम करेगा।
अहंकार हटा और हमें अपने भीतर उतरने में सुविधा हुई। भीतर उतरते ही हमारा सबसे पहला जुड़ाव परमात्मा से होगा। प्रभु में प्रेम है, प्रकाश है, शांति है, आनंद है और चेतन है। यही सब हमारे भीतर आएगा और हमारे व्यक्तित्व के टूटे हुए हिस्से फिर जुड़ जाएंगे।
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