गुरुवार, 25 सितंबर 2014

या देवी सर्वभूतेषु......शक्तिरूपेण संस्थिता

भारतीय धर्म और सनातन संस्कृति में नारी शक्ति को सदैव ही श्रृद्धा एवं सम्मान की दृष्टि से देखा गया है। नारी शक्ति को उसके सकारात्मक रूप में देखने की ऐसी अद्भुत मिसाल किसी अन्य देश या संस्कृति में नहीं मिलती। इसीलिये धर्म में देवी को ही देवताओं की शक्ति का मूल उत्सव माना गया है।
देवताओं को जब भी पराजय का सामना करना पड़ा या शक्ति की कमी का अनुभव हुआ उन्होंने देवी की ही आराधना और प्रार्थना की। शक्तिरूपा देवी के प्रसन्न होने पर ही देवताओं को युद्ध में सफलता प्राप्त हो सकी। आदिशक्ति, जगतजननी, मां भुवनेश्वरी, शक्तिरूपा, नौ दुर्गा आदि विभिन्न नामों से नारी शक्ति को ही दर्शाया गया है। यदि देवी दुर्गा के नौ रूपों को पूरी गहराई से ध्यानपूर्वक देखा जाए तो देवी के वास्तविक स्वरूप को समझने का सार्थक प्रयास किया जा सकता है। हम देखते हैं कि देवी के रूप में जहां अनुपम सौन्दर्य है तो वहीं अजैय शक्ति का केन्द्र भी है। संगीत रूपी अमृत भी उनके स्वरूप में है तो ज्ञान की पराकाष्ठा के प्रतीक वेद भी। दुष्ट-अधार्मिकों के विनाश के लिये अजैय शक्ति, मन को प्रसन्नता और शीतलता प्रदान करने वाला अनुपम-निर्मल सौन्दर्य, सदैव सन्मार्ग की और गति के लिये प्रेरित करने वाला आत्मज्ञान आदि सबकुछ जिस एक ही केन्द्र में समाहित हो वह केन्द्र ही देवी का स्वरूप है। आज भी यदि स्त्रियां इन सभी गुणों को अपने व्यक्तित्व में शामिल कर लें तो वे पुनरू निश्चितरूप से उसी सम्मान और गौरव को प्राप्त कर सकती हैं। इन गुणों को जगाने भर की देर है क्योंकि ये सभी गुण पूरी नारीजाति में सुप्त रूप से उपस्थित तो हैं ही।

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