गुरुवार, 25 सितंबर 2014

चैत्र व आश्विन माह में ही नवरात्रि पर्व क्यों?

वरात्र पर्व हमेशा चैत्र और आश्विन मास में मनाये जाने के पीछे एकवैज्ञानिक कारण है कि मौसम-विज्ञान के अनुसार ये दोनों ही माससर्दी-गर्मी  की सन्धि के महत्वपूर्ण मास हैं। शीत ऋतु का आगमनआश्विन मास से आरंभ हो जाता है और ग्रीष्म का चैत्र मास से। ज्यों हिएक ऋतु का पदार्पण हुआ कि सम्पूर्ण भौतिक जगत में एक हलचलप्रारंभ होने लगती है। पेड-पौधे,वनस्पति जगत,जल,आकाश औरवायुमंडल तक सबमें परिवर्तन होने लगता है। ये दोनो मास दोनोंऋतुओं के संधिकाल हैअतः हमारे स्वास्थय पर इनका विशेष प्रभावपडता है।
चैत्र में गर्मी के प्रारंभ हो जाने से पिछले कईं मास से जो रक्त का प्रवाह मंद था, अब वो हमारी नसों नाडियों में तीव्र गति से प्रवाहित होने लगता है। केवल रक्त की ही बात नहीं, यह नियम शरीर के वात, पित्त, कफ इन तीनों तत्वों पर भी लागू होता है। यही कारण है कि संसार के अधिकांश रोगी इन दोनों मासों में या तो शीघ्र अच्छे हो जाते हैं या फिर मृ्त्यु को प्राप्त होते हैं। इसलिए शास्त्रकारों नें सन्धि काल के इन्ही मासों में शरीर को पूर्ण स्वस्थ रखने के लिए नौ दिन तक विशेष रूप से व्रत-उपवास आदि का विधान किया है।
नव रक्त संचारी वसन्त के इन मादक दिनों में मन में विषय वासना की नईं तरंगें भी मन को खूब आंदोलित करती हैं, किन्तु यदि ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए इन नौ दिनों में आपके विधिपूर्वक व्रत-उपवास का आश्रय लिया तो समझिए कि आगामी ऋतुकाल के लिए आपने अपने भीतर शक्ति का संचय कर लिया, फल आपको ये मिलेगा कि आगामी ऋतु परिवर्तन तक न तो कोई रोग,व्याधी और न किसी प्रकार की चित्त की विकलता ही आपको पीडित करेगी। नवरात्रि के साथ ही रात्रि शब्द जुडा हुआ है। इस विषय में शास्त्र वाक्य है कि रात्रि रूपा यतोदेवी, दिवा रूपो: दिन को शिव(पुरूष) रूप में तथा रात्रि को (शक्ति) प्रकृ्ति रूपा माना गया है। एक ही तत्व के दो स्वरूप हैं फिर भी शिव(पुरूष) का अस्तित्व उसकी शक्ति(प्रकृ्ति) पर ही आधारित है।
या देवी सर्व भूतेषु बुद्धि रूपेण संस्थिता
नमस्तुभ्यं नमस्तुभ्यं नमस्तुभ्यं नमो नमः ।।

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