गुरुवार, 2 दिसंबर 2010

भागवत: १३२: जन्म-मरण के बंधनों से मुक्ति दिलाती है रामकथा

भागवत में हम सूर्यवंश की कथा सुन रहे हैं। भागवत में राम जन्म की चर्चा नहीं आई है पर आज हम इस गौरव की अनुभूति को ले लें कि कृष्ण जन्म तो हम कर ही रहे हैं साथ ही संक्षेप में रामकथा का श्रवण भी करते चलें। रामकथा जन्म-मरण के बंधनों से मुक्ति दिलाती है। सूर्यवंशी राजा दशरथ के यहां चार पुत्र हुए । सबसे बड़े थे राम, फिर भरत, लक्ष्मण और सबसे छोटे थे शत्रुघ्न। चारों राजकुमार बड़े हुए, लेकिन रामजी को देखकर दशरथजी को एक दिन चिन्ता हुई। रामजी जैसे-जैसे बड़े होने लगे, आचरण में वैराग्य दिखने लगा।

भजन-पूजन करते, अच्छी-अच्छी बातें करते तो दशरथजी को चिन्ता हुई कि मेरे बेटे को ये वैराग्य कैसे पैदा हो रहा है जबकि मैं तो राजा हूं। वे गुरु के पास गए। ऐसा कहते हैं कि वशिष्ठजी ने भगवान को योग वशिष्ठ सीखाया। उन्होंने कहा कि वैराग्य होना बहुत अच्छी बात है पर आप राजकुल के सदस्य हैं। आपके दायित्व क्या होने चाहिए, अपने कर्तव्यों को पहचानें और भगवान फिर उस मार्ग पर चलें। चारों राजकुमार बड़े हो गए। एक दिन अचानक ऋषि विश्वामित्रजी आए। विश्वामित्रजी ने दशरथजी से कहा-हम बहुत परेशान हैं, राक्षस यज्ञ नहीं करने देते। आप ये दोनों राजकुमार राम और लक्ष्मण हमें दे दें।
दशरथजी यह सुनकर संशय में पड़ गए। कहा- इतने सुकोमल राजकुमार राक्षसों से कैसे लड़ेंगे? आप इन छोटे-छोटे बच्चों को राक्षसों से लड़ाने ले जा रहे हैं, मना करने लग गए विश्वामित्रजी को। विश्वामित्रजी ने वशिष्ठजी की ओर देखा। वशिष्ठजी ने दशरथजी से कहा कि तुम्हारे बच्चे यज्ञ से पैदा हुए हैं और यज्ञ के लिए मांगे जा रहे हैं, दे दो। ये कुछ सीखकर ही आएंगे। सैद्धांतिक ज्ञान श्रीराम ने वशिष्ठ से प्राप्त किया। अब व्यावहारिक ज्ञान विश्वामित्रजी से प्राप्त करने जा रहे हैं। दोनों राजकुमारों को विश्वामित्र ले गए। दोनों राजकुमारों ने दैत्यों से यज्ञ की रक्षा की और यज्ञ संपन्न हुआ।

लड़कियां पायल क्यों पहनती हैं?

उज्जैन. छम... छम... छम... पायल की ऐसी आवाज किसी के भी मन बरबस ही लुभा लेती है। जब कोई लड़की पायल पहनकर चलती है तो उससे निकलने वाला मधुर स्वर किसी संगीत से कम प्रतीत नहीं होता। सामान्यत: सभी लड़कियां पायल पहनती हैं। विवाहित महिलाओं के लिए तो यह आवश्यक होता है कि वे पायल पहनें।
महिलाओं के लिए पायल पहनना काफी महत्वपूर्ण माना गया है। इसके पीछे कई कारण मौजूद हैं।
पायल महिलाओं के सोलह श्रंगार में अहम भूमिका निभाती है। पायल पहनने के पीछे यह वजह है कि प्राचीन काल में महिलाओं को पायल एक संकेत मात्र के लिए पहनाई जाती थी। जब घर के सभी सदस्य एक साथ बैठे होते थे तब यदि कोई पायल पहनी स्त्री वहां आती थी तो उसकी छम-छम आवाज से सभी को अंदाजा हो जाता कि कोई महिला उनकी ओर आ रही है। जिससे वे सभी व्यवस्थित रूप से आने वाली महिला का स्वागत कर सके, उसे सम्मान दे सके।
पायल की छम-छम अन्य लोगों के लिए एक इशारा ही है, इसकी आवाज से सभी को यह एहसास हो जाता है कि कोई महिला उनके आसपास है अत: वे शालीन और सभ्य व्यवहार करें। स्त्री के सामने किसी तरह की कोई अभद्रता ना हो जाए। ऐसी सारी बातों को ध्यान में रखते हुए लड़कियों के पायल पहनने की परंपरा लागू की गई। साथ ही पायल की आवाज से घर में नकारात्मक शक्तियों का प्रभाव कम हो जाता है और दैवीय शक्तियों सक्रीय रहती है।
पुराने समय में विवाह के बाद पति के घर में बहु के आने के लिए पूरी स्वतंत्रता नहीं रहती थी। साथ ही वह किसी से खुलकर बात नहीं कर पाती थी। ऐसे में जब वह घर में कही आती-जाती तो बिना उसके बताए भी पायल की छम-छम से सभी सदस्य समझ जाते थे कि उनकी बहु वहां आ रही है।
पायल की धातु हमेश पैरों से रगड़ाती रहती है जो स्त्रियों की हड्डियों के लिए काफी फायदेमंद है। इससे उनके पैरों की हड्डी को मजबूती मिलती है। साथ ही पायल पहनने से स्त्रियों का आकर्षण कहीं अधिक बढ़ जाता है।

अगर शांति चाहिए तो सुंदरकांड पढ़िए

सुंदरकांड श्रीरामचरितमानस का चौथा अध्याय है। यह श्रीरामचरितमानस का सबसे अधिक पढ़ा जाने वाला भाग हैं क्योंकि इसमें हनुमानजी के बल, बुद्धि, पराक्रम व शौर्य का वर्णन किया गया है। सुंदरकांड के पढऩे व सुनने से मन में एक अद्भुत ऊर्जा का संचार होता है। सुंदरकांड के हर दोहा, चौपाई व शब्द में गहन अध्यात्म छुपा है, जिससे मनुष्य जीवन की हर समस्या का सामना कर सकता है।पराक्रम, शक्ति व शौर्य के इस अध्याय का प्रथम श्लोक है-
शान्तं शाश्वतमप्रमेयमनघं निर्वाणशान्तिप्रदं

सुंदरकांड का आरंभ जिस श्लोक से हुआ है उसका पहला शब्द ही शांति है अर्थात सुंदरकांड का आरंभ शांति के आव्हान से हुआ है। सुंदरकांड के प्रथम श्लोक कायह प्रथम शब्द यहां संकेत दे रहा है कि वर्तमान युग सुख अर्जित करने का युग है। सुख मिलना बहुत ही आसान है। पहले के समय में जो आदमी के लक्ष्य हुआ करते थे वे अब आसानी से उपलब्ध हो जाते हैं जैसे- घर, बंगला, गाड़ी आदि। लेकिन मन की शांति नहीं मिल पाती। शांति प्राप्त करने का सर्वश्रेष्ठ उपाय भगवत स्मरण ही है। जब आपके मन में भगवान का वास होगा उसी समय शांति भी आपके जीवन में प्रवेश करेगी। इसके लिए आवश्यक है कि स्वयं को प्रभु को समर्पित कर दें और जब सुख व शांति दोनों जीवन में हो तो ही जीवन सुंदर होता है। यही सुंदरकांड का मुख्य उद्देश्य है।

हनुमान की पूजा से मिलती हैं ये आठ सिद्धियां
श्री हनुमान शिव के अवतार माने गए हैं। शास्त्रों के मुताबिक श्री हनुमान सर्वगुण, सिद्धि और बल के अधिपति देवता हैं। यही कारण है कि वह संकटमोचक कहलाते हैं। हर हिन्दू धर्मावलंबी विपत्तियों से रक्षा के लिए श्री हनुमान का स्मरण और उपासना जरूर करता है।
श्री हनुमान की भक्ति और प्रसन्नता के लिए सबसे लोकप्रिय स्तुति गोस्वामी तुलसीदास द्वारा बनाई गई श्री हनुमान चालीसा है। इसी चालीसा में एक चौपाई आती है। जिसमें श्री हनुमान को आठ सिद्धियों को स्वामी बताया गया है।
यह चौपाई है -
अष्टसिद्धि नव निधि के दाता।
अस बर दीन्ह जानकी माता।।
अक्सर हर हनुमान भक्त चालीसा पाठ के समय इस चौपाई का भी आस्था से पाठ करता है। लेकिन इसमें बताई गई अष्टसिद्धियों के बारे में बहुत कम ही श्रद्धालु जानकारी रखते हैं। इस चौपाई के अनुसार यह अष्टसिद्धि माता सीता के आशीर्वाद से श्री हनुमान को प्राप्त हुई और साथ ही उनको इन सिद्धियों को अपने भक्तों को देने का भी बल प्राप्त हुआ। जानते हैं इन आठ सिद्धियों के नाम और सरल अर्थ -
अणिमा - इससे बहुत ही छोटा रूप बनाया जा सकता है।
लघिमा - इस सिद्धि से छोटा और हल्का बना जा सकता है।
महिमा - बड़ा रूप लेकर कठिन और दुष्कर कार्यों को आसानी से पूरा करने की सिद्धि।
गरिमा - शरीर का वजन बढ़ा लेने की सिद्धि। अध्यात्म की भाषा में अहंकारमुक्त होने का बल।
प्राप्ति - इच्छाशक्ति से मनोवांछित फल प्राप्त करने की सिद्धि।
प्राकाम्य - कामनाओं की पूर्ति और लक्ष्य पाने की दक्षता।
वशित्व - वश में करने की सिद्धि।
ईशित्व - ईष्टसिद्धि और ऐश्वर्य सिद्धि।

बुधवार, 1 दिसंबर 2010

हमारे यहाँ कितने ही भोपाल हैं

हमारे तंत्र की सारी गंदगी और जलालत भोपाल गैस त्रासदी के रूप में बेनकाब होती है। कितनी लचर और अपराधियों को बचाने वाली हमारी राजनीतिक-कानूनी व्यवस्था है, इसकी खौफनाक तस्वीर पेश करता है भोपाल गैस कांड।
हिरोशिमा और नागासाकी की याद दिलाने वाली इस घटना के दोषियों को दो साल की सजा यह सोचने के लिए बाध्य करती है कि किस तरह से इस व्यवस्था से कोई भी भारतीय न्याय पाने की उम्मीद रख सकता है।
जिस दुर्घटना ने 1 लाख 20 हजार लोगों की जिंदगी पर असर डाला हो, जिसमें 20 हजार लोगों की मौत हो चुकी हो और जिसके कारण पीढ़ियाँ की पीढ़ियाँ विकलांग पैदा हुई हों, उसके प्रति इतनी भीषण उदासीनता की मिसाल इतिहास में दूसरी नहीं मिलती है।
आजादी के बाद से यह संभवतः पहला मौका है, जिसमें इतने बड़े पैमाने पर इंसानों की जानें जाने के बाद भी सरकार ने एक बहुराष्ट्रीय कंपनी को बचाने के लिए झूठ और मक्कारी का ऐसा जबर्दस्त जाल बुना। उसने यह साबित किया कि हिन्दुस्तानियों की जान पूरे तंत्र के लिए कितनी अधिक सस्ती है।
1984 के अंत में हुई दुर्घटना का न्याय 2010 में मिले और उसमें भी मामूली सी सजा सुनाई जाए, इससे पूरे लोकतंत्र पर सवालिया निशान लगता है। सोचकर हैरानी होती है कि इतने साल बीतने के बाद भी भोपाल के उस इलाके के पानी में जहर बना हुआ है, माँओं के दूध तक में सीसे और पारे जैसे विषाक्त पदार्थ मिल रहे हैं और इससे निजात दिलाने के लिए सरकार कुछ नहीं कर रही है।
इसके उलट अपना सब कुछ गँवा चुके निवासियों को इस तरह के फैसलों से नवाजा जा रहा है।
यह देखकर लगता है कि हम हिन्दुस्तानी होने पर कैसे गर्व करें? ऐसा देश है हमारा, जहाँ कि एक के बाद की एक सरकारें जनता को राहत देने की बजाय एक बहुराष्ट्रीय कंपनी को फायदा दिलाने-राहत दिलाने के लिए काम करती हैं। चाहे वह वैज्ञानिक हो या आम नागरिक, सबके लिए भोपाल गैस कांड जापान के हिरोशिमा-नागासाकी पर परमाणु बम गिराने के समान है।
देश की अब तक की सबसे बड़ी रासायनिक दुर्घटना के बारे में और उसके पीड़ितों के बारे में हमारा जो रवैया बेहद शर्मनाक रहा है। यह बात सिर्फ आंदोलनकारी कह रहे हैं कि वहाँ जहरीली वस्तुएँ मौजूद हैं, ऐसा नहीं है। खुद सरकार की 2002 की रिपोर्ट यह कह रही है कि भोपाल के यूनियन कार्बाइड के पूरे परिसर और आसपास के इलाके में जहरीली-खतरनाक चीजें मौजूद हैं और उनका पूरा असर लोगों के स्वास्थ्य पर पड़ रहा है।
2002 में इस रिपोर्ट के सामने आने पर भी वहाँ के निवासियों को इस जहर से बचाने के लिए कोई ठोस पहल नहीं की गई, जबकि हम देख चुके हैं कि हिरोशिमा-नागासाकी हमले से जिंदा बचे लोगों-पीड़ितों को बचाने, उनके इलाज के लिए कितने बड़े पैमाने पर योजना बनाई गई थी। इसकी तुलना में हमने क्या किया?
हमने सबसे पहले तो यही नहीं बताया कि भोपाल गैस कांड में किस जहरीली गैस के रिसाव से इतने लोग मरे। इसके बाद एक के बाद नित नए झूठ रचने का सिलसिला शुरू हुआ। दरअसल, लाशों पर राजनीति का सबसे बर्बर उदाहरण है भोपाल गैस त्रासदी।
जो लोग जिंदा बच गए वे 26 साल लंबी कानूनी लड़ाई लड़ने के बाद आज यह सोच रहे हैं कि वे भी मरने वालों के साथ ही मर जाते तो शायद बेहतर होता।
आज जो लोग बहुराष्ट्रीय कंपनियों को भारत में बुलाने के लिए आतुर हैं, उनके लिए पलक पावड़े बिछा रहे हैं, उन्हें एक बार भोपाल गैस त्रासदी को याद कर लेना चाहिए। ये बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ कितनी अमानवीय हो सकती हैं, इसका प्रमाण है भोपाल गैस त्रासदी।
इतने लोग मारे गए, इतनी पीढ़ियाँ विकलांग हुईं लेकिन यूनियन कार्बाइड को न इसकी कोई कीमत चुकानी पड़ी और न ही उसे और उसे खरीदने वाली डाऊ कंपनी पर इसका कोई दुष्प्रभाव पड़ा।
बुरी तरह झुलसे लोगों की मदद के लिए कंपनी अपनी तरफ से आगे नहीं आई और उसने जो कुछ मुआवजा दिया भी, वह सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद ही दिया। एक तरफ हम विश्वशक्ति बनने का दावा कर रहे हैं, वहीं हम अपने नागरिकों के जान की कोई कीमत नहीं समझते।
कायदे से तो इस कंपनी को बंद करना चाहिए था, उसकी बिक्री नहीं होने देना चाहिए थी और उसके खिलाफ कड़ा मुकदमा चलना चाहिए था। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। यूनियन कार्बाइड ने अपने पापों को ढँकने के लिए डाऊ को अपने अधिकार बेच दिए।
सारा कुछ बेशर्मी के साथ चलता रहा और कहीं से इसे रोकने की कोशिश नहीं की गई। आज हममें से बहुत से लोग जानते हैं कि भोपाल गैस त्रासदी से बचा जा सकता था, अगर कंपनी ने अपनी जिम्मेदारियों और सुरक्षा तंत्र को पुख्ता रखा होता। भोपाल में लोगों की जान के साथ इस कंपनी ने खेल खेला, जिसका नासूर कई पीढ़ियों को ढोना पड़ रहा है।
आज इस भयानक दुर्घटना के बाद बचे हुए पीड़ित यह कह रहे हैं कि उन्हें यह सजा मंजूर नहीं है और यह उनके जख्मों पर तेजाब छिड़कने जैसा है, तो इसमें सच्चाई है। कल्पना करिए कि अगर ऐसी कोई दुर्घटना अमेरिका या किसी भी विकसित देश में हुई होती तो उनके पीड़ितों को भी क्या इसी तरह 26 साल तक अपमान और उपेक्षा का घूँट पीना पड़ता?
आज जब हम देखते हैं कि भोपाल गैस त्रासदी में अपनी पूरी पीढ़ी को खोने वाले एक बुजुर्ग को 300 रुपए मिलते हैं तो समझ में आता है कि उसकी आँखों में इतनी गहरी निराशा क्यों है। भारत में जहाँ इस त्रासदी से पीड़ित मेज से गिरे टुकड़ों पर जी रहे हैं, वहीं किसी विकसित देश में ऐसी ही घटना का पीड़ित आज करोड़पति हो गया होता।
भारत में तो पीड़ितों को जिंदा रहने के लिए, इलाज के लिए, जहरीले पानी से मुक्ति के लिए खुद इतने लंबे आंदोलन करने पड़े, यात्राएँ करनी पड़ीं कि एक तरह से वे ही इस दुर्घटना के पीड़ित और आरोपी भी हो गए क्योंकि सजा तो वे ही पिछले 26 सालों से भोग रहे हैं।
एक बड़ा सवाल यह है कि जिस तरह से भोपाल में यूनियन कार्बाइड परिसर और उसके आसपास का पूरा इलाका जहरीला बना हुआ है, इसे अब तक क्यों नहीं ठीक किया गया? क्या हमारा विज्ञान पंगु है, क्या इस दिशा में सरकार को वैज्ञानिकों को नहीं लगाना चाहिए था? क्या दोषी कंपनी को इस जहर का काट विकसित करने के लिए बाध्य नहीं करना चाहिए था?
ऐसा लगता है कि हमारी सरकारें और न्यायपालिका यह मानकर चलती है कि जो लोग शोर मचा रहे हैं, वे मचाते-मचाते एक दिन थक जाएँगे। हमारा तंत्र रेत के नीचे अपनी गर्दन छुपा लेने में माहिर है और लोग जो लोग आवाज उठाते हैं, वे हाशिए पर फेंक दिए जाते हैं। आज भी हमारे इर्द-गिर्द कितने भोपाल हैं, जिन पर किसी की निगाह नहीं। क्या हम फिर किसी रिसाव, किसी भोपाल गैस त्रासदी के होने के इंतजार में जिंदा हैं?

भोपाल गैस त्रासदी के 26 बरस!



यूनियन कार्बाइड कारखाने से 2 दिसंबर 1984 की रात जहरीली मिथाइल आइसोनेट गैस के रिसाव की दुर्घटना के बाद भोपाल की हवाएं जैसे थम-सी गईं, जीवन भी जैसे थम-सा गया और जिसने जीने के लिए सांस ली वह मौत के मुंह में समा गया। इस दुर्घटना में तत्काल 3,500 लोगों की मौत हुई थी। दुर्घटना के प्रभाव से हजारों लोग बीमार और विकलांग हुए। स्वयंसेवी संगठनों के अनुसार दुर्घटना के 72 घंटों के भीतर 10,000 लोगों की मौत हुई और अब तक 25,000 लोगों की मौत हो चुकी है। जो लोग जिंदा बचे उनके बच्चे शारीरिक और मानसिक रूप से विकलांग पैदा हुए।

एक जवानी, जो बूढ़ी हो गई!
यूनियन कार्बाइड इंडिया लिमिटेड की स्थापना वर्ष 1969 में हुई थी। इसकी 50.9 प्रतिशत हिस्सेदारी यूनियन कार्बाइड के पास और 49.1 प्रतिशत हिस्सेदारी भारतीय निवेशकों के पास थी। इसमें सार्वजनिक क्षेत्र के वित्तीय संस्थान भी शामिल थे। जिस रात गैस रिसाव हुआ तबसे आज तक उसका मुख्य कार्यकारी अधिकारी अमेरिकी नागरिक वॉरेन एंडरसन को गिरफ्तार नहीं किया जा सका है। पीड़ितों को आज तक उचित न्याय नहीं मिला है। 25 बरस बीत गए, एक जवान पीढ़ी बूढ़ी हो गई, बूढ़ी पीढ़ी खत्म हो गई, लेकिन इंसाफ किसी को नहीं मिला!
01 2009

हमारा क्या कसूर था?

ये वे बच्चे हैं, जिनके मां-बाप आज से पच्चीस बरस पहले बच्चे हुआ करते थे। जहरीली गैस कुछ इस तरह से उनके खून में घुल गई कि न जाने कितनी पीढ़ियां इस तरह मानसिक और शारीरिक रूप से कमजोर पैदा होंगी? लेकिन जीवन मिला है तो उसका जतन तो करना ही होगा, कुछ स्वयंसेवी संस्थाएं ऐसे बच्चों को फीजियोथेरैपी करवाती हैं, ताकि कुछ तो राहत मिले इस मुश्किल सफर में। अस्पतालों में 6000 हजार लोग प्रतिदिन पहुंचते हैं। मुआवजे के नाम पर कुछ ज्यादा नहीं मिला है। इतना ही नहीं गैस पीड़ित कई तरह की गंभीर बीमारियों से जूझ रहे हैं।

पथरा गई हैं आंखें, सुख के इंतजार में!
भोपाल गैस त्रासदी के 26 साल बाद भी यूनियन कार्बाइड संयंत्र परिसर में जमा रासायनिक पदार्थों ने भोपाल की जमीन और भू-जल को प्रदूषित कर रखा है। नई दिल्ली के अनुसंधान और आंदोलन संगठन एवं सेंटर फॉर साइंस एंड एन्वायरमेंट की रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि संयंत्र से तीन किलोमीटर दूर तक के भू-जल में भारतीय मानक से 40 गुना अधिक तक कीटनाशक हैं। ये कीटनाशक लोगों के शरीर में धीमा जहर घोलने का काम कर रहे हैं। और लोग जोड़ों के दर्द, सांस लेने में परेशानी और अन्य समस्याओं से दो-चार हैं। पच्चीस बरस से इलाज का यह सिलसिला चल रहा है और राहत का कहीं नाम नहीं।

यह कैसा बचपन!

अपने बच्चों को स्वस्थ व खुश रखने के लिए माता-पिता क्या नहीं करते! लेकिन गैस त्रासदी ने सात साल के इस बच्चे के पैरों में खेलने की तो क्या चलने की शक्ति तक नहीं छोड़ी है। सरकार और यूनियन कार्बाइड के बीच हुए समझौते में पीड़ितों के लिए 47 करोड़ अमेरिकी डॉलर दिए गए। यह समझौता एक लाख पांच हजार पीड़ितों और मृतकों की संख्या तीन हजार मानकर किया गया था, जबकि हकीकत में पीड़ितों की संख्या पांच लाख 70 हजार और मृतकों की संख्या 25 हजार थी।
01 2009

रंगों में उतर आया है दर्द!

यूनियन कार्बाइड संयंत्र के बाहर म्युरल बनाकर अपने दर्द को बयान करती एक कलाकार। भोपाल गैस त्रासदी के 25 साल होने पर दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में तीन दिवसीय फिल्म महोत्सव का आयोजन किया गया। इस अवसर पर फोटो और कला प्रदर्शनियों के अलावा एक रैली का भी आयोजन किया गया। पीड़ितों की सहायता के लिए काम करनेवाले संगठनों ने लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार और राज्यसभा के सभापति हामिद अंसारी को इस आशय से संबंधित एक पत्र लिखा है कि दोनों सदनों में पीड़ितों को श्रद्धांजलि दी जाए।

हक की लड़ाई तो लड़नी ही होगी!
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यूनियन कार्बाइड संयंत्र के बाहर खड़ी महिलाएं गुहार कर रही हैं कि 25 बरस हो जाने के बावजूद सरकार ने उन्हें अब तक उचित मुआवजा नहीं दिया है। मुआवजा लेने के लिए और गुनाहगारों को सजा दिलवाने के लिए विभिन्न संगठन अपनी तरह से संघर्ष कर रहे हैं। भोपाल के शाहजहां पार्क में हर शनिवार को पीड़ित मिलते हैं और लड़ाई जारी रखने का संकल्प लेते हैं। ऐसे और भी कई आंदोलन लगातार चल रहे हैं, लेकिन सरकारों के कान पर जूं तक नहीं रेंगती।


अब तक कम नहीं हुए जख्म
विश्व की सबसे बड़ी औद्योगिक त्रासदी भोपाल गैसकांड को हुए 26 बरस हो गए हैं। आधी रात हुए इस हादसे में 15 हजार लोगों की मौत हो गई, जबकि 5 लाख से ज्यादा लोगों का जीवन दूभर कर दिया है। हालात यह हैं कि अब तक गैस के दुष्प्रभाव का सटीक आकलन तक नहीं किया जा सका है। 20 पीड़ित बस्तियाँ जहरीला पानी पीने को मजबूर हैं और कई लोग इलाज के लिए भटक रहे हैं। 2 और 3 दिसम्बर 1984 की मध्य रात्रि में यूनियन कार्बाइड के टैंक नंबर 610 में से हुआ गैस का रिसाव आज भी भोपालियों को साल रहा है।
हर जख्म समय के साथ भर जाते है, लेकिन गैसकांड की हर बरसी पर भोपाल के जख्म ताजा हो जाते हैं। हजारों लोगों के लिए इलाज और राहत की उम्मीद एक साल पुरानी हो जाती है। आँकड़ों की मानें तो इस हादसे में कुल 5 लाख 74 हजार लोग घायल हुए। मुआवजे को आधार बनाए तो कुल 15 हजार 274 लोगों की जान गई, जबकि मृतकों का सरकारी आंकडा 3000 से अधिक है।
गैर सरकारी संगठनों के अनुसार गैस ने 30 हजार लोगों की जान ली है। मुआवजे के लिए कुल 10 लाख 29 हजार 515 प्रकरण मिले, जिनमें से 5 लाख 75 हजार लोगों को 1536 करोड़ का मुआवजा दिया गया।
25 साल बाद अब हालात यह हैं कि मामले के मुख्य आरोपी वारेन एंडरसन की गिरफ्तारी नहीं हो पाई है। दूसरी तरफ गैस पीड़ित नित नई बीमारियों के शिकार हो रहे है। गाँधी मेडिकल कॉलेज ने इंडियन काउंसिल फॉर मेडिकल रिसर्च को एक दर्जन से ज्यादा शोध प्रस्ताव भेजे हैं, लेकिन एक पर भी अनुमति नहीं मिली है।
अब तक तो गैस के स्वास्थ्य और पर्यावरण पर घातक असर का पूरा आकलन भी नहीं हो पाया है। सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बाद और तय समय सीमा पूरी हो जाने के 5 साल बाद भी गैस पीड़ित बस्तियों में शुद्ध पेयजल पाइप लाइन से नहीं पहुँचाया जा सका है।

अनूठे हैं शिव के 108 रूप

हिन्दू धर्म में भगवान शिव को मृत्युलोक देवता माना गया है। शिव को अनादि, अनंत, अजन्मा माना गया है यानि उनका कोई आरंभ है न अंत है। न उनका जन्म हुआ है, न वह मृत्यु को प्राप्त होते हैं। इस तरह भगवान शिव अवतार न होकर साक्षात ईश्वर हैं।

शिव की साकार यानि मूर्तिरुप और निराकार यानि अमूर्त रुप में आराधना की जाती है। शास्त्रों में भगवान शिव का चरित्र कल्याणकारी माना गया है। उनके दिव्य चरित्र और गुणों के कारण भगवान शिव अनेक रूप में पूजित हैं।
शिव के अनेक रूपों से जुड़े धर्मशास्त्र में अनेक नाम आते हैं। धार्मिक आस्था से इन शिव नामों का ध्यान मात्र ही शुभ फल देता है। शिव के इन सभी रूप और सभी नामों का स्मरण मात्र ही हर भक्त के सभी दु:ख और कष्टों को दूर कर हर इच्छा और सुख की पूर्ति करने वाला माना गया है।
यहां जानते हैं शिव के इन 108 रूपों और नाम का अर्थ -
शिव - कल्याण स्वरूप
महेश्वर - माया के अधीश्वर
शम्भू - आनंद स्वरूप वाले
पिनाकी - पिनाक धनुष धारण करने वाले
शशिशेखर - सिर पर चंद्रमा धारण करने वाले
वामदेव - अत्यंत सुंदर स्वरूप वाले
विरूपाक्ष - भौंडी आँख वाले
कपर्दी - जटाजूट धारण करने वाले
नीललोहित - नीले और लाल रंग वाले
शंकर - सबका कल्याण करने वाले
शूलपाणी - हाथ में त्रिशूल धारण करने वाले
खटवांगी - खटिया का एक पाया रखने वाले
विष्णुवल्लभ - भगवान विष्णु के अतिप्रेमी
शिपिविष्ट - सितुहा में प्रवेश करने वाले
अंबिकानाथ - भगवति के पति
श्रीकण्ठ - सुंदर कण्ठ वाले
भक्तवत्सल - भक्तों को अत्यंत स्नेह करने वाले
भव - संसार के रूप में प्रकट होने वाले
शर्व - कष्टों को नष्ट करने वाले
त्रिलोकेश - तीनों लोकों के स्वामी
शितिकण्ठ - सफेद कण्ठ वाले
शिवाप्रिय - पार्वती के प्रिय
उग्र - अत्यंत उग्र रूप वाले
कपाली - कपाल धारण करने वाले
कामारी - कामदेव के शत्रुअंधकार
सुरसूदन - अंधक दैत्य को मारने वाले
गंगाधर - गंगा जी को धारण करने वाले
ललाटाक्ष - ललाट में आँख वाले
कालकाल - काल के भी काल
कृपानिधि - करूणा की खान
भीम - भयंकर रूप वाले
परशुहस्त - हाथ में फरसा धारण करने वाले
मृगपाणी - हाथ में हिरण धारण करने वाले
जटाधर - जटा रखने वाले
कैलाशवासी - कैलाश के निवासी
कवची - कवच धारण करने वाले
कठोर - अत्यन्त मजबूत देह वाले
त्रिपुरांतक - त्रिपुरासुर को मारने वाले
वृषांक - बैल के चिह्न वाली झंडा वाले
वृषभारूढ़ - बैल की सवारी वाले
भस्मोद्धूलितविग्रह - सारे शरीर में भस्म लगाने वाले
सामप्रिय - सामगान से प्रेम करने वाले
स्वरमयी - सातों स्वरों में निवास करने वाले
त्रयीमूर्ति - वेदरूपी विग्रह करने वाले
अनीश्वर - जिसका और कोई मालिक नहीं है
सर्वज्ञ - सब कुछ जानने वाले
परमात्मा - सबका अपना आपा
सोमसूर्याग्निलोचन - चंद्र, सूर्य और अग्निरूपी आँख वाले
हवि - आहूति रूपी द्रव्य वाले
यज्ञमय - यज्ञस्वरूप वाले
सोम - उमा के सहित रूप वाले
पंचवक्त्र - पांच मुख वाले
सदाशिव - नित्य कल्याण रूप वाल
विश्वेश्वर - सारे विश्व के ईश्वर
वीरभद्र - बहादुर होते हुए भी शांत रूप वाले
गणनाथ - गणों के स्वामी
प्रजापति - प्रजाओं का पालन करने वाले
हिरण्यरेता - स्वर्ण तेज वाले
दुर्धुर्ष - किसी से नहीं दबने वाले
गिरीश - पहाड़ों के मालिक
गिरिश - कैलाश पर्वत पर सोने वाले
अनघ - पापरहित
भुजंगभूषण - साँप के आभूषण वाले
भर्ग - पापों को भूंज देने वाले
गिरिधन्वा - मेरू पर्वत को धनुष बनाने वाले
गिरिप्रिय - पर्वत प्रेमी
कृत्तिवासा - गजचर्म पहनने वाले
पुराराति - पुरों का नाश करने वाले
भगवान् - सर्वसमर्थ षड्ऐश्वर्य संपन्न
प्रमथाधिप - प्रमथगणों के अधिपति
मृत्युंजय - मृत्यु को जीतने वाले
सूक्ष्मतनु - सूक्ष्म शरीर वाले
जगद्व्यापी - जगत् में व्याप्त होकर रहने वाले
जगद्गुरू - जगत् के गुरू
व्योमकेश - आकाश रूपी बाल वाले
महासेनजनक - कार्तिकेय के पिता
चारुविक्रम - सुन्दर पराक्रम वाले
रूद्र - भक्तों के दुख देखकर रोने वाले
भूतपति - भूतप्रेत या पंचभूतों के स्वामी
स्थाणु - स्पंदन रहित कूटस्थ रूप वाले
अहिर्बुध्न्य - कुण्डलिनी को धारण करने वाले
दिगम्बर - नग्न, आकाशरूपी वस्त्र वाले
अष्टमूर्ति - आठ रूप वाले
अनेकात्मा - अनेक रूप धारण करने वाले
सात्त्विक - सत्व गुण वाले
शुद्धविग्रह - शुद्धमूर्ति वाले
शाश्वत - नित्य रहने वाले
खण्डपरशु - टूटा हुआ फरसा धारण करने वाले
अज - जन्म रहित
पाशविमोचन - बंधन से छुड़ाने वाले
मृड - सुखस्वरूप वाले
पशुपति - पशुओं के मालिक
देव - स्वयं प्रकाश रूप
महादेव - देवों के भी देव
अव्यय - खर्च होने पर भी न घटने वाले
हरि - विष्णुस्वरूप
पूषदन्तभित् - पूषा के दांत उखाड़ने वाले
अव्यग्र - कभी भी व्यथित न होने वाले
दक्षाध्वरहर - दक्ष के यज्ञ को नष्ट करने वाल
हर - पापों व तापों को हरने वाले
भगनेत्रभिद् - भग देवता की आंख फोड़ने वाले
अव्यक्त - इंद्रियों के सामने प्रकट न होने वाले
सहस्राक्ष - अनंत आँख वाले
सहस्रपाद - अनंत पैर वाले
अपवर्गप्रद - कैवल्य मोक्ष देने वाले
अनंत - देशकालवस्तुरूपी परिछेद से रहित
तारक - सबको तारने वाला
परमेश्वर - सबसे परे ईश्वर

तीन कहानियाँ

सचाई का पाठ
एक सेठ दान-पुण्य के लिए हर रोज भंडारे का आयोजन करता था। सेठ का अनाज का व्यापार था। हर साल अनाज के गोदामों की स
फाई होती थी। उस समय घुन लगे बेकार गेहूं को इकट्ठा करके सेठ उसे पिसवाता और उसी आटे का भंडारा साल भर चलता था। लेकिन इसकी जानकारी किसी को न थी। सेठ का एक बेटा था। उसकी शादी हुई। सेठ के घर काफी समझदार बहू आई। जब बहू को पता चला कि उसके ससुर सड़े हुए गेहंू के आटे की रोटियां गरीबों को खिलाते हैं, तो उसे बहुत दुख पहुंचा। एक दिन जब सेठ भोजन करने बैठा तो बहू ने उसकी थाली में उसी आटे की रोटियां परोस दीं। सेठ ने समझा कि बहू ने कोई नया पकवान बनाया है। लेकिन जैसे ही मुंह में पहला कौर डाला, हिचकी आने लगी। उसने उस कौर को थूक दिया और बहू से बोला, 'यह आटा कहां से आया है? क्या घर में और आटा नहीं था?' बहू विनम्रता से बोली, 'आटा तो बहुत है बाबूजी, लेकिन मैंने सोचा कि आपके भंडारे में जिस आटे की रोटी बनती है उसी से घर में भी बनाई जाए।' इस पर सेठ ने कहा, 'लेकिन बहू वह आटा तो गरीबों के खाने के लिए होता है।' बहू बोली, 'पिता जी मुझे बताया गया है कि परलोक में भी प्राणी को वही खाना मिलता है जो वह गरीबों को खिलाता है, इसलिए सोचा कि क्यों न अभी से आपको उसी रोटी की आदत डलवाई जाए।' सेठ लज्जित हो गया। उसने उसी दिन सारा बेकार आटा पशुओं को खिला दिया और गरीबों के खाने के लिए अच्छे गेहूं निकलवाए।

स्वर्ग और नरक
एक युवा सैनिक ने धर्मशास्त्रों का अध्ययन किया था। वह जानना चाहता था कि स्वर्ग और नरक में क्या अंतर है?
उसने एक संत से पूछा, 'बताएं कि क्या स्वर्ग और नरक वास्तव में होते हैं या ये सिर्फ कल्पना हैं?' संत ने उसे अच्छी तरह देखा और पूछा, 'युवक, तुम्हारा पेशा क्या है?'
सैनिक ने अपने पेशे के बारे में बताया तो संत ने उसका तिरस्कार करते हुए कहा, 'तुम और सैनिक! तुम्हें कौन सैनिक कहेगा। किसने तुम्हारी भर्ती कर दी। देखकर तो तुम कायर लगते हो। भय और आशंका तुम्हारे चेहरे पर स्पष्ट झलक रही है।' यह सुनकर उस सैनिक का खून खौल उठा। उसने बंदूक निकाल ली। संत ने कहा, 'तुम बंदूक भी रखते हो। बहुत अच्छे! तुम क्या इस खिलौने वाली बंदूक से मुझे डराओगे।
इस बंदूक से तो बच्चा भी नहीं डरेगा।' यह सुनकर सैनिक अपना आपा खो बैठा, उसने झट से बंदूक का घोड़ा दबाने के लिए हाथ बढ़ाया तो संत ने कहा, 'लो, बस यही है नरक का द्वार।' संत की बात का मर्म समझते ही युवक की आंखें खुल गई और अपने किए पर वह ग्लानि से भर गया। वह संत के चरणों में गिर पड़ा। चरणों में गिरते ही संत ने कहा, 'लो, स्वर्ग का द्वार खुल गया। स्वर्ग एवं नरक, आनंद एवं दु:ख ही वह स्थिति है जो हम शांत रहकर या क्रोध करके उत्पन्न करते हैं। जिस क्षण व्यक्ति को क्रोध आता है उसका संपूर्ण अस्तित्व गहरी अशांति को प्राप्त हो जाता है। यह प्रत्यक्ष नरक के समान दुखदायी होता है। खुद की शांति के लिए हम स्वयं जिम्मेदार हैं जब हम इस जिम्मेदारी को उठाते हैं, स्वर्ग का निर्माण कर रहे होते हैं। संसार हमारी ही सृष्टि है।'

संघर्ष की राह
बालक ईश्वरचंद्र के पिता को तीन रुपये मासिक वेतन मिलता था। परिवार बड़ा था इसलिए घर का खर्च चलना मुश्किल
था। ऐसी स्थिति में बालक ईश्वरचंद्र की पढ़ाई का प्रबंध कैसे होता। ईश्वरचंद्र ने अपने पिता की विवशता को देख कर अपनी पढ़ाई के लिए रास्ता खुद ही निकाल लिया। उसने गांव के उन लड़कों को अपना मित्र बनाया, जो पढ़ने जाते थे। उनकी पुस्तकों के सहारे उसने अक्षर ज्ञान प्राप्त कर लिया। एक दिन कोयले से जमीन पर लिख कर उसने अपने पिता को दिखाया। पिता ने ईश्वरचंद्र की विद्या के प्रति लगन देखकर तंगी का जीवन जीते हुए भी उसे गांव की पाठशाला में भर्ती करा दिया। स्कूल की सभी परीक्षाओं में ईश्वरचंद्र ने प्रथम स्थान प्राप्त किया। आगे की पढ़ाई के लिए फिर आर्थिक तंगी आड़े आ रही थी। ईश्वरचंद्र ने फिर स्वयं अपनी राह बनाई और आगे पढ़ने के लिए माता-पिता से केवल आशीर्वाद भर मांगा।
उसने कहा, 'आप मुझे किसी विद्यालय में भर्ती करा दें। फिर मैं आप से किसी प्रकार का खर्च नहीं मांगूंगा।' ईश्वरचंद्र का कोलकाता के एक संस्कृत विद्यालय में दाखिला करा दिया गया। विद्यालय में ईश्वरचंद्र ने अपनी लगन और प्रतिभा से शिक्षकों को प्रसन्न कर लिया। उसकी फीस माफ हो गई। ईश्वरचंद्र के मित्रों ने किताबें उपलब्ध करा दीं। फिर उसने अपना खर्च पूरा करने के लिए मजदूरी शुरू कर दी। ऐसी स्थिति में भी उसने इतना परिश्रम किया कि उन्नीस वर्ष की आयु तक पहुंचते-पहुंचते वह व्याकरण, साहित्य, स्मृति तथा वेदशास्त्र में निपुण हो गया। जिसके लिए पढ़ना ही कठिन था वह एक बड़ा विद्वान बन गया। आगे चल कर यही बालक ईश्वरचंद्र विद्यासागर के नाम से विख्यात हुआ।
संकलन: लाजपत राय सभरवाल