सोमवार, 23 अगस्त 2010

वीरता की परीक्षा

जब अर्जुन की परीक्षा ली शिव ने
भगवान शंकर ने किरात अवतार लेकर पाण्डुपुत्र अर्जुन से युद्ध किया था तथा प्रसन्न होकर उसे अनेक अस्त्र-शस्त्र प्रदान किए थे। किरात अवतार में भगवान शंकर ने अर्जुन की वीरता की परीक्षा ली थी। इस अवतार से हमें यह सीख मिलती है कि यदि आप किसी को अपनी शक्तियां प्रदान कर रहे हैं तो यह अवश्य देख लें कि वह इस योग्य है भी या नहीं। अर्जुन पराक्रमी तो थे ही साथ ही योग्य भी थे इसलिए भगवान शंकर ने अर्जुन को अपनी शक्तियां (दिव्यास्त्र) प्रदान की थीं।

कौरवों ने छल-कपट से पाण्डवों का राज्य हड़प लिया व पाण्डवों को वनवास पर जाना पड़ा। वनवास के दौरान जब अर्जुन भगवान शंकर को प्रसन्न करने के लिए तपस्या कर रहे थे तभी दुर्योधन द्वारा भेजा हुआ मूड़ नामक दैत्य अर्जुन को मारने के लिए शूकर( सुअर) का रूप धारण कर वहां पहुंचा। अर्जुन ने शूकर पर अपने बाण से प्रहार किया उसी समय भगवान शंकर ने भी किरात वेष धारण कर उसी शूकर का बाण चलाया। शिव के माया के कारण अर्जुन उन्हें पहचान न पाया और शूकर का वध उसके बाण से हुआ है यह कहने लगा। इस पर दोनों में विवाद हो गया। अर्जुन ने किरात वेषधारी शिव से युद्ध किया। अर्जुन की वीरता देख भगवान शिव प्रसन्न हो गए और अपने वास्तविक स्वरूप में आकर अर्जुन को अनेक अस्त्र-शस्त्र तथा कौरव पर विजय का आशीर्वाद दिया।
(दैनिक भास्कर से साभार)

रविवार, 22 अगस्त 2010

रक्षाबंधन

शुभ घड़ियां
सावन माह के पूर्णिमा को रक्षाबंधन का पर्व मनाया जाएगा। यहां बताए जा रहे हैं, वह शुभ मुहूर्त जब बहन और भाई दोनों रक्षा सूत्र के बंधन में बंधकर शुभ फल पा सकते हैं।
इस बार रक्षाबंधन श्रावण मास, धनिष्ठा नक्षत्र, पूर्णिमा तिथि, शोभन योग और मंगलवार के दिन मनाया जाएगा।

- ज्योतिष शास्त्र के अनुसार भद्रा होने पर रक्षाबंधन अशुभ फल देता है। इसलिए इस दिन भद्राकाल में यह पर्व न मनाएं। भद्रा काल दिनांक 23 अगस्त की रात 8.08 बजे से शुरु होकर दिनांक 24 अगस्त की सुबह 9.22 बजे तक रहेगा। भद्राकाल की समाप्त होने के बाद रक्षाबंधन लगभग पूरे दिन शुभ योग लिए हुए हैं।
- रक्षाबंधन के लिए श्रेष्ठ शुभ मुहूर्त भद्राकाल के बाद सुबह 10.35 बजे से दोपहर 1.35 बजे तक लाभ, अमृत का योग है।
- इसके बाद दोपहर 3.32 बजे से 4.32 बजे तक शुभ का चौघडिय़ा है।
- रात्रि में रक्षाबंधन का विचार कर रहें लोगों के लिए रात्रि 8.10 बजे से 10.35 बजे तक का समय श्रेष्ठ रहेगा। रात्रि 10.35 बजे पूर्णिमा तिथि समाप्त हो जाएगी।
किसी कारणवश इन मुहूर्त में रक्षाबंधन न किया जा सके, तो इस बार भद्राकाल के बाद पूरा दिन ही रक्षाबंधन में किसी प्रकार से बाधक नहीं है।

रिश्तों की रक्षा का है यह सूत्र
सावन माह की पूर्णिमा को रक्षाबंधन (24 अगस्त) का पर्व मनाया जाता है। जन-जन में यह पर्व भाई-बहन के रिश्तों का अटूट बंधन और स्नेह का विशेष अवसर माना जाता है।
दरअसल रक्षाबंधन भारतीय धार्मिक परंपराओं में ऐसा पर्व है, जो न केवल भाई-बहन वरन हर सामाजिक संबंध को मजबूत करने की भावना से भरा है। इसलिए इस पर्व को मात्र भाई-बहन के संबंध से जोडऩा इसके महत्व को सीमाओं में बांधना है।
यह पर्व गहरे सांस्कृतिक, सामाजिक अर्थ लिए हुए हैं। इस त्यौहार के अर्थ को समझने के लिए रक्षा बंधन का मतलब जानना जरुरी है। प्रेम, स्नेह और संस्कृति की रक्षा का पर्व ही रक्षा बंधन है। यह एक-दूसरे की रक्षा के वचन का अवसर है। यह भावनाओं और संवेदनाओं का बंधन है। बंधन का भाव ही यह है कि एक को दूसरे से बांधना। ऐसा बंधन कोई भी किसी को भी बांध सकता है।
भाई-बहन के अलावा रक्षा सूत्र गुरु-शिष्य, भाई-भाई, बहन-बहन, मित्र, पति-पत्नी, माता-पिता-संतान, सास-बहू, ननद-भाभी और भाभी-देवर एक-दूसरे को बांध सकते हैं। क्योंकि बंधन का भाव ही यह होता है कि एक-दूसरे के लिए हमेशा प्यार, विश्वास और समर्पण रखना।
पुराण और इतिहास के अनेक प्रसंग साबित करते हैं कि पत्नी अपने पति की रक्षा के लिए रक्षासूत्र बांधती थी। लेकिन समय और परंपराओं में बदलाव के साथ यह भाई और बहन के संबंधों के अर्थ में ही प्रचलित हो गया।
वास्तव में बंधन और नियम पालन से ही सभ्य समाज बनता है। इससे ही हर संस्कृति को सम्मान मिलता है। रक्षा बंधन भी अपनत्व और प्यार के बंधन से रिश्तों को मज़बूत करने का पर्व है। बंधन का यह तरीका ही भारतीय संस्कृति को दुनिया की अन्य संस्कृतियों से ऊपर और अलग पहचान देता है।

पंचक नहीं होता है बाधक
रक्षाबंधन पर्व पर जब मूहुर्त देखें जाते हैं तो पंचक की जानकारी के अभाव में भय और संशय के कारण इस समय को अशुभ मानकर टाला जाता है। जबकि शास्त्रों में स्पष्ट लिखा है कि रक्षाबंधन जैसे पर्व पर पंचक काल का होना अशुभ नहीं है।

इस बार भी पंचक काल रक्षाबंधन यानि २४ अगस्त को प्रात: ७.३३ बजे से शुरु होकर २९ तारीख तक रहेगा। किंतु यह रक्षाबंधन पर्व मनाने में किसी प्रकार से बाधक नहीं है। क्योंकि पंचक काल में नहीं किए जाने वाले कार्य शास्त्रों साफ तौर पर बताए गए हैं। इसलिए जानते हैं क्या होता है पंचक और इस काल में कौन-कौन से कार्य अशुभ माने जाते हैं -
पंचक चंद्रमा की राशि विशेष में स्थिति और विशेष नक्षत्रों का योग होता है। पंचक की अवधि कुंभ राशि में चंद्रमा में आने से लेकर मीन राशि में चंद्रमा के पूर्ण काल बिताने तक होती है। इस अवधि में पांच नक्षत्रों का भी योग बनता है। जिसकी शुरुआत धनिष्ठा नक्षत्र से होती है। पंचक धनिष्ठा नक्षत्र के चार में से दो चरण छोड़कर यानि आधा धनिष्ठा नक्षत्र से आरंभ होता है। इसके बाद क्रम से शतभिषा, पूर्वा भाद्रा, उत्तरा भाद्रा और रेवती नक्षत्र के योग बनते हैं। दूसरे शब्दों में धनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वाभाद्रपद, उत्तरा भाद्रपद और रेवती पंचक नक्षत्र माने जाते हैं।
शास्त्रों में पंचक काल में दाह संस्कार, दक्षिण दिशा की यात्रा, लकड़ी से संबंधित कार्य, घास इकट्ठा करना, मकान की छत भरवाना और पंलग, चारपाई, भट्टी बनवाने जैसे कार्य ही अशुभ माने गए हैं। इनके शमन के भी शास्त्रों में उपाय बताए गए हैं। शेष कार्य और उत्सव या पर्व परंपराएं आदि बिना संशय के पूरी की जा सकती है।
इसलिए रक्षाबंधन पर शुरु होने वाले पंचक को लेकर बिना किसी भय और बाधा का विचार कर उत्साह और उमंग से यह पर्व मनाएं।

भद्रा क्यों है रक्षाबंधन पर अशुभ?
हर वर्ष रक्षाबंधन या श्रावणी पर्व मनाने के लिए शुभ मूहुर्त जरुर देखे जाते हैं। इनमें राखी बंधवाने के लिए भद्रा की स्थिति को विशेष रुप से देखा जाता है। शास्त्रों में भी रक्षाबंधन भद्राकाल में अशुभ माना गया है। जानते हैं क्यों भद्रा काल में मंगल कार्य या उत्सव नहीं किया जाता और इस बार रक्षाबंधन के दिन भद्रा काल कब है -
पुराणों में भद्रा को भगवान सूर्य देव की पुत्री और शनिदेव की बहन बताया गया है। अपने भाई शनि की तरह ही इसका स्वभाव भी क्रूर बताया गया है। उसकी उग्रता को रोकने के लिए ही भगवान ब्रह्मा ने उसे कालगणना या पंचाग के एक प्रमुख अंग करण में स्थान दिया। जिसे विष्टि कहा जाता है।

हिन्दू पंचांग के पांच प्रमुख अंग तिथि, वार, योग, नक्षत्र के साथ करण भी एक महत्वपूर्ण अंग होता है। यह तिथि का आधा भाग होता है। करण की संख्या ग्यारह होती है। इन ग्यारह करणों में सातवां करण विष्टि का नाम ही भद्रा है।
धर्मग्रंथो और ज्योतिष विज्ञान के अनुसार अलग-अलग राशियों के अनुसार भद्रा तीनों लोकों में घूमती है। इसी दौरान जब चन्द्रमा कर्क, सिंह, कुंभ व मीन राशि में विचरण करता है और उसके साथ भद्रा यानि विष्टी करण का योग होता है, तब भद्रा का निवास पृथ्वीलोक में होता है। इसी दौरान उसकी उपस्थिति सभी शुभ कार्यों में बाधक या उनका नाश करने वाली मानी गई है।
इस बार रक्षाबंधन २४ अगस्त को चंद्रमा कुंभ राशि में जाएगा और इसके साथ भद्रा का योग भी बन रहा है। ज्योतिष विज्ञान के अनुसार इस दिन भद्रा का मुख सामने की ओर होगा। यह काल मंगल कार्यों के आरंभ या अंत के लिए अशुभ और कार्य का नाश करने वाला माना जाता है।
इस बार भद्रा काल रक्षाबंधन के एक दिन पहले २३ तारीख की रात ८.०८ बजे से शुरु होकर २४ तारीख की प्रात: ९.२२ बजे तक है। इसलिए इस काल के बाद ही रक्षाबंधन का शुभ मुहूर्त प्रारंभ होगा, जो रात्रि में पूर्णिमा की समाप्ति तक रहेगा।

पहला रक्षासूत्र पत्नी ने बांधा पति को

हिन्दू पंचांग के सावन माह की पूर्णिमा (इस बार 24 अगस्त)को भाई और बहन के प्यार का प्रतीक रक्षाबंधन का त्यौहार मनाया जाता है। इस दिन बहन अपने भाई की कलाई में राखी बांधती है और उसकी लंबी आयु और सुख की कामना करती हैं ताकि संकट के समय वह अपनी बहन की मदद कर सके। किंतु क्या आप जानते हैं, आज जिस पर्व को हम भाई-बहन के रिश्तों का खास दिन मानते हैं, उसकी परंपरा पत्नी द्वारा पति को रक्षा सूत्र बांधने से शुरु हुई। जानते हैं कौन थी वह पत्नी जिसने अपने पति को पहला रक्षा सूत्र बांधा -
पौराणिक मान्यता है कि रक्षा सूत्र बांधने की पंरपरा की शुरुआत देवराज इंद्र की पत्नी शचि ने की थी। जब देव और दानवों के बीच युद्ध चल रहा था। देवताओं की हार करीब थी। इस हार का अर्थ था स्वर्ग पर असुरों का राज। तब इंद्र की पत्नी शची देवगुरु बृहस्पति के पास गई। तब देवगुरु ने राजा इंद्र और देवताओं की जीत के लिए शची को एक रक्षासूत्र दिया। उन्होंने उसे राजा इंद्र की दाहिने हाथ की कलाई पर बांधने को कहा।
रानी शची ने राजा इंद्र के दाहिने हाथ में रक्षा सूत्र और चांवल-सरसों को बांधकर उनकी सुरक्षा और विजय की कामना की थी जिससे वे असुरों पर विजय प्राप्त कर सके थे। धार्मिक मान्यताओं में यह दिन सावन माह की पूर्णिमा को माना जाता है।

भागवत: 54; -कन्या को ईश्वर का वरदान समझें

विदुरजी को मैत्रेयजी बता रहे हैं ऐसे ब्रह्मांड की रचना की गई। जब ब्रह्माजी ने सृष्टि की रचना की और इतने सारे मानस पुत्र पैदा हो गए। तब भगवान ने ब्रह्माजी से कहा- आपको मनुष्यों की सृष्टि पैदा करनी पड़ेगी जैसे ही भगवान ने संकेत दिया ब्रह्माजी के शरीर के दो भाग हुए। एक भाग स्त्री के रूप में तथा दूसरा पुरूष के रूप में पैदा हुआ। पुरूष मनु तथा स्त्री शतरूपा रूप में जानी गईं। ब्रह्मा ने उन्हें संतानोपत्ति की आज्ञा दी। उनको तीन बेटियां पैदा हुईं आकुति, देवहुति और प्रसूति तथा दो पुत्र पैदा हुए उत्तानपाद और प्रियव्रत।

संत कहते हैं कि पहले तीन कन्याएं हुईं और बाद में हुए पुत्र। भगवान भी ये घोषणा करते हैं कि मुझे जब अवसर मिलता है तो मैं पहले कन्या देना पसंद करता हूं। जिन लोगों के घर में कन्या पैदा हो और वे दु:ख मनाए तो यह भगवान के निर्णय के प्रति पाप है। यहां से वे बताते हैं कि जब मनुष्य पैदा हुए तो मनु शतरूपा ने कहा कि ये हमारे बेटे-बेटी सब पैदा हुए हैं तो इनको हम कहां रखेंगे। पृथ्वी तो रसातल में जा चुकी है और हिरण्याक्ष नाम का राक्षस उसको बाहर नहीं लाने दे रहा है। तब भगवान ने वराह अवतार लिया और जब पृथ्वी को बाहर लाए तथा हिरण्याक्ष को मारा। तब एक प्रश्न खड़ा हुआ कि हिरण्याक्ष और हिरण्यकषिपु कहां से आए।
परीक्षित ने शुकदेव से पूछा, विदुर ने मैत्रेयजी से पूछा। उन्होंने कहा एक ऋषि थे कश्यप। उनकी पत्नी थीं दिति। वे एक दिन संध्या को कामांध होकर अपने पति के पास पहुंचीं। उन्होंने कहा मुझे आपसे इसी समय एक पुत्र चाहिए। ऋषि ने कहा दाम्पत्य में पति-पत्नी के बीच भोग का भी एक अनुशासन होना चाहिए। आप गलत समय संतान की मांग कर रही हैं लेकिन वो हठ पर अड़ गई । ऋषि ने उनकी इच्छा पूरी की और उनके गर्भ में दो पुत्र आए हिरण्याक्ष और हिरण्यकषिपु।

शनिवार, 21 अगस्त 2010

देश में विदेश जैसा चेन्नई

विदेश में रहते हुए भी अपने देश जैसा अनुभव होने के बारे में तो यार-दोस्तों से खूब सुना था। कहीं लंदन में बसा छोटा सा भारत तो कहीं न्यूयॉर्क में मिनी इंडिया पर अपने ही देश में विदेशी होने का अनुभव अभूतपूर्व था। पूरा उत्तर भारत घूम चुकी थी, यहाँ तक कि उत्तर-पूर्व में सिक्किम, असम, मेघालय आदि भी पर कहीं भी भाषा ने इतना नहीं मारा जितना चेन्नई में भाषा ने कहर बरपाया।

पहली नजर में चेन्नई आधुनिकता और प्राचीनता के संगम स्थल पर खड़ा बेहद पारंपरिक व्यवस्थित, साफसुथरा एवं हरियाला शहर लगा। दसवीं शताब्दी के प्राचीन मंदिर और 21वीं शताब्दी के बड़े-बड़े श‍ॉपिंग मॉल साथ-साथ। बड़े ही सुनियोजित ढंग से विकसित होता महानगर। शायद ही कोई जगह खाली हो जहाँ नीम और नारियल के पेड़ न लगे हों। आत्मा को सुकून और मन को शां‍ति देती यहाँ की हरियाली।
कोलकाता से निकली तो सोचा था कि थोड़ी हिंदी थोड़ी अँगरेजी मिलाकर काम चला लूँगी पर यहाँ के लोगों की भाषा और संस्कृति प्रेम देखकर दंग रह गई। हिंदी का तो खैर यहाँ देशनिकाला ही है पर तगड़ी तमिल भाषा की तुलना में अँगरेजी जानने के बावजूद तमिल आपस में तमिल भाषा ही बोलना पसंद करते हैं। हम उत्तर भारतीयों की तरह उनमें न तो
अपनी भाषा के प्रति कोई कुंठा है और न ही रौब गाँठने के लिए अँगरेजी झाड़ने की मनोवृत्ति। आम तमिल स्वाभाविक जीवन जीने में विश्वास करता है।
अपनी सत्ता, संपदा, समृद्धि और उच्च होने का बोझ वह अपने सिर पर लादकर नहीं चलता है। बड़े से बड़े धनाढ्‍य भी सुबह व्यर्थ के दिखावे से दूर आधी लुंगी यानी घुटनों के ऊपर तक बँधी लुंगी में आप देख सकते हैं। कोयंबटूर में हुए तमिल इंटरनेशनल समिट की सफलता देखकर मैं तो दंग रह गई। सिर्फ दक्षिण के भी एक राज्य की भाषा और इतना विराट अंतरराष्ट्रीय आयोजन और वह भी तीन दिनों तक।
तमिल भाषा की खासियत है कि यह जितनी समृद्ध है, उतनी ही जटिल भी। संस्कृत की तासीर में रची-बसी होने पर भी यह हिंदी से कोसों दूर है।
तो अब सुनिए, चेन्नई में बाहर निकलने का एक उत्तर भारतीय का पहला अनुभव। बाहर निकलते ही कोलकाताClick here to see more news from this city के ऑटोवाले खूब याद आए। कितने सभ्य, कितने ईमानदार। चेन्नई में ऑटो वालों की दादागिरी है और वे बँधे-बँधाए भाड़े में जाने को तैयार नहीं होते। यदि आपको भाड़े का अंदाज है तब तो ठीक है, नहीं तो खुदा ही मालिक है। जेब पर डाका डलवाने को पूरा तैयार रहिए। वहाँ से मैं एक डिपार्टमेंटल स्टोर पहुँची। वहाँ कोई तकलीफ नहीं हुई। सजेधजे सामानों के पैकेट को उठाती गई पर मुझे दालचीनी कहीं ‍िदखाई नहीं पड़ी। मैंने एक सेल्सगर्ल से पूछा, 'दालचीनी?' उसने किसी और से कहा और थोड़ी ही देर में एक दूसरी सेल्सगर्ल अरहर की दाल और चीनी लेकर हाजिर हो गई थी।
वहाँ से लौटते वक्त फिर मजेदार घटना घटी। एक ठेले वाले को मैंने इशारे से कहा, 'तीन केला।' उसने समझा तीन रुपए का केला। उसने जवाब दिया, 'इल्लै चानी तीन रुपए में केला नहीं है।' मैंने फिर उसे दस का नोट पकड़ाया और तीन उँगली दिखाई। इस बार वह समझ गया और उसने मुझे तीन केले पकड़ा दिए। सबसे अधिक दिक्कत आई काम करने वाली बाई से काम करवाने में। काम पर उसे मकान मा‍लकिन ने तमिल बोलकर लगवा दिया। उन्हीं दिनों मैं जबर्दस्त बीमार पड़ गई। मुझे भयंकर उलटियाँ होने लगीं। मैं किसी भी प्रकार उसे नहीं समझा पाई कि मुझे डॉमस्टल टेबलेट चाहिए।
दूसरे दिन मैं थोड़ा ठीक महसूस कर रही थी। मुझे पपीता खाने की इच्छा हुई। अब उसे समझाऊँ कैसे? अचानक मुझे याद आया कि कूड़े की बाल्टी में बासी कटे पपीता के कुछ टुकड़े हैं। मैंने बाल्टी से पपीते का छिलका निकाल उसे दिखाया और पचास का नोट पकड़ा दिया। पंद्रह मिनट के भीतर ही वह पपीता लेकर हाजिर थी। सुबह ठेलेवालों को देख मुझे जबर्दस्त प्रेरणा मिलती। यहाँ चेन्नई में कोलकाता की तुलना में कहीं ज्यादा संख्‍या में सब्जियों और फलों के लिए श‍ॉपिंग मॉल हैं।
अलग-अलग काउंटर पर प्राइस टैग लटकाए सजीधजी सब्जियाँ, जिन्हें देख मैं हमेशा अवसाद से भर जाती हूँ कि ये चल गईं तो खुदरे सब्जी और फल बेचने वालों का क्या होगा। पर नहीं, फेरी लगा-लगाकर अपनी लकड़ी की चौपाया गाड़ी में सब्जी रख हांक लगा-लगाकर बेचने वाले ये फेरीवाले रिलायंश फ्रेश को भी मात देते हैं। वहाँ तो आप पहुँचेंगे तब पहुँचेंगे, ये तो सुबह हुई नहीं कि आपके घर हाजिर।
जिजीविषा और अकथनीय श्रम का एक उदाहरण और देखा। मेरे घर के सामने ही एक मकान बन रहा था। कई औरतें तसले में रेत-सीमेंट भर-भरकर उसे मकान की छत पर पहुँचा रही थीं। तभी एक मजदूर स्त्री पर नजर पड़ी। उसकी गोद में बच्चा था। मैं सोचने लगी बच्चे को गोद में लिए यह तसला कैसे उठाएगी। उसने अपने थैले से एक साड़ी खींची, पास ही बने नीम के पेड़ की डाली पर साड़ी से झूला डाला, दूधमुँहे को उसने सुलाया, कुछ देर झूला डुलाया, देखते-देखते दूधमुँहा सो गया और वह चालू हो गई, भर-भर तसला बालू-सीमेंट ऊपर पहुँचाने लगी। मैं प्रशंसा और सहानुभूति के भाव से उस औरत को देखती रही। उस शाम अल्प और अति के चरम बिंदुओं पर जीता यह शहर मुझे एक उदास रचना ही नजर आया।

एक महान सैनिक थे बाजीराव प्रथमप्रेरक व्यक्तित्व

इतिहास में ४१ लड़ाइयों में विजेता बाजीराव प्रथम (१७००-१७४०) चिर विजेता सेनापति रहे। उनके सैनिक जीवन का मूल्यांकन मराठों के सैनिक इतिहास के परिप्रेक्ष्य में ही करना होगा। शिवाजी (१६३०-१६८०) की मृत्यु के बाद मराठों ने औरंगजेब के विरुद्ध जो दीर्घ (१६२१-१७०७) व भीषण संघर्ष किया, अपने से तिगुनी मुगल सेना को पराजित किया व औरंगजेब महाराष्ट्र में थका-हारा मृत्यु को प्राप्त हुआ (१७०७)। इस संघर्ष में तपे मराठा सेनापतियों से बाजीराव ने प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से सीखा।
यह तो थी बाजीराव की सैनिक पृष्ठभूमि, साथ में उनकी पारिवारिक शिक्षा का भी महत्व है। उनके पिता प्रथम पेशवा बालाजी विश्वनाथ भट्ट (१६६०-१७२०) से उन्होंने कूटनीति के दाँव-पेंच सीखे जिन्होंने मराठा-मुगल संबंधों में सफल भूमिका निभाकर दिल्लीClick here to see more news from this city में मराठा वर्चस्व की नींव रखी। साथ में बाजीराव की माता ने भी पुत्र को धार्मिक शिक्षा के साथ श्रेष्ठ स्तर की सैनिक शिक्षा दिलवाई। इस दृष्टि से राधाबाई, दूसरी जीजाबाई (शिवाजी माता) सिद्ध हुईं। इस तरह तैयार बाजीराव के गुणों को शिवाजी पौत्र शाहू ने जानकर उन्हें २० वर्ष से कुछ कम आयु में ही पेशवा बनाया। इस पर उठी आपत्तियाँ स्वतः रद्द हो गईं जब बाजीराव ने निजाम आसिफजाह को पालखेड़ (औरंगाबाद के पास) में धावक युद्ध में हराया (१७२८)।
इस युद्ध का महत्व इसलिए है कि मात्र २८ वर्ष से कम आयु में बाजीराव ने ५६ वर्ष के आसिफजाह को पराजित किया जिसके पास दीर्घ सैनिक अनुभव व द. भारत का सर्वश्रेष्ठ तोपखाना था जबकि बाजीराव के पास मात्र फुर्तीला अश्व दल था। इस युद्ध से बाजीराव की सैनिक सूझबूझ का सिक्का जमा। विशेष यह कि घोर युद्ध में अपने सैनिक न गँवाते हुए तेज चालों से युद्ध कैसे जीतना, यह बाजीराव ने बताया। साथ में तोपखाने के निर्णायक तत्व होने पर भी उन्होंने प्रश्नचिह्न लगाया।
पालखेड़ विजय पर जन. मांटगॉमेरी ने बाजीराव की प्रशंसा की। ऐसा ही धावक युद्ध शिवाजी ने मुगलों के विरुद्ध साल्हेर मुल्हेर (गुजरात-खानदेश सीमा) में किया था, जब उन्होंने सूरत लूटकर महाराष्ट्र को प्रयाण किया (१६६४ ई.)। संभव है बाजीराव को इसका ज्ञान हो। शिवाजी की सैनिक नीति का विकास बाजीराव ने किया। उन्होंने घातलगाऊ छापामारी को छोड़ा परंतु उसके मुख्य तत्व गति आश्चर्य व मर्मांतक प्रहार को लेकर धावक-युद्ध शैली बनाई।
बाजीराव का अगला अभियान उत्तर की ओर था। १७२८ की वर्षा पश्चात उन्होंने नर्मदा पार की। उसी समय अनुज चिलाजी ने मांडू के पास व बाजीराव ने पूर्व की ओर से नर्मदा पार की। उस समय मराठा का पुराना मित्र छत्रसाल, अलाहाबाद के महंमद बंगरा पठान से लड़ रहा था। अपनी वृद्धावस्था से वह दुर्बल व परेशान था। अंततः उसने बाजीराव से सहायता माँगी तब बाजीराव गढ़ा स्थान में था। याचना के पद्यांश हैं-
जो गति ग्राह गजेंद्र की सो गति जानहुं आज, बाजी जात बुंदेलन की बाजी राखो लाज- और दुस्थिति ऐसी लक्ष्मी करत हा हा चीं करत गजराज, गोली लागत पहले पीछे आत आवाज।
भारतीय युद्धशास्त्र के अध्येताओं ने इस सेनापति का उच्च मूल्यांकन किया है। गतिशील अश्व दल के इस नायक ने फ्रेडरिक एंगेल्स का यह कथन सत्य सिद्ध किया कि "वेगयुक्त सेना, स्थिर सेना से चौगुनी प्रभावी होती है।" उसके नेतृत्व में नए मराठा सेनापति, मल्हारराव होलकर, राणोजी शिंदे, गायकवाड़, उदयजी पवार आदि तैयार हुए। देश हो या विदेश, युद्धशास्त्र तो एक ही है- अतः यह बाजीराव ने सिद्ध किया कि "बाध्य स्थितियाँ वस्तुगत हैं- परंतु मानव सोच आत्मगत है- अतः वस्तुगत पृष्ठभूमि के रंगमंच पर कुशल सेनापति रंग व प्रकाश से परिपूर्ण कई नाटक खेल सकता है"- बाजीराव ने अनजाने में इस माओवाक्य को चरितार्थ किया।

अजब-गजब बाल समाचार

गाय को शेक्सपियर पसंद!
विज्ञानियों का यह मानना है कि गाय को अगर अच्छा संगीत सुनने को मिले तो वह ज्यादा दूध देती है। इंग्लैंड में कुछ कलाकारों ने सोचा कि देखें गाय के आगे शेक्सपियर का नाटक खेला जाए तो क्या होगा। उन्होंने एक गाय के सामने शेक्सपियर का हास्य नाटक 'द मेरी वाइव्ज ऑफ विंडसर' प्रस्तुत किया।
इसको देखकर शायद गाय खुश हुई, क्योंकि उस दिन दूध का उत्पादन ज्यादा हुआ। इसके बाद नाटक के कलाकारों ने अंदाजा लगाया कि गाय भी इंसान की तरह ही है, जो खुश होने पर अच्‍छा काम करती है। पर इन कलाकारों का कहना है कि हम गाय के सामने 'हेमलेट' नहीं प्रस्तुत करेंगे, क्योंकि क्या पता दुखी होने पर वह दूध ही न दे। इन कलाकार दोस्तों को यह भी याद रखना चाहिए कि गाय के सामने कोई ऐसा नाटक न करें जिसे देखकर वह गुस्सा जाए। क्योंकि गाय का गुस्सा तो आप जानते ही हैं।

पालतू कुत्तों के लिए भी होटल!

यहाँ एक नया होटल खुला है। यह अपने आप में एक भव्य और अनोखा होटल है। इसमें भव्य कमरे और स्वीमिंग पूल हैं। मेरथल टेडफिल में 'द रॉयवान पेट होटल' खुलने के साथ ही चर्चा में आ गया। कारण था ही कुछ ऐसा क्योंकि यह श्वानों के लिए खुला फाइव स्टार होटल है।

अब आप कहेंगे कि श्वान भला अकेले कहाँ घूमने जाते हैं? तो जरा इस होटल को खोलने का उद्देश्य भी सुन लीजिए कि जो लोग अपने घर से बाहर लंबी छुट्टियाँ बिताना चाहते हैं उनके लिए अपने पालतू श्वान को किसके भरोसे छोड़कर जाएँ यह एक समस्या बन जाता है। इसी समस्या का हल देता है यह होटल। यहाँ सामान्य अतिथि श्वानों के लिए 29 पाउंड प्रतिदिन के खर्च पर कमरा उपलब्ध है।
इस होटल का परिसर भी काफी बड़ा है ताकि मेहमानों को घूमने-फिरने की पर्याप्त जगह मिले। होटल की राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री या फिर इन्हीं के कद के अन्य व्यक्तियों के पालतू श्वानों के लिए खास कमरा भी है जिसमें 22 इंच का टेलीविजन भी है। इस कमरे में श्वान एनीमल प्लानेट या अपनी रुचि का चैनल देख सकते हैं। होटल के प्रवक्त ने जानकारी देते हुए बताया कि हम आने वाले मेहमानों को लेकर उत्सुक हैं और उन्हें बेहतर सेवा देकर उनका दिल जीतने की कोशिश करेंगे। होटल स्टाफ पलक-पावड़े बिछाकर उत्सुक है कि - अतिथि तुम कब आओगे?

भव्य शुभारंभ!
इलियोनस। यहाँ एक नाई ने कटिंग की दुकान खोली। खूब प्रचार किया। नई दुकान में कंप्यूटर और तरह-तरह की चीजें लगाईं ताकि ग्राहकों को प्रभावित किया जा सके। तमाम तामझाम के साथ दुकान जमाने के बाद इस नाई का विचार भव्य शुभारंभ करने का था। नाई ने अपनी दुकान में दरवाजे के पास काँच लगाया कि ताकि लोग कटिंग, दाढ़ी या अपने बालों का स्टाइल बदलवाते हुए बाहर का नजारा भी कर सकें।
इतनी तैयारियों के बाद जिस दिन 'जयान'ज क्लासिक कट' का शुभारंभ होना था, उसी रात काँच तोड़कर एक चोर अंदर घुस गया और कंप्यूटर, कटिंग बनाने का सामान और थोड़ी-बहुत नकदी जो दुकान में थी, सब मार ले गया। बेचारा नाई। गाँव बसा नहीं और चोर पहले आ गए। पुलिस अभी अंदाज लगा रही है कि दुकान में कुल कितना नुकसान हुआ है। नुकसान की बात छोड़िए जरा यह तो सोचिए कि जिस सुबह में यह सब हो रहा था उसी सुबह में दुकान का भव्य शुभारंभ था। अब कोई शुभारंभ इससे ज्यादा भव्य क्या हो सकता था!

भागवत: ५३ -ब्रह्मा के शरीर से उत्पन्न हुए ऋषि

नील लोहित के जाने पर ब्रह्माजी ने अपने दस अंगों से दस पुत्र उत्पन्न किए। उनकी गोद से प्रजापति, अंगुष्ट से दक्ष, प्राण से वशिष्ठ, त्वचा से भृगु, हस्थ से ऋतु, नाभि से पुलक, कर्णों से पुलस्त्य मुख से अंगिरा, नेत्रों से अत्रि, मन से मरीची और इसके अतिरिक्त भी ब्रह्माजी के हृदय से काम, भोहों से क्रोध, अदरोष्ठ से लोभ, वाक से सरस्वती, लिंग से समुद्र, गुदा से निरूक्ति, छाया से कर्दम, दक्षिण स्तन से धर्म ओर वाम स्तन से अधर्म उत्पन्न हुए।

जब मरीची आदि से भी प्रजा बढ़ी तो ब्रह्माजी ने पुन: भगवान का स्मरण किया। भगवान का ध्यान करते ही ब्रह्माजी के शरीर के दो भाग हो गए। एक भाग पुरूष बना और दूसरा भाग स्त्री। जो पुरूष बना वही स्वयंभू मनु और जो स्त्री बनीं वे शतरूपा नाम की रानी बनी। मनु व शतरूपा से दो पुत्र व तीन कन्याएं उत्पन्न हुईं। पुत्रों के नाम प्रियव्रत और उत्तानपाद व कन्याओं के नाम हैं आकूति, देवहूति, और प्रसूति थे। इन्हीं तीन कन्याओं का क्रमश: रूचि, कर्दम और दक्ष प्रजापति के साथ विवाह किया। फिर इन तीन दंपत्तियों से ही आगे की समस्त सृष्टि का विस्तार हुआ।
जब हिरण्याक्ष को इस बात का ज्ञान हुआ तो उसने संपूर्ण पृथ्वी को पानी में छुपा दिया। तब ब्रह्मा की नासिकाओं से वराह भगवान प्रकट हुए। उन्होंने पृथ्वी को पानी से बाहर निकाला। हिरण्याक्ष को मारा। और पृथ्वी का शासन मनु के हाथों सौंपकर भगवान स्वधाम लौट गए।