मंगलवार, 9 मार्च 2010

गुझिया

- अरुण कुमार बंछोर

टैक्सी आ गयी। सामान रखा जाने लगा। फ्लाइट का समय हो गया था। बेंगलूर पहुंचते-पहुंचते रात हो जायेगी। और घर पहुंचने तक बच्चे सो जायेंगे। मैंने इस बार भी कितनी बार मां से कहा, बाबूजी से बात छेडो न। अब यहां अकेले-अकेले क्यों पडी हुई हो? चलो, बेंगलूर। मेरे पास..।
मां का वही जवाब था, जब तक हाथ पांव चल रहे है- हमें अपना काम कर लेने दे। फिर तो तू है ही।
और भी एक समस्या थी। इस मकान का क्या होगा? मैंने वहां अपना फ्लैट कब का ले लिया है। तनख्वाह से लोन की किस्त भी कट रही है। रिटायरमेंट के बाद यहां आकर न मैं रह पाऊंगा, न मेरा छोटा भाई। यहां न बिजली है, न पानी। ऊपर से सडक सीधी कभी नहीं चलती। हमेशा नीचे या ऊपर। खैर, मन को यही समझाता रहता हूं- जब समस्या आयेगी, तब उसका हल भी ढूंढा जायेगा..।
रुचि, इसमें गुझिया है। सूटकेस में और सामानों के ऊपर रखना। घर जाते ही पैकेट खोल लेना। वैसे तो तला हुआ सामान खराब नहीं होता। फिर भी गरम-गरम रखा गया है- कहीं-! मां ने पत्नी को एक पैकेट थमाते हुए कहा।
तुम भी न मां! अब ये सब करने की क्या जरूरत थी? मैंने कहा। वैसे मन में लड्डू फूट रहे थे, बेकार की इतनी मेहनत!
बेकार की? मां ने मेरी आंखों में झांककर कहा, तुझे मेरे हाथ की गुझिया इतनी पसंद है। और मैंने क्या किया? मैदा बेलना, खोवा भूनना, भरना, तलना- सब कुछ तो रुचि ने ही किया।
अम्माजी, यह मत कहिए। वरना कहने लगेंगे- तुम्हारी गुझिया मेरी मां जैसी नहीं होती।
बाबूजी को प्रणाम कर हम कार में बैठ गये। मेरी आंखों के सामने एक पुरानी तस्वीर खिल उठी.. ठीक जैसे पानी में परछंाई तैरती रहती है..। कार चलने लगी..
बी.टेक सेकेंड या थर्ड ईअर में था। त्यौहार और इतवार को लेकर तीन दिन की छुट्टी थी। रात के डिनर के बाद मैं स्टेशन के लिए निकलने ही वाला था कि अपनी लॉबी के तीन चार दोस्तों ने मुझे घेर लिया, क्यों गुरू, घर जा रहा है? तेरे ही मजे हैं।
बस, करीब एक रात की जर्नी होने के कारण मैं दो दिन की छुट्टी में भी घर भाग सकता था। इन बेचारों को जलन होती। इनके घर दूर जो थे। मेरा लैब पार्टनर विश्वेशदत्त बोला, अरे मोटे! घर से गुझिया लेते आना। चाची के हाथ की गुझिया निराली होती है। सबने समर्थन किया।
अच्छा बाबा, जरूर लाऊंगा। मैंने उन्हें आश्वस्त किया।
घर पहुंचते ही मैंने मां से कह दिया था, मां, जाते समय मेरे साथ गुझिया दे देना। वरना सब मुझे नोच खायेंगे।
वापस आने के दिन मुझे सुबह की ट्रेन पकडनी थी। पहले दिन शाम को यूं ही चाय पीते-पीते जब मां कह रही थी, तू ने अपना सामान ठीक से पैक कर लिया है न? हां मां! अब कितनी बार पूछोगी? तुमने गुझिया बना दी है न?
हाय राम! मां परेशान हो उठी, तू ने तो एक बार भी याद नहीं दिलाया। खोआ मंगा लेती। अब क्या होगा?
क्या मां, तुम भी-! मैं झुंझला उठा। हाथ की चाय कडवी लगने लगी। मैं उठ गया।
अरे चाय तो पी ले-
नहीं रहने दो। मुझे गुस्सा आ रहा था। मैं उबलने लगा, तुमने एक बार भी न सोचा दोस्तों के सामने मेरी मिट्टी पलीद होगी। अब? फिर मैं जाने क्या क्या बकबक करता रहा। मां चुपचाप मुझे देखती रही। मेरी बकबक सुनती रही। आखिर रसोई की ओर जाते-जाते उन्होंने सिर्फ इतना ही कहा, अपने बाप की तरह तू भी खाली मेरे ऊपर बरसेगा ही? तू भी तो खोआ ला सकता था। मुझे तैश आ गया, मुझे क्या मालूम कि खोवा चाहिए? असली बात तो यह है कि मैं भी भूल ही गया था। मगर उस समय बेचारी मां पर आग उगल रहा था। मां तो थी ही ऐसी। मैंने सुना था बाबूजी की बहुत इच्छा थी कि मां भी जाडे में एक कार्डिगन पहने। मगर मां टालती रही। बुआ का नाम लेकर कहती, लोग क्या कहेंगे कि अनब्याही ननद बैठी है, और यह गुलछर्रे उडा रही है।
रात का खाना मैंने ठीक से नहीं खाया। मां उदास थी। मैंने भी उन्हें नहीं मनाया। उनके गले लिपटकर कह सकता था, अच्छा बाबा, अगली बार तुम ढेर सारी गुझिया बना देना। फाइन समेत।
मगर मैं था कि अपनी झूठी प्रेस्टिज के चक्कर में खाना खाकर लेट गया। भोर में उठना भी था।
अलार्म बजते ही मैं जल्दी-जल्दी तैयार होने लगा। रात की बात याद आते ही दिमाग फिर से खट्टा हो गया। सभी दोस्त मुझे जरूर छेडेंगे, स्साले कंजूस! और जाने क्या क्या कहेंगे।
पराठे खाकर, चाय पीकर, दादा दादी और बाबूजी माताजी को प्रणाम कर मैं चलने लगा तो मां ने एक पोटली अलग से मेरे हांथों में थमा दी, संभाल कर ले जाना। अभी भी गरम है।
यह क्या है?
तेरे दोस्तों के लिए गुझिया! रात ही में मैंने तेरे बाबूजी को कहकर खोआ बाजार से मंगवा लिया था। मुझे बडा ताज्जुब हुआ, और तुम सारी रात बैठकर गुझिया बनाती रहीं? मुझे पता भी न चलने दिया? मां मुस्कुरा रही थी, तू क्या करता? मेरे साथ मैदा बेल देता? मैं ठगा सा खडा रहा। मां की ओर नजरें उठाकर देख नहींपा रहा था। मेरी आंखें मुझे धोखा देने लगीं, धत्, तुम भी.. पता नहीं क्या करती रहती हो! कहते हुए मैं भाग खडा हुआ।
बेंगलूर में घर पहुंचते ही हमारे बच्चे अपनी दादी की बनायी गुझिया पर टूट पडे। मैं ड्राइंग रूम में बैठा था।
पापा! कहते हुए मेरी बेटी एक प्लेट में गुझिया लेकर आ गयी, लो, मां ने कहा तुम भी खा लो!
मैंने उधर देखा और हंस दिया, अच्छा, रख दे।
नहीं, पहले तुम खाओ। छह साल की सावनी अपने नन्हें से हाथ से एक गुझिया मेरे मुंह मे ठूंसने लगी। अच्छा, मेरी मां! चल मैं खा लूंगा। पहले तू तो खा-! वह अपने भैया के पास भागी। फिर मैंने उनकी मां को बुलाया, रुचि, तुम भी इसमें से खाओ न-! मैं एक गुझिया उसके मुंह के पास ले गया।

आप भी हद करते हैं। वह मानो झेंप गई, बच्चे देखेंगे तो क्या कहेंगे?
धत् तेरी की! खाओ न-! जरा ठहरिए। अम्मा जी को फोन कर लूं। मेरी बगल में बैठे-बैठे उसने मोबाइल से घर का नम्बर मिलाया, अम्मा हम लोग ठीक ठाक पहुंच गये हैं। उसने स्पीकर लाउड कर दिया।
तुमने सबको गुझिया दे दी?
हां हां। बच्चे उस कमरे में हैं। और आपके मुन्ना तो यहीं बैठकर खा रहे हैं। उसने मुझे मोबाइल थमा दिया- हां मां, बोलो-!
गुझिया ठीक बनी है?
पता नहीं क्यों मेरा गला भर आया था, हां मां-! क्या हां मां, हां मां कर रहा है? मां और कुछ बातें करना चाहती थी, तेरी पसन्द की चीज है। इस बार चिरौंजी देना भूल गयी। और खोआ जरा ज्यादा भून गया था-। नहीं मां, बहुत अच्छी बनी है। बहुत अच्छी-! मैंने मोबाइल रुचि के हाथ में थमा दिया। आंखें फिर से धोखा देने लगी थीं..

मां इतनी दूर रहकर भी मेरे पास ही बैठी थी। अपने बेटे को गुझिया खिला रही थी..

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