शुक्रवार, 19 मार्च 2010

प्यार का बिंदास 'फन फॉर्मूला'


हेलो दोस्तो! हर समय हम क्यों हर वक्त छोटी-छोटी बातों को लेकर जरूरत से ज्यादा सीरियस रहते हैं। ‍रिलेशनशिप को लेकर तो हम इतने गंभीर हो जाते हैं कि उसका मस्ती, फन, छेड़खानी और खुशियों वाला साइड बिल्कुल ही गायब हो जाता है। प्यार में किसी का झूठ पकड़ा गया तो प्रेमियों के लिए यही नाराजगी का कारण बन जाता है।
हफ्ते भर यही किच-किच चलती रहती है कि मजबूरी थी तो भला आखिर कैसी मजबूरी थी। इस तफ्तीश में रिश्ते की ऐसी फजीहत होती है कि मानों इस बेसिर-पैर का मुकदमा लड़ने से सूली पर चढ़ना ज्यादा आसान हो। अब भला इससे कौन इंकार कर सकता है कि झूठ बोलना, धोखा देना, बेवफाई करना आदि नहीं चल सकता है।
लव रिलेशन में कोई यदि यह गलतियाँ बार-बार दुहरा रहा है तो क्या करना चाहिए? अरे बाबा आप तो फिर गंभीर हो गए। घबराने वाली कोई बात नहीं है। हो सकता है, वह उसके पर्सनेलिटी का हिस्सा हो। और आपका पर्सनेलिटी बिल्कुल उसके उलट। आप और आपका साथी एक-दूसरे को मैच कर रहे हैं कि नहीं यह जानने का फॉर्मूला भी निकाल लिया गया है।

कहते हैं न कि इश्क एक आग का दरिया है और डूब कर जाना है। आज हम पेश करेंगे आपके सामने एक 'फन फॉर्मूला' जिसे आप आजमाएँ और अपने एकरसता भरे नीरस रिश्ते को बनाएँ सरस एवं मजेदार। यह फन फॉर्मूला वाली इन्वेस्टिगेशन दोनों के लिए है। तैयार हैं आप। पेश है आपके सामने क्वेश्चन की लिस्ट। नियम भी आपको बता रही हूँ। इस टेस्ट से आपको पता चल जाएगा कि आप दोनों की जोड़ी कितनी मैच हो रही है। तो कलम उठाएँ और तैयार हो जाएँ।
हर सवाल के सामने जवाबों के ऑप्शन दिए गए हैं। सही जवाब को एक कागज पर या फाइल पर लिखते जाएँ।
केटेगरी-1
* मैं तो बस तत्काल ही काम कर डालता हूँ :
- एब्सोल्यूटली यस
नो
यस
एब्सोल्यूटली नो

* मेरी रुचियों का क्षेत्र काफी बड़ा है :
- एब्सोल्यूटली यस
नो
यस
एब्सोल्यूटली नो

* दूसरों के मुकाबले मुझमें अधिक एनर्जी है :
- एब्सोल्यूटली यस
नो
यस
एब्सोल्यूटली नो

केटेगरी-2
* लोगों को प्रचलित मापदंडों के अनुरूप ही व्यवहार करना चाहिए :
-एब्सोल्यूटली यस
नो
यस
एब्सोल्यूटली नो

* आमतौर पर मैं मानता हूँ कि नियम-कायदे का पालन करना जरूरी है :
- एब्सोल्यूटली यस
नो
यस
एब्सोल्यूटली नो

* मेरे फ्रैंड्स और फैमेली वाले कहेंगे कि मुझमें ट्रेडिशनल वैल्यूज हैं :
- एब्सोल्यूटली यस
नो
यस
एब्सोल्यूटली नो

केटेगरी-3
* मैं दूसरों के मुकाबले ज्यादा एनालिसिस और आर्ग्यूमेंट करता हूँ :
- एब्सोल्यूटली यस
नो
यस
एब्सोल्यूटली नो

* मैं इमोशन को बीच में लाए बिना ही प्रॉब्लम्स का समाधान कर सकता हूँ :
- एब्सोल्यूटली यस
नो
यस
एब्सोल्यूटली नो

* मुझे यह पता लगाने में मजा आता है कि कोई काम कैसे होता है :
- एब्सोल्यूटली यस
नो
यस
एब्सोल्यूटली नो

केटेगरी-4
* मुझे अपने दोस्तों की इच्छा और जरूरत को गहराई से जानना पसंद है :
एब्सोल्यूटली यस
नो
यस
एब्सोल्यूटली नो

* मैं लगातार खुद को खयालों (डे-ड्रीमिंग) में खोया हुआ पाता हूँ :
- एब्सोल्यूटली यस
नो
यस
एब्सोल्यूटली नो

* मैं अक्सर इमोशनल मूवी देखने के बाद कई घंटे तक उससे प्रभावित रहता हूँ :
- एब्सोल्यूटली यस
नो
यस
एब्सोल्यूटली नो
स्कोर इस प्रकार दें- हर एब्सोल्यूटली नो के लिए 0 प्वाइंट। हर 'नो' के लिए 1 प्वाइंट। हर 'यस' के लिए 2 प्वाइंट और हर एब्सोल्यूटली यस के लिए 3 प्वाइंट।
हर केटेगरी के जवाबों का कुल जोड़ अलग-अलग निकालें। याद रखें सभी केटेगरी को एक साथ न जोड़ें।
पहली केटेगरी आपको यह बताती है कि आप किस दर्जे (डिग्री) के खोजी हैं।
दूसरी केटेगरी यह बताती है कि आप किस डिग्री के निर्माता हैं।
तीसरी केटेगरी के अनुसार आप किस दर्जे के ऑर्डर देने वाले हैं।
चौथी केटेगरी का मतलब है कि आप किस डिग्री के मोल-तोल करने वाले हैं।
इस उत्तर के अनुसार तीसरे और चौथे केटेगरी वाले आपस में रिश्ते को आगे बढ़ाने के लिए डेट पर जा सकते हैं। यानी मिसाल के तौर पर पहली केटेगरी में चार अंक आया है और दूसरी केटेगरी में किसी को चार अंक आया है तो वे डेट पर जा सकते हैं। जबकि पहली केटेगरी वाले को पहली केटेगरी का अंक पाने वाले के साथ ही जाना चाहिए। यानी 'खोजी' को 'खोजी' के साथ और 'निर्माता' अंक पाने वाले को 'निर्माता' के साथ ही डेट पर जाना चाहिए।
अरे, आप तो फिर सीरियस हो गए। ओहो, यह सारी कसरत मजे के लिए की गई है। दिल्लगी, हँसी-मजाक को रोज के जीवन में शामिल रखें, प्यार की मुश्किलों से भरी डगर आसान हो जाएगी।

कहानी
एक बच्चा कैसे खुश हुआ
माँ बत्तख आश्चर्य से सोच रही थी कि क्या मुझसे अंडों को गिनने में कोई गलती हो गई? पर माँ बत्तख और ज्यादा कुछ सोचती इससे पहले सातवें अंडे से एक बच्चा बाहर निकल आया। यह सातवाँ बच्चा बाकी छः बच्चों से अलग था। भूरे पंख और आँखों पर पीलापन। बाकी छः नन्हे बत्तख बच्चों के बीच यह बड़ा अजीब लग रहा था। अपने इस अजीब से बच्चे को लेकर माँ बत्तख के मन में एक चिंता जरूर थी।
माँ बत्तख जब अपने सातवें बच्चे को देखती तो उसे विश्वास नहीं होता कि यह उसी का बच्चा है। यह सातवाँ बच्चा बाकी के बीच बहुत अजीब दिखता था। इसकी आदतें भी अलग थी। खाना भी वह अपने बाकी भाइयों से ज्यादा खाता था और वह उनकी तुलना में उसका शरीर भी ज्यादा बड़ा था। दिन जैसे-जैसे बीत रहे थे सातवाँ बच्चा खुद को अलग-थलग पाने लगा। कोई भी भाई उसके साथ खेलना पसंद नहीं करता था। फार्म में बाकी सारे लोग उसे देखकर उसकी हँसी उड़ाते थे।

हालाँकि माँ बत्तख अपने इस बच्चे को खुश करने की बहुत कोशिश करती थी, पर बाकी सभी लोगों के व्यवहार से वह उदास और दुखी रहने लगा। कभी-कभी माँ बत्तख कहती भी कि प्यारे बच्चे, तुम दूसरों से इतने अलग क्यों हो। यह सुनकर बच्चे को और भी बुरा लगता। कभी-कभी वह खुद से भी पूछता कि मैं दूसरों से इतना अलग क्यों हूँ। कोई भी तो मुझे पसंद नहीं करता है। उसे लगने लगा कि किसी को भी उसकी परवाह नहीं है।
फिर एक दिन सुबह वह बच्चा अपने फार्म से भाग निकला। एक पोखर के किनारे कुछ पक्षियों से उसने पूछा कि क्या तुमने कभी किसी भूरे पंख वाले बत्तख को देखा है। सभी ने मना करते हुए कहा कि हमने कभी तुम्हारे जैसा भद्दा बत्तख नहीं देखा। यह सुनकर भी उस बच्चे ने अपना धैर्य नहीं खोया। वह दूसरे पोखर गया। पर वहाँ भी उसे इसी तरह का जवाब मिला। यहाँ किसी ने उसे चेताया भी कि इंसानों से खबरदार रहना क्योंकि तुम उनकी बंदूक का निशाना बन सकते हो।
बच्चे को अहसास हुआ कि फार्म से भागकर उसने गलती की है। भटकते-भटकते एक दिन वह एक गाँव में किसी बूढ़ी महिला के पास पहुँच गया। महिला को दिखाई कम देता था। तो उसने इसे बत्तख समझकर अंडों के लालच में पकड़ लिया। पर इस बच्चे ने एक भी अंडा नहीं दिया। यह देखकर बुढ़िया के यहाँ रहने वाली मुर्गी ने बच्चे को बताया कि अगर बुढ़िया को अंडे नहीं मिले तो वह तुम्हारी गर्दन मरोड़ देगी। बच्चा यह सुनकर बहुत डर गया। फिर रात के वक्त वह बुढ़िया के यहाँ से भी भाग निकला।
एक बार फिर से वह अकेला था और उदास भी। उसे प्यार करने वाला कोई भी नहीं था। उसने खुद से कहा कि अगर कोई भी मुझे प्यार नहीं करता तो मैं सबसे छिपकर रहूँगा। यहाँ खाने को भी कोई कमी नहीं है। यह सोचकर उसने खुद को धीरज बँधाया। फिर वह जहाँ था वहाँ से उसने एक सुबह कुछ सुंदर हँसों को उड़ान भरकर दक्षिण की ओर जाते हुए देखा। सफेद और सुराहीदार गर्दन वाले पक्षियों को देखकर बहुत दिनों बाद बच्चे के चेहरे पर खुशी आई। उन पक्षियों को देखकर बच्चे ने सोचा कि मैं एक दिन के लिए भी अगर इनकी तरह सुंदर हो जाऊँ तो सब मुझे पसंद करने लगेंगे।
सर्दियाँ बहुत तेज हुई तो जहाँ यह नन्हा बच्चा रह रहा था, उस जगह दाना-पानी कम हो गया। खाने की कमी से यह बच्चा कमजोर हो गया। भोजन की तलाश में उसे बाहर निकलना पड़ा। तभी एक किसान की नजर उस पर पड़ी। किसान दयालु था और कुछ महीनों तक बच्चे को किसान ने अपने यहाँ रखकर पाला। कुछ महीने बीते तो वह काफी बड़ा हो गया था।
जब कठिन दिन बीत गए तो किसान ने उस पंछी को एक तालाब में ले जाकर छोड़ दिया। तालाब के पानी में जब उसने अपने-आप को देखा तो वह चकित रह गया। वह बावला हो गया- मैं सुंदर हूँ... मैं सुंदर हूँ...। वाकई वह अब बड़ा हो गया था और सुंदर भी। फिर जब दक्षिण गए हंस वापस उत्तर की तरफ लौटने लगे, तो इसने उन्हें देखा। उन्हें देखते ही इसे खयाल आया कि वह तो बिलकुल उड़ने वाले हंसों की तरह है।
हंसों ने भी अपने इस जोड़ीदार को पहचान लिया और उसे अपने साथ ले लिया। फिर किसी बूढ़े हंस ने उससे पूछा कि इतने दिनों वह कहाँ रहा तो वह बोला कि यह लंबी कहानी है। बाद में सुनाऊँगा। हंसों का यह झुंड एक तालाब के किनारे उतर गया। वहाँ इस सुंदर से हंस को देखकर बच्चे चिल्ला रहे थे कि देखो वह हंस कितना सुंदर लग रहा है। हंस ने यह सुना तो शरमाकर मुस्कुरा दिया। कहानी खत्म।
57 सालों से शान की सवारी

ओवेन हुक की उम्र अब 72 साल है। जब वे 15 साल के थे तब उनका मन स्कूल से उचट गया और वे एक किराना दुकान पर काम करने लगे। इसी उम्र में उन्हें साइकिल चलाने का शौक भी लगा। उन्होंने 36 महीने की किस्त पर एक साइकिल खरीदी। इसी दिन से यह साइकिल उनकी दिनचर्या का एक अनिवार्य हिस्सा बन गई और पिछले 57 सालों से यह साइकिल उनके पास है।

आज भी व‍े दिन में दो बार इस पर आधा-आधा मील की यात्रा करते हैं। अब दादा बन चुके ओवन कहते हैं कि इस साइकिल के साथ उनकी दोस्ती बहुत पक्की है और अब इसे छोड़ पाना मुश्किल है। ओवेन की साइकिल की चमक-दमक अब भी बरकरार है। इतने सालों में बस एक बार उस पर रंग करवाने की जरूरत आई थी। ओवेन अब एक स्कूल के प्रभारी हैं और आज भी अपनी साइकिल पर स्कूल तक जाते-आते हैं।

सेमल पर छाई है बहार
गर्मियों के आते ही वन-उपवन, बाग-बगीचों की छटा कुछ बदली-बदली सी नजर आती है। जब हम होली की तैयारी में लगे रहते हैं तब प्रकृति में फूल भी फाग रचने को तैयार रहते हैं। फूल तो कई हैं पर मेरे कॉलेज परिसर में चार-पाँच सेमल के पेड़ प्रकृति प्रेमियों का ध्यान अपनी रंगीन अदा से खींच ही लेते हैं। इन दिनों में सेमल में बड़े-बड़े कटोरेनुमा रसभरे फूलों का गहरा लाल रंग अपने शबाब पर होता है। पलाश, सेमल और टेबेबुआ को देखकर मुझे यह लगता है कि निश्चय ही मनुष्य ने होली खेलने की प्रेरणा जंगल का यह मनमोहक, मादक दृश्य देखकर ही ली होगी।
प्रकृति हजारों लाखों वर्षों से यह होली खेलती आ रही है। निसर्ग का यह फागोत्सव फरवरी से शुरू होकर अप्रैल-मई तक चलता है। सेमल के पेड़ और होली का गहरा संबंध यह भी है कि होली को जो डांडा गाड़ा जाता है वह सेमल या अरण्डी का ही होता है। ऐसा संभवत: इसलिए किया जाता है क्योंकि सेमल के पेड़ के तने पर जो काँटे होते हैं उन्हें बुराई का प्रतीक मानकर उन्हें जला दिया जाता है।
देखा जाए तो सेमल के पेड़ की तो बात ही निराली है। भारत ही नहीं दुनिया के सुंदरतम वृक्षों में इसकी गिनती होती है। दक्षिण-पूर्वी एशिया का यह पेड़ ऑस्ट्रेलिया, हाँगकाँग, अफ्रीका और हवाई द्वीप के बाग-बगीचों का एक महत्वपूर्ण सदस्य है। पंद्रह से पैंतीस मीटर की ऊँचाई का यह एक भव्य और तेजी से बढ़ने वाला, घनी पत्तियों का स्वामी, पर्णपाती पेड़ है। इसके फूलों और पुंकेसरों की संख्‍या और रचना के कारण अँगरेज इसे 'शेविंग ब्रश' ट्री कहते हैं।
इसके तने पर मोटे तीक्ष्ण काँटों के कारण संस्कृत में इसे 'कंटक द्रुम' नाम मिला है। इसके तने पर जो काँटे हैं वे पेड़ के बड़ा होने पर कम होते जाते हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि युवावस्था में पेड़ को जानवरों से सुरक्षा की जरूरत होती है जबकि बड़ा होने पर यह आवश्यकता खत्म हो जाती है। है न कमाल का प्रबंधन।
सेमल के मोटे तने पर गोल घेरे में निकलती टहनियाँ इसे ज्यामितीय सुंदरता प्रदान करती हैं। पलाश के तो केवल फूल ही सुंदर हैं परंतु सेमल का तना, इसकी शाखाएँ और हस्ताकार घनी हरी पत्तियाँ भी कम खूबसूरत नहीं। इसकी इन्हीं विशेषताओं के कारण इसे बाग-बगीचों और सड़कों के किनारे, छायादार पेड़ के रूप में बड़ी संख्‍या में लगाया जाता है। बसंत के जोर पकड़ते ही मार्च तक यह पर्णविहीन, सूखा-सा दिखाई देने वाला वृक्ष हजारों प्यालेनुमा गहरे लाल रंग के फूलों से लद जाता है। इसके इस पर्णविहीन एवं फिर फूलों से लटालूम स्वरूप को देखकर ही मन कह उठता है -
'पत्ता नहीं एक/फूल हजार
क्या खूब छाई है/सेमल पर बहार।'
सेमल सुंदर ही नहीं उपयोगी भी है। इसका हर हिस्सा काम आता है। पत्तियाँ चारे के रूप में, पुष्प कलिकाएँ सब्जी की तरह, तने से औषधीय महत्व का गोंद 'मोचरस' निकलता है जिसे गुजरात में कमरकस के रूप में जाना जाता है। लकड़ी नरम होने से खिलौने बनाने व मुख्‍य रूप से माचिस उद्योग में तीलियाँ बनाने के काम आती हैं। रेशमी रूई के बारे में तो सभी जानते ही हैं। बीजों से खाद्य तेल निकाला जाता है।
इन दिनों मकरंद से भरे प्यालों के रूप में लाल फूलों से लदा यह पेड़ किस्म-किस्म के पक्षियों का सभास्थल बना हुआ है। तोता, मैना, कोए, शकरखोरे और बुलबुलों का यहाँ सुबह-शाम मेला लगाता है। सेमल पर एक तरह से दोहरी बहार आती है, सुर्ख लाल फूलों की और हरी, पीली, काली चिड़ियों की। इन्हीं चिड़ियों के कारण इसकी वंशवृद्धि होती है। इस पर फल लगते हैं। बीज बनते हैं। सेमल के पेड़ और पक्षियों का यह रिश्ता पृथ्वी पर सदियों से चला आ रहा है और यदि हम इनके रंग में भंग न डालें तो यह ऐसे ही आगे भी चलता रहेगा। हालाँकि प्रकृ‍ति में दिनोंदिन हमारी दखलअंदाजी के चलते ऐसी संभावना क्षीण होती जा रही है।
पेड़-पौधों के फूलने की घटना के संदर्भ में वैज्ञानिकों ने यह पता लगाया है कि पौधों की पत्तियाँ ही उन्हें फूलने का संदेश देती हैं। परंतु सेमल पर जब बहार आती है तब तो उसके तन पर पत्तों का नामोनिशान तक नहीं होता। ‍तो फिर सेमल को फूलने का संदेश किसने दिया। दरअसल इसकी पत्तियाँ झड़ने से पूर्व ही इसके कानों में धीरे-से बहार का गीत गुनगुना जाती हैं कि उठो, जागो, फूलने का समय आ गया है बसंत आने ही वाला है। वास्तव में पतझड़ी पेड़ों की पत्तियाँ झड़कर आने वाली बहार का गीत गाकर ही इनके तन से विदा होती हैं। हमें सेमल की सुंदरता, पत्तियों के विदा गीत और प्रकृति का इस उपकार के लिए धन्यवाद करना चाहिए।

एक वर्ष की कीमत समझें
स्तो, अब वक्त आ गया है 2009 को अलविदा कहने को और 2010 के स्वागत का। आदमी का जीवन जब कुछ वर्षों का है तो स्वाभाविक है कि हरेक वर्ष की बहुत बड़ी कीमत है। कहते हैं कि 1 वर्ष की कीमत उस विद्यार्थी से पूछो जोकि अपनी कक्षा में पास नहीं हो सका। और 1 सेकंड की कीमत उस धावक से जो कि 1 सेकंड से भी कम समय से पिछड़ कर स्वर्ण पदक हासिल करने से चूक गया।
दोस्तो कभी आपने इस बात पर गौर किया कि हमारा जीवन क्या है। यही एक-एक पल से बना है। क्योंकि जो पल एक बार चला गया वह अब पलट कर कभी नहीं आएगा। तो क्यों न हम इस समय की और एक-एक वर्ष की कीमत पहचानें।
एक बार पलटकर देखें कि विगत वर्ष में हमने क्या हासिल किया और क्या हासिल करने से छूट गया। हमने अपने जिन गुणों के कारण कुछ पाया उन्हें हम बरकरार रखें और
जो हम प्राप्त कर सकते थे ‍लेकिन हमारी किसी गलती से हम उसके हकदार नहीं बन सके, उन कमियों को दूर करते चलें। और इन बातों को आगे भी ध्यान रखें और जीवन में उसे अमल में लाएँ।
गलती हर इंसान से होती है। सचिन तेंडुलकर भी कभी शतक मारता है, कभी दोहरा शतक तो कभी 0 पर या 20 रनों के भीतर ही आउट हो जाता है। आज हमारे देश में इतने बड़े-बड़े उद्योगपति हैं। सभी को पहले प्रयास में तो सफलता नहीं मिल जाती। उन्हें भी किसी-किसी व्यवसाय में कुछ समय घाटा उठाना पड़ता है। महात्मा गाँधी भी कहते थे 'चाहे सौ गलतियाँ करो, लेकिन किसी भी गलती को दोहराओ मत। क्योंकि गलती को दोहराना मूर्खता है।'
बस जरूरत है इन गलतियों को दूर करते जाने की ताकि जीवन में आप सफल कहलाएँ। ताकि आप स्वयं पर और आपके परिजन आप पर गर्व कर सकें। आशा करता हूँ इन बातों को ध्यान में रखते हुए आप अपने नव वर्ष की शुरुआत करेंगे। नव वर्ष की ढेरों शुभकामनाएँ।

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