मंगलवार, 27 अप्रैल 2010

हँसगुल्ले

मरा डॉक्टर अधमरा मरीज
दक्षिणी अफ्रीकी टेस्ट खिलाड़ी हाशिम आमला जैसी घनी-घनघोर दाढ़ी और सपाट चंदिया वाले मेरे दोस्त मिर्जा विवादास्पद बीटी बैंगन की तरह लुढ़कते चले आ रहे थे। रिटायर्ड थे पर तोंद यों फूली थी जैसे पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा द्वारा समेटा गया काफी माल अंदर पैक हो। आत्मा तक गहरी एक ठंडी साँस खींची और बोले - 'क्या करूँ, कहाँ जाऊँ?' मैंने धीरे से चुटकी ली- 'तुम्हारे जाने के लिए अब एक ही जगह बची है। तुम तैयारी करो, दो गज जमीन का इंतजाम मैं कराए देता हूँ!'

मिर्जा ने गुस्से में तोंद को कई बाउंस दिए और बोले - 'सीरियस बातों में छुछलइयाँ मत खेला करो! मैं बीमार हूँ! पिछले दो महीनों से यूँ लगता है जैसे मेरे कान में कोई हारमोनियम बजा रहा हो।' मैंने दिलासा देते हुए कहा - 'मेरे साथ चलो। ईएनटी डॉक्टर को दिखाते हैं। खुदा ने चाहा तो हारमोनियम बजना बंद हो जाएगा... या फिर साथ में तबला भी बजने लगेगा। मिर्जा ने कान में उँगली घुमाई और बोले - 'मियाँ, दाल उबलेगी तो अपने ही चूल्हे में गिरेगी...। मेरा डॉक्टरों पर यकीन वैसे ही उठ गया है जैसे अमरसिंह का मुलायम सिंह पर से। खुदा न करे वह कहीं मुर्दा डॉक्टर न हो!'

मैं चौंका! मुर्दा डॉक्टर? शायद मिर्जा के दिमाग की बालकमानी पलट गई है! पागलखाने फोन करना होगा! मिर्जा मेरी खामोशी भाँप गया! बोला - 'लाला भाई, तुम मुझे पागल समझ रहे हो? अखबार में धोनी और सलोनी के क्रिकेट स्कोर के अलावा कभी न्यूजें भी पढ़ लिया करो! बेगम मेरेकान का हारमोनियम बंद कराने डॉक्टर के यहाँ ले जा रही थीं। मगर न्यूज पढ़ते ही मैंने इरादा मुलतवी किया।

न्यूज में साफ छपा है कि भारत में 7.63 लाख डॉक्टर हैं (झोला छाप डॉक्टरों को छोड़कर) यानी पाँच हजार लोगों पर एक डॉक्टर। इस गिनती में वे डॉक्टर भी शामिल हैं जो या तो मर चुके हैं या विदेश चले गए या उम्र के कारण डॉक्टरी करने लायक नहीं रहे। अब मान लो कि खुदानखास्ता मेरे हिस्से में वह डॉक्टर आ गया जो मर चुका है। मेरे कानों में हारमोनियम की जगह कब्र की सायं-सायं बजने लगेगी।

बाज आए ऐसी मोहब्बत से, हटाओ पानदान अपना! नमाज बख्शवाने जाऊँ और रोजा गले पड़ जाएँ। तुम खामख्वाह पानी पर कील ठोंकने की कोशिश न करो। मैं यूँ ही ठीक हूँ। बजने दो कान में हारमोनियम या तानपूरा। मुझे डॉक्टर को दिखाना ही है तो पहले खुद जाकर ठोंक-बजाकर यकीन कर लो कि वह जिंदा डॉक्टर है या मरे हुए डॉक्टरों में से एक है। फिलहाल मैं कान में सुदर्शन की पत्ती का अर्क गर्म करके टपकाता हूँ। शायद हारमोनियम का बजना बंद हो जाए। तुम्हें भी बुढ़ापे में खाँसी-खुर्रा लगा रहता है।

डॉक्टर के वहाँ जाओ तो पूछताछ कर कन्फर्म कर लेना कि कहीं वह स्वर्गीय डॉक्टरों में से एक तो नहीं है। चलता हूँ। हारमोनियम अब भी बज रहा है। आवाज बाहर आती होती तो तुम्हें भी सुनवाता। खुदा हाफिज।

काम न करने के उपाय
काम न करना भी एक बहुत बड़ा काम है। काम न करके आप चैन से नहीं बैठ सकते। सच तो यह है कि काम न करने वाला बड़ा ही बेचैन रहता है। पेश हैं कुछ ऐसे ठोस उपाय जिन्हें अपनाकर आप काम न करते हुए चैन की बंसी बजा सकते हैं। सर्वप्रथम काम न करने का दर्शन समझिए। एक बार दार्शनिक स्तर पर मानसिक मजबूती आ गई तो काम न करते हुए झिझक नहीं होगी।

कहते हैं, "लेस वर्क लेस मिस्टेक, मोर वर्क मोर मिस्टेक, नो वर्क नो मिस्टेक" अर्थात जितना अधिक काम करेंगे गलतियाँ उतनी अधिक होंगी। ऐसे में कम काम करेंगे तो कम गलती होगी और काम नहीं करेंगे तो गलती होगी ही नहीं। अतः काम न करना ही श्रेयस्कर है।

काम न करने के संदर्भ में एक और थ्योरी मुझे मिली। यह चौपाई रूप में है - "रघुपति राघव राजा राम, जितना पैसा उतना काम।"

हम सभी जानते हैं काम के मुकाबले वेतन कम ही मिलता है सो कम काम करके वेतन के प्रति पनप रहे आत्मिक असंतोष से छुटकारा पाया जा सकता है। मुझे विश्वास है अब तक आप काम न करने के प्रति मानसिक रूप से मजबूत हो चुके होंगे। इसके बाद का कदम काम न करने के लिए व्यावहारिक उपाय अपनाना है।

काम न करने के लिए पहला व्यावहारिक उपाय यह है कि काम समझते हुए भी उसे न समझ पाने का अभिनय करना। वह भी उस सीमा तक कि काम बताने वाला यह सोचने लगे कि इस शख्स से काम कराने से बेहतर है खुद काम कर लेना है।

काम न करने का दूसरा सफल उपाय दिए हुए काम की जलेबी बनाना है अर्थात काम करने के बजाय इतना उलझा देना है कि काम बताने वाला अपनी ही बात का ओर-छोर न ढूँढ़ पाए।

ऐसे ही काम न करने का तीसरा उपाय है - "ना करनी नहीं और फली तोड़नी नहीं।" इस उपाय में काम करने के लिए मना नहीं किया जाता और काम भी नहीं किया जाता। बस हर समय काम में लगे रहने का नाटक किया जाता है।

अंत में काम देने वाले को यह भ्रम पैदा हो जाता है कि बेचारा काम करने वाला बड़े परिश्रम और लगन से काम में लगा तो है पर यह काम इसकी क्षमता से बाहर है। ऐसे में वह या तो स्वयं साथ लग कर काम पूरा करवा देता है या फिर उसे कोई सहयोगी दे देता है जो मिल-जुलकर काम निपटवा देता है। इस उपाय में काम कोई और करता है और नाम उसका होता है। सच पूछिए तो काम न करने का यह एक बड़ा ही लाभकारी उपाय है।

कुछ लोग काम न करने के लिए बीमारी का बहाना बनाते हैं लेकिन काम से बचने का यह एक बेहद लचर और घटिया उपाय है। यह अधिक समय तक प्रभावी नहीं रहता और कई बार इसमें लेने के देने पड़ जाते हैं। काम न करने का "नौ मन तेल और राधा" उपाय भी एक श्रेष्ठ उपाय है। इसमें काम करने से पहले ऐसी-ऐसी शर्तें रखना है कि काम बताने वाला पानी माँग जाए।

इस उपाय को अपनाने के लिए आपको बाल की खाल निकालनी आनी चाहिए। ऐसे में नियमों की उलटी-सीधी व्याख्या करने में पारंगत होना बड़ा काम आता है। वैसे कहते हैं जो इस कला में निपुण हो जाते हैं उनसे काम खुद घबराता है।

ऐसे लोगों से काम को डर लगा रहता है कि उनके हाथ में पहुँचते ही अर्थ का अर्थ होकर रहेगा। यहाँ तक कि वह काम देने वाले से कहता है कि हे प्रभु मुझे ऐसे आदमी से बचाओ। ऐसे लोग हैंडपंप को कुआँ और चौपहिया वाहन को बैलगाड़ी बना देते हैं। ये कलियुग के अनुकरणीय चरित्र हैं इन पर कामचोर होने का ठप्पा भी नहीं लगता और इनसे काम दूर भी रहता है। मुझे विश्वास है अब तक आप अपने देश में काम की गति कम होने का कारण समझ गए होंगे।

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