बुधवार, 5 मई 2010

'तू-तू-मैं-मैं' में प्यार का तड़का


अक्सर ऐसा होता है कि आप अपने साथी से किसी भी बात पर गुस्सा हो जाते हैं। कभी वह टाइम पर नहीं आ सके, या आपके विचार मेल नहीं खाए आदि कई कारण हैं जिन पर आपका क्रोधित होना स्वाभाविक है। आप अपने क्रोध पर नियंत्रण नहीं रख पाते।

यदि वह हमसे नाराज हैं तो इसको छिपाने की आवश्यकता नहीं। यदि वह हम पर अपना रोष प्रकट कर रहे हैं, तो इसका अर्थ यह नहीं कि वे हमसे नफरत करते हैं। सच तो यह है कि क्रोध भी प्रेम की अभिव्यक्ति का एक प्रकार है।

क्रोध या गुस्सा सामान्यत: एक अवगुण है जो थोड़ा बहुत सब में होता है। फर्क सिर्फ इतना है कि कोई आवश्यकता से अधिक गुस्सा करता है तो कोई कम। कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जिन्हें गुस्सा जरूर आता है, लेकिन वे उसे व्यक्त नहीं करते। ऐसा कभी आदतवश होता है और कभी विवशता के कारण।

पर यह सत्य है कि हम सभी को कभी न कभी किसी न किसी बात पर गुस्सा आता ही है, क्योंकि अन्य अनुभूतियों की तरह यह भी एक अनुभू‍ति है। अक्सर लोग जब अपना क्रोध उस आदमी पर व्यक्त नहीं कर पाते, जिस पर वे करना चाहते हैं तब वे अपना गुस्सा दूसरी चीजों पर निकालते हैं।

मनोवैज्ञानिकों का कहना है‍‍ कि क्रोध के आवेग में किसी चीज को उठाकर फेंकने से या मारने से मनुष्य के अंदर की भड़ास निकल जाती है तथा उसके जल्दी शांत हो जाने की संभावनाएँ बढ़ जाती हैं।

इसके विपरीत कुछ लोगों को गुस्सा करने की आदत पड़ जाती है जिससे वे अंदर ही अंदर घुटते रहते हैं। गुस्सा दबाना या उसे अभिव्यक्त न करना शुरू में किसी विवशता के कारण होता है, जो क्रमश: आदत का रूप ले लेता है। सच तो यह है कि क्रोध की आग बुझती नहीं ‍वरन अंदर ही अंदर सुलगती रहती है।

इस कारण अक्सर लोग खासकर युवा भयंकर निराशा का शिकार हो जाते हैं और नशीली चीजों के सेवन की ओर अग्रसर हो जाते हैं। गुस्सा दबाने का असर हमारे मस्तिष्क पर भी पड़ता है।

गुस्सा व्यक्त करते समय ध्यान दें कि आपकी आवाज‍ किस प्रकार बदल रही है। सामने बैठे व्यक्ति से यह न कहें, 'तुमने मेरे साथ ऐसा किया' क्योंकि ऐसा कहने से आप उसे अपने गुस्से के विषय में बता रहे हैं, न कि अपना गुस्सा प्रकट कर रहे हैं। इसके बजाय कहें 'मैं तुमसे नाराज हूँ' या 'मैं तुमसे नफरत करती हूँ 'या मुझे तुम्हारे पर इतना ज्यादा गुस्सा आता है क्योंकि तुमने मेरे साथ ऐसा-वैसा किया।'

नकारात्मक भावनाओं को जिस प्रकार अ‍नुभव किया जाता है, यदि उसी रूप में अभिव्यक्त ना किया जाए तो इसके हानिकारक परिणामों से बचा जा सकता है।
* आप यह जरूर ध्यान रखें कि जिस बात से आप दोनों के बीच असहमति बनी है बात उसी तक सीमित रहे। वहाँ से इसे डाइवर्ट कर कहीं ओर खींच कर न ले जाएँ नहीं तो समस्या कम होने की बजाय और बढ़ सकती है।
* अपने मनोभावों पर नियंत्रण रखें। अपने शब्द मर्यादा की सीमा में रखें और आपका उद्देश्य मतभेदों को दूर करना होना चाहिए।

* यदि आपके विचार से आपका साथी सहमत नहीं है तो फिर जबर्दस्ती उस पर अपने विचारों को थोपें नहीं। थोड़ा उस घड़ी को टालने का प्रयास करें। दिमाग शांत होगा तो ऑटोमैटिक ही कई इशूज रिजॉल्व हो जाएँगे।
* जहाँ तक संभव हो आप दोनों के अलावा तीसरे को बीच में न आने दें, लेकिन आवश्यक हो जाए तो विश्वसनीय दोस्त को मिडिएटर बनाने से भी परहेज न करें।

* बात को गाँठ न बाँध लें। जितनी जल्दी हो सके। आगे बढ़कर बात कर लें। जैसे खाना खाया‍ कि नहीं या उनके ही किसी अन्य मित्र के बारे में पूछ लें। आपके फोन में भले ही बैलेंस हो लेकिन साथी का मोबाइल माँगकर यूज कर लें।

* सामने वाला जो काम कर रहा है। उसकी आगे बढ़कर हेल्प करने चले जाएँ।
दोस्तो, याद रखिए यही वह नाजुक समय होता है जबकि आप तलवार की धार पर खड़े होते हैं जिसके एक ओर कुआँ होता है और दूसरी ओर खाई। आपमें से किसी की भी गलती आगे के रिश्ते पर हो सकता है ब्रेक लगा दे।
क्योंकि बड़े-बड़े झगड़ों की शुरुआत ऐसे ही किसी छोटे बिंदुओं से होती है।

किसी ने ठीक ही कहा है कि यदि आपको आदमी का व्यवहार परखना हो तो आप देखिए कि उसके झगड़ा करने का ढंग क्या है। उस समय वह कितना शालीन बना रह सकता है या कितना अभद्र हो सकता है।

झगड़े में भी प्यार बना रहे तो इससे अच्छा कुछ हो ही नहीं सकता। गुस्सा करो तो भी ऐसे कि आपके अन्य दोस्त भी आपकी मिसाल दें कि देखो लड़ने-झगड़ने के बावजूद भी कब पहले जैसे हो जाते हैं पता ही नहीं चलता।

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