सोमवार, 3 मई 2010

मेरा बचपन मत छीनो



  अरुण कुमार बंछोर 
कामवाली कई दिनों से नहीं आ रही थी। हम परेशान थे। हमने अपनी समस्या पडोसियों को बताई। बाजू के दयाल जी एक दिन घर पर पधारे। उन्होंने कहा, मेरी नजर में एक आठ साल की बच्ची है। उसे रखना चाहेंगे।

मरता क्या न करता। हमने तुरंत हां कर दी। दो दिन बाद ही वे बच्ची को लेकर हाजिर हो गए। बच्ची बेहद मासूम थी। मैंने पूछा, क्या तुमने कहीं पहले काम किया है?

इस बात का जवाब दयाल जी देने लगे, इस लडकी ने कुछ जगह काम किया, मगर कहीं टिक नहीं पाई। पन्द्रह से बीस दिन होते-होते यह काम छोडकर भाग आई। मुझे लगता है बडे निर्दयी और कंजूस रहे होंगे वह लोग। इस बच्ची से जरूरत से ज्यादा काम लेते थे। मुझे लगता है, इसी कारण यह भाग खडी होती है।

मेरी पत्नी ने बडे प्यार से उसे अपने पास बुलाया और कहा, चिन्ता मत करो। मैं तुम्हें सब कुछ दूंगी। तुम्हें अच्छा खाना दूंगी। नए कपडे सिलवा दूंगी। सोने के लिए गद्देवाला बिस्तर लगवा दूंगी। पूरे पैसे भी दूंगी। बस, तू मन लगाकर काम कर।

मासूम बच्ची की गोल-गोल आंखें डबडबा गई। वह मेरी पत्नी की आंखों में एकटक देखने लगी। मगर उसने कहा कुछ नहीं। मेरी पत्नी ने पूछा, क्या तू इतने से खुश नहीं रहेगी? तुझे और क्या चाहिए?

उसने साहस बटोरा और धीरे से कहा, क्या मुझे स्कूल जाने देंगी? क्या मुझे कुछ देर बच्चों के साथ खेलने देंगी? मुझे टी.वी. देखने को मिलेगा? मेरी मां नहीं है, मुझे अपने पास सुलाएंगी?

इतने सारे सवालों से मैं अवाक् रह गया। मेरी आंखें भर आई। मैंने दयाल जी से कहा, यार, माफ करो। इसे इसके पिता के पास ले जाओ। हम इसका बचपन नहीं छीन सकते। वह बच्ची उल्लास में भरकर बाहर की तरफ बढ गई। मगर मेरी पत्नी का मूड ऑफ हो गया।

कोई टिप्पणी नहीं:

टिप्पणी पोस्ट करें