रविवार, 31 अक्तूबर 2010

चतुर कविराज

एक थे चतुर कविराज, उन्हें था अपनी अकल पर बड़ा नाज। वो थे भी होशियार, राजा भी उनकी हर बात मानने को हो जाते थे तैयार।
एक दिन कविराज ने एक कविता लिखी, सुनकर राजा की तबियत खिली। बोले-'बोलो क्या माँगते हो, क्या इनाम चाहते हो।' कविराज ने सोचा देखते हुए ऊपर, फिर दिया कुछ देर बाद उत्तर-'महाराज मुझे तो दे दीजिए एक शिकारी कुत्ता' सुनकर सारे दरबारी हुए हक्का-बक्का।
सब दरबारियों ने सोचा कविराज ने एक अवसर खो दिया, खनखनाते सिक्कों से हाथ धो लिया। राजा ने कहा-'जो तुमने माँगा है वह मिल जाएगा, शिकारी कुत्ता तुम्हें दे दिया जाएगा।'
कविराज ने कहा-'महाराज आप हैं बहुत दयावान, यदि घोड़ा भी होता मेरे पास तो मैं शिकार पर जाता श्रीमान।' राजा ने कहा-'घोड़ा भी दे देते हैं, तुम्हारी इच्छा पूरी कर देते हैं।'
कविराज ने आगे कहा-'जब भी शिकार मेरे साथ आए, तो चाहता हूँ कि कोई उसे पकाकर खिलाए।'
राजा ने उसे रसोइया भी दे दिया, पर आगे कविराज ने कहा-'आपकी उदारता का नहीं है जवाब, पर मैं इतने सारे उपहार कहाँ रखूँगा जनाब?' राजा ने उसे एक महल भी दे दिया, कविराज का मन अभी भी नहीं था भरा।
फिर उसने कहा-'मैं इतनी बड़ी व्यवस्था को संभालूँगा कैसे, यह सब काम होगा कैसे?' राजा ने कहा मैं दूँगा तुम्हें एक खजूर का बाग, उसमें जमा लेना अपना सारा काम। 'मैंने देखी नहीं ऐसी दयालुता, ऐसी उदारता। मैंने जो चाहा आपने दिया। आप हैं कविता के सही कदरदान, मेरा आभार स्वीकार करें श्रीमान।'

कोई टिप्पणी नहीं:

टिप्पणी पोस्ट करें