शुक्रवार, 29 अक्तूबर 2010

भागवत: १०५: जब इंद्र ने अपने गुरु विश्वरूप का सिर काटा


अभी तक हमने पढ़ा देवगुरु बृहस्पति के विलुप्त होने पर विश्वरूप को देवताओं ने अपना गुरु बनाया। विश्वरूप के तीन सिर थे। एक बार कोई ऐसा अवसर आया कि इंद्र में और विश्वरूप में विवाद हो गया। इंद्र उस पर क्रुद्ध हो गए और उसका सिर काट डाला। तब जो सोमरस पीने वाला उसका सिर था वह पपीहा, सुरा पीने वाला गोरैया और अन्न खाने वाला तीतर हो गया।इंद्र को ब्रह्महत्या का दोष लग गया। उसने कुछ समय तक तो इस दोष को स्वीकार किया किंतु संवत्सर के अंत में उसने पृथ्वी पर वृक्ष और स्त्रियों, जल में इस ब्रह्म दोष को बांट दिया।
भूमि ने यह मांग की, उसके ऊपर के गड्ढे स्वयं भर जाएं। हत्या का चतुर्थ अंश उसने अपने ऊपर ले लिया । यही कारण है कि ऊसर भूमि पर पूजा आदि निषेध है। काटने पर फिर अंकुर निकल आए यह वर मांगकर वृक्षों ने हत्या का दूसरा भाग अपने सिर ले लिया। वह हत्या उनमें गोंद के रूप में विद्यमान है। इसलिए गोंद खाना निषेध बताया गया है। गर्भ की पीड़ा न हो और प्रसूतिकाल के पश्चात भी स्त्री-पुरूष मिलन कामना बनी रहे। यह वर मांगा स्त्रियों ने और इसी के साथ हत्या का तीसरा भाग उन्होंने लिया। वह स्त्रियों में मासिक धर्म के रूप में आज भी विद्यमान है। दूध आदि में जल को मिलाने पर भी उन पदार्थों की वृद्धि हो यह मांगकर जल ने शेष दोष स्वीकार कर लिया जो बुलबुले के रूप में है इसीलिए बुलबुले वाले जल में स्थान करना वर्जित बताया गया है।
तब शुकदेव बोलते हैं- देखो उस इंद्र को इतने बड़े सिंहासन पर बैठने के बाद भी दुर्गुण छोडऩे की इच्छा नहीं होती, इसलिए परीक्षित मैं बार-बार तुम्हारी प्रशंसा भी कर रहा हूं। तुम बहुत अच्छे व्यक्ति हो। राजगादी पर, राजमद से तुमसे यदि भूल हुई तो तुमने भगवान का नाम लेने का प्रयास किया। अब तुम अपने भीतर बैठे परमात्मा को पहचानते हो। यही परमात्मा तुम्हारा उद्धार करेंगे। यहां छटा स्कंद समाप्त होता है। अब हम कल से भागवत का सातवां स्कंध प्रारंभ करेंगे।

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