शनिवार, 23 अक्तूबर 2010

भागवत: ९९ - १००: जीवन में नाम का बड़ा महत्व है

भागवत कह रही है कि संतान का लालन-पालन करें तो होश में करें। होश में रहने की जो बात यहां कही जा रही है, वो यही है कि बच्चों कों कहीं न कहीं परमात्मा से जोड़े रखिए। भक्त बनाएइ। भक्त में सारे गुण होते हैं। भक्त एक आचरण है संपूर्ण आचरण। कंप्लीट केरेक्टर का नाम भक्त है। परमात्मा पूरा भक्त चाहता है। नाम का बड़ा महत्व है इसलिए नाम लेते रहिए।

आपको यह घटना याद होगी कि हनुमानजी जब भगवान राम के पास से विरह संदेश लेकर मां सीता के पास पहुंचे और उन्होंने मां सीता को सारा संदेश दिया तो सीता मां ने मुंह मोड़ लिया। सोचा ये भी कोई रावण की माया है। हनुमानजी बहुत दु:खी हो गए। अब कैसे मनाएं? कथा सुनाई और रामजी की अंगुठी भी डाल दी फिर भी सीताजी विश्वास नहीं कर रही हैं। तब हनुमानजी को याद आया कि भगवान ने मुझे एक बात कही थी कि यदि सीता न पहचाने और कोई परेशानी खड़ी हो जाए तो मैं तुम्हें कान में एक बात कह रहा हूं यह है कोडवर्ड मेरे और सीता के बीच का। हनुमानजी को याद आया कि भगवान ने कह रखा है वह बोल दो।
उन्होंने तत्काल कहा- रामदूत मैं मातु जानकी और रामजी और सीताजी जब एक-दूसरे से बात करते थे, एकांत में तो सीताजी भगवान को करूणानिधान कहती थीं। यह बात सीताजी को मालूम थी, रामजी को मालूम थी और जैसे ही हनुमानजी ने बोला सत्य शपथ करूणानिधान की। सीताजी ने कहा ये कोई निकट का व्यक्ति है। एकदम पलटीं, बेटे को स्वीकार किया। नाम का ऐसा महत्व है। करूणानिधान नाम था प्रभु राम का। इसलिए नाम को जीवन में बनाए रखिए ये नाम आपको परमात्मा तक पहुंचा देगा।

जब चंद्रमा ने वनस्पतियों को भस्म होने से बचाया
परीक्षितजी ने शुकदेव महाराज से कहा- हे महामुनि। मुझे परमपुरूष परमात्मा द्वारा देवता, मनुष्य, नाग और पक्षी आदि की सृष्टि का विवरण विस्तार से समझने की कृपा कीजिए। तब शुकदेवजी कहने लगे कि राजा प्राचीनबर्हि के दस पुत्र जिनका नाम प्रचेता था, समुद्र में तपस्या करके बाहर निकले। उन्होंने देखा कि सारी पृथ्वी लता, वृक्ष आदि से हरी-भरी हो गई है। उनके लिए उस धरा पर कहीं स्थान ही शेष नहीं है। इससे उनको बड़ा क्रोध आया और उन्होंने उस वृक्षावली को अपने क्रोध से भस्म कर देना चाहा।

चंद्रमा वनस्पतियों के स्वामी हैं। जब चंद्रमा को यह विदित हुआ तोवे प्रचेताओं को वनस्पति का लाभ समझाकर उन्हें कुमार्ग से विरक्त करने का प्रयास करने लगा और वह उसमें सफल भी रहे। चंद्रमा ने वृक्षों के अधिपति की कन्या को प्रचेताओं की पत्नी के रूप में दिलवा दिया। प्रचेतागण शांत हो गए। उससे उन्होंने दक्ष को उत्पन्न किया। दक्ष क्योंकि प्रचेताओं से उत्पन्न थे इस कारण उनका नाम प्राचेतस हुआ और उन्हीं की संतान से ये सारा संसार भर गया। दक्ष ने मानसी सृष्टि उत्पन्न की उसमें देव, दानव, मानव सभी थे। किंतु इस सृष्टि में बल का अभाव था और इसी कारण वह पनप नहीं सकी।
प्रजापति दक्ष निराश हुए और घोर तप किया। भगवान प्रकट हुए और उन्होंने कहा कि तुम प्रजापति पंचजन की पुत्री आसिन्की से विवाह कर लो । उसी से सृष्टि की वृृद्धि होगी। ऐसा कहकर भगवान अंतध्र्यान हो गए। आदेश के अनुसार दक्ष ने आसिन्की से विवाह किया। उनके यहां दस हजार पुत्र उत्पन्न हुए। उन्हें सृष्टि की वृद्धि का आदेश दिया। पिता का आदेश मानकर दक्ष पुत्र तपस्या के लिए निकल गए।
(sabhar dainik bhaskar)

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