मंगलवार, 26 अक्तूबर 2010

दादी की चतुराई

आज के चकाचौंध और आँय-फाँय अँगरेजी के जमाने में कौन बच्चा अपना नाम गणेश बताना पसंद करेगा? शानदार स्कूल में पाँचवीं कक्षा में पढ़ने वाला गणेश पटवर्द्धन अपने इस पुराने से नाम से बड़ा खुश था। इसका कारण यह था कि गणेश मार्र्ग उसके छोटे शहर की सबसे ज्यादा रौनक वाली सड़क थी। फैशनेबल मॉल उसी सड़क पर।
आधुनिक सिनेमाघर उसी सड़क पर। जूते, कपड़े, विदेशी खाने की महँगी दुकानें सब उसी सड़क पर। और उसी सड़क पर था गणेश का घर-गणेश विला। वह घर सबसे अलग, सबसे न्यारा था। छत पर लाल कवेलू, सामने लकड़ी की बालकनी और बड़े से अहाते में नारियल के ऊँचे-ऊँचे पेड़।
गणेश को लेने के लिए सुबह जब स्कूल बस आती तो वह उसके घर के दरवाजे के पास रुकती। दोपहर बाद जब वह स्कूल से लौटता तो बस उसे गणेश मार्ग की दूसरी ओर उतारती। उस समय तक चहल-पहल इतनी बढ़ जाती कि सड़क पार करना कठिन हो जाता। गणेश काफी देर तक दूर खड़े अपने घर को देखता रहता। उसे अपना घर सुंदर लगता लेकिन उसे यह समझ में नहीं आता कि उसका घर सबसे अलग क्यों है?
आजी (दादी) उसे बताती कि अभी कुछ वर्ष पहले इस रास्ते के सारे घर ऐसे ही थे। जब से इस शहर में जमीन के भाव बढ़ने लगे, उनके पड़ोसियों ने अपने-अपने घर बेच दिए। उन घरों को तोड़कर वहाँ नई दुकानें-दफ्तर और बाजार बने। पेड़ कट गए और रास्ते का हुलिया बदल गया। बस, एक पटवर्द्धनों का बंगला ही पुरानी शान के साथ खड़ा है।
गणेश और आजी की दोस्ती थी। पूरे परिवार में गणेश सबसे छोटा था, तो आजी सबसे बड़ी। घर भी आजी का ही था। आजी उसे कहानियों के साथ पुराने जमाने के किस्से सुनाती। आजी ने उसे बताया था कि बिल्डर लोग उनका घर भी खरीदना चाहते हैं। रुपयों का लालच देते हैं। इतना रुपया जो राजा की कहानी में ही सुनने को मिलता है। हम इतने रुपए लेकर क्या करेंगे? फिर आजी की आँखें दूर कहीं देखने लगतीं। तेरे परदादा बड़े वकील थे। उनसे मिलने के लिए तिलक आए थे, तब ऊपर के कोने वाले कमरे में ठहरे थे। इस घर में आए मेहमानों के नाम जब आजी गिनाती तो गणेश को लगता कि वह उसकी सोशल स्टडीज की पुस्तक में से देखकर बोल रही हैं।
घर बेचने और रुपयों वाली बात गणेश की समझ में नहीं आती। परंतु पूरे पटवर्र्द्धन परिवार में, यानी गणेश के तात्या, अप्पा काका, अण्णा काका और काकियों में घर बेचने को लेकर खासी ऊहापोह थी। पुराना बंगला सबको पसंद था परंतु रुपयों से खरीदी जा सकने वाली मोटरकार, होटलों का खाना, महाबलेश्वर में छुट्टियाँ ललचा रही थीं। आजी से सब डरते थे।
उनकी जुबान की तलवारबाजी से परिवार के लोग तो क्या, बिल्डर-मवाली-सिपहिये सब खिसकते नजर आते थे। एक जान्हवी ताई थी जो अधिक उकसाने पर वैसी जुबान चला सकती थी। जान्हवी की माँ जब बेटी की चिकिर-चिकिर से आजिज आ जाती तो रुँआसी होकर कहती- बाई, तू ठहरी दुर्गादादी की पोती, मेरा तुझसे क्या मुकाबला। तू उन्हीं के पास जा।
दादी ने जान्हवी को अच्छा साध रखा था। जान्हवी के खूब लंबे और रेशमी बाल थे। बचपन से अब तक दादी ही उन्हें तेल लगाकर चोटी गूँथती। जब सब जान्हवी के बालों की प्रशंसा करते, दादी यों मुस्कुराती जैसे उनके बालों की ही बात हो रही हो। जान्हवी कॉलेज में क्या जाने लगी, बाल कटवाने की जिद करने लगी। दादी ने उसे पुचकारा, समझाया, डाँटा... और आज तो उन दोनों ने खूब तलवारें भाँजी। सारे घर की सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई। दादी गुस्से से तमतमाकर घर से बाहर निकल गई और जाकर नारियल के बगीचे में बैठ गई।
बचपन से उन्हें यह जगह बहुत प्रिय थी। जब उनकी शादी हुई तब वे चौदह वर्ष की ही तो थीं। यहीं पर वे घरकुल खेलती थीं। लेकिन आज की गृहस्थी उन्हें समझ में नहीं आती, ऐसा वे बड़बड़ा रही थीं। गुस्साने से ज्यादा वे बौखला गई थीं। घर क्यों बेचना है? बाल क्यों काटना है? घर में सिनेमा क्यों चाहिए? घर का खाना छोड़ बाजार का क्यों चाहिए? दादी को शोरगुल बिलकुल नापसंद था। दोपहर हो गई और गणेश मार्ग पर शोर बढ़ गया। दादी को सिरदर्द होने लगा। वे उठने के लिए झुकी ही थीं कि ऊपर लटके नारियलों को पता नहीं क्या हो गया। एक नारियल आकर उनके सिर पर गिरा।
सच कहो तो टल्ले से ज्यादा वह कुछ नहीं था लेकिन बुढ़िया को बेहोश करने के लिए वह काफी था। हो सकता है ऐसा भूख लगने के कारण हुआ हो। दादी ने जब आँखें खोलीं तब एक दर्जन चेहरे उन पर झुके हुए थे। उनमें से सबसे छोटे, प्यारे चेहरे से उन्होंने पूछा कि तुम कौन हो? उसने शीश नवाकर कहा- मैं गणेश हूँ। दादी ने हाथ जोड़कर नमस्कार किया। फिर एक मोटी-सी महिला से पूछा- तुम कौन हो? उत्तर मिला मैं शुभांगी, आपकी बड़ी बहू। इस हालत में भी दादी का चौकस स्वभाव कम नहीं हुआ था।
सबके नाम जानने के बाद उन्होंने पूछा कि पीछे छुपती फिर रही बालकटी लड़की कौन है? लड़की सहमते हुए बोली- मैं जान्हवी हूँ। दादी बोली- छुपती क्यों हो? तुम तो सबसे सुंदर लग रही हो। सब लोग चौंक पड़े। पहले तो दादी बगीचे में बेहोश पड़ी मिली। पूरे चार घंटे बाद उन्हें होश आया। फिर उनकी याददाश्त खो गई। अब वे लंबे बाल कटाने पर जान्हवी को सुंदर कह रही थीं। तभी दूर से सुनाई देते वाहियात गीतों की धुन पर दादी पैर हिलाने लगीं। यह तो वाकई में डरा देने वाली बात थी। डॉक्टर काका ने कहा कि इन्हें आईसीयू में रखकर देखते हैं।
तीन दिन अस्पताल में रहने के बाद दादी घर लौट आईं। अब वे पहले की तरह ही अच्छी-भली चल-फिर-बोल रही थीं, लेकिन सबकुछ भूल गई थीं। अब वे किसी को दादू, किसी को मोटी, किसी को चष्मिश जैसे नामों से पुकारने लगीं। दादी दिनभर जोर से टीवी चलाकर रखतीं। अब वे घर का खाना छोड़ पिज्जा-बर्गर की जिद करने लगीं। पहले तो सबको इसमें फायदा दिखा परंतु जब टीवी से सिरदर्द और बाहर के खाने से पेट गड़बड़ाने लगा तो सब बड़े परेशान हो उठे। घर बेचने की बात सब भूल गए।
महीना खत्म होने के बाद दूधवाला हिसाब लेकर आया। चालाक ने सोचा कि डोकरी की हालत का फायदा उठाकर सौ-पाँच सौ रुपए झटक लूँ। सबकी आँख बचाकर उसने बगीचे में फूल चुन रही दादी को पकड़ा और बोला कि आजी, पिछले माह के मेरे पाँच सौ रुपए बाकी हैं। आप अप्पा से कहकर दिलवा दो। दादी चमकी और आँखें तरेरकर बोलीं- महेश्या, झूठ बोलेगा तो कौवा काटेगा। छुट्टे पैसे नहीं थे इसलिए तूने ही बत्तीस रुपए लौटाए नहीं मेरे। अब बोल? महेश्या दादी के पैर छूने लगा।
दूधवाले के जाते ही पीछे से निकलकर गणेश सामने आया और आँखें नचाने लगा। दादी यह क्या शरारत है? दादी ने आँखें मिचकाकर फुसफुसाया कि तेरा गणेश विला बचाए रखना है तो वेड़ा (पागल) बनकर पेड़ा खाओ।

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