बुधवार, 3 नवंबर 2010

भागवत: ११०: नृसिंह रूप में हिरण्यकषिपु का वध किया भगवान ने



अभी तक हमने पढ़ा कि हिरण्यकषिपु द्वारा मना करने पर भी प्रह्लाद भगवान की भक्ति करता रहा। क्रोधित होकर हिरण्यकषिपु ने प्रह्लाद को मृत्युदंड दे दिया। हाथी के पैर के नीचे ले गए प्रह्लाद को। पहाड़ से पटका, अग्नि में जलाया लेकिन प्रह्लाद को प्रभु की भक्ति कर रहा था इसलिए उसे कुछ भी नहीं हुआ।
एक दिन हिरण्यकषिपु ने प्रह्लाद से कहा कि तेरा कोई भगवान है तो इस खंबे में क्यों नहीं दिखाई पड़ता? प्रह्लाद ने दृढ़ता से कहा कि खंबे में भी भगवान हैं। तब हिरण्यकषिपु ने कहा कि यदि इस खंबे से भगवान न निकला तो इसी समय मैं अपनी तलवार से तेरा सिर धड़ से अलग कर दूंगा। इतना कहकर उसने ज्यों ही खंबे पर हाथ मारा। तभी भयंकर गर्जना हुई। ऐसा लगा मानो प्रलय आने वाली है। हिरण्यकषिपु ने तलवार उठाई और अपने पुत्र का सिर काटने लगा तभी खंबे को फाड़कर भगवान नृसिंह प्रकट हो गए। हिरण्यकषिपु ने नृसिंह भगवान पर प्रहार करना चाहा जैसे ही वह नृसिंह की ओर बढ़ा उन्होंने उसे पकड़ लिया। भगवान नृसिंह वहां से कूदे हिरण्यकषिपु के सिंहासन पर जाकर विराजमान हो गए। और वहां बैठकर उन्होंने हिरण्यकषिपु को अपनी जंघा पर लेटाया और अपने तीव्र नाखूनों से उसको चीर दिया।
इतना विकराल रूप था भगवान का कि किसी को उनकी ओर देखने का साहस नहीं हुआ। हिरण्यकषिपु के वध का समाचार चारों ओर तीव्रगति से फैल गया। देवताओं ने सुना तो वे हर्ष निनाद करने लगे। अपने भक्त प्रह्लाद के वचनों को कृतार्थ करने और अपनी सर्वव्यापकता सिद्ध करने हेतु नृसिंह के स्वरूप में वैशाख शुक्ल चतुर्दशी के दिन खंबे में से प्रकट हुए।

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