गुरुवार, 25 नवंबर 2010

भागवत: १२६ : भगवान विष्णु ने क्यों लिया मत्स्यावतार ?

भागवत में अब मत्स्यावतार की कथा आ रही है। राजा सत्यव्रत था। राजा सत्यव्रत एक दिन जलांजलि दे रहा था नदी में। अचानक उसकी अंजलि में एक छोटी सी मछली आई। उसने देखा तो सोचा वापस सागर में डाल दूं लेकिन उस मछली ने बोला-आप मुझे सागर में मत डालिए अन्यथा बड़ी मछलियां मुझे खा जाएंगी। तो उसने अपने कमंडल में रखा। मछली और बड़ी हो गई तो उसने अपने सरोवर में रखा, तब मछली और बड़ी हो गई। राजा को समझ आ गया कि यह कोई साधारण जीव नहीं है। राजा ने मछली से वास्तविक स्वरूप में आने की प्रार्थना की।

साक्षात चारभुजाधारी भगवान विष्णु प्रकट हो गए और कहा कि ये मेरा मत्स्यावतार है। भगवान ने सत्यव्रत से कहा-सुनो राजा सत्यव्रत! आज से सात दिन बाद प्रलय होगी। तुम एक नाव में सप्त ऋषि के साथ बैठ जाना, वासुकी नाग को रस्सी बना लेना और मैं तुम्हें उस समय ज्ञान दूंगा। ऐसा कहते हैं कि उसको मत्स्यसंहिता का नाम दिया गया। यहां आकर आठवां स्कंध समाप्त हो रहा है।आठवें स्कन्ध में भगवान की लीला देखी, समुद्र मंथन देखा, वामन अवतार देखा, मत्स्यावतार देखा और अब नवम स्कंध में प्रवेश कर रहे हैं।
यह स्कंध भगवान का स्कंध है। नवां स्कंध रामायण का स्कंध है। रामायण सीखाती है जीना। राजा परीक्षित की बुद्धि को स्थिर करने के लिए, शुद्ध करने के लिए नवें स्कंध में सूर्यवंशी और चंद्रवंशी राजाओं की कथा कही गई है। सूर्य हैं बुद्धि के स्वामी और चंद्र हैं मन के स्वामी। बुद्धि की शुुद्धि के लिए सूर्यवंशी रामचन्द्रजी का चरित्र कहा गया और मन की शुद्धि के लिए चन्द्रवंशी श्रीकृष्ण का चरित्र कहा गया। रामचन्द्रजी मर्यादा का पालन करेंगे तो हमारे मन का रावण मरेगा। हमारे मन का काम मरेगा तो परमात्मा कृष्ण पधारेंगे।

कोई टिप्पणी नहीं:

टिप्पणी पोस्ट करें