सोमवार, 29 नवंबर 2010

भागवत: १३०: कपिल मुनि ने राजा सगर के पुत्रों को भस्म किया

श्रीशुकदेवजी ने कहा कि- हे राजा परीक्षित। राजा अम्बरीष के कुल में आगे पुरंजय नाम का शक्तिशाली राजा हुआ। पूर्वकाल में दैत्यों और देवताओं का युद्ध हुआ। देवता पराजित होकर पुरंजय के पास सहायता के लिए आए। पुरंजय ने कहा कि इंद्र मेरा वाहन बनें तो मैं सहायता करूंगा। इन्द्र को स्वीकार करना पड़ा। इंद्र ने बैल का रूप धारण किया। राजा पुरंजय शस्त्र सज्जित होकर उस पर आरूढ़ हुए और देवताओं को विजय दिलाई। चूंकि दैत्यों का पुर जीतकर इन्द्र को दिया था, इसीलिए उनका नाम पुरंजय पड़ा। इन्द्र को वाहन बनाया, इसलिए उनका नाम इंद्रवाह पड़ा और बैल के कंधे पर बैठकर युद्ध किया, इसलिए नाम काकोस्थ पड़ा।

राजा पुरंजय के आगे जाकर पुत्र हुए उसमें सत्यव्रत भी हुआ। यही सत्यव्रत बाद में त्रिशंकु कहलाया। सत्यव्रत के यहां पुत्र हुआ हरिशचन्द्र। हरिशचन्द्र की संतान का नाम सगर पड़ा। सगर ने एक बड़े यज्ञ का आयोजन किया। उस यज्ञ के अश्व को इन्द्र ने चुराया और कपिल मुनि के आश्रम में बांध दिया। सगर के पुत्रों ने घोड़े की खोज में पाताल तक खोद डाला। कपिल मुनि के आश्रम में वो घोड़ा दिखा। उन्होंने कपिल मुनि को ढ़ोंगी समझा और ज्यों ही कपिलमुनि ने नेत्र खोला सगर के पुत्र वहीं भस्म हो गए । जब पुत्र नहीं लौटे तो उन्होंने अपनी दूसरी पत्नी से उत्पन्न अंशुमान को खोज के लिए भेजा।
अंशुमान ने वहां पहुंच कर कपिल मुनि को तपस्यारत देखा। उन्होंने मुनि की प्रशंसा की, तब मुनि ने उनको सारी घटना बताई। घोड़ा देते हुए कहा कि वे इससे अपने पिता का यज्ञ सम्पन्न करें और मृत पितरों का गंगाजल से उद्धार करें। गंगाजल के बिना मृत पितरों का उद्धार संभव नहीं है। अंशुमान घोड़ा लेकर वन में प्रस्थान कर गया।

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