गुरुवार, 18 नवंबर 2010

भागवत: १२० : लक्ष्मी को पाना है तो परिश्रमी बने

पिछले अंक में हमने पढ़ा कि समुद्र मंथन के दौरान जो विष निकला उसे भगवान शंकर ने पी लिया। रात को शिवजी की तबीयत खराब हो गई। गरमी चढ़ी तो शिवजी ने पार्वतजी से कहा पार्वती कुछ बेचैनी सी हो रही है। पार्वती ने बोला सब थे तब बोलना था अब रात को किसको बुलाऊंगी? एक काम करो मेरे ऊपर धतूरा चढ़ा दो, शंकरजी ने कहा- भांग का लेपन कर दो और मेरा जलाभिषेक कर दो, मैं शांत हो जाऊंगा। पार्वती ने वैसे ही किया। यही वजह है कि आज भी धतूरे, भांग एवं शीतल जल से शंकरजी की पूजा की जाती है।

याद रखिए कि जब मस्तिष्क का मंथन करेंगे तो सबसे पहले विष ही निकलेगा। विषपान की आदत डालिए, नीलकंठ बनिए। समुद्र मंथन के दौरान आठवें नंबर पर निकली लक्ष्मीजी। जैसे ही लक्ष्मीजी निकलीं तो देवता और दैत्य चौंक गए। सबके सब देखने लग गए लक्ष्मी आई हैं। सबकी इच्छा थी कि हमें मिल जाए। लक्ष्मीजी से कहा गया आपको स्वतंत्रता है आप इनमें से जिसे चाहें वरण कर लें। लक्ष्मी चलीं किसको वरण करूं। सबसे पहले उन्होंने निगाह डाली तो साधु-संत बैठे हुए थे वो खड़े हुए। हाथ जोड़कर बोले हमारे पास आ जाओ। लक्ष्मी बोलीं- देखो तुम हो तो भले लोग, लेकिन तुमको सात्विक अहंकार होता है कि हम दुनिया से थोड़े ऊपर उठे हैं, भगवान के अधिक निकट हैं तो तुम्हारे पास तो नहीं आऊंगी। अहंकारी मुझे बिल्कुल पसंद नहीं हैं।
साधु-संतों को छोड़कर आगे चली तो ब्रह्माजी नजर आ गए उन्होंने कहा-बाबा! आप तो बाप बराबर हो और मैं आपकी बेटी हूं। आगे चली गईं। देवता खड़े हो गए, इंद्र के नेतृत्व में हमारी हो जाओ, उन्होंने कहा-तुम्हारी तो नहीं होऊंगी। बोले क्यों? तुम देवता बनते हो पुण्य से और पुण्य से कभी लक्ष्मी नहीं मिला करती। लक्ष्मी की एक ही पसंद है पुरुषार्थ और परिश्रम।

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