शुक्रवार, 1 अप्रैल 2011

भागवत २१९-२२१ कृष्ण को रणछोड़ क्यों कहते हैं?

देवताओं ने अपनी रक्षा के लिए मुचुकुन्द से प्रार्थना की अब आगे...उस समय देवताओं ने कह दिया था कि सोते समय यदि आपको कोई मूर्ख बीच में ही जगा देगा, तो वह आपकी दृष्टि पड़ते ही उसी क्षण भस्म हो जाएगा।कालयवन के भस्म होते ही भगवान श्रीकृष्ण मुचुकुंद के समक्ष प्रकट हुए मुचुकुंद ने उनको प्रणाम किया। भगवान् ने उसे बद्रिकाश्रम जाने के लिए कहा। दोनों भाई वापस मथुरा लौट आए। इधर भगवान् श्रीकृष्ण मथुरापुरी में लौट आए। अब तक कालयवन की सेना ने उसे घेर रखा था।
अब उन्होंने म्लेच्छों की सेना का संहार किया और उसका सारा धन छीनकर द्वारका को ले चले। जिस समय भगवान् श्रीकृष्ण के आज्ञानुसार मनुष्यों और बैलों पर वह धन ले जाया जाने लगा, उसी समय मगधराज जरासन्ध फिर (अठारहवीं बार) तेईस अक्षौहिणी सेना लेकर आ धमका। शत्रु-सेना का प्रबल वेग देख कर भगवान् श्रीकृष्ण और बलराम मनुष्यों की सी लीला करते हुए उसके सामने से बड़ी फुर्ती के साथ भाग निकले।
उनके मन में तनिक भी भय न था। फिर भी मानो अत्यन्त भयभीत हो गए हों इस प्रकार का नाट्य करते हुए, वह सब का सब धन वहीं छोड़कर अनेक योजनों तक वे अपने कमलदल के समान सुकोमल चरणों से ही पैदल भागते चले गए। जीवन में शांति के महत्व पर भगवान की यह सबसे अद्भुत लीला थी। जिनका एक केश मात्र ही पूरी पृथ्वी का भार कम करने में सक्षम है वे श्रीकृष्ण नंगे पैर भागे। कृष्ण, कंस के अत्याचार झेल चुके मथुरावासियों के जीवन में अब पूर्ण शांति चाहते थे।

इस तरह काल को भी जीता जा सकता है
भागवत में अब तक आपने पढ़ा...जरासंध का मथुरा पर आक्रमण करना अब आगे...पचास वर्ष पूर्ण होने पर जरासंध आता है। जीव का पूर्वाद्र्ध समाप्त हुआ और अब उत्तरार्ध आया है वृद्धावस्था। वृद्धावस्था शुरू हो गई है। जरासंध के आने पर मथुरा का गढ़ टूटने लगता है। आंखों की, कानों की, हाथ पैरों की शक्ति क्षीण होती जाती है। चालीसवां वर्ष शुरू होते ही प्रवृत्ति में कटौती करनी शुरू करनी चाहिए। प्रभु की सेवा का समय बढ़ा देना चाहिए।जब जरासंध वृद्धावस्था अपने साथ काल को भी ले आता है तब बचना और कठिन है।
जरासंध और कालयवन एक साथ आ धमके तो श्रीकृष्ण को मथुरा छोड़ द्वारिका आना पड़ा।कालयवन का आगमन का समाचार सुनकर श्रीकृष्ण ने उसको कंस के समान ही समझा और यादवों की रक्षा के लिए एक नए दुर्ग का निर्माण किया। सभी यादवों को उस जगह भेजकर सुरक्षित कर दिया। स्वयं दुर्ग से बाहर निकल आए। जब कालयवन भगवान् श्रीकृष्ण की ओर दौड़ा, तब वे दूसरी ओर मुंह करके रणभूमि से भाग चले और उन योगिदुर्लभ प्रभु को पकडऩे के लिए कालयवन उनके पीछे-पीछे दौडऩे लगा। रणछोड़ भगवान् लीला करते हुए भाग रहे थे, कालयवन पग-पग पर यही समझता था कि अब पकड़ा, तब पकड़ा। इस प्रकार भगवान् बहुत दूर एक पहाड़ की गुफा में घुस गए। उनके पीछे कालयवन भी घुसा। वहां उसने एक दूसरे ही मनुष्य को सोते हुए देखा। उसे देखकर कालयवन ने सोचा ''देखो तो सही, यह मुझे इस प्रकार इतनी दूर ले आया और अब इस तरह-मानो इसे कुछ पता ही न हो, साधु बाबा बनकर सो रहा है।
यह सोचकर उस मूढ़ ने उसे कसकर एक लात मारी। वह पुरुषबहुत दिनों से वहां सोया हुआ था। पैर की ठोकर लगने से वह उठ पड़ा और धीरे-धीरे उसने अपनी आंखें खोलीं। इधर-उधर देखने पर पास ही कालयवन खड़ा हुआ दिखाई दिया। वह पुरुष इस प्रकार ठोकर मारकर जगाए जाने से कुछ रुष्ट हो गया था। उसकी दृष्टि पड़ते ही कालयवन के शरीर में आग पैदा हो गई और वह क्षणभर में जलकर राख का ढेर हो गया।यह काल को जीतने का तरीका है, जब हम पर काल का हमला हो तो डरे नहीं, परमात्मा को उसके आगे कर दें। परमात्मा को आगे कर देने से लाभ यह होगा कि काल आपको सताएगा नहीं। परमात्मा जब आगे हो जाएगा तो फिर सद्गुरु, सद्पुरुषों और सत्संग की इच्छा जागेगी। जीवन में सत्संग घटने लगेगा तो काल और उससे भयंकर उसका भय दोनों स्वत: ही समाप्त हो जाएंगे। कालयवन को जो पुरुष गुफा में सोए मिले.....।वे इक्ष्वाकुवंषी महाराजा मान्धाता के पुत्र राजा मुचुकुन्द थे। वे ब्राह्मणों के परम भक्त, सत्यप्रतिज्ञ, संग्राम विजयी और महापुरुष थे। एक बार इन्द्रादि देवता असुरों से अत्यन्त भयभीत हो गए थे। उन्होंने अपनी रक्षा के लिए राजा मुचुकुन्द से प्रार्थना की और उन्होंने बहुत दिनों तक उनकी रक्षा की।

जरूरत है तो सिर्फ तरीका बदलने की
जब महाबली मगधराज जरासन्ध ने देखा कि श्रीकृष्ण और बलराम तो भाग रहे हैं, तब वह हंसने लगा। उसे भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजी के ऐश्वर्य, प्रभाव आदि का ज्ञान न था। बहुत दूर तक दौडऩे के कारण दोनों भाई कुछ थक से गए। अब वे बहुत ऊंचे प्रवर्शण पर्वत पर चढ़ गए। उस पर्वत का प्रवर्षण नाम इसलिए पड़ा था कि वहां सदा ही मेघ वर्षा किया करते थे। जब जरासन्ध ने देखा कि वे दोनों पहाड़ में छिप गए और बहुत ढूंढने पर भी पता न चला, तब उसने ईंधन से भरे हुए प्रवर्शण पर्वत के चारों ओर आग लगवा कर उसे जला दिया। जब भगवान् ने देखा कि पर्वत के छोर जलने लगे हैं, तब दोनों भाई जरासन्ध की सेना के घेरे को लांघते हुए बड़े वेग से उस ग्यारह योजन (44 कोस) ऊंचे पर्वत से एकदम नीचे धरती पर कूद आए। उन्हें जरासन्ध ने अथवा उसके किसी सैनिक ने देखा नहीं और वे दोनों भाई वहां से चलकर फिर अपनी समुद्र से घिरी हुई द्वारकापुरी में चले आए।
जरासन्ध ने ऐसा मान लिया कि श्रीकृष्ण और बलराम तो जल गए और फिर वह अपनी बहुत बड़ी सेना लौटाकर मगध देश को चला गया।इस बात की बड़ी चर्चा होती है कि भगवान युद्ध से भागे थे। आईए इस फिलॉसाफी पर चर्चा करें....। गीता में भगवान ने कहा-हे पार्थ! मुझे तीनों लोकों में कुछ भी करने को नहीं है। पाने योग्य कोई ऐसी वस्तु नहीं है जो पाई न हो। तो भी मैं कार्य में लगा रहता हूं। भगवान के कार्य सूर्य, चन्द्र, पृथ्वी, पवन इत्यादि को अविराम और अचूक गति से चलने में दिखाई देते हैं। भगवान् वह ईश्वर ही तो ''सब कारणों का एक मात्र अधिष्ठाता है, इस जगत् के रूप में व्यक्त हो रहा है।ईश्वर प्रकृति रूप में जब अबाधगति से कर्मरत है तो व्यक्ति क्यों कर्म विमुख हो? कर्म समाप्त नहीं होते।
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