मंगलवार, 31 मई 2011

भागवत २६७

द्रोपदी के स्वयंवर की बस यही शर्त थी कि.....
पं.विजयशंकर मेहता
बलरामजी कृष्णजी को देखने लग गए कि अब और बचा है क्या स्वयंवर में। कृष्ण बोलते हैं-दाऊ अब द्रौपदी अपने जीवन में आएगी। हम यह घोषणा कर रहे हैं कि यदुवंशी इस स्वयंवर में शामिल नहीं होंगे, दर्शक रूप में जा रहे हैं। सबको लगा यह ठीक है। द्रौपदी के स्वयंवर में पहुंचते हैं भगवान दु्रपद देश की द्रौपदी उस समय संसार की सबसे सुन्दर स्त्री मानी जाती थी। याज्ञसेनी नाम था उसका। उसके पिता दु्रपद ने यज्ञ से उसको प्राप्त किया था और परमात्मा ने उसको अतिरिक्त सौंदर्य दिया था।
द्रौपदी के बारे में ऐसा कहते थे कि उसको पाने के लिए उस समय आर्यावर्त का प्रत्येक राजा उत्सुक था। द्रौपदी की देह से स्थायी सुगंध निकलने का वरदान था। हजारों फुलवारियां अगर खिल जाएं और सुगन्ध फैलाएं। ऐसी सुगन्ध 24 घण्टे द्रौपदी की देह से आएगी यह उसको वरदान था। द्रौपदी को पाने के लिए सारे राजा आए हुए थे। शर्त यह थी कि एक लकड़ी का यंत्र था, उसमें मछली लगी थी, उस मछली को नीचे तेल में देखकर उसकी चलित आंख का निशाना लगाना था और निशाना लग जाए तो द्रौपदी उसको वरेगी। भगवान् भी पहुंच गए स्वयंवर में बलरामजी के साथ।
दुर्योधन आया था कर्ण को लेकर। सभी आए थे कोई नहीं चूका। दुर्योधन को तो पता था कि जीतेगा कर्ण और फिर द्रौपदी को मुझे भेंट करेगा। आप सोचिए दुर्योधन किस स्तर पर मित्रता कर रहा था और कर्ण किस स्तर पर मित्रता कर रहा था। कर्ण आया ही इसीलिए था कि मित्र यह विजित है मुझसे और फिर मैं आपको भेंट कर दूंगा। मित्रता में इतने निम्न स्तर पर नहीं जाना चाहिए। कर्ण जैसा योग्य और ज्ञानी लेकिन उलझा हुआ था दुर्योधन में।

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