सोमवार, 30 मई 2011

भूतिया बूढ़ा

पूनम पाण्डे
रात का घुप्प अंधेरा था, सांय-सांय हवा चल रही थी। चिटकू और मक्खन दोनों मेले से घर लौट रहे थे, बहुत देर बाद दोनों को लगा जैसे वो कहीं भटक गए हैं। दूर एक पीली रोशनी की लौ टिमटिम-टिमटिम कर रही थी। चिटकू और मक्खन तेज़ कदमों से रोशनी की ओर बढ़ने लगे। पास आकर उन्होंने देखा वह जुगनुओं का दल था। अंधेरा गहरा गया था, अब तो उन्हें घबराहट होने लगी।
किसी तरह दोनों चलते रहे..चलते रहे..डर के मारे दोनों को लगातार पसीना आ रहा था। चिटकू ने अचानक दूर एक आदमी खड़ा देखा। वह उन्हीं के पास आ रहा था। उसके हाथ में एक टार्च भी थी। ज़रा देर में वह उस आदमी के पास खड़े थे। वह आदमी एकदम बूढ़ा-फटेहाल और भयानक दिख रहा था। उन दोनों को परेशान देखकर वह उनका हाथ पकड़कर उत्तर की दिशा में ले चला। थोड़ी ही देर में शहर आ गया।
चिटकू-मक्खन ने डर के मारे रास्तेभर उस भूतिया बुज़ुर्ग से बात नहीं की थी। अब उन्हें अपने घर का रास्ता समझ में आ गया था इसलिए वह उस आदमी को छोड़ अपने घर की तरफ भाग निकले। अगले दिन उनका दोस्त वीनू उनको पिछली रात का किस्सा सुनाने लगा, दरअसल वीनू भी मेले में फैंसी ड्रेस प्रतियोगिता में बूढ़ा फटेहाल आदमी बनकर गया था। जिससे चिटकू और मक्खन रास्ते में मिले और डरे थे।

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