सोमवार, 30 मई 2011

गिलहरी की दोस्ती

 में भालू और गिलहरी में गहरी दोस्ती थी। दोनों सभी काम, यहां तक कि शिकार भी एक साथ करते थे। भालू अपने साथ-साथ गिलहरी के लिए भी खाना लाता था। गिलहरी को खाने के लिए जो मिलता, उसमें से वह आधा भालू को दे देती थी।

जंगल में रहने वाले लोमड़ को दोनों की दोस्ती फूटी आंख नहीं भाती थी। उसने मन ही मन दोनों की दोस्ती में फूट डालने की ठान ली। एक दिन मौका पाकर लोमड़ ने गिलहरी से कहा, ‘क्यों बहन, तुम्हारे दोस्त भालू के क्या हालचाल हैं?’गिलहरी खुश होकर अपनी और भालू की बातें करने लगी। भालू की तारीफ सुनकर लोमड़ गुस्से से तिलमिलाने लगा। वह सब के साथ चालाकी करता था, सबको धोखा देता था, इसलिए कोई उसका दोस्त बनना पसंद ही नहीं करता था। लोमड़ बोला, ‘बहन, तुम बहुत भोली हो। तुम नहीं जानती कि भालू तुम्हें बेवकूफ बनाता रहता है?’
‘मुझे बेवकूफ बनाता है..’
गिलहरी ने पूछा- ‘वह कैसे?’
लोमड़- ‘भालू जब शिकार लाता है तब खाने से पहले उसे साफ कौन करता है?’
‘सफाई तो भालू करता है’, गिलहरी ने जवाब दिया।
‘क्या तुम जानती हो कि वह ऐसा क्यों करता है। वह सारा बढ़िया माल पहले अपने आप खा लेता है, बचा-खुचा तुम्हें दे देता है। बढ़िया खाना खा-खा कर वह मोटा होता जा रहा है, तुम छोटी की छोटी हो’, लोमड़ ने लम्बी सांस ली- ‘वैसे मुझे इस बात से क्या लेना देना? जानता हूं कि यह बात बताने का कोई फायदा नहीं..’
लोमड़ गिलहरी के मन में शक का बीज बोकर चलता बना। गिलहरी सोचने लगी- ‘लोमड़ कहीं ठीक ही तो नहीं कह रहा था। मैं तो भालू को अपना दोस्त समझती हूं और हो सकता है कि वह मुझे बुद्धू बना रहा हो।’
अगले दिन भालू ने गिलहरी के साथ जंगल में फल इकट्ठे किए, उन्हें साफ किया और खाने लगा। गिलहरी से भी खाने के लिए कहा, लेकिन गिलहरी ने बेर नहीं खाए। भालू हैरान था। गिलहरी सोच रही थी- ‘शायद लोमड़ सच कह रहा था।’खाने के बाद मूछें साफ करते हुए उसने गिलहरी को शहद खाने के लिए बुलाया। गिलहरी देख रही थी कि भालू ने पहले ही सब खा लिया था। उसको लोमड़ की बात पर पूरी तरह विश्वास हो गया था।
‘कोई बात नहीं, भालू को अब मैं सबक सिखाऊंगी।’ दूसरे दिन भालू और गिलहरी दोनों शिकार करने गए। भालू के हाथ में एक बकरी की टांग आ गई, वह उसे पकड़कर खींचने लगा। तभी उसको महसूस हुआ कि उसके सिर पर कोई चीज़ रेंग रही थी। वास्तव में वह गिलहरी थी। गिलहरी ने भालू के सिर पर चढ़कर शिकार को पहले खाने का फैसला कर लिया था। भालू यह सब नही जानता था। बकरी उसके हाथ से निकलकर भाग गई। बेचारा भालू।
आगे भालू को खरगोश दिखा। उसे पकड़ने के लिए वह दबे पांव उसकी तरफ बढ़ा। इस बार तो गिलहरी ने हद ही कर दी। वह भालू की आंखों के सामने फुर्ती से उसके सिर पर चढ़कर बैठ गई। भालू भूत समझकर डर से थर-थर कांपने लगा। खरगोश भी झाड़ियों में जा छिपा। गिलहरी ने भालू से बात भी करनी बंद कर दी। उसका पेट ही कितना था? कुछ भी खाकर पेट भर लेती। भालू शिकार पर अकेला जाने लगा था, लेकिन गिलहरी पीछे से जाकर उसको परेशान करना नहीं भूलती। एक दिन भालू को नन्हा सूअर दिखाई दिया। कई दिनों से भालू कोई शिकार नहीं कर पाया था। फल-फूल से उसका पेट कहां भरता। उसे ज़ोर से भूख लगी थी। सूअर को पकड़ने के लिए छलांग लगाई। गिलहरी भी देख रही थी। वह भी उछलकर भालू के सिर पर चढ़कर बैठ गई। भालू सूअर को हाथ से निकल जाने देना नहीं चाहता था। वह गुर्राया- ‘तुम मुझसे बचकर भाग नहीं सकते।’ वह सूअर को पकड़ने के लिए तेज़ी से भागा।
भालू को अपनी पीठ पर फिर से कोई चीज़ चलती हुई महसूस हुई। गिलहरी तो उसको दिखाई नहीं दे रही थी। उसने गुस्से में अपना एक पंजा ज़ोर से पीठ पर दे मारा। पांचों नाखून गिलहरी के सिर से पूंछ तक चुभ गए थे।
गिलहरी दर्द से तड़प उठी। भालू कहीं पहचान न ले इसलिए मुश्किल से कराहने की आवाज़ रोकी। जल्दी ही भालू ने अपना पंजा पीठ पर से हटा लिया। नाखून बाहर निकलते ही गिलहरी भाग खड़ी हुई। दर्द से बेचैन होकर एक पेड़ से दूसरे पेड़ पर कूदने लगी। भालू ने दौड़कर सूअर पकड़ लिया।
सूअर ने शिकार से भालू खुश था। कई दिनों के बाद भर-पेट खाना मिला था। हमेशा की तरह भालू ने गिलहरी को आवाज़ लगाई। गिलहरी नहीं आई। वह तो भालू को अपना दुश्मन समझने लगी थी। बहुत देर तक इंतज़ार करने के बाद भालू अकेला वापिस लौट गया। गिलहरी पेड़ों के बीच छिपी बैठी थी। उसकी पीठ पर भालू के नाखूनों से बने ज़ख्म ठीक हो गए थे, लेकिन वे काली धारियों में बदल गए थे। आज भी ये काली धारियां गिलहरी को दोस्त को धोखा देने की याद दिलाती हैं।
लोमड़ की तरह अब उसका भी कोई दोस्त नहीं था। पेड़ों पर अकेली घूमती रहती। उसने मांस खाना भी छोड़ दिया। भालू को देखकर वह पेड़ों के बीच छिप जाती है।
भालू और और गिलहरी की दोस्ती को दुश्मनी में बदलवाने के कारण लोमड़ आज भी अपनी चालाकियों के लिए बदनाम है।

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