गुरुवार, 2 जून 2011

गुस्सा ही पाप का कारण है...

लक्ष्मणजी का हर उत्तर जैसे परशुरामजी के लिए आहूति के समान था। परशुरामजी और ज्यादा गुस्सा हो गए। उनका बढ़ता हुआ गुस्सा देखकर रामचन्द्रजी ने उनका गुस्सा शांत करने के लिए कहा बच्चे अगर कभी कोई गलती करते हैं भी तो गुरु, पिता और माता मन में आनंद से भर जाते हैं।
इसलिए आप इसे छोटा मानकर इसे क्षमा कर दें। रामचन्द्रजी के वचन सुनकर वे कुछ ठंडे पड़े। इतने में लक्ष्मण जी कुछ कहकर फिर मुस्कुरा दिए। उनको हंसता देखकर परशुरामजी का गुस्सा फिर से बढ़ गया। उन्होंने गुस्से से कहा है राम तेरा भाई बड़ा पापी है। यह शरीर से गौरा व दिल से काला है। यह विषमुख दुधमुंहा नहीं है। लक्ष्मण जी ने हंसकर कहा मुनि श्री क्रोध ही पाप का मूल है।
जिसके वश में होकर मनुष्य अनुचित कर्म कर बैठते हैं। मैं आपका दास हूं। अब गुस्सा त्यागकर दया कीजिए। टूटा हुआ धनुष गुस्सा करने से जुड़ तो जाएगा नहीं। यदि धनुष बहुत ज्यादा ही प्रिय है तो कुछ उपाय किया जाए। किसी बड़े गुणी को बुलाकर जुड़वा दीजिए। लक्ष्मणजी के बोलने से जनक जी घबरा जाते हैं और उन्हें समझाते हैं कि अनुचित बोलना अच्छा नहीं है।
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