गुरुवार, 2 जून 2011

भागवत २६९

....और अर्जुन ने जीत लिया स्वयंवर
पं.विजयशंकर मेहता
पाण्डव बहुत नाराज होते, उन लोगों ने हमको जलाने की कोशिश की, आज आदेश करें, तो कुन्ती बोलती हैं कि न तो हमारे पास सेना है, न समर्थन है। पंाच तुम हो और ये कौरव, पितामह भीष्म और गुरूदेव द्रोण उनके साथ हैं उन्होंने हमें जलाकर मारने की कोशिश की थी। कुंती को तो आशा थी कि आएगा एक दिन कभी, मां के कहने थे। पांचों पाण्डव पहुंच गए।
अर्जुन ने धनुष उठाया एक तीर साधा और सीधा निशाने पर। जय-जयकार हो गई। द्रौपदी चली माला पहनाने, तो राजा लोग खड़े हो गए। दुर्योधन, कर्ण, जरासंध, शिशुपाल ने कहा यह कैसे हो सकता है। पहले तो इसका परिचय दो और दूसरा क्षत्रियों के स्वयंवर में ब्राह्मण को अनुमति नहीं मिल सकती। मार डालो इस ब्राह्मण को और लोग मारने के लिए चले। बलराम भी खड़े हो गए।
बलराम को यह नहीं पता कि किस ओर से लडऩा है पर कहीं भी लड़ाई होती तो वे एकदम से उत्साह में आ जाते थे। बलराम एकदम से खड़े हुए तो कृष्ण ने कहा-दाऊ बैठ जाओ। दाऊ ने कहा- यहां हाहाकार हो रहा है। कृष्ण ने कहा-पांडव जीवित हैं मैं बहुत प्रसन्न हूं। वो अर्जुन है सब निपटा लेगा चुपचाप बैठो दाऊ। कृष्ण मन ही मन प्रसन्न थे कि इस मछली को विश्व में दो ही लोग भेद सकते थे या तो कर्ण या अर्जुन। कर्ण बाहर हो चुका है तो यह शत-प्रतिशत अर्जुन है।अर्जुन आज एक युद्ध लडऩे जा रहे थे, कृष्ण सामने थे दोनों का वही वार्तालाप मन ही मन हो चुका था जो भविष्य में गीता के रूप में आएगा।

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