बुधवार, 15 जून 2011

भगवान को जीवन में लाना हो तो यह स्थान सबसे अच्छा है...

पं. विजयशंकर मेहता
परमात्मा को जीवन में उतारना हो तो सबसे सही स्थान है हृदय। इसकी साफ-सफाई करना होगी। श्री हनुमान चालीसा के अंतिम दोहे में तुलसीदासजी ने श्री आंजनेय को आमंत्रण दिया है कि वे पधारें, लेकिन साथ में श्रीरामजी, सीताजी और लखनजी को भी लाएं और आने के पश्चात वापस न जाएं, स्थाई रूप से निवास करें।
भगवान को रहने के लिए तुलसीदासजी ने जो स्थान प्रस्तावित किया है, वह है उनका हृदय।
'कीजै नाथ हृदय महँ डेरा' तथा अंतिम दोहे में कहा 'हृदय बसहु सुर भूप।'
हृदय में परमात्मा उतरते ही हम व्यवहार की जगह स्वभाव पर टिकना सीख जाते हैं। इससे स्वभाव सधेगा और ऐसे लोग सरल, सहज और सुव्यवस्थित होंगे। प्रबंधन की ऊंची उड़ानें इन्हीं तीनों से आरंभ होती हैं, परिश्रम की सारी ऊर्जा इन्हीं में समाहित है।
जो सरल होता है उसका सोच-सत्य और स्पष्ट होता है। जो सहज होता है उसके निर्णय परिपक्व और दूरगामी रहते हैं और जो सुव्यवस्थित है वह अथाह परिश्रम में भी थकता नहीं। दुनिया की सारी सफलताएं इन्हीं तीनों गुणों की दासी हैं और ये गुण श्री हनुमान चालीसा का प्रसाद है।
अब जब श्री हनुमान चालीसा का समापन हो, तब विचार करें कि गोस्वामीजी ने यह जो श्री हनुमान चालीसा लिखी है यह हमारे लिए कैसे उपयोगी बनी। तुलसीदासजी ने हनुमानचालीसा लिखकर यह बताया इसकी पंक्ति-पंक्ति में परिणाम तो वेद मंत्र का ही है, लेकिन यदि कोई दोष हो जाए तो गलती से दुष्परिणाम नहीं मिलेगा। इतनी बढिय़ा व्यवस्था कर दी। इसकी हर पंक्ति मंत्रों के समान प्रभावशाली और दिव्य बन गई।

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