बुधवार, 15 जून 2011

भागवत २८०

मंजिल को पाना है तो...
पं.विजयशंकर मेहता
भगवान हर भक्त पर समान रूप से अपनी कृपा रखते हैं। परमात्मा के लिए उनका हर बच्चा समान है वे देते समय ये नहीं देखते कि लेने वाला चोर है या साहूकार है वे सिर्फ ये देखते हैं कि इसकी आस्था कितनी दृढ़ और सच्ची है। भागवत के इस प्रसंग के अनुसार शाल्व के मन में संकल्प चाहे जैसा भी था लेकिन उसके संकल्प के प्रति उसकी दृढ़ता व आस्था के कारण ही उस पर शिवजी प्रसन्न हुए।अब भागवत में एक नया प्रसंग आता है।
शाल्व शिशुपाल का सखा था और रुक्मिणी के विवाह के अवसर पर बारात में शिशुपाल की ओर से आया हुआ था। उस समय यदुवंशियों ने युद्ध में जरासन्ध आदि के साथ-साथ शाल्व को भी जीत लिया था। उस दिन सब राजाओं के सामने शाल्व ने यह प्रतिज्ञा की थी कि मैं पृथ्वी से यदुवंशियों को मिटाकर छोड़ूंगा, सब लोग मेरा बल-पौरुष देखना। मूढ़ शाल्व ने इस प्रकार प्रतिज्ञा करके देवाधिदेव भगवान् पशुपति की आराधना प्रारम्भ की।
मन में संकल्प बुरा था लेकिन तपस्या कठोर थी और फिर तप भी किया भोलेभाले शिव के लिए। शिव तो बस शिव ठहरे। शाल्य का भयंकर संकल्प जानकर भी वे प्रसन्न हो गए।
भगवान् शंकर आशुतोष हैं, औढर दानी हैं, फिर भी वे शाल्व का घोर संकल्प जानकर एक वर्ष के बाद प्रसन्न हुए। शाल्व ने यह वर मांगा कि मुझे आप एक ऐसा विमान् दीजिए जो देवता, असुर, मनुष्य, गन्धर्व, नाग और राक्षसों से तोड़ा न जा सके, जहां इच्छा हो, वहीं चला जाए और यदुवंशियों के लिए अत्यंत भयंकर हो। भगवान् शंकर ने कहा दिया तथास्तु। शाल्व ने वह विमान प्राप्त करके द्वारिका पर चढ़ाई कर दी। शाल्व के विमान ने द्वारिकापुरी को अत्यंत पीडि़त कर दिया।

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