शुक्रवार, 24 जून 2011

घर से किसी को भी खाली हाथ न जाने दें, क्योंकि

हमारी भारतीय संस्कृति में मान्यता है अतिथि देवो भव:। हम अपने अतिथियों को देवतुल्य मानते हैं और अपनी शक्ति के अनुसार उनके स्वागत सत्कार और कोई क मी नहीं छोड़ते। अतिथियों के साथ ठीक से व्यवहार करना, उनकी आवश्यकताओं को समझ कर उनको पूरा करने के लिये प्रयत्नशील रहना चाहिए। उनके मान सम्मान और उनकी सुख सुविधा का ध्यान रखना चाहिए।
उनके लिये यथा सम्भव एक सुखद और सौहाद्र्रपूर्ण वातावरण उपलब्ध करवाना चाहिए। इसी प्रकार के संस्कार बचपन से हमें हमारे माता पिता देते हैं। हमारे यहां प्राचीनकाल से ही यह परंपरा है जिसका उल्लेख हमें अपने धर्मग्रंथों में भी मिलता है। इसका एक सबसे अच्छा उदाहरण भागवत में श्रीकृष्ण और सुदामा की कथा में मिलता है। इस कथा के अनुसार जब गरीब सुदामा कृष्ण के घर पहुंचे तो स्वयं कृष्ण ने उनके चरण धोए व आदर सत्कार किया।
उसके बाद जब वे वहां से विदा हुए तो उन्हें अनेक तरह के उपहार देकर श्रीकृष्ण ने विदा किया। इस तरह के अनेक उदाहरण हमें हमारे धर्मग्रंथों में मिलते हैं। इसीलिए मेहमान को कभी घर बिना तिलक किए व बिना उपहार दिए विदा नहीं करना चाहिए। दरअसल इसके पीछे ज्योतिषीय मान्यता है यह है कि घर से मेहमानों को कुछ उपहार देकर विदा करने से घर में हमेशा सुख-समृद्धि बनी रहती है।
तिलक लगाकर व उपहार देकर विदा करना भारतीय संस्कृति के अनुसार सम्मान सूचक तो है ही साथ ही ऐसा करने से घर आए अतिथि के पास वह उपहार जिंदगी भर उस घर के लोगों के साथ बिताए पलों की यादों के रूप में रहता है। इससे रिश्तों में सुधार होता है। आपसी सामंजस्य और मधुरता बढ़ती है। समाज में मान-सम्मान भी बढ़ता है।

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