सोमवार, 13 जून 2011

भागवत २७८

ऐसे लोग कभी सच्चे प्रेम को नहीं समझ पाते
पं.विजयशंकर मेहता
इस प्रकार भगवान् ने युधिष्ठिर का राजसूय यज्ञ पूर्ण किया और अपने सगे-संबंधियों की प्रार्थना से कुछ महीनों तक वहीं रहे। इसके बाद राजा युधिष्ठिर की इच्छा न होने पर भी भगवान् ने उनसे अनुमति ले ली और अपनी रानियों तथा मंत्रियों के साथ इन्द्रप्रस्थ से द्वारिकापुरी की यात्रा की। सब तो सुखी हुए, परन्तु दुर्योधन से पाण्डवों की यह उज्जवल राज्यलक्ष्मी का उत्कर्ष सहन न हुआ। क्योंकि वह स्वभाव से ही पापी, कलहप्रेमी और कुरुकुल का नाश करने के लिए एक महान रोग था।
जो मन से कपटी होते हैं वे सच्चे प्रेम को नहीं समझ पाते हैं। युधिष्ठिर के मन में दुर्योधन के लिए कोई मैल न था लेकिन दुर्योधन इन्द्रप्रस्थ जैसा राज्य देखकर दंग रह गया। उसके मन में इस राज्य को पाने की लालसा हो उठी। इसका वैभव उसके सिर चढ़ गया। कपटी, पापी और कामी लोग हमेशा दूसरों के वैभव, दूसरों की सम्पत्ति और दूसरों की स्त्री पर ही निगाह रखते हैं। दुर्योधन इन्हीं तीन दुर्गुणों का प्रतीक है। वह कैसे भी पाण्डवों की सुख-शान्ति में खलल डालना चाहता था।
पाण्डवों की लोगों में प्रतिष्ठा बनने लग गई। लोग जानने लग गए कि यह कोई नई शक्ति आई है। कुरूवंश का हिस्सा आया है जिसके पास धर्म है, यह उजला पक्ष है कुरूवंश का। एक पक्ष दुर्योधन के साथ रह गया। राजसूय यज्ञ हुआ जीत लिया, विश्व विजेता बन गए। अब राजसूय यज्ञ के बाद तिलक होना है। बढिय़ा यज्ञ किया गया। सारे राजाओं को आमन्त्रित किया गया। शिशुपाल और दुर्योधन, सब लोग आए। युधिष्ठिर का राजतिलक होना है।

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