शनिवार, 11 जून 2011

ये करिश्माई शक्तियां देती है मां गायत्री और गंगा की भक्ति

जीवन में पावनता और शक्ति का संयोग हमेशा सुखद होता है। इससे शरीर से लेकर सांसारिक स्तर पर व्यक्ति के साथ समाज भी सुखी होता है। जिस तरह स्वच्छता के बिना शरीर रोगी होकर शक्तिहीन हो जाता है। उसी तरह संस्कार और आचरण में गंदगी सांसारिक कलह का कारण बनती है। जिससे धर्म और संस्कार की जड़े कमजोर होती है। इसलिए शक्ति और पवित्रता एक-दूसरे के बिना निरर्थक मानी गई है।

हिन्दू धर्म में माता गायत्री और गंगा की उपासना, स्मरण और भक्ति बेजोड़ शक्ति और पावनता की कामना को पूरा करने का ही श्रेष्ठ और सरल मार्ग माना गया है। दोनों ही मातृशक्तियों की उपासना का विशेष दिन भी हिन्दू माह ज्येष्ठ माह की शुक्ल पक्ष की दशमी (इस बार 11 जून) को गंगा और गायत्री जयंती के रूप में मनाया जाता है।
शास्त्रों में गायत्री मंत्र में समाई चौबीस शक्तियों में मंदाकिनी यानी गंगा भी एक मानी गई है। इसलिए अगर गंगा और गायत्री उपासना के सांसारिक और आध्यात्मिक फल पर नजर डालें तो अनेक समानता दिखाई देती हैं। जानते हैं मां गंगा और गायत्री शक्ति से जुड़ी कुछ विशेष बातें -
गायत्री शक्ति मन को पवित्र कर कलह, दु:खों और बुरी लतों से छुटकारा देती है। वहीं गंगा तन पवित्र करने के साथ पापमुक्त करने वाली है। गायत्री साधना जीवित प्राणी को भी तारने वाली मानी गई है। वहीं गंगा मृत आत्मा को भी मोक्ष प्रदान करने वाली मानी गई है।
जहां भगीरथ के घोर तप से गंगा स्वर्ग से जमीन पर अवतरित होकर संसार के लिए सुखदायी बनी। उसी तरह ब्रह्मदेव के प्रयासों से गायत्री शक्ति जगत के लिए कल्याणकारी बनी। विश्वमित्र द्वारा तप से पाई यही गायत्री महाशक्ति विष्णु अवतार श्री राम के माध्यम से जगत के लिए संकटमोचक बनी।
मां गायत्री के हाथों में गंगाजल भरे कमण्डल के ही दर्शन होते हैं। इसलिए गायत्री साधना के लिए गंगा तट का भी बहुत महत्व माना गया है। सार यही है कि गंगा स्नान से पाई पवित्रता और पाप नाश से ही उपासक में गायत्री की शक्ति का अवतरण होता है और उसका मन पावन और कलहमुक्त होकर ईश्वरीय शक्ति के अनुभव या साक्षात्कार की दशा में पहुंच जाता है। जिसमें उपासक दिव्य और चमत्कारिक व्यक्तित्व और सिद्धियों का स्वामी बन सकता है।
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