शनिवार, 11 जून 2011

अगर आपको सुख-दुख की चिंता ज्यादा सताती है...

पं. विजयशंकर मेहता
कहते हैं सुख और दुख जैसे एक ही सिक्के हैं। ये इस संसार की दो धुरियां भी है। कोई सुख से सुखी है तो कोई दुख से अशांत। मुसीबत यह है कि जिन्हें दुख नहीं है, वो भी सुख की कमी से परेशान हैं।
जिन्हें सुख और दुख की चिंता बहुत सताती हो वे एक बात याद रखें कि दुनिया जड़ पदार्थों की बनी हुई है। उसमें अच्छाई और बुराई अलग से नहीं है। हर इन्सान अपनी अनुभूतियों के आधार पर सुख-दुख, अच्छा-बुरा इस कायनात में डाल देता है। परम शक्ति किसी न किसी मनुष्य के रूप में ही दुनिया में आती रही है।
हिन्दुओं ने अवतार कह दिया, कहीं ये ईशु कहलाए, कहीं नानक बनकर आए। ये हस्तियां अपने विशिष्ट आचरण से हमें गहरी शिक्षा दी गईं। जैसे हजरत मोहम्मद ने बड़ा काम यह किया कि उस परवरदिगार की कार्यप्रणाली को संसार के सामने लाए और अमल करके भी दिखाया ताकि लोग उन्हें देखकर उस सही मार्ग पर चल सकें।
सीधी सी बात है उन्होंने अल्लाह के बंदों को अल्लाह का हिदायत नामा समझाया और लोगों को ठीक जिन्दगी जीने के लिए प्रेरित किया। दो बातें मोहम्मद ने अपने चरित्र में विशेष रूप से दिखाई थीं। पहली वे बहुत नेक थे और दूसरा सहनशील थे। ये फकीरी के गहने हैं। हर धर्म में इन्हें अपनाया गया है। सच तो यह है दो ही लोगों में चेतना मानी गई है एक ईश्वर में और दूसरा उसके द्वारा बनाए गए मनुष्य में।
मनुष्य की इन्द्रियां चूंकि सक्रिय होती हैं और उसके पास इस बोध की संभावना होती है कि वे इनका सदुपयोग कर सके। इसलिए मानव सत्ता को सुर-दुर्लभ कहा गया है। हम मनुष्यों को भटका हुआ देवता बताया जाता है। अत: हम सबसे पहला काम यह करें उन सारी संभावनाओं का दोहन करें जो हमें श्रेष्ठ बना सकती हैं।

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