शुक्रवार, 10 जून 2011

भागवत २७५ २७६

अगर आप हैं मुश्किलों से परेशान
पं.विजयशंकर मेहता
गुरु मंत्र प्राप्त करते समय जो शक्तिपात होता है वह ही सद्गुणों को जीवन में उतरने में सहयोगी होता है। जब भगवान को आप अपने को समर्पित कर देते हैं सारी समस्याएं अपने आप ही सुलझने लगती है। सब कुछ बदलने लगता है। इसीलिए जब आप भी जीवन की समस्याओं से परेशान हों तो सब कुछ भगवान पर छोड़ दीजिए और देखिए सारी समस्याएं अपने आप सुलझ जाएगी। कुछ ऐसा ही संदेश दे रहा है हमें भगवान का पांडवो के जीवन में प्रवेश और हर कार्य में उनकी मदद करना।कृष्ण ऐसी ही कृपा पाण्डवों पर कर रहे थे। राजसूय की तैयारी पुरजोर चल पड़ी। हर और दूत दौड़ा दिए गए। महाराज युधिष्ठिर का राजसूय है। वे चक्रवर्ती सम्राट बन रहे हैं।
मंत्र का सभी सम्प्रदायों एवं साधन-प्राप्तियों में महत्व को स्वीकार किया गया है। साधन की दृष्टि से मंत्र-जप का उद्देश्य शक्ति को अपने अंतर में जागृत करना है तथा उसका अनुभव करना है। वास्तव में मंत्र, गुरु, शक्ति तथा इष्ट से एक ही तत्व के विभिन्न स्वरूप तथा स्तर हैं जो विभिन्न रूपों में कार्य करते हुए साधक को अध्यात्म पथ पर अग्रसर करते हैं। मंत्र-जप के साधक के स्तर भेद एवं अधिकार भेद से कई श्रेणियों में बांटा जा सकता है, जिनमें सबसे उत्तम है मंत्र शक्ति का प्रत्यक्ष होकर जप का विलीन हो जाना। साधन की आवश्यकता तभी तक है जब तक प्राप्तव्य नहीं हुआ। गंतव्य पर पहुंच कर यात्रा समाप्त हो जाती है।
प्रयत्नपूर्वक जप आणवोपाय के अंतर्गत है एवं स्वाभाविक जप शक्ति की क्रिया अथवा शाक्तोपाय है। मन निर्मल हो जाने पर शक्ति अपनी क्रियाएं समेट लेती हैं क्योंकि क्रियाएं चित्त के आधार पर ही शक्ति की क्रियाशीलता हैं। संस्कार क्षय के पश्चात् क्रियाओं की आवश्यकता एवं उनका आधार दोनों समाप्त हो जाते हैं। क्रियाओं में मंत्र-जप के कई स्वरूप तथा विभिन्न स्तर स्वयंमेव प्रकट होते रहते हैं। अन्य क्रियाओं के साथ भी जप क्रिया प्रकट हो सकती है तथा केवल जप क्रिया भी। देखा जाए तो अन्य क्रियाएं भी मंत्र शक्ति का स्वरूप है।
पाण्डवों को भगवान् की शक्ति सामथ्र्य और ज्ञान पर पूरा भरोसा था। उन्होंने खुद को भगवान् को ही समर्पित कर दिया था। अब तो बस भगवान् सब करवा रहे थे, पाण्डव कर रहे थे। पाण्डवों का डंका अब सब ओर गूंज रहा था।
जब तक पुरुषार्थ के आधार पर जप चलता है जब तक मंत्र अचेतन है। कई प्रकार के अनुष्ठान पराशचरण इत्यादि अचेेतन मंत्र को चेतन करने के लिए
किए जाते हैं। भगवान् की बात सुनकर महाराज युधिष्ठिर का हृदय आनन्द से भर गया। उनका मुखकमल प्रफुल्लित हो गया। अब उन्होंने अपने भाइयों को दिग्विजय करने का आदेश दिया। भगवान् श्रीकृष्ण ने पाण्डवों में अपनी शक्ति का संचार करके उनको अत्यन्त प्रभावशाली बना दिया। धर्मराज युधिष्ठिर ने संचयवंशी वीरों के साथ सहदेव को दक्षिण दिशा में दिग्विजय करने के लिए भेजा।
नकुल को मत्स्यदेशीय वीरों के साथ पश्चिम में, अर्जुन को केकयदेशीय वीरों के साथ उत्तर में और भीमसेन को भद्रदेषीय वीरों के साथ पूर्व दिषा में दिग्विजय करने का आदेश दिया। सब भाइयों ने राजा की आज्ञा ली और निकल पड़े। भगवान् भी उनके साथ गए। भक्ति का सबसे बड़ा सुख यह है कि भक्त के आगे भगवान् चलते हैं और उनके पीछे भगवान् का सारा वैभव। पाण्डव दिग्विजय को निकल पड़े हैं।

कोई भी कार्य शुरू करें तो ये जरूर ध्यान रखें...
हमारे यहंा हर कार्य को शुरू करने के पहले भगवान को याद किया जाता है। कहा जाता है कि भगवान को याद करके यदि कोई काम शुरू किया जाए तो उस काम में किसी तरह की कोई रूकावट नहीं आती। यहां भागवत में जो प्रसंग चल रहा है उसमें भगवान कृष्ण की पूजा सर्वप्रथम की गई।
धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान् श्रीकृष्ण की अनुमति से यज्ञ के योग्य समय आने पर यज्ञ के कर्मों में निपुण वेदवादी ब्राह्मणों को ऋत्विज, आचार्य आदि के रूप में वरण किया।
पाण्डवों ने द्रोणाचार्य, भीष्मपितामह, कृपाचार्य, धृतराष्ट्र और उनके दुर्योधन आदि पुत्रों और विदुर आदि को भी बुलवाया। राजसूय यज्ञ का दर्शन करने के लिए देश के सब राजा, उनके मन्त्री तथा कर्मचारी, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शुद्र सब के सब वहां आए।राजा युधिष्ठिर का प्रताप चारों ओर फैल गया। उन्हें चक्रवर्ती सम्राट मान लिया गया। भगवान की ऐसी कृपा रही कि कहीं कोई विरोध भी नहीं कर सका। भगवान को आगे करके जब कोई कार्य किया जाए उसमें कोई समस्या नहीं आती, जो आती है उसे भगवान खुद निपटा देते हैं।
अब सब लोग इस विषय पर विचार करने लगे कि सदस्यों में सबसे पहले किसकी पूजा अग्रपूजा होनी चाहिए। जितनी मति, उतने मत। इसलिए सर्वसम्मति से कोई निर्णय न हो सका। ऐसी स्थिति में सहदेव ने कहा-यदुवंश शिरोमणि भगवान् श्रीकृष्ण ही सदस्यों में सर्वश्रेष्ठ और अग्रपूजा के पात्र हैं।
उस समय धर्मराज युधिष्ठिर की यज्ञसभा में जितने सत्पुरुष उपस्थित थे सब ने एक स्वर से बहुत ठीक-बहुत ठीक, कहकर सहदेव की बात का समर्थन किया।यह विचार पांचों पाण्डवों के मन में था लेकिन अपने बड़े-बूढ़ों के प्रभाव को भी वे कम नहीं करना चाहते थे। ऐसे में सबसे छोटे भाई की सलाह काम आई। सलाह हमेशा लेते रहना चाहिए। कभी-कभी छोटों की सलाह मानकर काम करना भी श्रेष्ठ होता है। जैसे ही सहदेव ने श्रीकृष्ण का नाम लिया लोग हर्षित हो उठे।

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