सोमवार, 20 जून 2011

दादी की गोद नानी की लोरी

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सुदर्शन फाकिर द्वारा रचित और जगजीत सिंह की मखमली आवाज में ये पंक्तियां जब हमारे कानों में गूंजती हैं तो दिल और दिमाग बचपन के उन अलमस्त दिनों की याद में खो जाता है। दादा-दादी, नाना-नानी या बुआ-मौसी के पेट पर लेटकर कहानी सुनना, चंदामामा, चंपक और दीवाना पढ़ना और एलिस की तरह वंडरलैंड में खो जाना। सचमुच कोई भी शख्स अपने जीवन में बचपन के दिनों को कभी नहीं भूल पाता।
वह जमाना ही अलग था, जब बचपन के उस जादू भरे माहौल में दादी या नानी की गोद में लेटकर शूरवीर राजाओं, राजकुमारियों, राक्षसों और परियों की कहानी सुनते-सुनते रातें छोटी मालूम होती थीं, दिल में सुगबुगाता विस्मय आंखों में उतर आता था, मन के किवाड़ खुल जाते और कहानी का दामन थामकर मन खुले आसमान में बेरोकटोक विचरण करने लगता था। जीवन के न जाने कितने अनमोल सूत्र, कितने रहस्य, कितने सबक चुपके से मन में घर कर जाते और बचपन में बोए ये बीज जाने-अनजाने बड़े होने पर मुश्किल की घड़ी में हौसला देते।
‘आसमां में बिजली चमकी, बादल गरजे, मेघ बरसे और अबोध बाल-मन में सवाल उठा? सवाल के जवाब में दादी ने एक कहानी सुना डाली। डाल पर चिड़िया चहकी, शेर दहाड़ा, भूकंप आया, मनुष्य ने मनुष्य से दोस्ती की, प्रेम किया, युद्ध किया’, इस तरह हर छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी घटना से एक लोककथा जन्म लेती। एक कान से दूसरे कान, एक मुख से दूसरे मुख और एक मन से दूसरे मन में गूंजती लोक कथाएं सदियों से बहती रही हैं।
पंचतंत्र की कहानी हो या कछुए व खरगोश तथा चूहे की चिंदी या मां के कलेजे की कहानी, बच्चों के मनोरंजन के साथ-साथ ये कहानियां बच्चों को पर्यावरण से जोड़ने का काम भी करती थीं। रामायण, महाभारत, वेद, पुराणों की कहानियां व लोक कथाएं बच्चों में जिज्ञासा जगाती और बच्चे कई दिनों तक इन कथाओं से जुड़े रहते। ये कथाएं, कहानियां और सुरीली लोरियां उनमें नए संस्कार जगाती थीं।
यह वह जमाना था जब संयुक्त परिवार थे। एक ही घर में दादा-दादी, बुआ-मौसी, चाचा-चाची और बहुत सारे बच्चे डेरा जमाए रहते। गर्मी या दीवाली की छुट्टियां होते ही ननिहाल जाने का कार्यक्रम बनता, खानदान के सारे बच्चे एक-दूसरे से मिलने को उतावले हो उठते थे। इन संयुक्त परिवारों में बच्चे बड़े-बूढ़े से कहानी सुनने के लालच में न केवल दिनभर उनके पीछे रहते, बल्कि उनकी सेवा भी करते थे। परिवार के बुजुर्गो को भी अपने परिवार में मान-सम्मान मिलता, वे बच्चों के साथ अपने ही घर में कभी बेगाना महसूस नहीं करते थे। उनका बुढ़ापा सुरक्षित था। बच्चों के चारों तरफ संबंधों का आत्मीय संसार था। उस समाज में सुरक्षा व स्थायित्व था। जीवन का आनंद लेने के अपने तौर-तरीके थे। आंगन में बच्चे लूडो-कैरम, शतरंज, व्यापार, गिट्टे या ताश खेलने में मशगूल हो जाते थे।
खेल के दौरान गप्पेबाजी चलती रहती और बड़े-बूढ़ों की नसीहत व डांट-फटकार भी। दोपहर में खस की चटाइयां खिड़कियों पर डाल दी जाती थीं। पानी में आम, तरबूज ठंडे करने के लिए डुबो दिए जाते। शाम होते ही बच्चे बाहर मैदान में या बगीचे में उछलकूद करने के लिए निकल पड़ते। कीकली, छुपा-छुपी, कंचे, कबड्डी, गुल्ली-डंडा, ऊंच-नीच, विष-अमृत, गेंद-तड़ी, पतंग उड़ाने जैसे न जाने कितने देसी खेलों में बच्चों को एक-दूसरे को छकाने में बड़ा मजा आता था।
इन सीधे-सलोने परम्परागत खेलों में न चौड़े-विशाल मैदानों की जरूरत थी और न ही स्टेट्स सिंबल बने आज के महंगे साजो-सामान की। शाम ढलते ही आंगन या छत पर पूरे परिवार के सोने का कार्यक्रम बनता। आंगन पानी से धोए छिड़के जाते। बच्चे बिस्तर उठाकर छत या आंगन में जमाते। चांदनी रात में तारों तले दादी से कहानी सुनने का मजा ही कुछ और था। बच्चों का दादा-दादी व नाना-नानी के प्रति लगाव बढ़ता रहता था। सात समंदर पार के राजाओं, परियों और साहस व संघर्ष की इन कहानियों से बच्चों की इमेजिनेशन में चार चांद लग जाते और उन्हें एक नई प्रेरणा मिलती थी। कहानियां बच्चों की पहली पाठशाला होती थी।
रानी लक्ष्मीबाई और शिवाजी की बहादुरी, बीरबल की सूझबूझ भरी चतुराई, हरिश्चंद्र की सत्यवादिता, विवेकानंद और गांधीजी, शहीद भगत सिंह, सुभाषचंद्र बोस के त्याग, महानता और महाराणा प्रताप के संकल्प और साहस की कहानियों से बच्चों का चरित्र निर्माण तो होता ही था, साथ ही उन्हें ये कहानियां, लोककथाएं अपनी जड़-जमीन और संस्कृति से भी जोड़े रखती थीं।
जब बच्चे दादा-दादी से पौराणिक कथाएं और देश-विदेश की लोककथाएं सुनते तो उनका मासूम मन देश और काल की सीमाओं को तोड़ कल्पना शक्ति के सहारे नए मूल्य और आदर्शो को आत्मसात करता था। तब बच्चे-बच्चे होते थे। तब बच्चों का बाल-सुलभ भोलापन, जिज्ञासा, उत्सुकता, कौतूहल, चंचलता, मासूमियत प्रतियोगिता और प्रतिस्पर्धा की बलि नहीं चढ़ा था। बच्चों की गर्मी की छुट्टियों और धमा-चौकड़ी को स्कूली होमवर्क और कोचिंग क्लासेज ने चौपट नहीं किया था। पूरी छुट्टियां एड़ी-चोटी एक कर अव्वल आने की दौड़ में नहीं खपाई जाती थीं। न वीडियो गेम्स थे और न ही टीवी, कम्प्यूटर, इंटरनेट या मोबाइल का मोह। सूचनाओं और जानकारियों के हमले, दैनिक जीवन में व्याप्त हिंसा और अपराध ने उनकी मासूमियत को खत्म नहीं किया था।
भारी-भरकम बैग और भीषण प्रतिस्पर्धा ने बच्चों को असमय ही प्रौढ़ और तनावग्रस्त नहीं किया था। आज एकल परिवारों का जमाना है। मियां-बीवी और एक या ज्यादा से ज्यादा दो बच्चे। संयुक्त परिवार का चलन समाप्त हो गया है। शहर तो शहर, गांव में भी आज दो भाई साथ-साथ नहीं रहते। बच्चे विवाह होते ही माता-पिता से अलग रहने लगते हैं। पोते-पोती से अलग रहने वाले दादा-दादी परिवार से कट गए हैं। कहानी कहने-सुनने की परम्परा आज मनोरंजन के आधुनिक साधनों, टेलीविजन पर चैनलों की बाढ़ में लुप्त होती जा रही है। फिल्मों और टेलीविजन ने बच्चों के अबोध मन पर कब्जा कर उनकी सारी कल्पनाशीलता को लगभग खत्म कर दिया है। अपने देश की संस्कृति, परम्परा, इतिहास, सामाजिक मूल्यों से जुड़ी कहानियों के प्रति उनमें अब कोई जिज्ञासा नहीं दिखाई देती है।
यह सच है कि आधुनिक युग में टेलीविजन सूचना और मनोरंजन का पर्याय बन गया है। देश व दुनिया की तमाम गतिविधियों का प्रसारण कर लोगों में जागरूकता और दिलचस्पी पैदा करने में दूरदर्शन कुछ हद तक सफल रहा है, किन्तु इसके साथ ही विज्ञापनों के आक्रमण तले बच्चों के खेल, उनके खिलौने, उनकी सोच और उनकी आदतें सब मीडिया द्वारा संचालित हो रहे हैं। हम उन्हें छद्म धारावाहिकों की छद्म दुनिया, शक्तिमान के करतब और आपराधिक पृष्ठभूमि में पलते अनैतिक संबंधों की कहानियां परोस रहे हैं। दिन-रात टीवी देखना या वीडियो खेल खेलना मानसिक रूप से निष्क्रिय करता है।
यह बच्चों को सवाल करने या सोचने के लिए प्रेरित नहीं करता, यहां जो कुछ दिखाया जाता है वह एकतरफा होता है, इसलिए बच्चों को वही ग्रहण करना पड़ता है। यह बच्चों में तर्क या क्रिएटिविटी को प्रोत्साहित नहीं करता। टेलीविजन या कम्प्यूटर बच्चों को एक-दूसरे से काटकर अंतमरुखी और अकेला बना देता है। धीरे-धीरे उनमें तनाव बढ़ने लगता है। यही वजह है कि आज बच्चों में पहले से कहीं ज्यादा तनाव के मामले सामने आने लगे हैं। उन्हें तनाव मुक्त रखने के लिए मनोचिकित्सक की जरूरत पड़ने लगी है। पहले बच्चे कहानियों के जरिए साहित्य व समाज से जुड़ते थे।
तरह-तरह के सवाल उनके मन में उठते थे और घर के बड़े-बूढ़े अपने अनुभव व नजरिए से उनके हर सवाल का समाधान करते थे। पर आज हम दो हमारा एक और एकल परिवारों के चलन से बच्चे अकेले रहने के लिए बाध्य हैं। बढ़ती महंगाई और मां के नौकरीपेशा होने के कारण दादी या नानी के पास बच्चों को सुबह से शाम तक देखभाल के लिए छोड़ा जरूर जाता है पर जरूरत पूरी होते ही बच्चे और मां-बाप अपनी दुनिया में रम जाते हैं। बढ़ती प्रतिस्पर्धा और परीक्षा में अव्वल आने की होड़ ने बच्चों को कला, साहित्य और हमारे परम्परागत खेलों से दूर कर दिया है।
बढ़ती महंगाई और भौतिक प्रगति की दौड़ में दिन-रात भागते कामकाजी माता-पिता के पास बच्चों के साथ बोलने या उनकी सहज बाल जिज्ञासाओं का समाधान करने का वक्त ही नहीं है? ऐसे में बच्चे अपना ज्यादातर वक्त दूरदर्शन, वीडियो गेम्स और कॉमिक्स पढ़कर गुजारते हैं। ठांय-ठांय की आवाज के साथ तेज रफ्तार और मारधाड़ वाले तमाम कम्प्यूटर खेल बच्चों में हिंसक प्रवृत्ति को जन्म दे रहे हैं। ज्यादा समय दूरदर्शन देखने और रफ्तार वाले वीडियो खेल तल्लीन होकर खेलने से बच्चों की आंखों पर तो असर पड़ता ही है, शारीरिक कसरत न होने से मोटापा और अन्य बीमारियां भी बच्चों में आम हो गई हैं। इसमें कोई शक नहीं कि हमारे जमाने के बच्चों के मुकाबले आज का बच्च चीजों को कहीं ज्यादा जानता और समझता है। आज छोटे से बच्चे को यह मालूम है कि परमाणु अस्त्र क्या है, ओबामा और रोनाल्डो कौन है? अंटार्कटिका में रहने वाले पेंग्विन कितने खतरे में हैं? वेलेन्टाइन-डे क्या और कब होता है., वगैरह-वगैरह..।
पहले के जमाने में बच्चे एक खास उम्र के बाद ही दुनिया-जहां की खबर जानना शुरू करते थे। 5 साल तक तो दूध पीना और खेलना-कूदना ही चलता रहता था। अब तो दो-ढाई साल का शिशु बस्ता उठाए नर्सरी में पहुंच जाता है और एबीसी व कई कविताएं रटने की मानसिक कवायद शुरू कर देता है। सवाल यह नहीं है कि यह अच्छा है या बुरा, ऐसा होना चाहिए या नहीं, दरअसल आज के हालात में यह अनिवार्य हो गया है। बच्च न भी चाहे तो उसे चाहना होगा, जानना होगा, मासूमियत, जिज्ञासा आज बच्चों में खत्म-सी हो गई है। हममें से जो लोग छोटे शहरों, कस्बों या गांवों में पले-बढ़े हैं, उन्हें अच्छी तरह याद होगा कि बरसात शुरू होने से पहले घर में बड़ियां, पापड़, आलू के चिप्स, चावल के खीचे और ऐसी तमाम चीजें बनाई जाती थीं। पूरा घर ही नहीं पास-पड़ोस की औरतें भी जुट जातीं।
बच्चे भाग-भागकर पापड़, बड़ियां सुखाते। हर काम सामूहिक रूप से किया जाता। जाने-अनजाने बच्चे मिल-बांटकर काम करने और हर चीज बांटने का सबक सीखते, जो उन्हें परिवार से, फिर समाज से जुड़ने के लिए प्रेरित करता। हर छोटे-बड़े त्योहार पर घर में मेला-सा लग जाता था। ऐसे वक्त पूजा-पाठ, मिठाइयां, घर की साफ-सफाई आदि सभी कामों में बच्चों की अहम भूमिका होती थी। दीवाली के दिनों में खीर-पताशे से ज्यादा उत्सुकता दादी या नानी की संदूकची की हुआ करती थी। संदूकची के खुलने का बेसब्री से इंतजार होता था। संदूकची में यूं नया कुछ भी नहीं होता था पर दादी या नानी सालों से सहेजी हुई एक-एक चीज जिस मनोयोग से खोलकर दिखाती, वह बच्चों में ‘खुल जा सिमसिम’ की तरह जिज्ञासा जगाने के लिए काफी होता।
कपड़े-लत्ते, चांदी के सिक्के, पुरानी तस्वीरें, स्मृति-चिह्न — चीजें मामूली पर हर चीज एक समूची कहानी कहती हुई। ‘यह क्या है?’ पूछते ही दादी एक मजेदार कहानी सुनाती और बच्चे बड़े विस्मय से उसे सुनने में मग्न हो जाते थे। जीवन में जिज्ञासा का अपना एक महत्व है। जिज्ञासाएं अनंत मार्ग खोल देती हैं। अभी बहुत कुछ करना है — यह भाव बना रहे तो बच्चे खोजने, जानने की कोशिश करते हैं। सुनते हैं, पढ़ते हैं, सिर्फ नकल नहीं करते। आज भी मैं जिन चीजों से चमत्कृत होती हूं उन्हें सुनकर मेरा बेटा रत्ती भर भी प्रभावित नहीं होता। आज के बच्चे अधिक निडर और निर्भीक हैं।
आज 12-13 साल के किशोरों द्वारा बच्ची से ज्यादती बच्चे द्वारा अपनी मां की हत्या या परिवार के सदस्यों द्वारा पिता का कत्ल जैसी खबरें आम हो गई हैं। बच्चे डरें यह भला किसे अच्छा लगेगा। बचपन के डर बच्चे को धीरे-धीरे निडर बनाने के लिए कितने जरूरी हैं, यह किसी भी मनोवैज्ञानिक या काउंसलर से जाना जा सकता है। कौतूहल, डर, आशंका बच्चों को धीरे-धीरे बड़ा करते हैं। बचपन से ही निर्भीक, खुले बच्चों में उत्तेजना ज्यादा होती है। हाइपर एक्टिव बच्चों की संख्या हमारे समाज में बढ़ रही है। एकल परिवारों में दिन-रात अकेले रहते बच्चे माता-पिता का ध्यान खींचने के लिए ऊधम मचाते रहते हैं या ऐसी हरकतें करते हैं, जिससे उन्हें कोई नजरंदाज न करे।
संयुक्त परिवारों में दादा-दादी की छांव तले पले बच्चे खुद को उनके आगे हमेशा बच्च बना रहना पसंद करते थे। आज शहरों में व्यस्त जीवन के चलते बच्चों का परिवार के रिश्तेदारों, दादा-दादी, नाना-नानी या दूर के बहन-भाइयों के साथ संबंध व संपर्क न के बराबर हो गया है। एक वक्त था जब माता-पिता से रूठने या झगड़ने पर किशोर-किशोरियां अपने दादा-दादी की शरण में पहुंच जाते थे और अपने मन की भड़ास शांत करते थे। घर के बड़े-बूढ़ों की बच्चों को गलत राह पर भटकने से रोकने में एक अहम भूमिका होती थी। निराशा या तनाव के वक्त वे बच्चों के साथ लगातार संवाद बनाए रखते थे, जिससे बच्चे कभी खुद को अकेला महसूस नहीं करते थे।
आधुनिकता की अंधी व अंतहीन दौड़ में हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि समाज के प्रति हमारा कर्तव्य बच्चे को जन्म देने से कहीं अधिक एक स्वस्थ अंग के रूप में उसे समाज से जोड़ना है। बदकिस्मती से बच्चे आज एकतरफा संवाद करने के लिए बाध्य हैं। उनकी सुनने, जिज्ञासा शांत करने वाला कोई नहीं है। ऐसे में वह सही-गलत का अपने ही हिसाब से विश्लेषण करते हैं और गलत दिशा में भी बढ़ सकते हैं। एक ऐसा मुल्क, एक ऐसी संस्कृति, एक ऐसा समाज और एक ऐसी नैतिकता जिसका हम बखान करते कभी नहीं थकते, उस मुल्क में आज हमारे पास अगर बच्चों को देने के लिए प्यार की भाषा, लोककथाएं, कहानियां और लोरियां नहीं हैं, जीवन के आदर्श और सामाजिक मूल्य सिखाने का वक्त नहीं है तो हम भविष्य में उनसे प्यार भरे दो मीठे बोल सुनने की उम्मीद कैसे कर सकते हैं?

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